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Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Wednesday, July 19, 2023

हकीकत, आभाषी, और मिथ्याभाषी दुनियाँ?

हकीकत की दुनियाँ?

आभाषी दुनियाँ?

मिथ्याभाषी दुनियाँ?

और खिचड़ी दुनियाँ?   

और भी पता नहीं कैसी-कैसी दुनियाँ? 

जैसे हकीकत के जीव, फोटोजीव, विडियोजीव? और भी पता नहीं कैसे-कैसे जीव?

चलो इसे थोड़ा अपने नेताओं के सफाई अभियान से समझते हैं।  

कुछ लोग होते हैं जो सही में सफाई पसंद होते हैं। कुछ दिखावे के सफाई पसंद होते हैं। दिखावे वालों को हकीकत की इमेज से ज्यादा, शायद सामाजिक इमेज ज्यादा पसंद होती है। अब इमेज के अपने फायदे-नुकसान हैं। तो बनाने में क्या जाता है? जैसे एक झाड़ू उठाओ, थोड़ा सफाई करते फोटो करवाओ और दुनियाँ को दिखाओ। देखो कितना सफाई पसंद लोग हैं। या गरीबों को दान-दक्षिणा दो और फोटो करवाओ या विडियो बनाओ और डाल दो ऑनलाइन। कितने दयालु लोग हैं? पब्लिक जगहों को साफ़ करने वाले लोग? स्टेजों पे, प्रोग्रामों में दान देने वाले लोग? ऐसे लोगों की हकीकत सच में वही होती है? या धोखा, दिखावा? उसके बदले कुछ ज्यादा पाने की खातिर? दोनों ही सच हो सकते हैं शायद। इंसान-इंसान पे निर्भर है। 

बहुत से ऐसे लोग, जो ऐसे-ऐसे ऑनलाइन फोटो या विडियो डालते हैं, यहाँ सफाई अभियान का हिस्सा, वहाँ सफाई अभियान का हिस्सा। यहाँ दान, वहाँ कल्याण में दिखते हैं, फोटो या विडियो में। क्या वो अपने खुद के घरों या आसपास का भी ऐसे ही ध्यान रखते हैं? या वहाँ की हकीकत कुछ और ही होती है? कई बार तो उनके अपने खाली प्लॉट, पुराने-घर सड़ांध मार रहे होते हैं, जहाँ अक्सर उनका बचपन बीता होता है। और उनके बाहर ताले लटके होते हैं। कभी-कभी तो इतने टूटे-फूटे से मकान, की अड़ौसी-पड़ोसियों को भी खतरा रहने लगे। कई पडोसी तो शायद बोल भी चुके हों ऐसा कुछ कई बार। थोड़ा बड़े होते ही, कुछ लोग तो ऐसी-ऐसी जगह शायद आना-जाना तक पसंद नहीं करते। हालाँकि, उनका बचपन वहीँ गुजरा होता है। और धरोहर बताते हैं, वो ऐसी-ऐसी जगहों को? जैसे हाथी के दाँत खाने के और, और दिखाने के और? थोड़ा ज्यादा हो गया शायद? सफाई पसंद लोगो, आओ ऐसी-ऐसी जगहों की भी खबर लें।

ये कैसा संसार और कैसा लोकतंत्र?

हम उस महाभारत की दुनियाँ में नहीं हैं, जहाँ राजदरबार में पाँडव और कौरव आमने-सामने हैं और मामा शकुनि अपने खास अंदाज में, भाँजे दुर्योधन कहके गोटियाँ फेंक रहा है। और कह रहा है, ये भी गई। ये भी गई। और ये भी। भांजे युधिष्ठर! कुछ और है दाँव पर लगाने को?

हम उस महाभारत की दुनियाँ में हैं, जहाँ इन जाहिल जुआरियों, जो अपने आपको योद्धा कह रहे हैं और बेहुदा किस्म के खिलाडियों के लिए, हर इंसान एक गोटी/कोड है। वो कोड जिसके नाम पे या कहो नंबरों पे, या मिश्रित चिन्हों पे, राजनीतिक पार्टियाँ चाल (दांव) चलती  हैं। आखिर सबजन राजा-महराजाओं की ही तो प्रॉपर्टी हैं? भला वो इंसान थोड़े ही हैं? उनके कोई अधिकार थोड़े ही हैं, जो उनको चलने से पहले, उनसे पूछा जाए या इजाज़त ली जाए?  

