About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Thursday, March 16, 2023

फुट डालो, राज करो-- राजनीती!

उन्हें ये तो मालुम है, की जो कुछ हो रहा है, वो सही नहीं हो रहा। मगर, ये सब गड़बड़ क्यों और कैसे हो रहा है, ये नहीं मालूम।  

ज़्यादातर बच्चे इस कुंबे में माँ-बाप में से किसी एक ने पाले हैं, क्यूँकि दूसरा किसी भी कारणवश दुनियाँ में ही नहीं रहा। इस कुन्बे की ज़्यादातर लड़कियाँ युवावस्था में ही, किसी भी कारणवश वापस घर बैठ गयी। और भी कुछ-कुछ ऐसा ही, इस दौरान सुनने में आया। काफ़ी हद तक हकीकत भी। क्या कारण हो सकते हैं?  ये सब सुनकर या जानकार, सीधा सा प्रश्न दिमाग़ में यही आएगा। 

किसी भी मौत के बाद का शौक समय, खासकर तेहरवीं तक का, मेरे लिए पहली बार इतने पास से देखने-समझने का था। इतने सारे सवालों के साथ-साथ, कहीं न कहीं, बहुत से जवाब भी लिए हुए था।  

राजनीती 

उनमें, राजनीती और उसकी क्रूरता और निर्दयता एक है। मौत पे भी राजनीतिक जुआ! -- Kinda Checkmate! आप राजनीती को पसंद करते हैं या नहीं? आपके आसपास कोई राजनीती में है भी, या नहीं?  ये सब भी जरूरी नहीं है। राजनीती फिर भी, आपकी ज़िंदगी का हर पहलु तय करती है। 

फुट डालो, राज करो 

ये वो जुआ है, जिसमें राजे-महाराजों ने पुरे समाज को ही एक दुसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया हुआ है। जो जितने बेवकूफ़ हैं, वो उतने ही राजे-महाराजों के सैनिक ज्यादा हैं। वो, जो ये तक नहीं सोच सकते, की इसमें तुम्हारा अपना या अपनों का कितना भला है? 

फुट डालो राज करो, जैसे उनकी माँ, बेटी या बेटे की आपस में नहीं बनेगी, तो तुम्हारा भला होगा। वो या ये, घर बैठेगी या बैठेगा, या इसकी या उसकी आपस में बिगड़ेगी, तो मेरा वैवाहिक वक़्त ठीक होगा। वो गाँव आ गया या आ गयी तो हमारी नैया पानी में गयी। वो शहर गया या गयी तो हमारी। और भी पता नहीं क्या-क्या! वैसे इसमें अज़ीब जैसा क्या है? इंसानी फिदरत है। खासकर, अंदर से असुरक्षित या कमज़ोर इन्सान की? या कुछ ज़्यादा ही ठाली इंसानो की? 

या शायद कुछ और भी है? राजनीतीक जुआ? और इन असुरक्षित मह्सूस करने वाले इंसानों के दिमाग़ में, अलग-अलग पार्टीयों द्वारा, भेझे में ठूस-ठूस कर भरा गया कूड़ा? ये वो है, जो होता है, मगर दिखता नही। या यूँ कहें , "जो होता है, वो दिखता नहीं और जो दिखता है, वो होता नहीं"? या शांत दिमाग से देखने-समझने लगो -- दिखेगा भी, और समझ भी आने लगेगा, की जो दिख रहा है या सुन रहा है, उसके पीछे वज़ह क्या हैं?   

इसका सबसे बुरा असर किसपे होता है? शायद बच्चों पे? और बुज़र्गों पे? 

Friday, March 10, 2023

होलिका दहन (7.3.2023)

बचपन से बहुत बार होलिका दहन देखा या ज्यादातर सुना। बहुत सालों बाद, अबकी बार जो देखा, वो होलिका दहन के नाम पर एक डरावना-सा सांग था। किसी मंदिर के नाम पे कोई राजनीतिक तांडव जैसे। आगे ट्रैक्टर, पीछे ट्रॉली। ट्रॉली में आग की लपटें ऐसे जैसे -- (some assisted murder). 

(I will write with time about that in details, how that happened? Rather must say kinda enforced by creating such conditions? And creations of such conditions are not that difficult by experts of political designs and political fights. Common people must be aware about such things to stop them). Read somewhere some term about that I guess, Cult Politics? Sinister designs, by twisting or altering, manipulative ways to represent something contrary? 

