About Me
- Vijay Dangi
- Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?
Saturday, October 5, 2024
बुझो तो जाने ?
Tuesday, July 2, 2024
राजनीतिक रंगमंच और नशा-शिकार, मानव-रोबोट्स
आपकी हमारी जिंदगी का हर-पल, हर उतार-चढाव राजनीति और इस वयवस्था के इर्द गिर्द घुमता है और ज्यादातर हमारी जानकारी के बैगर।
जिंदगी के बहुत से अहम् फैसले ऐसा लगता है की हम खुद करते हैं। मगर ज्यादातर को जिस दिन समझ आने लगा की हकीकत इसके विपरित है तो हैरानी किसे नहीं होगी? खासकर, आम-आदमी के केस में। गाँव में आने के बाद, ये सब जैसे मैं हर रोज होते देख रही हूँ। अनुभव कर रही हूँ। इधर, उधर, उधर, जिधर देखो हर उस तरफ। कैसे संभव है ये? और मैंने इन लोगों को मानव-रोबोट्स का नाम देना शुरू कर दिया। ऐसा लग रहा था, जैसे इंसान जैसा कोई दिमाग है ही नहीं, इन लोगों के पास। जैसे कोई कंप्यूटर या रोबोट काम करता है, उसमें भरी हुयी प्रोग्रामिंग के अनुसार, कुछ-कुछ, वैसे ही सब यहाँ होता नजर आ रहा था।
मेरे लिए भी अजीब नहीं बल्की बहुत अजीब था ये सब देखना, अनुभव करना, जानना। धीरे-धीरे जब जानकार लोगों ने गुप्त-गुफाओं की तरफ इशारे करने शुरू किये तो जैसे अचानक से काफी कुछ समझ आने लगा। जैसे कंप्यूटर की सैटिंग कर दें की उसे कितनी देर बार अपने आप स्क्रीन ऑफ कर देना है या कब कितने मिन्ट्स के बाद फिर से जाग जाना है। कौन सी फोटो स्क्रीन के बैकग्राउंड पे रहेगी और कौन सी login करने के बाद दिखेगी। कब अपने-आप update हो जाना है और कब तक और कैसे हम उसे रोक सकते हैं? और भी कितना कुछ ऑटो पे रख सकते हैं या पहले से ही होता है। क्या-क्या और कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे बदल सकते हैं? खराब होने पे कैसे- कैसे ठीक कर सकते हैं? जैसे कंप्यूटर जैसी मशीन बताती हैं की क्या-क्या automation पे है और कैसे? क्या-क्या semiautomation पे है और कैसे? और क्या-क्या Enforce या Force किया जा सकता है?
Alcoholic or Drug Addicts Robots
नशा-शिकार, मानव-रोबोट्स (सबसे आसान तरीका मानव रोबोट बनाने का)
ऐसा ही कुछ देखा और समझा पीछे कुछ alcoholic या ड्रग्स abuse के आसपास के केसों में। इसमें शायद थोड़ा-बहुत लिखने से काम नहीं चलना। कई किताबें छप सकती हैं, ऐसी-ऐसी सामानांतर केसों की घड़ाई के कारनामों की। उन्होंने कैसे और कहाँ से शुरू किया? कैसे इस रस्ते पे आगे बढे और उसके बाद लोग या कहें ये सिस्टम और राजनीति, कैसे-कैसे use और abuse करती है? कैसे ऐसे लोगों की मदद करने की बजाय, अपनों तक को उनके खिलाफ खड़ा कर देती है?
मानो एक alcoholic है। ज़िंदगी के उस मोड़ पे है, जिसे चाहें जिधर खिसका दें। ऐसी संगति से निकाल लें और कहीं कामधाम पे लगा दें। ये उस खटारा गाड़ी के जैसा है, जो सर्विस और पैसे दोनों माँग रही है। उसके बाद संजय दत्त के जैसे चल सकती है। मगर हर कोई तो संजय दत्त नहीं है। इतना पैसा और इतना जुगाड़ या साधन कहाँ से आएं? आ तो सकते हैं, शायद थोड़े-से प्रयासों की जरुरत है। उसके लिए हमें सरकार की तरफ देखने की जरुरत नहीं है। समाज को अपनी भलाई अगर खुद नहीं करनी आती, तो सरकारें भी तो इसी समाज की देन हैं। वो ऐसी भलाई कैसे करेंगी?
