About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Saturday, July 6, 2024

Hierarchy और संबोधन ?

मैंने तो सुना है, ये सब कोड हैं। चाहे वो फिर नाम हो या पोस्ट? सुना है, आपमें से ही कहीं से शायद? और सर, मैडम, महोदया, मिस, श्रीमती, श्रीमान, आदरणीय, मीलॉर्ड जैसे संबोधन भी? जब कोड की दुनियाँ में ही बात करनी हैं तो अमेरिकनों की तरह ही करो। क्यों खामखाँ के पचड़े में पड़ना? वैसे ये जो विडियो प्रोमोप्ट आते हैं, या खास वक़्त पे खास वीडियो, ये कितने सच होते हैं, इसका पता कैसे चले? मुश्किल है ना थोड़ा? और अगर सोशल मीडिया के द्वारा बात करें, तो कौन-सा MP या MLA सीधा बात करते होंगे? उनके प्रोफाइल तो उनकी टीम चलाती होंगी। नहीं? तो MP, MLA लिखना बहुत नहीं होगा, उनके ऑफिसियल कोड बिगाड़े बिना? हाँ, सीधे शायद हम ऐसे बात नहीं करते, भारतीय हैं ना। पर मेरे जैसे तो नेताओं से मिलने के कोई खास शौकीन नहीं होते। जब अवसर हों तब भी। अपनी ही अलग दुनियाँ में रहते हैं।    

और कोड, कुछ-कुछ ऐसे ही जैसे, विजय कुमारी दांगी है तो चलेगा। सिर्फ विजय दांगी है, तो बैठो घर? अजीब हैं ये कुमार, कुमारी, राजे-महाराजों वाले साँग जैसे? या महज कोड शायद?     

वैसे Hierarchy को हिंदी में क्या कहते हैं?                         

Monday, July 1, 2024

Morality and Illigal Experimentations in Living Labs (Society)?

 Living Labs?

ये क्या होती हैं?

जहाँ कहीं जीवित प्राणियों पे, उस वक़्त चल रही किर्याओं या पर्किर्याओं पर अध्ययन होता है, उसे जीवित लैब बोलते हैं। जानवरों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तक पर, परिक्षण करने के कुछ रुल होते हैं। मगर, आज की टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग ने, उसे दुरुपयोग करने वालों के लिए आसान कर दिया है। आज के वक़्त में सारा संसार एक अजीबोगरीब बुचड़खाना है या कहो जीवित लैब है। और अपने आप में बहुत बड़ा जुर्म का अड्डा भी। जैसे, इस या उस पार्टी के कोढों के अनुसार बीमारियाँ, जन्म, अबोरशंस या लोगों की मृत्यु भी इन्हीं सब का हिस्सा हैं।    

   

Monday, June 24, 2024

Death Or Murder Attempts?

Death Or Murder Attempts? लोगों को ऐसे मारो, की लाठी दिखाई भी ना दे और काम हो जाय?

अगर किसी के बैंक में पैसे हैं या किसी भी तरह की बचत है, मगर गुंडागर्दी के तहत किसी ने उसपे कुंडली मार रखी हो? जिसकी बचत है, वो बार-बार रिक्वेस्ट भी कर चुका, की मुझे एमर्जेन्सी है। फलाना-धमकाना हैल्थ इश्यूज हैं। और कभी भी एमर्जेन्सी पड़ सकती है। आप Urgently मेरे पैसे रिलीज़ करें। मुझपे कोई डिपेंडेंट भी हैं। उनके लिए भी चाहिएँ। मगर फिर भी, पैसे रिलीज़ ना किए जाएँ?

उसपे डिपेंडेंट में मान लो, कोई शराब का एडिक्ट भी हो। इसी नशे के तहत, उसे बोतल पकड़ा कर उसकी ज़मीन हड़प ली हो, कुछ अपने कहे जाने वाले लोगों ने। और अब ऐसे ही टेढ़े-मेढ़े रस्तों से, फिर से शराब सप्लाई हो रही हो, ताकी उसे दुनियाँ से ही उठाया जा सके। जब उसे ना सिर्फ, ऐसे आदमखोरों से दूर करने की जरुरत है, बल्की ईलाज की भी। क्यूँकि, डॉक्टर्स के अनुसार तो ये भी एक बीमारी है। और इसका ईलाज भी है। मगर, आपके पास इतने पैसे हैं ही नहीं। इस शराब एडिक्ट की हड़ियाँ निकली हुई हैं और तवचा बिलकुल काली पड़ चुकी है। मतलब, लिवर काफी डैमेज हो चूका। जिस बेचारे के पास खाने तक के पैसे नहीं, वो शराब कहाँ से पी रहा है? वैसे, जब उसके पास खाने तक को नहीं होता, ये शराब सप्लाई तभी होती है? ये, और ऐसी-ऐसी कहानियाँ, आगे किसी पोस्ट में।    

अगर ऐसे केस में ये शराब का एडिक्ट मरता है, तो वो Death कहलाएगी? या Murder? Assisted Murder? अरे नहीं। रोज, हजारों शराब के नशे वाले मरते हैं। खासकर, गरीबी की वजह से। कहाँ, किसे फर्क पड़ता है? ऐसे-ऐसों को तो वैसे भी, अपने ही ठिकाने लगा देते हैं। महज़ कुछ पैसों या ज़मीन की खातीर। और उन्हीं अपनों में से कुछ, ऐसी-ऐसी मौतों के बाद, रोने भी आते हैं? जाने ऐसे लोग, ऐसी परिस्थितियों में, ऐसे-ऐसे आँशु कहाँ से ले आते हैं?    

ये पब्लिक नोट किसी Academic Teachers Branch वाली संगीता मैडम के लिए भी। सुना है, पिछले 1 साल से भी ऊप्पर वक़्त से, फाइल उसी ब्रांच में पड़ी है। और उससे ऊप्पर बैठी Authorities के लिए भी। क्यूँकि, नीचे वाली कुर्सियों का महज़ बहाना होता है। VC जब चाहे, ऐसी-ऐसी फाइल्स को क्लियर करने के ऑर्डर दे सकता है।  

Prompt: ना सिर्फ ये हालात, बल्की, किसी नेता के सोशल पेज पर, शायद ऐसा ही देखा-पढ़ा। दादा जी जैसी-सी दिखने वाली किसी फोटो पे श्रद्धांजलि। और उस फोटो पे मुझे जो दिख रहा था, वो था, जैसे या तो चेहरा बहुत लाल हो रखा है या चेहरे पर, खासकर, नाक के आसपास चोट। मुझे ऐसा दिखा, मतलब? ऐसे-ऐसे ऑनलाइन कारनामों के बारे में, आगे किसी पोस्ट में। उसी दिन, इस शराब एडिक्ट भाई के चेहरे पर चोट। और भी जगह होंगी, ये चोट शरीर पे। टूटा-फूटा होगा कहीं या फोड़ा होगा किसी ने? होता रहता है, शराब एडिक्ट के साथ ऐसा? क्या नई बात है?           

Thursday, June 13, 2024

अलग-अलग स्तर, अलग-अलग प्रभाव या दुस्प्रभाव? Training

इस पोस्ट में सिर्फ पहले प्रश्न पे आते हैं। या जो कुछ चल रहा था, उसे जानने की कोशिश करते हैं। 

ट्रैनिंग

किसकी ट्रैनिंग? कैसी ट्रैनिंग? बच्चों की? बुजर्गों की? युवाओं की? कैसे देते हैं, वो ये ट्रैनिंग? कौन हैं ये लोग, या समुह जो ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी ट्रैनिंग देते हैं, लोगों को? और बच्चों और बुजर्गों तक को नहीं बक्शते? इन्हें कोई रोकने-टोकने वाले नहीं हैं क्या?   

राजनीती और राजनीती से जुड़े लोग?

बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ?

और?        

मैं अभी गाँव अपना सामान नहीं उठाकर लाई थी। मगर 26-29 April, 2021 का खास जेल ट्रिप हो चुका था। वहाँ जो कुछ देखा, सुना या अनुभव किया, उसमें काफी-कुछ ऐसा था, जिसपे शायद ध्यान कम दिया। या शायद थकान, गर्मी और सिर दर्द की वजह से ध्यान कम गया। ऐसा ही कुछ, जब यहाँ गाँव आने पे बच्चों या बुजर्गों को किसी ना किसी रुप में कहते सुना या भुगतते सुना, तो शुरु-शुरु में तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ा, शिवाय चिढ़ के। या ये क्या हो रहा है, और क्यों, जैसे प्रश्नों के। मगर धीरे-धीरे शायद समझ आने लगा। बच्चों और युवाओं की अजीबोगरीब ट्रैनिंग चल रही थी, उनकी समझ के बैगर। और बुजुर्ग भुगत रहे थे। कहीं ना कहीं युवा भी। और बच्चों की ऐसी ट्रैनिंग का मतलब? वो भविष्य में भुगतेंगे? और ऐसा भविष्य, शायद बहुत दूर भी ना हो, अगर वक़्त रहते रोका ना जाय तो?   

क्या थी ये ट्रैनिंग?

जैसे --

"जेल में औरतें अपना टाइम पास करने के लिए गाने गा रही थी। कुछ नाच भी रही थी। और कुछ दूर से सुन रही थी। मैं जो एक दिन पहले ही वहाँ पहुँची थी, सिर दर्द और गर्मी से हाल-बेहाल थी। मेरे सिर दर्द का मतलब, मुझे आसपास बिलकुल शाँत चाहिए और लाइट भी नहीं। मगर यहाँ तो उल्टा था। जैसे जबरदस्ती का दुगना अत्याचार। ऐसे में दवाई भी असर नहीं करती। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? वक़्त तो काटना था। आँख बंद कर, कानों को जैसे बंद कर, एक कोने में दुबकने की कोशिश? मगर इतना जबरदस्त शोर, एक छोटा-सा कमरा और इतनी सारी औरतें, सुनेगा तो फिर भी। उसपे गानों के नाम पे भद्दे आइटम नंबर्स और बेहुदा एक्शन्स। वो वक़्त तो आप काट आए।" 

यहाँ गाँव में ये क्या चल रहा था? कोई पियक्कड़ एक बुजुर्ग माँ को हद से परे, बेहुदा गालियाँ दे रहा हो और महाबेहुदा एक्शन कर रहा हो? इधर-उधर आसपास भी कुछ-कुछ ऐसा-सा ही। मगर वैसा ही कुछ CJI भी कह रहा था, शायद? सिर्फ भाषा और तरीके का फर्क था? या कहो समाज के अलग-अलग हिस्से के स्तर का? बात तो वही थी।     

दूसरी तरफ, कोई 5-6 साल की छोटी-सी बच्ची, "मेरा नाड़ा खोलन आवै स... "  जैसे बेहुदा आइटम नंबर पर अजीबोगरीब एक्शन कर रही हो और उस गाने या ऐसे-ऐसे गानों पर गुनगुना रही हो? और आसपास के बड़े बच्चे या बच्चियाँ या युवा वर्ग उसके मजे ले रहे हों? बच्चे को समझाने या रोकने की बजाय या ये तमाशा बंद करवाने की बजाय? बच्चा तो बच्चा है, अपरिपक्कव। मगर बड़े?   

