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Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator? Currently working at media culture lab, social designing and engineering, human robotics.

Thursday, January 11, 2024

हूबहू जैसे Biomimicry? या जीव रोबॉट्स?

जीवित जीवों की या प्रकृति की नक़ल (Biomimicry)

सामाजिक घड़ाईयाँ और मानव रोबोट बनाकर, इंसानो का दुरुपयोग, खुद उनके खिलाफ और उनके अपनों के खिलाफ कैसे हो रहा है? इसे समझने के लिए पहले, इन तरह-तरह के जीव रोबोट्स को देखो। शायद आपको कुछ समझ आए। 


कैसे बनाते हैं ये रोबॉट?
कौन बनाता है, ऐसे-ऐसे रोबोट?

क्या कुछ जानकारी चाहिए, अलग-अलग जीवों जैसे रोबोट बनाने के लिए? हर जीव एक मशीन है। कोई आसान-सी मशीन और कोई बहुत-ही जटिल। इन सब मशीनों में मानव सबसे जटिल मशीन है। जितना ज्यादा फालतू दिमाग, उतनी ही ज्यादा जटिल मशीन। ज्यादातर मशीने जीवों के अध्ययन से बनती हैं। ऐसे ही जीव रोबोट्स। 

क्यूँकि इंसान भी एक मशीन है। मगर, कुछ ज्यादा ही जटिल मशीन। इसलिए मानव रोबोट बनाने के लिए इस जटिल जीव का अध्ययन जरुरी है। ठीक ऐसे ही जैसे, बाकी जीवों का। मगर, मानव सभ्यता और मानवाधिकार उसमें आड़े आते हैं। सिर्फ तब तक, जब तक आपको अध्ययन करने के गुप्त तरीके पता नहीं होते। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास वो गुप्त तरीके हैं। जिसे हम सर्विलांस बोलते हैं। सही शब्द Mass Surveillance । जिसका दुरुपयोग दुनिया भर की राजनीती (सिविल की या मिलिट्री की) भी कर रही है और बहुदेशीय कम्पनियाँ भी।  

हूबहू सामाजिक घड़ाईयाँ उसी का परिणाम हैं। जिसे दुनियाँ भर की ज्यादातर जनसंख्याँ भुगत रही है। जिन्हें वो समझ आ रहा है और जहाँ-जहाँ वो समझ आ रहा है, वहाँ-वहाँ उसके खिलाफ आवाजें भी उठ रही हैं। और उसके इंसान पर दुस्प्रभावों पे अध्ययन भी हो रहा है। इन दुस्प्रभावों में रिश्तों के जोड़-तोड़ से लेकर राजनीतिक बीमारियाँ, खास तारीखों पे पैदाइश और मरण भी है। इसके इलावा, बाजार और राजनीती या कहो कुर्सियों की मार-काट तो है ही।  आओ, आपको ऐसे ही एक छोटे से अध्ययन पे, अपने साथ लेकर चलती हूँ। मगर, उससे पहले थोड़ा सिस्टम को समझेंगे। जीवों के या कहो मशीनों के सिस्टम को।  

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