क्या हम संजय दत्त जैसे लोगों, जो ऐसी जिंदगी जी चुके हैं या कहें की उससे निकल बेहतर ज़िन्दगी की तरफ बढ़ चुके हैं, जैसे लोगों को ऐसे लोगों के लिए प्रेरणा बना सकते हैं? इनमें अगर वो लोग भी जुड़ जाएं जो समाज का और ऐसे लोगों का भला चाहते हैं, तो शायद काफी कुछ हो सकता है। जाने कितने ऐसे पियकड़ जिंदगी जीने से पहले उसे खो देते हैं। घर और आसपास पे मात्र भार बनकर रह जाते हैं, जो खुद समाज का एक जिम्मेदार हिस्सा हो सकते हैं।
ठेकों को बंद करवाओ भी उसका एक समाधान हो सकता है क्या? आखिर किसी सरकार को शराब, बीड़ी, पान- जैसे जानलेवा उत्पादों से क्या मिलता है? और जो मिलता है, इतना सारा राजस्व वो कहाँ और किसके काम आता है? हकीकत ये है की समाज की ये बिमारियाँ हैं ही सरकारों की और उनके सहयोगियों की देन। और उन्हीं के भले के लिए हैं। आम-आदमी को इन सबसे दूर रहने की जरुरत है।
स्वयसेवी संस्थाएं, जो इस दिशा में काम करती हों?
हर छोटे-बड़े अस्पताल का एक हिस्सा deaddiction-सेंटर क्यों न हो? आखिर ये सब हैं तो बीमारियां ही? मगर वो खटारा सरकारी अस्पताल जैसा न हो। या प्राइवेट ठगुओं जैसा। हर किसी के पास इत्ता पैसा कहाँ होता है? बल्की यूँ लगता है, ऐसी-ऐसी बीमारियाँ देन और निशानी ही हर तरह की गरीबी की होती हैं। जहाँ दवाइयोँ से ज्यादा काउंसलिंग और ऐसे बीमार-आदमी की इच्छा-सकती को बढ़ावा देना, ज्यादा काम आता है।
आगे किसी और पोस्ट में इसके और पहलुओं के बारे में।
Monday, July 1, 2024
Morality and Illigal Experimentations in Living Labs (Society)?
Living Labs?
ये क्या होती हैं?
जहाँ कहीं जीवित प्राणियों पे, उस वक़्त चल रही किर्याओं या पर्किर्याओं पर अध्ययन होता है, उसे जीवित लैब बोलते हैं। जानवरों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तक पर, परिक्षण करने के कुछ रुल होते हैं। मगर, आज की टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग ने, उसे दुरुपयोग करने वालों के लिए आसान कर दिया है। आज के वक़्त में सारा संसार एक अजीबोगरीब बुचड़खाना है या कहो जीवित लैब है। और अपने आप में बहुत बड़ा जुर्म का अड्डा भी। जैसे, इस या उस पार्टी के कोढों के अनुसार बीमारियाँ, जन्म, अबोरशंस या लोगों की मृत्यु भी इन्हीं सब का हिस्सा हैं।
Sunday, May 5, 2024
राजनीती, आम आदमी को परेशानियाँ देती है, या उनके हल? (Tech Knowledge Abuse)
पीछे जो AC, Cooler वाली पोस्ट लिखी थी, उसे फिर से पढ़ें। खासकर ये, सुप्रीम कोर्ट पहुँचा पानी।
वैसे उत्तरी भारत का गर्मी का कहर और दक्षिणी भारत में बारिश के आसार। उत्तर भारत वालों को भी, दक्षिण की सैर पे निकल जाना चाहिए, Pleasant Weather के दर्शन के लिए। नहीं? खाली-पीली सी खबरें जैसे? कुछ-कुछ ऐसे?
वैसे, ऐसे-ऐसे निर्जीव एप्लायंसेज (AC, Cooler) का, आदमियों या जीवों में किसी तरह की खराबी आने से कोई लेना-देना हो सकता है, क्या? (आप सोचो, और बताओ। आते हैं, ऐसे-ऐसे कई तरह के निर्जीवों की खराबियों पर। और उनके आसपास के जीवों पर प्रभावों या दुस्प्रभावों पर भी।)
क्या सच में पानी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था? क्या सच में दिल्ली में बाढ़ आई थी? दिल्ली के कौन से हिस्से में? वहाँ इससे पहले बाढ़ कब आई थी? सुना, अरविन्द केजरीवाल का ऑफिसियल घर, सिविल लाइन्स पे और लाल किला भी इस बाढ़ की चपेट में आ गया था?