किसी पियक्कड़ ने कोई दरवाजा तोडा हुआ हो। और कोई बुजुर्ग माँ, उसे जोड़ियों से यहाँ-वहाँ बाँधे हुए हो? या नाडों को या नवार जैसे गुच्छों से जैसे, यहाँ-वहाँ कहीं खूँटी, तो कहीं किसी पोल से बाँधे हुए हो? क्यों? दरवाज़ा ही ना ठीक करवा लें? 

कितना अंतर है ना बड़े लोगों (?) के नाड़े वाले जॉक्स में और आम लोगों, मध्यम वर्ग या गरीबों की ज़िंदगियों की सामान्तर घड़ाइयों में? ये सब अंतर देख नफ़रत नहीं होने लगेगी, ऐसे so-called बड़े लोगों से? मगर नफरत क्यों? वो उनकी ज़िंदगी है? उन्हें समाज के किन्हीं तबकों में ऐसी-ऐसी सामान्तर घड़ाईयोँ की शायद खबर तक ना हो? और हो भी, तो उन्हें क्या मतलब? या शायद से मतलब होना चाहिए? खासकर तब, जब आप ऐसे-ऐसे लोगों की वजह से ही शायद, कहीं चुनकर पहुँचते हैं?        

और फिर मैं ऐसे-ऐसे प्रश्नो पे, अपनी ही आवाज़ सुन रही हों जैसे? 

"हाँ! वैसे ही जैसे, तुने कितने लैपटॉप, कूलर या AC या गाड़ी, और कितना ही सामान ठीक करवा लिया? खाती वो खिड़की कर गया क्या ठीक? किसने रोका हुआ है, उसे? और उसके अलावा, कोई और नहीं है क्या, ठीक करने वाला? बड़े लोग भी ऐसे ही, इतने-इतने दिन AC, Coolers के बावज़ूद, यूँ गर्मी में मरते हैं? या यूँ आग लग जाती हैं? उनका आसपास यूँ गँवार या खुद so-called बड़े लोगों के जाल में नहीं होगा ना? वो भी तब, जब इतनी सारी एजेंसियाँ और मीडिया हाउस, देख, सुन और रिकॉर्ड तक कर रहे हों? वैसे ही जैसे, आपने कोई memoir या आपके साथ हुआ क्राइम, किन्हीं मीडिया हाउस को मेल किया हो और वो उसे इग्नोर के डस्टबिन में डाल चुके हों? अब कैसे मीडिया को किया, ये भी एक वजह हो सकता है, उसके डस्टबिन में जाने की? या शायद, आप इन मीडिया हाउसेस के बारे में अभी तक भी बहुत कम जानते हो? या शायद कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी? नहीं तो ऐसी-ऐसी खबरों को तो मीडिया हाउसेस ..... ? शायद अभी काफी कुछ जानना बाकी है, मीडिया हाउसेस के बारे में भी?"  

"ठीक ऐसे ही जैसे, यूनिवर्सिटी में GB (General Branch) वालों ने घर ठीक करके दिया था? XEN, JS Dahiya ने सब तो करवा दिया? कौन है ये JS Dahiya? रिपेयरिंग के नाम पे यूनिवर्सिटी में कट तो सबका बराबर लगता है ना? नहीं शायद? कुछ का ज्यादा लगता है? हद से ज्यादा? ऐसे लोगों की जहाँ नौकरी से छुट्टी होनी चाहिए और उनकी बचत पे चपत लगनी चाहिए, वहीं आप ना सिर्फ ऐसी जगह को छोड़ के चलना ही मुनासिब समझते हैं, बल्की ये तक कहते हैं, काट लो जितना बनता है। बुरी जगहों से और बुरे लोगों से जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लो, उतना ही अच्छा?"  

वहीं कुछ दूसरी साइड भी हैं। जो देखते-देखते कुछ ना आते हुए भी, ना सिर्फ प्रमोशन के पायदान नापते हैं, बल्की एक से दूसरा सरकारी घर ऐसे बदलते हैं, जैसे आप जैसे लोग काम ही उनके लिए करते हैं? SLAVE कहीं के। कहीं दूर क्यों जाएँ, मेरे अपने डिपार्टमेंट का डायरेक्टर। ऐसे लोग जिनके खिलाफ शिकायत हों और वही शिकायत निवारण committees के चेयरपर्सन या मैम्बर? जहाँ तकरीबन सब शिकायत निवारण committees के यही हाल हों, जाना चाहेंगे आप वहाँ वापस?          

"वो यूनिवर्सिटी थी। ये तो तेरा अपना घर और अपना आसपास या गाँव है ना?"  

बड़बड़ाना खुद से ही जैसे?

हर जगह की अपनी समस्याएँ हैं। कुछ से आप थोड़ा आसानी से निपट सकते हैं। और कुछ से थोड़ा मुश्किल से? और कुछ को हाथ जोड़ चलते बनते हैं, जैसे गुनाह आपने ही किए हों? कुछ समस्याएँ वक़्त के साथ, अपने आप ठीक हो जाती हैं। कुछ वक़्त माँगती है। और कुछ वक़्त से आगे, थोड़ी-बहुत मेहनत भी और कसमकस भी या इधर-उधर की खटपट और चकचक, पकपक भी। गाँव का कुछ-कुछ ऐसा ही लगा। कुछ ऐसे नुकसान या भुगतान हो गए, जो वक़्त रहते रोके जा सकते थे। मगर नहीं रुके। कुछ धीरे-धीरे ही सही, मगर कुछ हद तक सही दिशा में चल पड़े शायद? कुछ को, कुछ और वक़्त और थोड़ी बहुत मेहनत चाहिए। और इधर-उधर का साथ और थोड़ी-बहुत समझ  भी। 

जैसे शराब कहाँ से और कैसे सप्लाई होती है और कौन करता है या करते हैं? पीने वाला कब पीता है और कब-कब नहीं? सिस्टम या राजनीती से इस सबका क्या लेना-देना है? क्या कहीं का सिस्टम लोगों को जबरदस्ती कोई दिशा या दशा देता है? जी हाँ। हकीकत यही है। जैसे एक पार्टी आपको यूनिवर्सिटी से बाहर का रस्ता दिखाए, तो दूसरी गाँव से बाहर का या देश से ही बाहर का। चाहे ऐसा करने के लिए उन्हें, खून-खराबा ही क्यों ना करना पड़े। या जेलम-जेल ही क्यों ना खेलना पड़े। समाज का अलग-अलग स्तर, अलग-अलग जगह पे, काफी कुछ एक जैसा-सा दिखता हुआ भी, बहुत कुछ अलग कहता है। इसीलिए शायद सबसे सही वो समाज हैं, जहाँ ये फर्क कम है। जहाँ समाज का एक बड़ा हिस्सा, कम से कम, मूलभूत जरुरतों के लिए तो तरसता नहीं नज़र आता।  

जहाँ की सरकारें अपने समाज की मूलभूत आवश्कताओं तक की जरुरतों को पूरा नहीं कर पाती, क्या करती हैं वो सरकारें? किसके लिए बनती हैं, ऐसी सरकारें? मंदिर-मस्जिद के गोबर के नाम पे लोगों को मानसिक तौर पर जकड़े रहने के लिए? या नाडों या बेल्टों के नाम पे तमासे करते रहने और करवाते रहने के लिए? 

शायद, इसका एक ही समाधान है, सरकारों से उम्मीदें ही क्यों? आप इतने काबिल क्यों नहीं हैं की आपका समाज कम से कम ऐसी सरकारों पे निर्भर ना हो? अगर ऐसा होने लगेगा, तो ऐसी सरकारें अपने आप खत्म होने लगेंगी। और सिर्फ वही सरकार बना पाएँगे, जो तमाशों के लिए नहीं या किसी cult में लोगों को मानसिक-तौर पर जकड़ने के लिए नहीं, बल्की समाज को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।          

सीधे-रस्ते या घुमाऊ-रस्ते और सामान्तर घड़ाईयाँ ? 1

सीधे रस्ते और घुमाऊ रस्ते में फर्क क्या है?

सीधा रास्ता आपको जल्दी कहीं पहुँचायेगा या घुमाऊ?

आम आदमी बहुत ही सीधा और सरल सोचता है। मगर राजनीती के खिलाडियों के पास ऐसा कोई रस्ता नहीं। क्यूँकि, वो जुआ है। खतरनाक जुआ। कोई भी पार्टी उस जुए को कैसे घुमाती है, ये सिर्फ वही बेहतर जानते हैं। 

घुमाऊ रस्ते का मतलब बहुत ही टेढ़ा-मेढ़ा, उलझ-पुलझ और बहुत-कुछ छुपा हुआ है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं। आपके अपने कौन हैं? वो जिन्हें आप हकीकत में जानते हैं? जो आपके आसपास रहते हैं? जिनसे आप अक्सर बात करते हैं? जिनके आप अक्सर काम आते हैं या जो आपके काम आते हैं? 

या वो जिन्हें आप किसी के द्वारा जानते हैं? जिनसे आप शायद ही कभी मिलते हैं? जो शायद ही कभी आपके आसपास होते हैं? आपका उनके या उनका आपके काम आना तो बहुत दूर की बात।   

सामान्तर घड़ाईयाँ, इन्हीं टेढ़े-मेढ़े रस्तों और छुपम-छुपायियों की देन हैं। इसीलिए, इनमें राजनीती खुद आपको आपके अपने खिलाफ या आसपास के खिलाफ प्रयोग कर पा रही है।   

Common Sense को भूलकर, जब आप स्मार्ट बनने या दिखने या दिखाने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर धरे जाते हैं। या शायद ये भी कह सकते हैं की अपने दिमाग का जब आप थोड़ा-सा भी प्रयोग नहीं कर पाते, तो दिमाग का थोड़ा ज्यादा प्रयोग करने वाले, आपको अपना रोबॉट बना देते हैं। वो भी ऐसे, की आपको पता तक नहीं चलता की ऐसा हो रहा है। 

मान लो आपको अपने घर से किसी जगह जाना है। तो एक तो होगा सीधा-सा रास्ता। और ढेरों होंगे उल्टे पुल्टे या टेढ़े मेढ़े रास्ते। कहाँ से जाएंगे आप? कौन सा रास्ता कम वक़्त लेगा और कम संसाधनों या पैसे में होगा? टेढ़ा मेढ़ा रास्ता कब प्रयोग करेंगे? जब सीधे रस्ते में कोई रुकावट हो? या रुकावट ना हो और किसी के कहने पर बेवकूफ बन गए हों? या किसी ने थोड़ी देर की कहीं रुकावट कर, आपको घुमाने के लिए या तंग करने के लिए ऐसा कर दिया हो। समझदार भी एक-दो बार तो बेवकूफ बन सकता है। मगर पता लगने के बावजूद कितनी बार? सामान्तर घड़ाइयों में खास है, झूठ, धोखा, हकीकत से दूर दिखाना या बताना, छुपम-छुपाई और फूट डालो, राज करो। 

Tuesday, June 11, 2024

Different Levels of Pyramid and Different Level Plays Differently? Training

समाज के अलग-अलग स्तर पर, एक जैसी-सी कहानियाँ जैसे? मगर अलग-अलग स्तर पर लोग, भुगतते अलग-अलग हैं? ऐसा क्यों?