क्यों धर्तराष्ट्र महाराज? अब ये धर्तराष्ट्र और इनके राजदरबारों में, चारों तरफ बैठे बड़े-बड़े लोग, न्यायलय और उनके न्यायधीश? बेचारे! बिलकुल महाभारत की तरह मुसीबत में फँसे, लंजु-पंजु हुए, कोई भीष्मपितामह जैसे? या ये भी किसी पार्टी के योद्धा (खिलाड़ी) हैं? या कहना चाहिए मात्र कोड हैं। कौन सा कोड कहाँ बैठेगा, ये भी ये गुप्त सिस्टम बताता है।  

इस महाभारत में, कितनी ही गोटियाँ, कोड आप जैसे, हम जैसे, पता नहीं कब और कहाँ भेंट चढ़ जाएँ। इन खिलाडियों/जुआरियों के checkmate/s के दाँवों पे! कहीं accidents में, कहीं बिमारियों में, कहीं रिश्तों में फेंकी गई दरारों में। कहीं ऐसे, तो कहीं वैसे, जालों में, जंजालों में।

इन जुआरियों से परे, कथित खिलाडियों से परे, इन राजाओं और राजदरबारों से परे, कोई और जहाँ भी है क्या? होना तो चाहिए। वो संसार, जहाँ कोई इंसान, अगर इनका हिस्सा न होना चाहे या इनकी रची बेहुदा दुनियाँ से परे रहना चाहे, तो रह सके। उस संसार में जिसमें लोकतंत्र है, जुआरियों से परे, शिकारियों से परे। उस संसार में जहाँ सजा है, कुर्सियों पे बैठकर गुंडागर्दी करते या करवाते, शामिल होते या जुर्मों के खिलाफ आँख  बंद कर बैठे अधिकारियों के लिए। जहाँ जुर्म भुगतने वाले को अपना ऑफिसियल घर और नौकरी नहीं छोड़नी पड़ती, क्युंकि जुआरियों के गुप्त दाँवों के अनुसार ऐसा ही होना है। बल्की ऐसे करने या करवाने वाले अधिकारीयों को सिर्फ वो कुर्सियां ही नहीं छोड़नी पड़ती, बल्कि जेल भी जाना पड़ता है। ये कैसा संसार और कैसा लोकतंत्र, जहाँ डर ही नहीं है, इन कुर्सियों पे बैठे जुआरियों या जुआरियों का साथ देने वाले अधिकारियों को?  

मुझे 2018 में, जब इस संसार और इन गुप्त लोकतंत्रों के नाम पे धब्बों की खबर होने लगी थी, तो मेरी दुनियाँ तो उल्ट-पुलट हो चुकी थी। ऐसा जानकर-समझकर, किसी भी आम इंसान की होनी थी। क्युंकि जो मुझे दिखाया जा रहा था, वो दुनियाँ, वो थी ही नहीं, जिसे इस दिमाग ने बचपन से देखना और समझना शुरू किया था। जिन्हें योद्धा और खिलाडी कहा जा रहा था, उनकी जगह, मुझे सिर्फ और सिर्फ, चाल चलते, घात लगाते, checkmate करते, जुआरी और शिकारी नजर आ रहे थे। उस ऑफिस और कैंपस में, मैंने इन कोडों को समझने के लिए ही, बेवजह बंद पड़े स्टोरों और लैबों के ताले तोड़ उन्हें खोलना शुरू कर दिया था। तब तक भी मालुम नहीं था की वो सिर्फ academics वाले ऑफिस की राजनीती की वजह से बंद नहीं थे, बल्की उनके पीछे तो उससे कहीं बड़ी राजनीती थी। धीरे-धीरे वो भी समझ आने लगा था। उसके बाद 2018 में ही VC ऑफिस में एक खास मीटिंग के बाद, मेरा Psycho पहुंचना, वो इंजेक्शन और वो हिमाचल में चैल के स्कूल का विजिट। किसी ऐसे स्कूल का, भला एक यूनिवर्सिटी में टीचर से क्या लेना-देना? और मेरा वहाँ से नौ, दो, ग्यारह होना।   

उसके बाद की चालें, यूनिवर्सिटी घर छोड़ो। मेरा ओमेक्स में किराए पे घर लेना। 2-महीने किराया भी देना, मगर चालों को समझते हुए शिफ्ट न करना। क्युंकि ड्रामे हर कदम पर बहुत कुछ कह रहे थे। 

अब इलाज तो होना ही था। आखिर चिड़िया पिंजरा तोड़ कहाँ तक उड़ेगी? और 2019 की कैंपस मार-पिटाई! अब तो इस दुनियाँ को जानना और जरूरी हो गया था। नहीं?             