उन लपटों से पहले आसमान में धुएँ का कहर, सामने गली से ऐसे गुजर रहा था, जैसे लीलता जा रहा हो, गली दर गली, धुआँ ही धुआँ। 

कहते हैं, किसी समाज को, वहाँ के जनमानस को, उनकी खुशहाली या समस्याओं को जानना है तो उनके रीतिरिवाज़ों को जानना बहुत जरूरी है। रीतिरिवाज़ बताते हैं वो समाज अपने जनमानस को कैसे जोड़ता है या तोड़ता है। ऐसे ही, शायद जानना जरुरी है उन रीतिरिवाज़ों में आते बदलाओं को -- क्यूँकि वो बदलाव आईना होते हैं उस बदलते समाज का, भले के लिए या बुरे के लिए। बदलाव आगे बढाते हैं या पिछड़ा बनाते हैं? औरतोँ को, बच्चोँ को, समाज के कमज़ोर तबके को शशक्त करते हैं या दबाते हैं?        

Wednesday, March 8, 2023

मानव-संसाधन और सामाजिक-घड़ाई

थोड़ी दिशा मिले तो 

चल निकलेंगे 

ऐसा मेरा विश्वास है 

बेकार नहीं हैं वो 

दिशाहीन कह सकते हैं 

वो भी, अज्ञानता की वजह से 


मानव संसाधन (Human Resource) का ज्यादा ज्ञान तो नहीं मुझे, पर शायद थोड़ी-बहुत समझ  जरूर है।  इंसान, बेरोज़गार तो हो सकते हैं, मगर बेकार नहीं।  बेकार है तो वो सिस्टम, वो सामाजिक-राजनितिक तानाबाना, जो उन्हें सही दिशा नहीं दे पाता। क्यूँकि अपने-अपने निहित स्वार्थों के लिए उन्हें ठाली लोगों की एक फ़ौज़ चाहिए। सब अपने-अपने काम लग गए, तो "टुकड़े डालो, कुत्ते पालो" या प्रश्न करने वालों के लिए "लठ्ठ लाओ, मार भगाओ", वाली सोच की राजनीती कैसे चलेगी?

फुट डालो, राज करो के शिकार हैं ये। जिन्हे अपने ही आसपास के लोगों को नीचे गिरने या गिराने में अपना फायदा नजर आता है। जहाँ से ये प्रचंड चल रहे हैं और जो लोगों को अपने शिकार कर रहें हैं, उन लूकी-छिपी-सी गुफाओं की समझ भी नहीं है इन्हे। वैसे ही, जैसे मुझे नहीं थी। इन्हें मालूम ही नहीं की इनका रोबोट्स की तरह इस्तेमाल करने वाले खिलाड़ी, दूर बैठे भी कैसे इनकी ज़िंदगियों को रिमोट कंट्रोल कर रहे हैं। इन्हें लगता है, सबकुछ ये खुद ही कर रहे हैं। 

 हक़ीकत हाँ में भी है और ना में भी 

हाँ -- क्यूँकि ऐसा होता प्रतीत हो रहा है, दिख रहा है 

ना खुद नहीं कर रहे -- क्यूँकि इन्हें मालूम ही नहीं लैब कैलिब्रेशन्स (Lab Calibrations) कैसे होते हैं? और सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) क्या है?

कौन और कैसे उन्हें बदल सकता है? तोड़, जोड़, मरोड़ सकता है? विचलित या भर्मित कर सकता है ? चालाकी से, धूर्तता से, दिमाग से इधर से उधर कर सकता है? वो, जो उन्हें चोबीसों घंटे अध्ययन या अवलोकन पर रखता है। उसे इंटेलीजेंसीआ भी कहते हैं। वैज्ञानिक, डॉक्टर, प्रोफेसर, इंटेलिजेंस शाखाएँ -- सिविल या फ़ौज़ और पत्रकार शायद यही सब करते हैं। 

समाज अपने आप में एक बड़ी लैब है --सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) अर्थात सामजिक तानेबाने को समाज के हित के लिए सँरचना, घड़ना।  घड़ना, वैसे ही, जैसे कुम्हार घडता है। जुलाहा बुनता है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे पक्षी बुनते हैं, रेशमी कीड़ा बुनता है, मधुमखी बुनती है।  सुनार तापता है।    

या सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) -- राजनीतीक लाभ के लिए या बड़ी-बड़ी कंपनियों के फायदे के लिए, राजे-महाराजों के लिए करना। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे गीद्ध झपटता है,  मकड़ी बुनती है, शेर, चीता घात लगाते हैं, शिकार करते हैं --छुपकर, स्फुर्ति से, कोई छद्धम युद्ध जैसे। 

मोबाइल आज के वक़्त, सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) का सबसे बड़ा हथियार है। और प्रोद्योकी  (technology), किसी भी फॉर्म में उसका अभिन्न अंग।  ज्यादातर ऐसे लोगों को आज भी पता नहीं है की दिनरात जिस मोबाइल को वो साथ लिए घुमते हैं, वो क्या-क्या करता है? और  किन-किन के लिए करता है? कैसे ये लोगों की ज़िंदगियों को रिमोट कंट्रोल करता है? छद्धम युद्ध के सैनिकों की तरह कौन-कौन इसमें घुसे बैठे हैं?   

मानव-संसाधन के लिए इन सबकी जानकारी, ज्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत लाभकारी तो जरूर होगी।