क्यूँकि, स्तर अलग-अलग है। लोग अलग-अलग हैं। उनके आसपास का समाज या तबका भी अलग है। उनका शिक्षा का स्तर, सोच, रहन-सहन, पैसा, घर, जमीन-जायदाद सब अलग-अलग है। जिसके पास ये सब जितना ज्यादा है, वो उतना ही कम भुगतता है। ज्यादातर फाइल्स तक का खेल रहता है। जिनके पास ये सब कम है या कहो, जो इस स्तर पर जितना कमजोर है, वो उतना ही ज्यादा भुगतता है। जिसका समाधान, अपने विरोधियो पर फोकस करना नहीं, बल्की अपनी और अपने आसपास की स्तिथि को सुधारना है। so-called बड़े लोग, अक्सर वही नहीं होने देते। वो एक तरफ, आपकी अच्छाईयों को डुबोने में लगे होते हैं तो बुराईयों को बढ़ाने-चढ़ाने में। क्यूँकि, उन्हें पता होता है, की आपकी strenghts क्या हैं और weaknesses क्या। और आपको ये तक नहीं पता होता, की आपके ये so-called विरोधी हैं कौन। इसलिए, सामान्तर घड़ाईयाँ दिखती एक जैसी-सी हैं। मगर परिणाम? 

दूसरा, बड़ों के किस्से कहानियों को अगर बच्चों पे या बुजर्गों पे थोंपने की कोशिश होंगी तो सोचो वहाँ क्या होगा? नाड़े की कहानी से जानते हैं। 

मैं अभी गाँव अपना सामान नहीं उठाकर लाई थी। मगर 26-29 का खास जेल ट्रिप हो चुका था। वहाँ जो कुछ देखा, सुना या अनुभव किया, उसमें काफी-कुछ ऐसा था, जिसपे शायद ध्यान कम दिया। या शायद थकान, गर्मी और सिर दर्द की वजह से ध्यान कम गया। ऐसा ही कुछ, जब यहाँ गाँव आने पे बच्चों या बुजर्गों को किसी ना किसी रुप में कहते सुना या भुगतते सुना, तो शुरु-शुरु में तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ा, शिवाय चिढ़ के। या ये क्या हो रहा है और क्यों, जैसे प्रश्नों के। मगर धीरे-धीरे शायद समझ आने लगा। बच्चों और युवाओं की अजीबोगरीब ट्रैनिंग चल रही थी, उनकी समझ के बैगर। और बुजुर्ग भुगत रहे थे। कहीं ना कहीं युवा भी। और बच्चों की ऐसी ट्रैनिंग का मतलब? वो भविष्य में भुगतेंगे? और ऐसा भविष्य, शायद बहुत दूर भी ना हो, अगर वक़्त रहते रोका ना जाय तो?   

क्या थी ये ट्रैनिंग?

कौन और कैसे चला रहे थे इसे? 

क्या अभी भी ऐसा कुछ चल रहा है? 

सिर्फ यहाँ या हर जगह?   

जानते हैं ऐसे और कैसे-कैसे प्रश्नो के उत्तर, हकीकत में जो देखा, सुना या अनुभव किया उससे। आगे पोस्ट्स में। 

Friday, June 7, 2024

सोए हुए को जगाना या जागते हुए को सुलाना जैसे? Training

Amplifying the latent or dormant?

बुल्लेट? 

पिस्टल? 

डंडा? 

चाकू? 

झगड़े या गुंडा-गर्दी वाले पैसे?  

झगड़े या गुंडा-गर्दी वाली ज़मीन? 

टूटे-फूटे से रिश्ते? 

बदहाली? 

ज़ंजीरें, चाहे सोने की ही क्यों ना हों? 

लड़ाई-झगड़े?

खंडहर?

 

या 


शांति? 

खुले रस्ते? 

खुशहाल ज़िंदगी? 

समृद्धि? 

खुला आसमां और उड़ते पंछी ?

धरोहर? 


किसको सुलाना चाहते हैं, आप?

और किसको जगाना?

ये सब निर्भर करता है की आप व्यस्त कहाँ हैं? अपनी और आसपास की ज़िंदगी को सवाँरने में? या लूटपाट में, एक दूसरे का बुरा चाहने और करने में?

रुकावटों, अवरोधों को खड़ा करने में? या बंद रस्तों को भी खोलने में? बीमारियाँ पनपाने में, मंदिर-मस्जिद के नाम का गोबर (गोबर क्यों कहा?) फैला, मारकाट करने में? खुशहाल ज़िंदगियों को उजाड़ने में? या बदहाल ज़िंदगियों को भी सँवारने में? अपना ना कमाकर, दूसरों का भी हड़पने के चक्कर में? कुछ ज्ञान बाँटने में? या ज्ञान-विज्ञान का दुष्प्रयोग कर, कम पढ़े लिखे लोगों में अंधविश्वास और अज्ञान फैलाने में? अपने आसपास कचरा फ़ैलाने में या साफ़-सफाई करने में? आपकी और आपके आसपास की ज़िंदगी, उसी हिसाब से आगे बढ़ेगी।              

Thursday, May 2, 2024

गुलामी की मानसिकता और आपकी पहचान ? (Hide Information to Control)

जब आपकी मानसिकता गुलाम होती है तो आपकी अपनी कोई पहचान या कोई स्टैंड नहीं होता। जो होता है, वो जिसकी आप गुलामी कर रहे हैं, उन्हीं का होता है। कौन-सी पार्टी आपके काम की है? कितनी काम की है? आपके अपनों, आसपास के लोगों से भी ज्यादा?  

जो कोई पार्टी, आपसे जितना छिपा रही है या पारदर्शी नहीं है, वो आपके काम की नहीं है। जनता का भला करने वालों को छिपाने की क्या जरुरत? ऐसे में तो कोई भी पार्टी जनता की हितेषी नहीं है, शायद। सभी कुछ ना कुछ, नहीं, बल्कि, बहुत कुछ छिपा रही हैं। कोढ़ के अनुसार काम कर रही हैं। सविंधान या देश नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। फिर ये सेनाएँ क्या है और किसके लिए लोगबाग लड़ते-मरते हैं? बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए? राजे-महाराजों के लिए? 

सबसे बड़ी बात, आप भी अपने या अपनों के लिए काम ना कर, कहीं इन्हीं की गुलामी तो नहीं कर रहे? इसीलिए आज भी छोटी-मोटी गोटियाँ (so-called), कीड़े-मकोड़ों की तरह यहाँ से वहाँ, उठा कर पटक दी जाती हैं। या ख़त्म कर दी जाती हैं। राजे-महाराजों द्वारा? या आपकी राजे-महाराजों की गुलामी की मानसिकता द्वारा? अपने छोटे-मोटे लालच की वज़ह से? या हक़ीक़त से दूर, अँधे-बहरे होने की वजह से? अपनों से दूर और औरों के पास होने की वजह से?

ये सब सामान्तर घड़ाईयोँ से समझ आता है। आसपास के कुछ लोगों ने अपना या अपने किन्हीं आसपास वालों का भला करने के लिए, पता ही नहीं, कैसे-कैसे नुकसान कर डाले। आसपास वालों के तो किए जो किए, अपने भी। क्यूँकि, इन पार्टियों ने उन्हें अँधा और बहरा बनाया हुआ है। जहाँ कहीं से इन्हें सचाई पता लग सकती है, वहीं से भगा देते हैं। या उस इंसान को कहीं दूर पटक देते हैं या दुनियाँ से ही उठा देते हैं। पार्टियों के स्क्रिप्ट्स के अनुसार, सामान्तर घड़ाईयाँ घड़ने के लिए, ऐसी दूरियों या दीवारों का होना बहुत जरुरी होता है। क्यूँकि, आम इंसान इतना बुरा नहीं होता, जितनी निर्दयी और क्रूर राजनीतिक पार्टियाँ होती हैं। ज्यादातर, कोई खास बेईमान या लालची नहीं होते। मगर, इन पार्टियों के पास उन्हें ऐसा बनाने के तरीके होते हैं। इसलिए आम-आदमी के पास सूचनाएँ सिर्फ वो पहुँचती हैं, जिससे इन पार्टियों का काम आसान हो जाता है। जितना ज्यादा इस सही सूचना को छिपाने या तोड़ने-मरोड़ने वाली दिवारें (shield) को ख़त्म किया जाएगा, उतना-ही इन पार्टियों के बुरे जालों से मुक्ति मिलेगी। और आपकी पहचान, इनके चिपकाए स्टीकरों की गुलाम नहीं रहेगी।  

इन्हें हम बीमारियों से या कहना चाहिए की राजनीतिक बीमारियों की हकीकतों से ज्यादा अच्छे से समझ सकते हैं।   

Monday, April 29, 2024

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, जैसी-सी कहानियाँ (Parallel Case Creations)

अभी पिछले साल (?) दो भाई-बहन दुबई की सैर पे गए। हाँ, तो क्या खास है? दुनियाँ जाती है। बहन की फिर शादी हो गई, इंटरकास्ट और भाई ने ज़मीन हड़प ली, किसी अपने की ही। होता रहता है, इसमें भी क्या खास है? किसी पियक्कड़ की ज़मीन, कोई भी हड़प ले? फिर ये तो शायद किसी अपने ने ही ली है, protection के लिए। बिचौलिया अहम है।   

सोचो इन सबका दुबई-बाढ़ से क्या लेना-देना?    

रैली पीटें थोड़ी? भाई-बहन की? बिचौलिए की? ऐसी शादी की? और ऐसे protection की? ये रैली कौन और किसकी पीट रहा है? या पीट रहे हैं? कहाँ-कहाँ और किन-किन लोगों की? कौन-कौन पार्टियाँ या उनके कर्ता-धर्ता? इस सबका किसी को दुनियाँ से ही खिसकाने से भी कोई लेना-देना हो सकता है? खिसकाने वाले कौन और नाम किसका लगाने की कोशिश हुई? अजीबोगरीब जाले हैं, ना? वहाँ फिर क्या लाकर रख दिया? किसने और कैसे? ये कौन अपने हैं, जिन्होंने ये सब रचा? आम आदमी? उसकी समझ से बाहर है, ये कहानी। या ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी, कहानियाँ। ये वो बता सकते हैं, जो आदमी को रोबॉट बनाते हैं। वो फैक्टरियाँ, जो दुनियाँ भर में ये सब करती हैं। अहम? कैसे? और आम आदमी को ये सब कैसे समझ आएगा? उसके लिए उसे कैंपस क्राइम सीरीज़ को समझना होगा।        

अच्छा ये ED-ED क्या है? ये ED-ED? कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे EC-EC?      