Friday, July 14, 2023

Cult Politics (लगान-राजनीती?)

Cult Politics हिंदी में उचित शब्द क्या होगा इसके लिए? लगान-राजनीती? कभी गोरों की, तो कभी कालों की? या यूँ कहें की कभी गैरों की, तो कभी अपनों की?    

14.07.2023 (Around/After 4.00 PM) शिव मुर्ति स्थापना और मंदिर वही होलिका दहन (7.3.2023) वाला? पहली बार देखा गया अजीबोगरीब और डरावना-सा-होलिका-दहन। गुप्त कोड हैं क्या किसी पार्टी के, ऐसे-ऐसे धर्मों के प्रचार-प्रसार में? आप क्या कहते हैं?     

आभासी दुनियाँ पे राजनीती के तड़के: भगवानों की हकीकत बस इतनी-सी है? आप सोचिए। इस विषय पर आने से पहले ये पढ़िए:     

तिकोने लाल रंग के झंडे और पीला उसके बहार। हरयाणवी नाच-गाना। गाने के बोल-- तु राजा की राजदुलारी --

उसके पीछे-पीछे दूसरा ट्रेक्टर, झंडा नारंगी। 

शिव मूर्ति स्थापना?        

पहली बार कब सुना था ये गाना? 2009? FB वाल Y-D 

शायद ये?   


और आज का राज? 
नीचे बोलती तस्वीर और गाना?
बड़ा ही उलझ-पुलझ 
खेल काफी पुराना।   

"धुम्मां ठा दिया कती" 
नीचे जो शिव के अवतार की फोटो है--
"धुम्मां ठा दिया कती" इसी को कहते हैं क्या?
सोचो, कैसे-कैसे तो भगवान पाल रखे हैं हमने?
इनकी मुर्तियाँ दूध भी पी जाती हैं?

चाहे छोटे-छोटे गरीब बच्चों तक को देने को दूध ना हो, ऐसे भगतों के पास! अपनी या किसी अपने की लगा के देखो न एक-आध मूर्ति, क्या पता वो भी पीती हो दूध? और दूध ही क्यों? पानी, चाय, लस्सी, नीम्बू-पानी, कॉफ़ी, शरबत और भी पता नहीं कितनी ही तरह के जलपान। पिला के तो देखो। 
मुर्ति-पूजा पे इतना सांग और इतना खर्च? ये सब किसी गरीब को दो तो शायद ज्यादा भला होगा। उसपे मंदिरों के चढ़ावों पे पुजारियों के जूत बजने भी कम हो जाएंगेनहीं?
      

ऐसे-ऐसे भक्तों की भी कमी नहीं मिलेगी, जिन्हें इंसानों से कैसे व्यवहार करते हैं, चाहे ये तक न पता हो। मगर ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे भक्त बने जरूर घुम रहे होंगे। या ज्यादातर ऐसे ही लोग भक्त होते हैं?

राजनीती के भगवानों के उप्पर अगर घर के भगवानों को रख दें, तो शायद कुछ दब जाएँ ये ताँडव-वाले?
राजनीतिक-भगवान? 
भगवान और ताँडव?  
भगवान और धुआँ-धुआँ?
भगवान और भाँग? 
और भी पता नहीं क्या-क्या!     
ये सामंती-व्यवस्था, गरीबों के किस काम की?
और सबसे ज्यादा भक्त भी गरीबों और कम पढ़े-लिखों में ही मिलेंगें। 

थोड़ा भी पढ़ा-लिखा और इन ऐसे-ऐसे भगवानों का जानकार व्यक्ति, शायद यही कहेगा,
 मोदी जेलर, यहाँ तो विकल्प है -- अंगुठा या हस्ताक्षर। 
आप जबरदस्ती उठा के जेल में रोक के उंगलिमाल या अँगूठामाल बनना चाहते हो क्या? 
थोड़ी बहुत तो शर्म करलो आदमखोरो। जेल भेझेंगे क्या सच लिखने या बोलने पर भी? कितनी बार?    
   