अपने आप आ गया था? या? हरियाणा या पंजाब के कुछ शरारती तत्वों की करामात की वजह से? कितने सारे लोगों ने भुगता उस परेशानी को?
परेशानियाँ, जो असलियत में हैं ही नहीं। बल्की, राजनीती की पैदा की हुई? ठीक ऐसे, जैसे राजनीतिक बीमारियाँ?
मतलब राजनीती, हमारी समस्याओँ के समाधान के लिए नहीं है? बल्की, ना हुई समस्याएँ लाने के लिए?
LG, AC, Softliner Cooler (Tech Knowledge Abuse, Dramas)
16 . 05 . 2024
सुनील और सतीश मिलकर, बड़ी मेहनत के बाद LG, AC को VTRail (stebilizer) के साथ उतार कर ले गए हैं। ये stebilizer भी जाने क्यों, कहीं बदला गया है शायद? कृपया करके AC को AC ही समझें, ना की VC । और AC यहाँ, LG का है। कोई दिल्ली के LG की बात नहीं हो रही। हमारा सतीश (खाती) थोड़ा लापरवाह है, इसलिए AC उतारकर, खिड़की ठीक नहीं करके गया। कल करने की बोलकर, ऐसे ही छोड़ गया। अब इसके अंदर से बिल्ली घुसने की कोशिश करे या बन्दर, क्या फर्क पड़ता है? बताओ, बिल्ली कौन-सा CJI की रहती है यहाँ? और बन्दर कौन-सा Eurovision Song Contest विजेता? खिड़की खुली पड़ी है, तो पड़ी रहे। खंडहर की खिड़की ही तो है। ज्यादा से ज्यादा, धूप, लू और अंधड़ का कूड़ा ही तो घुस सकता है। उसके लिए अड़ा दो कुछ भी।
इस घटनाकर्म के तत्पश्चात, शिव अपने Softliner (cooler) की सेवा में पधार गए हैं। और Softliner black pump को उतार कर, Redish Boss को स्थापिथ कर गए हैं।
Softliner रात को नामतर मात्र चला है। शिव ने कल फिर अवतारित होने को बोला था। मगर आज शिव के अवतारित होने की उम्मीद धूमिल हुई। शिव, भोलू की शादी की शॉपिंग में वयस्त होने की वजह से नहीं आ सका। कई तरह के एप्लायंसेज, और कई भोलूओं की शादी। पता नहीं भोलूओं की शादी से ही, क्या कनेक्शन है, इन सबका? और शिव का 16 से? ना उससे पहले और ना उसके बाद।
19. 05. 2024
शिव ने अपने रिप्लेसमेंट को भेझ दिया है। सतीश (बिजली वाला), अपने चिंटू के साथ पधारा है। खाती का अवतार, बिजली वाले में बदल गया है। मगर नाम के अलावा कुछ नहीं मिलता-जुलता। Softliner (Cooler) के चलने की उम्मीद अभी भी कायम है। और सतीश (बिजली वाला), अपने चिंटू के साथ, Softliner के fan की मोटर को उखाड़ कर ले गया। मोटर भी कूलर के रंग जैसी-सी ही, मैचिंग-मैचिंग जैसे, स्लेटी-सी।
21. 05. 2024
Softliner की मैचिंग-मैचिंग स्लेटी-सी मोटर की जगह, काली मोटर लगा दी गई है। अब Softliner के चलने की पूरी-पूरी उम्मीद है। और Softliner कूलर आखिर चल पड़ा है। कहाँ जाने के लिए? ये तो पता नहीं। कहीं US का इरादा तो नहीं, वो भी नींद में? पता चले, ऊपर से गिर गया नीचे, धड़ाम।
मीटर का मैन स्विच जो पहले लाइट के आने-जाने की खबर देता था, पीछे लाइट ठीक करने वाले ने बदल कर Neo का गन्दा-सा स्विच लगा दिया था। वैसे Neo सुना-सुना सा शब्द है, कहाँ सुना था? अब फिर से Anchor का लाइट वाला, मैन स्विच लग गया है। मगर लाइट के जाते ही या आते ही, इन्वर्टर को फिर से चलाना पड़ता है, इन्वर्टर वाली लाइट तभी चलती है। छोटे-मोटे लोग और छोटी-मोटी-सी समस्याएँ।