ED के आगे B लगे तो क्या बनता है? B. ed? या B. ED? या Bed? या खाटू? खाटू के कितने रंग हैं? झंडे के? इतने क्यों? ये हिन्दू है? मुस्लिम है? क्रिस्टियन? या सिख?

B. ED कितने में होती है?

जो B.ED करवाते हैं, वो खुद कितने पढ़े-लिखे हैं? 75000, एक साल के, एक B.ED करने वाला देता है? एक साल में, एक ही कॉलेज से कितने B.ED करते हैं? ये so-called कॉलेज वाले, एक साल में सिर्फ B.ED से ही कितना कमाते हैं? वो भी शायद, घर बैठे? टीचर्स क्या करते हैं? और उसके बावजूद कितना कमाते हैं? उनकी कमाई घर बैठे-बैठे ही कौन-कौन खा जाता है? क्यों? वो इतने नालायक क्यों हैं? कैसी डिग्री के लिए इतने पैसे देते हैं? ये शायद वो प्रश्न हैं, जो मुझे रितु (भाभी) ने या उस वक़्त मेरे कुछ अपनों के यहाँ विजिट्स ने समझाए। बहुत कुछ उसके काफी बाद में समझ आया। शायद ये भी, की रितु को और उसके घर को कौन खा गए? और नाम फिर किसका लगाने की कोशिशें हुई? 


ये भी की आज तक यूनिवर्सिटी, मेरा पैसा क्यों रोके हुए है?

ये भी की भाभी के जाते ही, ये किस खास अपने बिचौलिए ने, so-called अपनों को ही, दूसरे भाई की ज़मीन थमा दी? 

बहुत से so-called अपनों के शब्द भूलते नहीं हैं। जम गए हैं, जैसे कहीं। जैसे, "देख दम, मेरी आपणे घर मैं भी चालय, अर थारे भी। थाम भी चला लो न (माँ-बेटी)।" भाभी के जाने के बाद, जब बुआ-दादी को भी किनारे करने की कोशिशें हो रही थी। और गुड़िया को कहीं और पार्शल करने की। कहना तो चाह रही थी, की चाल्या तो तब करेय ना, जब कोई चलाना चाहे। पर ना वक़्त था इतना बोलने का और ना अकसर मन होता, ऐसे गँवारों से तू-तू, मैं-मैं करने का। यहाँ तो यही नहीं समझ आता, की लोग दूसरों के यहाँ अपनी चलाना क्यों चाहते हैं? अपनी ज़िंदगी अपने अनुसार चल जाय, वो बहुत नहीं होता? ज्यादातर, अपना शरीर ही नहीं चलता, अपने अनुसार तो। पता नहीं कब, कहाँ और क्या हो जाता है? और ठेकेदारी औरों के घर, अपने अनुसार चलाने की चाहतें? पता चल गया होगा अब तक तो, ऐसे लोगों को भी थोड़ा-बहुत शायद? ये वो दुनियाँ है, जहाँ बीमारियाँ और ऑपरेशन तक, राजनीती के कोढों के अनुसार होते हैं। इधर वालों को कोई पार्टी धकेल रही होती है और उधर वालों को कोई और। काटते रहो, एक दूसरे को ही।  

बहुत ज़बरदस्त खिचड़ी पकी होती है, ऐसे सामान्तर घड़ाईयोँ में। और भी अहम। ये घढ़ाईयाँ घड़ती राजनीतिक पार्टियाँ हैं। और आम-आदमी, एक-दूसरे को ही कौस रहा होता है। कैसे?

जैसे एक भाभी ने बताया की उसने B.ED करने के 60000 एक साल के दिए थे। तो दूसरी ने बताया, 75000 लेते हैं। नहीं। ये उन्होंने नहीं बताया। मैं जहाँ कहीं जाती, अकसर वहाँ उन लोगों के पास कहीं से भी फ़ोन आ जाते थे, उन्होंने बताया? उसपे कमेंट्री फिर कहीं, किसी आर्टिकल में, या सोशल मीडिया पे मिलती, की यहाँ घड़ाई क्या चल रही है। बहुत-सी पार्टियों की इधर या उधर पहुँच या घुसपैठ, कुछ हद तक ऐसे समझ आई।  

ऐसे ही जैसे, जब कुछ अपनों ने बोला, तुम अपना हिस्सा क्यों नहीं ले लेते। इस सोशल मीडिया या आर्टिकल्स ने ही बताया, की ये सब क्या था। Indirect ways to inform about indirect tunnels of different parties . अलग-अलग पार्टियों के अलग-अलग तरह के उकसावे, तरीके फूट डालो, राज़ करो के? 

आप जहाँ कहीं जाते हैं या देखते हैं या समझने की कोशिश करते हैं, यूँ लगता है, ये तो इन्हीं के खिलाफ रखा हुआ है। और ये, ये सब ऐसे कर रहे हैं, जैसे किसी और के खिलाफ। ऐसे ही शायद, जैसे कोई आपको चिढ़ाने या तंग करने की कोशिश में, खुद की ही रैली पीटने लगें?   

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा? जैसी-सी कहानियाँ हैं ये। इधर भी और उधर भी।          

दुबई में बाढ़? (Artificial Rain)

इससे पहले भी कभी सुना की दुबई में बाढ़ आई हो? मैंने तो नहीं। हो सकता है, मेरी जानकारी में ना हो। अभी जो दुबई बाढ़ का जिक्र हुआ, वो कौन-कौन से चैनल्स पे हुआ? अहम?

उन्हीं चैनल्स पे क्यों हुआ? बाकी पे क्यों नहीं?

जिन-जिन चैनल्स पे हुआ, वो किस-किस पार्टी के हैं? या किनके पक्ष में हैं? और भी ज्यादा अहम है, शायद?

चलो मान लिया की सच में बाढ़ आई। तो ऐसा कैसे संभव है? क्या बाढ़, आँधी, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदायेँ, कृत्रिम रुप से लाई जा सकती हैं? अगर हाँ, तो कैसे? कहाँ-कहाँ, ऐसी विज्ञान और टेक्नोलॉजी का प्रयोग हो रहा है? और कहाँ-कहाँ दुरुपयोग?     

बच्चों की किताबों को थोड़ा अपडेट करने की जरुरत है। अगर वो अपडेट ना भी हों, तो भी कम से कम टीचर्स को तो ये काम अपनी जिम्मेदारी समझ करना चाहिए। 

साथ में ये भी बताएँ की प्रकृति से ऐसा खिलवाड़, इंसान के लिए कितना फायदे या नुकसान का सौदा है?

कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे इस या उस पार्टी के कोढ़ के अनुसार, बिमारियों की भरमार। जैसे ना हुई बीमारियाँ बनाई जा रही हैं या कहो की घड़ी जा रही हैं। वैसे ही रेगिस्तान जैसे इलाकों में बाढ़ है। 

टेक्नोलॉजी और पैसा इतना ही फालतु है, तो अमेरिका जैसे देश, एरिज़ोना जैसे राज्यों में कैक्टस की बजाय, कुछ अच्छा क्यों नहीं उगाते? भारत जैसा पिछड़ा देश, मुंबई जैसे शहरों में ऐसे एक्सपेरिमेंट की बजाय, राजस्थान जैसे इलाकों को क्यों नहीं हरा-भरा कर लेता? संभव तो शायद बहुत कुछ है मगर?

Wednesday, April 10, 2024

शक्ति की रैली पीटना? (Dehumanization)

शक्ति, औरत है? पुरुष है? या LGBT? वैसे, ये LGBT कोढ़ क्या है?

बच्चा या बच्ची है? युवा है, या बुज़ुर्ग? इंसान है? शैतान है? भगवान है? भगवानी है? कोई देव या देवी? आप शक्ति को किस रुप में मानते या जानते हैं? पवित्र है? अपवित्र है? पूजनीय है या अपूजनीय? किसी का बेटा है या बेटी? किसी की माँ है या बाप? किसी की बहन है या भाई? किसी की पत्नी है या पति? किसी एक की है या अनेक की? और भी कितने ही ऐसे प्रश्न हो सकते हैं। 

राजनीती वाले, इधर वाले या उधर वाले, किस शक्ति की रैली पीट रहे हैं? इधर वाले या उधर वाले? आप राजनीती के गढ़े भगवानों, अवतारों, छलियों, शैतानों या इंसानों को मानते हैं? या आपका अपना भी कोई मत है? या उनके कहने या उकसाने पर लोगों की रैलियाँ पीटते हैं ? (जो ज़्यादातर जाने-अंजाने, आप अपनी खुद की पीट रहे होते हैं।)

या ऐसे उकसावों और भडावों से दूर रहते हैं?

मान लो, कोई शक्ति पुरुष है और अपनी पत्नी को लेकर कहीं जा रहा है। तो कोई कहे, ये दो को कहाँ ले चला? या ये आधे-आधे टुकड़े कहाँ ले चला? हकीकत में वो चाहे, एक को ही ले जा रहा हो। क्यूँकि, शायद ऐसे लोगों के लिए शक्ति पुरुष नहीं औरत है। शायद माँ है, बहन है, बुआ है या बेटी है। या शायद पत्नी है। इधर वालों ने भी शक्ति की रैली पीट दी और उधर वालों ने भी। सिर्फ़ किसी राजनीतिक पार्टी के भड़काओं या उकसावों पे। क्यूँकि, राजनीती का काम यही है। नहीं तो किसी के भगवानों या भगवानियों, देव या देवियों या आमजन के निजी रिश्तों से राजनीती का क्या लेना-देना? 