आभासी या थोपे हुए लॉर्ड्स पे या बुत्तों वाली मूर्तियों पे, हमने तो अपने भगवान धर दिए, अपने वाले मंदिर में।  
इनके भगवानों की ये जाने। समझ अपनी-अपनी और भगवान भी अपने-अपने।

कुछ-कुछ ऐसा ही पहले भी लिख चुकी शायद?
पढ़ने के लिए दिए गए लिंक को चैक करें  पथ्थरों में भगवान या मंदिर?

Tuesday, July 4, 2023

Two Years of Writing?

The first year of writing since an enforced resignation in June 2021, was good from the point of publishing "Campus Crime Series Cases". I wrote a post on the same last year also. Check the given link:

How was the writing break?

How was this year from that point of view?

This year was more than a writing year. It was the year, when I started shifting from university campus house to my home in village. Any shift takes time in adjustment. On that, when you don't know for how long you would be there. And what would be the next destination. My choice, since almost a decade is Europe. But leaving India, especially after corona pandemic seems a bit difficult task. Rather should say, I am nomore that much travel loving person as I used be earlier. Or probably, it's true about most people after corona? I have become suspicious of so many things. Just wanna have a base somewhere along with India and wanna write and write. 

Though first choice is Europe but things seem interesting elsewhere also. Writing, editing, journalism and science communication in the form of what they started calling story telling? And issues of importance are governance, system and impact on human beings. How media plays its role in that?  

To some extent, I have already started Social Case Studies. But unlike Campus Case Series, it's a bit difficult to write about them. These are not straight forward official documents that one can collect, analyze and convert into a case study book. I guess, I also need to learn how to hide people's and places identities, without loosing the essence of fact files. Some personal losses during this time period made me more determined to do whatever I am doing. It's important for common people, for any welfare society. Publications have been stopped for a while or should I say got delayed due to many factors. By next year, when I will be writing some post like this, hope I will have something better.

Monday, July 3, 2023

दोहरी मार

अनपढ़ गंवारों, -- भोले-लोग बोलना चाहिए शायद, जिन्हें आसानी से बहकाया या इधर या उधर किया जा सकता है, की कहानियाँ तो बहुत सुनी होगी आपने? कैसे बाबे, भोले लोगों को अपने जाल में फँसाते हैं? उनकी औरतों का शोषण करते हैं और एक-आध आदमी को घर से भी उठा देते हैं। कभी-कभी तो दुनियाँ से ही। यही नहीं, इसका जिम्मेदार भी वो, घर के ही किसी आदमी को ही ठहरवा देते हैं। इसे बोलते हैं, एक तीर से दो वार। पीछे की किसी तंत्रिक-विद्या या तंत्र का अर्थ कुछ लोगों ने, कुछ अजीबोगरीब बाबाओं से जोड़ दिया शायद। घोरी, अघोरी और पता नहीं क्या-क्या बकवास। यहाँ विज्ञान, तर्क और संवाद की बात मिलेगी। जो ऐसे-ऐसे बाबाओं से बिलकुल उल्टा है। या यूँ कहो की ऐसे-ऐसे लोगों की पोलपट्टी खोलने का काम करता है। ठीक वैसे ही, जैसे टोने-टोटके और उनके पीछे छिपे जुर्म या राजनीतिक रंगमंच के Show, Don't Tell की कहानियाँ। चालें चलना (Tricks), कोई जादु नहीं है। क्युंकि, इनमें आमजन को जो दिखाया या सुनाया जाता है, हकीकत उसके परे होती है। गुप्त होती है।
    
जहाँ फुट डालो राज करो में, न जाने कैसा-कैसा भूसा, लोगों के दिमागों में डाला जाता है। ऐसा ही कुछ, यहाँ-वहां की कहानियाँ हैं। 