LG, AC ले जाने वाला अभी तक परेशान है। ये महान AC एक बार खराब हुआ था। ठीक करने के लिए दिया, तो कभी-कभार ही ठंड करता है। हाँ, ज्यादातर वक़्त कमरे को गर्म बड़े अच्छे से कर देता है। बस, तब से ऐसे ही पड़ा था। बाकी बिजली के एप्लायंसेज के भी यही हाल रहे हैं। तो 6-7 एक्सटेंशन इक्क्ठी हो रखी हैं। ताकि एप्लायंसेज के जलने या खराब होने की बजाय, एक्सटेंशन के ही फ्यूज उड़ लें या जल लें। मगर वक़्त के साथ, वो भी सब खराब। जिनमें से दो ही, ठीक होकर आई हैं। बाकी, अभी भी खराब ही पड़ी हैं। ऐसे ही जैसे, वैक्यूम क्लीनर।
वैसे उत्तरी भारत का गर्मी का कहर और दक्षिणी भारत में बारिश के आसार। उत्तर भारत वालों को भी, दक्षिण की सैर पे निकल जाना चाहिए, Pleasant Weather के दर्शन के लिए। नहीं? खाली-पीली सी खबरें जैसे? कुछ-कुछ ऐसे?
वैसे, ऐसे-ऐसे निर्जीव एप्लायंसेज (AC, Cooler) का, आदमियों या जीवों में किसी तरह की खराबी आने से कोई लेना-देना हो सकता है, क्या? आप सोचो। आते हैं, ऐसे-ऐसे कई तरह के निर्जीवों की खराबियों पर। और उनके आसपास के जीवों पर प्रभावों या दुस्प्रभावों पर भी।
Monday, April 29, 2024
दुबई में बाढ़? (Artificial Rain)
इससे पहले भी कभी सुना की दुबई में बाढ़ आई हो? मैंने तो नहीं। हो सकता है, मेरी जानकारी में ना हो। अभी जो दुबई बाढ़ का जिक्र हुआ, वो कौन-कौन से चैनल्स पे हुआ? अहम?
उन्हीं चैनल्स पे क्यों हुआ? बाकी पे क्यों नहीं?
जिन-जिन चैनल्स पे हुआ, वो किस-किस पार्टी के हैं? या किनके पक्ष में हैं? और भी ज्यादा अहम है, शायद?
चलो मान लिया की सच में बाढ़ आई। तो ऐसा कैसे संभव है? क्या बाढ़, आँधी, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदायेँ, कृत्रिम रुप से लाई जा सकती हैं? अगर हाँ, तो कैसे? कहाँ-कहाँ, ऐसी विज्ञान और टेक्नोलॉजी का प्रयोग हो रहा है? और कहाँ-कहाँ दुरुपयोग?
बच्चों की किताबों को थोड़ा अपडेट करने की जरुरत है। अगर वो अपडेट ना भी हों, तो भी कम से कम टीचर्स को तो ये काम अपनी जिम्मेदारी समझ करना चाहिए।
साथ में ये भी बताएँ की प्रकृति से ऐसा खिलवाड़, इंसान के लिए कितना फायदे या नुकसान का सौदा है?
कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे इस या उस पार्टी के कोढ़ के अनुसार, बिमारियों की भरमार। जैसे ना हुई बीमारियाँ बनाई जा रही हैं या कहो की घड़ी जा रही हैं। वैसे ही रेगिस्तान जैसे इलाकों में बाढ़ है।
टेक्नोलॉजी और पैसा इतना ही फालतु है, तो अमेरिका जैसे देश, एरिज़ोना जैसे राज्यों में कैक्टस की बजाय, कुछ अच्छा क्यों नहीं उगाते? भारत जैसा पिछड़ा देश, मुंबई जैसे शहरों में ऐसे एक्सपेरिमेंट की बजाय, राजस्थान जैसे इलाकों को क्यों नहीं हरा-भरा कर लेता? संभव तो शायद बहुत कुछ है मगर?