और आपको पता है, की ऐसे-ऐसे भड़कावे या उकसावे आपकी जानकारी के बिना, आपके अपने घरों में लड़ाई-झगड़ों की ही वजह नहीं बनते, बल्कि बीमारियों की अहम कड़ियाँ (प्रकिर्या का हिस्सा) भी बनते हैं। कैसे? जानते हैं आगे कुछ पोस्ट में।   

Monday, March 25, 2024

होलिका दहन 24-03-2024 (Dehumanization)

वही पिछले साल पहली बार देखा गया तमाशा। ट्रैक्टर पे रंग-बिरंगे पुते लड़के और ट्राली पे आग की लपटें और धुआँ-धुआँ। अंधभक्ति के तमासे और ज्यादातर कम पढ़े-लिखों की भीड़। पढ़े-लिखे जहाँ उसे स्मॉक्स्क्रीन (Smokescreen) का नाम देंगे। युरोप की कुछ खास यूनिवर्सिटीज के मीडिया कोर्सेज बेहतर समझा पाएँ शायद। 

तो कुछ के लिए? किसी घर की तबाही जैसे। ठीक वैसे जैसे, किसी बेवक़्त हुई मौत के दिन, कोई छोटा पूछता है, दीदी ये क्या हो रहा है?" और आप जैसे भड़ास खुद पे ही और अपने आसपास के हालातों पे निकाल रहे हों। "भेझे से पैदल लोगों के साथ इस संसार में ऐसा ही होता है। जिनके पास ना पैसा होता और ना दिमाग।" इससे आगे जो कुछ समझ आता है, वो उस दिन के बाद के हादसों के अनुभवों से। या यूँ कहो की रीती-रिवाज़ों, आस्थाओं और धर्मों के जरिए परोसे गए, पिरोए गए, कदम दर कदम बिछाए गए जालों से, घातों से और हादसों पे हादसों से। आम आदमी उन्हें वैसे देख या समझ ही नहीं पाता। किस्मत या किसी भगवान का दिया, प्रसाद समझ निगल जाता है। ठीक ऐसे जैसे, जहर को आँख बंद कर निगल जाना। परेशान वो शायद ज्यादा होते हैं, जो उन्हें करने और करवाने वालों को देख और समझ रहे होते हैं। हादसों पे जैसे मखोलियों के झुँड और मखोलों में जैसे हादसों को भद्दे से भद्दे रुपों में पेश कर, अपने कारनामों पे ठोकना मोहर। आप ये सब देख और जानकर, सिर्फ सोचते ही रह जायेंगे की ये कैसे इंसान हैं? क्या ये सच में इंसान हैं? या जानवरों के सांचों पे इंसानों के खोल मात्र? और ये कैसी सेनाएँ हैं? आम इंसान को कीड़े-मकोड़ों की तरह रौंदती हुई जैसे। किसके लिए और क्यों?

फाइलों के संसार में और इस संसार में यही फर्क है। वहाँ पढ़े-लिखे (?) और शातीर कढ़े हुए लोग, सिर्फ फाइल-फाइल खेलते हैं, ज़िंदगी भर। और यहाँ? उन फाइलों से निकले हुए स्क्रीप्ट्स, सिर्फ शब्द या कोई नाटक ना होकर, किसी फाइल का हिस्सा भर नहीं, बल्की लोगों की ज़िंदगियों से खेलते हैं। मालूम नहीं कैंपस क्राइम वालों को क्या खतरा है, की आज तक लोगबाग उन डॉक्युमेंट्स को छुपाने की जद्दो-जहद में हैं? वो, जो उन इंस्टीटूट्स की वेबसाइट पे आम जनता को उपलभ्द होने चाहिएँ। समाज में जो कुछ हो रहा है, वो उसका मामूली-सा नमुना भर हैं। उनसे कहीं ज्यादा भद्दे और खुँखार जुर्म तो इन इंस्टीटूट्स की किलाबंद-सी दिवारों के बाहर का समाज भुगत रहा है। जिससे ना कोई खास छिपाने की जद्दो-जहद है और ना ही कोई बचाने की। क्यूँकि पढ़े-लिखे (?) और कढ़े शातीरों को मालूम है, की इन्हें इतनी आसानी से समझ नहीं आना। इसीलिए शायद, समाज के इस तबके को, ये so-called संभ्रांत लोग, कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा समझते ही कहाँ हैं?                           

होलिका दहन का ये रुप, एक ऐसा ही छोटा-सा नमुना भर है। पहले देखते सुनते थे, की होलिका दहन श्याम को होता था। अब तो इसका खास वक़्त भी है शायद। कितने बजे, किस रुप-स्वरुप में, कहाँ से और किस गली से होकर गुजरेगा।   

रीती-रिवाज़ वहाँ के समाज की मानसिकता का आईना भी हैं। अब होली को ही समझने की कोशिश करो और पता चलेगा, लठमार होली का रिवाज़ कहाँ-कहाँ है, आज तक? और बेहुदा रंगों, गंदे पानी का चलन आज तक भी कहाँ-कहाँ बचा हुआ है? जहाँ एक तरफ, रंगों के नाम पे ग्रीस और कीचड़ तक से लथ-पथ प्रदर्शन देखें है। तो दूसरी तरफ, डंडे और रस्सी के कोलडों की मार झेलते लोग। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता था, जैसे, होली ना खेलकर, लोग साल भर की दबी-छुपी, अंदर की भड़ास निकाल रहे हों। यही नहीं, बल्की कुछ केसों में, इससे भी थोड़ा आगे चलकर, रंग लगाने के नाम पे बेहुदगी और धक्का-मुक्की तक। जहाँ किसी के हाथ टूटे मिलें, तो किसी के दाँत। कोई लहु-लुहान मिले तो कोई, कई-कई दिन तक कोलडों के निशान और दर्द लिए। अच्छा है, वो सब आजकल तकरीबन यहाँ तो खत्म-सा है। मगर अभी जो राजनीती का घिनौना प्रदर्शन ट्रैक्टर-ट्राली के नाम पे होने लगा है, वो भी कुछ-कुछ ऐसा ही है, जैसे एक दूसरे के खिलाफ कोई दबी-छुपी सी ख़ीज निकालना। खीज़? वो भी रीती-रिवाज़ों के नाम पे? धर्म आस्थाओँ के नाम पे?  

पता है, थापे दिवार पे कब लगते हैं और पेपर पे कब? थापे में वायरस भी छुपकर बैठा होता है? और घी और मेहँदी के थापे में अलग-अलग तरह की मोहर भी होती है? मेहँदी पे बुलेट (गणेश) भी छिपा हो सकता है? और घी पे वायरस? और भी कितना कुछ, एक छोटा-सा थापे का रिवाज़ बता सकता है? रीती-रिवाज़ों के कोढों पे एक नहीं, बल्की कितनी ही किताबें लिखी जा सकती हैं। और इन कोढों में छुपा ज्ञान-विज्ञान, आम आदमी को कैसे-कैसे ढालने के काम आता है, इन सेनाओं के? और राजनीतिक पार्टियों के? सामने होकर भी, आपकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा होकर भी, छुपा हुआ ये रहस्य्मयी संसार। कौन चला रहा है इसे? भगवान? चलो, भगवान ही नाम दे देते हैं, इन रहस्य्मय शैतानों को। मगर कहाँ कौन-सा या कहना चाहिए की कौन-से वाले भगवानों की पार्टियाँ या कम्पनियाँ (फ़ैक्टरियाँ) काम पे लगी हैं, उन्हें भी जानो-पहचानों। हम धीरे-धीरे आपके बहुत आसपास से होकर, दूर, आपसे बहुत दूर बैठे, उन भगवानों या भगवानियों, देवों या देविओं से मिलाने या उनके हूबहू दर्शन करवाने चलेंगे। तो अगर आपको वो दर्शन चाहियें, तो साथ रहिएगा इस यात्रा पे। 

Sunday, February 25, 2024

आम लोगों की माइग्रेशन की कहानियाँ (Enforced Migrations by Invisible Ways)

अब वि राज मान तो होना चाहिए, सत्ता के गलियारों के हिसाब से, आम आदमी की ज़िंदगियों में भी? AP   R   IL (2024?) सही महीना है उसके लिए? और तारीख़ क्या होंगी? 

पूजा का प्रसाद, ईधर से उधर होने के लिए MA   R    CH (2024?) सही रहेगा? उनकी तारीख़ क्या होंगी? खास तरह की पूजा-अर्चना की विधि समझने के लिए कौन-कौन से प्रोजेक्ट्स को पढ़ना चाहिए? सिविल और डिफ़ेन्स की विधियाँ अलग हैं? और इंजीनियरिंग और डॉक्टर्स की अलग? ऐसे ही कुछ प्रोजेक्ट्स समझने की कोशिश है आजकल।   

एक विराजमान यहाँ होगा, तभी तो दूसरा कहीं और होगा? वैसे ये जो अब वापस अपने घर होगा, ये वहाँ से निकाला कौन-सी पार्टी वालों ने था? एक रितु यहाँ से खाएँगे, तभी तो एक पूजा (नर्स) के जाने की भरपाई कहीं और होगी? और दूसरी पूजा (टीचर) कहीं और खिसकेगी? ये कौन-सी और कैसी सेनाओं के इधर से उधर आम लोगों की (By Invisible Enforcements) माइग्रेशन की कहानियाँ हैं? सिर्फ माइग्रेशन भी कहाँ? उनके परिणाम? या कहना चाहिए खासकर दुष्परिणाम? रिश्ते-नातों की दूरियाँ, कोर्ट्स में केसों की कहानियाँ, लोगों की आत्महत्याओं या खात्में की कहानियाँ, बच्चों के अनाथ होने की कहानियाँ, स्कूल स्तर पे ही बोर्डिंग स्कूलों के हवाले होने की कहानियाँ, भावनात्मक स्तर पर खोखले या असुरक्षित इंसानो की कहानियाँ? अपनों के इधर या उधर छूट जाने की कहानियाँ? Enforced माओं या बापों के आने या जाने की कहानियाँ? घरों के उजड़ने या बसने की कहानियाँ? आर्थिक या ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे एंगल तो फिर किसी रुंगा या प्रसाद जैसे ही होंगे, ऐसे-ऐसे हादसों में? Designed Tragedies?          