कोई कहे की लड़कियां दो हैं और लड़का एक। शादी तो एक की ही हो सकती है। 
चलो कोई नहीं। दूसरी की कहीं और हो जाएगी या न होगी तो भी चलेगा। सारी दुनियाँ कहाँ शादी करती है? फिर बच्चे तो गोद भी लिए जा सकते हैं। उससे अच्छी फॅमिली क्या होगी, जहाँ जरूरतमंद बच्चों की मदद भी हो सके और बेवज़ह लोगों से बचा भी जा सके।  
ना। दूसरी की भी तब होगी, जब एक की ऐसी-तैसी होगी। और बच्चे आपको गोद लेने नहीं दिए जाएंगे। यहाँ किसी बच्चे को भी सामान्तर केस घड़ाई में धकेला जाएगा। वो भी उसके अपने और आसपास के गवाँरपट्ठों को शामिल करके। 
ये कैसे लोग हैं? और कैसी शादी? बेहुदा लोग बच्चों तक को नहीं बक्शते? 

बाबाओं के जालों में फंसे हुए अनपढ़-गँवार (अंजान, अनभिज्ञ) लोग? अरे नहीं, इनमें पढ़े-लिखे बाबाओं के जाल में फँसे, पढ़े-लिखे गँवार भी मिल जाएंगे। फिर कम पढ़े लिखे लोगों को क्या बोलें?   

लड़कियाँ दो हों। एक की शादी हो रखी हो। मगर अपने मायके बैठी हो। जिस किसी भी वजह से या झगडे से। या आपस में बनती न हो। जो सिंगल हो अगर उसे बोला जाए, की तू अपनी ऐसी-तैसी करवा, उसकी गृहस्थी सही तब चलेगी। 
ये कैसी गृहस्थी? और ये कौन लोग हैं ये सब बोलने वाले? ऐसे लोग अपने हो सकते हैं क्या? या गँवार ही कुछ ज्यादा है? उसपे अपने को समझदार होने का ढिंढोरा भी पीट रहे हों?   

लड़के की बीवी, बच्चे समेत घर बैठी हो। और किसी पड़ौसी की लड़की को बोला जाए की तू इसका जुठा बल्ला- बल्ला खा ले, तो वो वापस ससुराल आ जाएगी। या पड़ोस की विधवा औरत को कुछ और अनाप-सनाप। 

इनके लड़की हो गयी। लो भई हो गया 50-50 
इनके लड़का। ये हुआ ना अब 100 % 

आम आदमी को तो शायद यही समझ आएगा की कैसे बेहुदा गँवार लोग है। नहीं ? मगर इन इतनी महान सोच के लोगों को कैसे समझ आता होगा ये सब ? या इनके दिमाग में ऐसी खरपतवार कहाँ से आती होगी? उसपे कुछ लोगों को ये भी समझ आ रहा हो की कहाँ और कैसे जाहिलों के बीच फंसे हो, निकलो वहाँ से।   

गुफाओं को टटोलें और इन सबके तार कुछ महान, इधर या उधर के राजनीतिक घरानों या उनके आसपास के जंजालों के आसपास मिलेंगे। जो दिमागों की Programming में माहिर है। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ, अपने उत्पाद बेचने में। आदमी भी ऐसे लोगों के लिए किसी उत्पाद से ज्यादा नहीं है। ऐसे जालों की सबसे खास बात, की अगर इनके कोई पढ़ा-लिखा, तर्क करने वाला इंसान पल्ले पड़ गया या पड़ गई, तो सोचो क्या होगा? शायद उस इंसान की अब खैर नहीं?    

दिमागों की Programming को कैसे समझा जाए? संपादन (Editing), खासकर Registry Editing से जो समझ आया। इनके जानकार, शायद मुझसे कहीं ज्यादा बता पाएं। पर जितना अब तक मेरी समझ आया वो तो आमजन से सांझा किया ही जा सकता है। आगे की पोस्ट्स में। 

Saturday, July 1, 2023

राजनीतिक रंगमंच के जालों से बचें

राजनीतिक रंगमंच के जालों से बचें, क्यूंकि इनमें ज्यादातर बुरा ही बुरा होता है। भला शायद ही किसी का हो। ये राजनीति करने वालों के लिए तो सही हो सकते हैं। मगर आमजन के लिए नहीं। 

जब जाले ही हैं तो बचें कैसे?

हर घर कुछ कहता है। वैसे ही हर गली-मोहल्ला। हर रोड, हर गाँव-शहर। मगर क्या कहता है?  