भाभी के जाने के बाद, और पड़ोस में, घर-कुनबे में ही, किसी के यहाँ दूसरी बहु आने पर, जब गुड़िया ने बोला, बुआ आपको पता है, उनके यहाँ नई बहु आई है। वो मेरी मम्मी की जगह आई है। पुरानी कहाँ गई? और उसकी बेटी? मेरी उनसे बात करवा दो। मुझे लगा, बच्चे को भावनात्मक बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। सच भी, जाने वाले वापस कहाँ आते हैं? मगर, जुए के इन अजीबोगरीब खेलों में, ड्रामों में आते-जाते रहते हैं, शायद। जब जुआ ही हो गया, तो क्या बहु-बेटियों का फर्क और क्या भाई और बटेऊओं का? सब का गोबर-गणेश जैसे? किसी को भी, कुछ भी बना दो। किसी का किरदार थमा दो। तमाशा ही तो है। वही चल रहा है। इधर भी, उधर भी। उधर भी और उधर भी। आप कहाँ रह रहे हैं, इससे बहुत फर्क पड़ता है। ये सिर्फ आपके घर का कैसा माहौल है की बात नहीं है। बल्की, कभी-कभी शायद अड़ोस-पड़ोस, मौहल्ला, गाँव या शहर, ये देश या वो देश भी, ज़िंदगी को कितनी ही तरह से बनाता या बिगाड़ता है। इसलिए आपका पता आपकी बहुत बड़ी पहचान है, ID है। पहले ये सब ऐसे समझ नहीं आता था। यूँ लगता था की क्या फर्क पड़ता है? पड़ता है, एक ही मौहल्ले में भी एक घर से दूसरे घर के पते पर ही कोई सिस्टम ही बदल जाता है। एक गली से दूसरी गली पर शायद बहुत कुछ बदल जाता है।         

बचा जा सकता है क्या इन सबसे? अपनों से ज्यादा बात कर, बाहर वालों की बजाय। क्यूँकि, जहाँ जितना ज्यादा उल्टा-पुल्टा है, वहाँ लोगबाग उतने ही ज्यादा दूसरों के सुने, कहे गए किस्से-कहानियों (narratives, perception) के हवाले हैं। वो इतना कुछ सच मान सकते हैं, जैसे वो तो live-in रह रही थी। किसी और की या अपने किसी की कहानी या ज़िंदगी की हकीकत बता, इशारा किसी और की तरफ करने वाले घर-घुसडु। जिन बेचारों को ये तक खबर ना हो, की वो उस वक़्त टाँग तुड़ाये पड़ी थी। और कोई बच्चा उसके पास रह रहा था। जो इतना छोटा था की लक्ष्मणरेखा से घेरे बना, कीड़े-मकोड़ों को मारने जैसे खेल खेलता था। उसके बड़े भाई-बहन डिपार्टमेंट तक छोड़ने और लेने जाते थे। और उनकी माँ (मेरी cousin), नौकरी और घर के कामों के बावजूद, मेरे छोटे-मोटे काम निपटा के जाती थी। इसी तरह के कितने ही narratives, perceptions घर के तकरीबन हर इंसान के बारे में सुनने को मिले। भाभी के जाने के बाद जो चला, उससे बेहुदा षडयंत्र तो शायद ही कोई हो। क्यूँकि ना तो जाने वाले को बक्सा जा रहा था, ना जो बचे थे उन्हें। जिन्होंने बच्चे तक को नहीं बक्सा, वो और किसे बकसेंगे? वैसे ये In, Out भी बड़े अजीब हैं। शब्दों के हेरफेर जैसे। एक तरफ Live-in, Live-out जैसे अमेरिकन Resident-in, out type? तो दूसरी तरफ Checked-in, checked-out type? यहाँ पे residence की बजाय airport आ गया लगता है, खास तरह के experimental type? कलाकार ही जानें और कितनी तरह के in और out होते हैं? यहाँ, जहाँ आजकल हूँ,  तो दरवाजा खोल दिया बाहर की तरफ या अंदर की तरफ और लो हो गया in, out । अब ये दरवाजे भी कितनी ही तरह के हो सकते हैं। Offensive, Defensive या Neutral?                                     

बुनाई सामाजिक ताने-बाने की, कितनी सिद्धत से? वो भी औरों की ज़िंदगियों में, घरों में, कुनबों में, मौहल्लों में, रिश्ते नातों में? सबसे बड़ी बात, खुद दूर, बहुत दूर बैठकर। लोगबाग तुमसे कभी मिले नहीं, तुम्हें शायद जानते तक नहीं। आम लोगों को कोई खबर नहीं की ये राजनीतिक पार्टियाँ क्या-क्या और कैसे-कैसे काँड रचती हैं। बड़े लोगों का संसार और हद गिरे हुए दर्जे का कंट्रोल, लोगों की ज़िंदगियों पर। एक ऐसा कंट्रोल, जिनमें उन्हें खबर ही नहीं, की वो कैसे-कैसे और कहाँ-कहाँ, कौन से स्तर तक कंट्रोल हो रहे हैं। और ऐसा करके कंट्रोल करने वालों को क्या मिल रहा है? 

रिश्ते-नातों के हूबहू से झगड़े। जमीन-जायदाद के हूबहू से झगड़े। अंजाम भी हूबहू से ही? हाँ। सिर्फ भेझे से पैदल लोगों के यहाँ। कमजोर तबकों में। क्यूँकि, उनमें और यहाँ खास फर्क है, संसाधनों का, ज्ञान का। जो उन्हें बचा लेता है, बहुत से बुरे प्रभावों से। मगर यहाँ, ना सिर्फ रिश्ते-नातों को ख़त्म कर देता है, बल्की ज़िंदगियाँ ही खा जाता है। अहम, उसके लिए खुद आपको अपनी सेनाओं की तरह प्रयोग करते हैं। मानव रोबॉट बेहतर शब्द है, शायद? या चलती-फिरती गोटियाँ? खुद आपके अपने खिलाफ और आपके अपनों के खिलाफ। दुष्परिणाम, अगली पीढियाँ और ज्यादा भुगत रही हैं, ना सिर्फ भावनात्मक स्तर पे, बल्की बदले माहौल की वजह से।                         

Social Engineering इसी को बोलते हैं? और Social Tales, लोगों की ज़िंदगियों के आसपास ही घुमती हैं? मगर ऐसे की आभासी और हकीकत की दुनियाँ का फर्क ही जैसे खत्म होता लगे। और ये सब घुमा कौन रहा है? Social Media Culture, जिसमें वो सब आता है जो आप देख, सुन या अनुभव कर सकते हैं। 

आप क्या देख, सुन या अनुभव कर रहे हैं?

ये सब इस पर निर्भर करता है की आप कैसे माहौल से घिरे हैं। जिसमें इंसानो के साथ-साथ, वहाँ का हर जीव और निर्जीव शामिल है। जो आपको बहुत कुछ बिना कहे भी कहते हैं। बिना सुनाए भी सुनाते हैं। और अंजान होते हुए भी अहसास कराते हैं। जैसे हवा, पानी, खाना-पीना, पहनावा, रीति रिवाज़, धर्म मजहब, पढ़ाई-लिखाई का होना या ना होना, शिक्षा का स्तर, भाषा-बोलचाल,  आर्थिक स्तिथि, न सिर्फ आपकी खुद की, बल्की आसपास की भी। यही सब अच्छी या बुरी ज़िंदगी बनाता है। और यही सब ज़िंदगी को छोटी या बड़ी करता है।    

Wednesday, January 31, 2024

सामाजिक घड़ाईयाँ

APEX Hospital (या कोर्ट?) 50% Off?

चलो एक छोटी-सी कहानी सुनाऊँ। कहानी? नहीं हकीकत। APEX hospital के बाद रितु PGI गई और उसकी लाश ही घर आई। ऊपर से मैं शायद बहुत शांत दिख रही थी, मगर। अंदर से जैसे कोई दिमागी दौरा। जिसे बच्चे को देखते हुए, आप उड़ेल भी नहीं सकते। और उसके बाद जो नौटंकियों का दौर चला, उससे घिनौना, शायद ही कुछ देखा हो, ज़िंदगी में। जैसे एक तरफ आसमान में चीलों को मँडराते देखा तो दूसरी तरफ कई सारी आदमी के खोल में चीलों को आते-जाते और उनके ड्रामों को देखा। 

इसके कई महीने बाद, मैं फिर से APEX हॉस्पिटल गई। 

क्यों?   

किसके साथ?

क्या खास था?

क्या तारीखें थी? 

APEX से आई एक नन्हीं कली? या परी? Kali या Pari? दोनों के मतलब कोढ़ के अनुसार अलग हैं? और पार्टियाँ भी अलग? ऐसे ही जैसे, किसी को बोलो Prince, Princess, King, Queen, Rani, Maharani, Raja, Maharaja, Lakshmi, Lakshmibai, Lakhmi, Bal, Her, Hari, Dev, Baldev, Her dev, Har dev, Har-Har, Devi, Deva, Mahadevi, Mahadeva, Kaal, Mahakal, Har Har Dev, Har Har Maha Dev  इनके, और इन जैसे कितने ही और शब्दों के कोढ़ के ज्यादातर, वो अर्थ नहीं होते, जो आम आदमी सोचता है। गुड़ का गोबर भी हो सकता है। और गोबर का गुड़ भी। खैर। वापस, 50% पर आते हैं।                            

आसपास कहीं एक छोटी बहन को लड़की हुई थी। इसमें क्या खास था? ड्रामे, 50% वाले।  

इसी छोटी बहन की पहली शादी से एक लड़की है। जिसे वो पीछे छोड़ आई। उस बच्ची को छाती में साँस की दिक्कत जैसा कुछ बताया, घर बनाते वक़्त CEMENT की वजह से। अब तक ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी, कितनी बच्चों की बीमारियाँ पढ़ चुके आप? सब यहीं आसपास से। 

उसके इलावा छोटी बहन को घर में रोक के रखना, खाने-पीने तक को कुछ ना देना, मारना-पीटना, वगरैह। और खुद राम-रहीम (शायद?) सत्संग में चले जाना। वैसे तो मैं ऐसे-वैसे और कैसे-कैसे गुरुओं को नहीं मानती। मगर, यहाँ से जैसे नफरत-सी हो गई, ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे गुरुओं पे और गुरु-भगतों पे। ये गुरु यही सब सिखाते हैं क्या, अपने भगतों (अंधभक्तों) या चेलों को? सोचो, ये केस कब का होगा? राजनीतिक सामाजिक घड़ाईयाँ रिश्तों की? फिर हूबहू कोढ़ वाले राजनीतिक तमासे, लोगों की असली ज़िंदगियों में? राम-रहीम के आसपास? H#30, Type-4 धमाल। एक और बिग बॉस हाउस। राजनीतिक, सोशल और सामाजिक कहानियों का अड्डा जैसे? वैसे, कैंपस क्राइम सीरीज की कोई फाइल भी मिलती-जुलती है शायद इससे? 

54-days Earned Leave? और राम रहीम? और स्टुडेंट्स की केस घड़ाई, मेरे खिलाफ। वो हरि याणा बंद तो भी टीचर ने नहीं पढ़ाया वाली शिकायतक्या तारीख थी? 25? 2017? और महीना? वैसे हरि याणा क्यों बंद था उस दिन? और दिवाली वाली छुट्टियों में स्टुडेंट कहाँ बैठा था? और हस्ताक्षर कहाँ? फिर से टीचर की झूठी शिकायत?                    

वैसे 

CEMENT क्या है?  

TILES क्या हैं?

TILES पे X टाइप खास डिज़ाइन क्या हैं?

और कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे DESIGN हैं, या रंग हैं?

अरे। ये BP से कहाँ पहुँच गई मैं?    

ROHIT? 

AP? 

BULLET?


ROBIN? 

TB? एक कमरा कई बन्दे? 

HERNIA? 

ऐसे कैसे? और कैसे-कैसे बीमारियाँ होती हैं दुनियाँ में? धकाया हुआ Culture Media? सोशल कल्चर मीडिया? और लोगों की ज़िंदगियों से कैसे-कैसे खिलवाड़? और आप खुद जाने-अनजाने, इस सब का हिस्सा बने हुए हैं? किसके लिए? यही नहीं। अपने बच्चों को भी उसी Culture Media में धकेल रहे हैं। जाने-अनजाने?    

खास नंबर वाली AP Bullet पहले किसी छोटी बहन के पास आई। वहाँ से खास तारीखों को, वो कहीं और खड़ा होनी शुरू हुई। और कुछ वक़्त बाद, उस घर में भी कोई Bullet पहुँच गई? भाभी जा चुकी थी। किसी और जबस्दस्ती सामाजिक समान्तर घड़ाई के धकेल की, घर में आने की कहानी की शुरुआत? मुझे जब भी कोई Bullet दिखती है, ऐसा लगता है, बंद क्यों नहीं हो जाती ये Bullet? इसका तो नाम ही हिंसा जैसा-सा है। हालाँकि, किसी वक़्त मुझे भी बुलेट ठीक-ठाक लगती थी। हालाँकि, भारी-भरकम मशीनों की मैं फैन कभी नहीं रही।    

उसपे, पता है वो किसकी पहुंचाई हुई है? ये अहम है? 

इन सब ज़िंदगियों का, इनकी ज़िंदगियों के उतार-चढ़ावों का और फिलहाल इन ज़िंदगियों में जो चल रहा है उसका, किसी Hyderabad, Telangana या Andhra Pradesh से कोई लेना-देना हो सकता है क्या? या शायद ऐसे ही किसी और के, किसी घटना या दुर्घटनाक्रम से? मैं खुद जानना चाह रही हूँ, जानकारों से। क्यूँकि, पता नहीं क्यों, मुझे इन ज़िंदगियों में या आसपास के इन घरों में, सबकुछ जैसे उल्टा-पुल्टा सा लगता है। इसकी इस वक़्त की कहानी जैसे, इससे या इस फाइल से मिलती-जुलती है। उसकी, उस वक़्त की कहानी, जैसे उससे? पता ही नहीं, कैसे-कैसे जाले हैं? जोड़-तोड़ और मरोड़ हैं? और कैसे-कैसे कोढ़?              

गूगल ज्ञान और खास तरह की AI Enforcements?


अब कोई उस गुड़िया के नाम पे 50%, 50% करने लगे, तो आप क्या करेंगे? जबरदस्ती का Psycho war चल रहा है। यूँ लग रहा है, जैसे लोगों के दिमाग की common sense को ही ब्लॉक कर दिया गया है। Long Term में बच्चे पर ऐसे Enforced Dramas का प्रभाव क्या होगा? अगली पीढ़ी के खास रोबोट्स का उत्पादन और फिर उनकी पैदाइशी ट्रेनिंग ऐसे शुरू होती है और आगे चलती है। बच्चे की पैदाइश से लेकर, तारीख, जगह, हॉस्पिटल, डॉक्टर और कितने सारे छोटे-मोटे details, सब कौन कंट्रोल कर रहा है? और उससे भी अहम है, कैसे और क्यों?

हमारे बच्चों को Psycho Manipulations, Alterations, Psycho Wars, Psycho Operations (Military या Civil) जरुर पढ़ने चाहिएँ। 24 Hour, 365 Days, जब आप observations और Surveillance Abuse के घेरे में हों, तो ज़िंदगियाँ बिलकुल लैब-सी कंट्रोल होती हैं। समाज की इस लैब के Standards और Protocols भी बिलकुल ऐसे ही डिज़ाइन और operate होते हैं, जैसे किसी भी Scientific लैब में। 

ये उदाहरण इसलिए दिया, की एक तो ये तरो-ताज़ा है। उसपे, इससे पहले आसपास के ही कई बच्चों की पैदाइशों से लेकर, हॉस्पिटल, उन बच्चों की बीमारियों और फिर स्कूल जाने तक के सफर को थोड़ा पास से देखने का मौका मिला, इन पिछले कुछ सालों में। खासकर, जब से मैं घर आई हूँ।  
 
आगे और कई ऐसे उदाहरण मिल सकते हैं, अजीबोगरीब ड्रामों के, जहाँ बच्चों तक को शामिल कर लिया जाता है। जो मेरे हिसाब से इन बच्चों और माता-पिता के लिए भी सही नहीं है। वो उनकी ज़िंदगियों को कोई अजीबोगरीब दिशा दे रहे हैं। जिनसे ना सिर्फ सावधान रहने, बल्की बचने की जरुरत है।  
    
मगर बचोगे कैसे, जिनके बारे में तुम्हें मालूम ही नहीं? ये भी अहम है। वो भी जानने की कोशिश करेंगे।                     

Wednesday, January 17, 2024

Store H#16, Type-3

आपमें से कौन-कौन हैं, जो स्टोर में अपना मंदिर बनाते हैं? 

जब मुझे 2011 में H#16, Type-3 घर मिला, तो कुछ अजीब-सा था उसमें। रंग-रोगन करवाने के बावजूद,  उसके स्टोर में जैसा जो पहले था, बिलकुल वैसे ही था। बहुत कुछ अजीब-सा दीवारों पे और ढेर सारा घी या तेल जैसा कुछ रमा हुआ, जैसा फर्श पे। पता नहीं, उसके स्टोर पे पेंट किया भी गया था या नहीं। शायद मैंने ध्यान नहीं दिया। या शायद, बिना दीवारों को साफ किए, ऊपर से हल्का-सा कर दिया, पेंट करने वालों ने। क्यूँकि, जब मैंने सामान शिफ्ट करने के पहले साफ-सफाई चैक की, तो पता चला की स्टोर तो बहुत गन्दा है। 

पड़ोस से ही, मेरे एक Colleague के यहाँ से, एक सफाई वाली (Domestic Help) को भी बुला लिया। और फिर वही साफ-सफाई करने आने लगी। मैंने उसे स्टोर को अच्छे से साफ करने को बोला। उसने स्टोर देखते ही कहा, मैडम आपने ये स्टोर साफ नहीं करवाया क्या? इसपे पेंट भी नहीं हो रखा शायद।  

मैंने कहा, हाँ शायद रह गया। आपको थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। ये तो कुछ ज्यादा ही गन्दा है। उसे ऐसा बोल के मैं नीचे आ गई। अगले दिन, जब वो काम वाली आई तो उसे फिर से बोला, अरे शायद कल आप भूल गए। आज साफ करके जाना स्टोर को। 

उसने बोला, मैडम आपने देखा इसपे (दीवारों पे) क्या-क्या लिखा हुआ है?

मैंने कहा, हाँ ! बड़ा अजीब-सा है। जो भी है, आप साफ कर दो। 

उसने कहा, मैडम आपने नीचे फर्श देखा?

मैंने कहा, हाँ ! दिवार और फर्श दोनों ही बहुत गंदे हैं। देख लिए। अब कर भी दो साफ। इसके एक्स्ट्रा पैसे ले लेना। 

उसने कहा, मैडम बात पैसों की नहीं है। मैं नहीं करुँगी ये साफ?

मैंने कहा, क्यों? ज्यादा गन्दा हो तो आप साफ नहीं करते?

उसने कहा, कर देती हूँ। पर इसे नहीं करुँगी। 

ऐसा क्यों? मैंने पूछा 

उसने कहा, आपको पता है, यहाँ कौन रहता था?

हाँ। बाहर नाम लिखा है ना। 

उसने कहा, अरे आपने अपना नाम भी नहीं लिखाया अभी?

नहीं, अभी यूनिवर्सिटी वाले आएँगे लिखने। उन्होंने बोला है। 

पर मैडम, वो तो पहले लिखा नाम भी नहीं मिटा कर गए। उसके ऊपर भी पेंट नहीं हो रखा। 

यार, तुम बहुत गप्पेड हो। कर जाएँगे। अभी काम करो अपना। 

और मैं आज फिर से नीचे आ गई, ये सोच के की ऐसे तो ये बोलना ही बंद नहीं होगी। मैंने ध्यान नहीं दिया, ये सोच के की स्टोर साफ कर गई होगी। मगर देखा, तो फिर से नहीं। 

अगले दिन आई, तो उसे बोला पहले स्टोर, बाद में बाकी कुछ। चलो ऊपर, मेरे सामने करो। 

मैडम, बोला ना, मैं नहीं करुँगी ये। 

मगर क्यों?

वो सामने मैडम ये बोल रही थी, जो पहले यहाँ रहते थे ना, वो पता नहीं क्या-क्या करते थे?  

क्या-क्या करते थे, मतलब?

अरे, पता नहीं क्या भूत-वूतों से बातें करते थे। 

ओह हो। तो डरा दिया आपको किसी ने?

नहीं और भी एक-दो ने बोला। 

अच्छा? भूतों को मानते हो तुम?

आप नहीं मानते?

मन का वहम होता है। मानों तो हैं। नहीं तो नहीं। इंसान से बड़ा भूत क्या होगा? डर का भूत होता है। 

अच्छा? तो आप ही साफ करना। या किसी और को बुला लेना। मैं तो नहीं करुँगी। 

मुझे लगा उसे किसी ने डरा दिया है। ऐसे तो कोई उसे काम से भी भगा देगा। मैंने उसे कहा, चाय पीते हो?

हाँ ! 

आओ चाय पीते हैं। सोचा, इस बहाने थोड़ा गप्पे भी हांके जाएँगे उसके साथ और शायद बातों-बातों में उसका डर भी खत्म हो जाएगा। 

उसने कहा, मैं बना देती हूँ। 

नहीं बैठो आप। आज मैं ही बनाती हूँ। फिर कभी पीनी हो तो आप बना लेना। 

और लो जी, हो गई वो शुरू। वो मैडम, ऐसे बोल रहे थे और वो वैसे बोल रहे थे, उनके बारे में। कई तरह की उल्टी-पुल्टी सी बातें, उनके मंदिर के बारे में। जो मुझे खामखाँ और बकवास लग रही थी। लगा ज्यादातर कम पढ़े लिखे और गरीब तबकों के साथ शायद ज्यादा होती है, ये समस्या। लोगबाग पता नहीं कैसे-कैसे डर बिठा देते हैं, उनके मन में। मगर फिर कुछ उसने ऐसा बोला, जिसने मेरा ध्यान खींचा, उस घर में लगे पेड़-पौधों के बारे में। ये थोड़ा बहुत मेरी रुची का विषय था। मेरे समझाने पे उसने थोड़ी-बहुत सफाई तो कर दी। मगर सिर्फ फर्श की। जाने क्यों, जब वो दीवारें साफ करने लगी तो मैंने टोक दिया। आज बहुत कर दिया। ये फिर कभी कर देना। 

उसके जाने के बाद, मैंने दीवारों पे उन अजीबोगरीब चिन्हों को थोड़ा ध्यान से देखा। मगर, कुछ पल्ले नहीं पड़ा।  सिवाय इसके, की पता नहीं ज्यादा धर्म में विश्वास करने वाले लोग क्या-क्या बनाते रहते हैं। शायद इसलिए भी, की उस वक़्त तक मेरे लिए वो सब अंधविश्वास और बेवकूफी के इलावा कुछ नहीं था। उस घर में बहुत ज्यादा पेड़ तो नहीं थे। मगर दो पेड़ दक्षिण भारत से थे। सीधी-सी बात, वो उधर से होंगे। तो उनपे भी कोई खास ध्यान नहीं दिया। 