Show, Don't Tell --सामांतर केसों की घड़ाई। ज्यादातर में आमजन को पता नहीं होता की ऐसा वो खुद नहीं कर रहे, बल्की उनसे करवाया जा रहा है। करवाने के भी तरीके हैं। 

कैसे? 

क्या ऐसा संभव है की कहीं किन्ही फाइल्स में किन्ही कोड्स में Carrot and Stick or Reward and Punishment का cryptic जिक्र हो और --

वो कहीं और प्रत्यक्ष रूप में चल रहा हो?

एक तरफ फाइल्स हैं और ज्यादातर सॉफ्ट लेवल पे ही रहना है। मगर दूसरी तरफ, जैसे पुलिसआ डंडा। 

राजनीतिक पार्टियों को उसे फाइल्स से आगे Show, Don't Tell वाले अवतार में लाना है। सभी राजनीतिक पार्टियों की पहुँच के अपने अलग-अलग बंदोबस्त है -- उस आखिरी आमजन तक। इनमें आपके आसपास के नौकरी करने वाले बन्दों से लेकर, खेत-खलियान में काम करने वाले किसान तक, बागबानी करने वाले माली से लेकर, आपके घरों में काम करने वाले लोगों तक, यूनिवर्सिटी-कॉलेज पढ़ने वाले विधार्थियों से लेकर, स्कूल के बच्चों तक। उसपे यहाँ-वहाँ लगे कैमरों से लेकर, आपके मोबाइल तक के कैमरे और माइक्रोफोन तक की पहुँच भी अहम् है। आपकी गाडी से लेकर, आपके घर के AC, TV तक। आपके लैपटॉप, कम्प्युटर से लेकर उस नन्हे से LED बल्ब तक।        

लोगों ने सॉफ्ट लेवल को किताब-कम्प्युटर तक सिमित कर दिया है। और हार्ड लेवल अलग ही तरह की युद्ध कला है। या कहो कुछ ज्यादा ही ओछी राजनीति है। जहाँ-जहाँ, किताबें-कम्प्युटर पहुँचेगा, वहाँ-वहाँ, कम से कम कुछ अच्छा पहुँचने की संभानाएं तो है।  मगर ये हार्ड लेवल? जहाँ-जहाँ, अच्छी किताबें और कम्प्युटर का उपयोग होगा, वहाँ-वहाँ शायद, शांति और समृद्धि पहुँचेगी। मगर खुरापाती लोग यहाँ भी गड़बड़ घोटाले करने लग जाएँ तो? राजनीतिक Show, Don't Tell  पटल पर वो भी शायद सोडा या हुक्का से ज्यादा न रहे। अब आपको Show, Don't Tell का राजनीतिक मोहरा भर रहना है या उससे अलग अपना कुछ करना है? ये तो आप पर निर्भर है।    

डंडा-युद्ध, पिस्तौल युद्ध (Stick Violence, Gun Violence)

कितनी आकार का डंडा युद्ध हो सकता है? एक बड़ा डंडा और उसके साथ एक छोटा, उल्टा ?  यहाँ एक डंडा। यहाँ दूसरा। यहाँ तीसरा। कोई गिनती ही नहीं है शायद। इतने डंडे यहाँ-वहाँ? बन्दर आते हैं? या बहुत ज्यादा कुत्ते हैं गली में ? अरे उनका इलाज करो न। अपने घरों में क्यों मार-पिटाई का माहौल बना रहे हो?  ये एक तरह से वहाँ रहने वाले, दिमागों की PROGRAMMING है। ऐसे घरों में ज्यादातर नोंक-झोंक और मार-पिटाई ज्यादा देखने को मिलेगी। ये किसी एक जगह की बात नहीं हो रही। गाँव-शहर कई जगह ऐसा कुछ देखने को मिला। 

यहाँ छोटे-बड़े, बच्चों को खासकर, भड़ाम-भड़ाम करने में बड़ा मजा आता है। कोई नकली में खुश हो लेते हैं। तो कोई देसी कट्टे जैसा कुछ या असली के साथ फोटो करवा के। हरियान्वी में बोलें तो शायद, "घणा अमरीकन होया हांडे सै?" वहाँ ज्यादा होता है क्या gun violence? या शायद UP कट्टा किसने नहीं सुना होगा? कट्टा है मेरै धौरे, बचके रहिए या फलां-फलां जगह का हूँ, अर भुण्डे मार दिया करूँ। ऐसा कुछ सुना है क्या कहीं ? पहुँचने वाले कैसे पहुँचे होंगे इन सब तक? कहीं ये सब शायद फोटो, विडियो तक सिमित रहा हो। और कहीं? Show, Don't Tell? ठीक वैसे ही, जैसे कहीं सिर्फ फाइल्स में Carrot and Stick or Reward and Punishment का cryptic जिक्र हो और -- वो कहीं और प्रत्यक्ष रूप में चल रहा हो? आपको क्या लगा था, की आपसे जो कुछ भी करवाया जा रहा है, वो आपके या आपके अपनों के हित के लिए है? 

Proxy War (जैसे दूसरे की जगह हाज़िरी लगाना, परीक्षा देना, या दूसरे के नाम पे लड़ना या लड़वाना )  

शैतान बच्चे, जैसे क्लास में किसी और की हाजिरी लगवा जाएं। युद्ध में भी ऐसा संभव है क्या? जुए में, cards गेम्स में शायद? कहीं-कहीं तो सुना है, परीक्षाओं में भी? ऐसे बच्चे कैसा तो माहौल बनाएंगे और कैसी डिग्री लेकर नौकरी पाएंगे? जो नौकरी मिल भी गयी तो ज़िंदगी भर आकाओं की गुलामी करेंगे। अब उन्होंने कोई सामाजिक सेवा का ठेका थोड़े ही लिया है? जिनकी सोच ऐसी हो, मान के चलिए, ठेका उन्होंने अपने घर का या अपनों का भी नहीं लिया हुआ। ऐसी सोच मिलजुलकर एक स्वार्थी तबके या समाज से ज्यादा कुछ नहीं बना सकती। 

जुआ और युद्ध

घरों और समाज की बर्बादी। जुए के नाम पे क्या याद आता है? महाभारत? इससे अच्छा उदाहरण, इसके भद्दे और विपरीत प्रभावों का शायद और कोई हो ही नहीं सकता। आपके आसपास जुआ खेलने वाले कुछ घर या शायद इंसान तो जरूर होंगे? हैं, तो संभल जाइये। या शायद उनके आसपास के हालात जानने की कोशिश कीजिए। कम से कम, कुछ बर्बाद घर तो जरूर मिलेंगे। राजनीति के राजे-महाराजों के जुए, समाज के जब आखिरी छोर पे पहुँचते हैं, तो शायद अपने सबसे निर्दयी और क्रूर रूप में होते हैं। क्युंकि वहाँ उन्हें बचाने वाले न तो सिपाही, गार्ड्स होते। न इतना दिमाग और न पैसा। वो सबसे पहले बलि चढ़ते हैं। यहाँ भी फाइल्स और प्रत्यक्ष रूप के भेद जैसी-सी कहानियाँ मिलेंगी। एक तरफ बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ या पार्टियाँ दुनियाँ के पटल पर स्टॉक-मार्किट की उठा-पटक में अभ्यस्त हों और दुसरी तरफ? छोटे से स्तर पर ज्यादातर कम पढ़े लिखे, बेरोजगारों के छोटे-छोटे से स्तर के जुआ अड्डे। बड़े स्तर के सट्टा बाजार मार भी आसानी से झेल जाते हैं। क्यूंकि वो अपने गुजारे-भत्ते के लिए नहीं खेल रहे होते, बल्कि राजपाट और वर्चस्व के लिए खेल रहे होते हैं। मगर छोटे स्तर के ये खिलाड़ी समझ ही नहीं पाते की इनके इस खेल में फायदे से ज्यादा मार है, हर तरह से। ये खेल गुजारे-भत्ते के साधन नहीं हो सकते। आसपास के वातावरण को हर तरह से खराब करने के जरूर होते हैं।             

मतलब ये की Show, Don't Tell --सामांतर केसों की घड़ाई में अच्छा शायद ही कुछ मिलेगा। खासकर, जब आप समाज का सबसे कमजोर और गरीब तबका हों। वो फिर चाहे शहरों की ज्यादातर बाहरी और अनाधिकृत कॉलोनियाँ हों या गाँव। स्लम-एरिया की तो फिर कहानियाँ ही क्या होंगी?