एक दो बार उन मैडम से मुलाकात भी हुई, जब वो अपने पुराने घर देखने आए की अब वहाँ कौन आया है। और शायद एक बार बेल के सीजन में या अपना कोई लैटर वगैरह या शयद पार्सल पूछने, जिनके पते अभी तक उसी घर के थे। वो बेल का पेड़ भी शायद उन्हीं का लगाया हुआ था। मुझे उनमें कुछ खास अलग नज़र नहीं आया। मीठा बोलते हैं। अपने जूनियर्स से, ऐसे ही व्यवहार करते हैं, जैसे ज्यादातर पढ़े-लिखे सभ्य लोग। 

हाँ। वक़्त के साथ-साथ कई बातें पता चली, जिनसे लगा की शायद कुछ तो खास होगा, जो इतने सारे लोगबाग कह रहे हैं। जैसे, मेरे एक पड़ोसी ने खास धन्यवाद दिया, जब मकान के अंदर के कुछ पेड़ और बाहर खाली प्लॉट की दिवार के साथ लगते झाड़ को साफ करवाया। मैडम धन्यवाद आपका, साँपों के छुपने की जगह बने हुए थे, ये झाड़। हो सकता है, उन्होंने सिक्योरिटी को मध्यनजर रख ऐसा किया हो। वैसे भी हर इंसान और उसका स्वाभाव अलग होता है। जैसे मैंने उन्हें साफ करवा, फूलों के, मगर कांटो वाले पौधे लगवा दिए थे, गुलाब और bougainvillea की अलग-अलग वैरायटी। 

कुछ वक़्त बाद मुझे खुद लगने लगा था, की कुछ अजीब-सा है उस घर के आसपास और अंदर भी। मगर मेरे लिए वो भूत नहीं थे। वो था Surveillance Abuse । और था, डराने के अजीबोगरीब तरीके, खासकर, आप अकेले रहते हों तो। वो भी धीरे-धीरे समझ आए। यहाँ-वहाँ से कुछ दोस्तों, पत्रकारों या जाने-अनजाने सोशल प्रोफाइल्स पढ़के, जिन्हें मैं यहाँ-वहाँ के लिंक्स से पढ़ने लगी थी। वैसे तो टोने-टोटकों के कई वाक्या सामने आए थे। मगर, 2016 में, दुशहरी के आम के पेड़ पर कच्चे धागे वाले कारनामे ने, शायद, एक तरह से उस स्टोर या ऐसे-ऐसे कितने ही स्टोरों के राज खोलने में मदद की वक़्त  साथ। धर्मो और आस्थाओं के नाम पे रीती-रिवाजों और उनसे जुड़े जुर्मों और उससे जुड़े विज्ञान के आम-आदमी पे मानसिक जाल को समझने में भी सहायता की। इन्हीं सब में जैसे गूँथ-सा दिया है, पढ़े-लिखे शातीर लोगों ने, आम-आदमी की ज़िंदगी के उतार चढ़ाओं को। उसकी ज़िंदगी की खुशियों को, गमों को। त्योहारों को, उत्सवों को। उससे भी अहम पैदाइशों को, बिमारियों को और मौतों को भी। 

मुझे तो शायद उन मैम का धन्यवाद करना चाहिए और उनके स्टोर और पेड़ों के बारे में जानकारी देने वालों को भी। क्यूँकि, अगर मुझे वो घर ना मिला होता और जो कुछ वहाँ था या हुआ, अगर उसे जानने की रुची ना हुई होती, तो रीती-रिवाजों का या धर्मों का ये जाला, विज्ञान और राजनीती के साथ कहाँ पता लगता? अन्धविश्वाशों के भी, समाज के अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग मायने हैं, ये भी कहाँ पता होता? किसी के लिए, वो सिर्फ श्रद्धा और विश्वास, किसी के लिए अंधविश्वास तो किसी के लिए विज्ञान। वो विज्ञान, जो लोगों को और उनकी ज़िंदगियों को काबु करता है। उन्हें मानव रोबोट बनाता है। 

यूनिवर्सिटी वाले, ना उस नाम को बदलने आए, और ना ही उस नाम प्लेट को। और ना ही वक्त के साथ, मैंने जरुरी समझा, क्यूँकि, अजीबोगरीब अटैक होने लगे थे। और वो नाम तकरीबन दिखाई देना बंद हो गया था। ध्यान से देखने पे ही हल्का-सा दिखता था। उन मैम का नाम भी वि से ही था और उसका अर्थ भी बड़ा ही कोमल-सा। बाद में भी,  Type-4 में भी, वो मेरे पड़ोसी थे। कभी-कभार उनके यहाँ आना-जाना भी हुआ या आते जाते वक़्त हाय-हैलो। मालूम नहीं, उन्हें अपने स्टोर वाले मंदिर के बारे में या उस घर के पेड़ों के बारे में, ये वाली जानकारी कितनी थी या है। क्यूँकि, मैंने उनसे ऐसा कभी पूछा नहीं। शायद यही जानकर की वो धर्म और रीती-रिवाजों को काफी मानते हैं और उसपे विज्ञान से भी शायद कम ही नाता है। 

हालाँकि, अपने एक और साथ वाले पड़ोसी से समझ आया, की जरुरी नहीं रीती-रिवाजों और विज्ञान की राजनीती के इस जाल की कहानी, विज्ञान वालों को ही पता हो। बहुत बार शायद उल्टा भी हो सकता है। जैसे मेरे साथ वाले घर वाली मैम से पेड़-पौधों का शायद थोड़ा बहुत समझ आया। और खनन वाले ज्ञान और विज्ञान का भी। थोड़ा बहुत ये भी, की क्या कहाँ रखा है और उसका क्या मतलब हो सकता है, को पढ़ते कैसे हैं, सिर्फ देखकर। ये ज्ञान बाहर की यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पे तो ऐसे है, जैसे थोड़े देर भी किसी वेबसाइट पे ठहरे तो गप्पे हाँकने लगेगा। अब पता नहीं, खुद उन यूनिवर्सिटी के ज्यादातर Stake Holders को इसके बारे में कितना पता है? क्यूँकि, आज भी शायद ये सब, बहुत से स्टूडेंट्स और स्टाफ को वैसे नहीं पता, जैसे कुछ लोगों को पता होता है? शायद? जानकार शायद ज्यादा बता पाएँ। 

इस स्टोर जैसी-सी ही, कितनी ही जानकारियों ने, इस कल्चर को "मीडिया कल्चर और सोशल इंजीनियरिंग" से अवगत कराया। ठीक वैसे, जैसे लैब में होता है। 

इंसानों के साथ-साथ, अगर पशु-पक्षियों के कल्चर मीडिया को जानोगे, तो शायद जरुर लगे, जैसे जादू है कोई। इतनी आसान है क्या ये ट्रैंनिंग, मानव-रोबॉट बनाने की? या automated सिस्टम के साथ-साथ जैसे सब बदलता है? क्यूँकि, उनमें तो दिमाग वैसे ही नहीं होता। इंसान का तो फिर भी ब्लॉक करना पड़ता है शायद, कोई खास हिस्सा या जानकारी या लालच या डर जैसे, इंसानी व्यवहार को इधर-उधर खिसकाना? या कुछ जरुरतें खत्म करके, कुछ ना जरुरी जरुरतें पैदा करना? 

Sunday, January 14, 2024

आज का ज्ञान

दान का तिनका भी दिखाकर और बताकर,  

मगर बड़ी धोखाधड़ी और काँड भी छुपाकर करें।  

Friday, January 5, 2024

यूनिवर्सिटी की सैर पे चलें?

आओ नजरों से जाले हटाएँ 

ये फोटो किसी यूनिवर्सिटी के ऑफिसियल पेज से ली गई है 
कौन सी यूनिवर्सिटी?

चलो आएंगे इस जहाँ पे भी। आपको इस फोटो को देखके क्या समझ आ रहा है? अगर आप कम पढ़े लिखे हैं और विज्ञान से कम नाता है तो मकड़ी के जाले-सा कुछ? या आँख पे जैसे कोई जाला सा छा गया और दिखाई भी कम दे रहा है?
मुझे सिर दर्द रहता था, एक सीनियर ने सलाह दी, आँख चैक करवाओ। डॉक्टर ने बोला आँखे ठीक हैं, थोड़ी आँखों की muscle कमजोर हैं। आँखों की exercise किया करो।  उसके बाद पेपर थे तो सिर दर्द और बढ़ गया। अबकी बार डॉक्टर ने चस्मा लगवा दिया। उस चश्में को पहन के ऐसे लग रहा था जैसे ऊपर जाने वाली सीढ़ियां, नीचे की तरफ जा रही हों और जब नीचे की तरफ जाना हो, वहाँ एक दो step ही गुल हो जाएँ। मतलब फूटने का सही इंतजाम। फिर से डॉक्टर को दिखाया तो सलाह मिली, चश्में नए-नए हैं, थोड़ा वक़्त लगेगा एडजस्ट होने में। कुछ दिन कोशिश की लगाने की मगर कुछ ही वक़्त बाद उन्हें संभाल के पैक करके रख दिया।
 
शायद आप कोई पढ़ाकू टाइप बच्चे हैं, मगर चश्में अच्छे नहीं लग रहे, लैंस लगवा लो, ऐसा किसी ने सलाह दी। और आपने लैंस लगवा लिए। मगर आजकल तो सुना है की लैंस भी अच्छी खासी quality के आने लगे हैं। 2002 के आसपास ऐसा नहीं था। विदेशों में तो पता नहीं, पर उस वक़्त भारत में आँखों के लैंसों का उदय थोड़ा नया ही था। और उस वक़्त लैंस की quality भी आज जितनी अच्छी नहीं थी। लैंस लगवा लिए। मगर उन्हें आप 5-7 घंटे से ज्यादा लगाएंगे तो फिर सिर दर्द होगा। कुछ ही दिन हुए थे लैंस लगाते हुए। एक दिन हॉस्टल वापस आकर लैंस उतार के रख दिए। मुझे ऐसा ही समझ आया। अगले दिन सिर दर्द से हाल बेहाल। समझ नहीं आया, ऐसा क्या हुआ? एक आँख के सामने भी जैसे जाला-सा छा गया। उस दिन रविवार था। ऐसे ही निकाल दिया की शायद आराम करने से राहत मिल जाए। मगर सोमवार को भी ऐसा कुछ नहीं हुआ और सिर दर्द और जाला दोनों बढ़ गए। आखिर हॉस्पिटल गई। डॉक्टर को जाते ही समझ आ गया। लेडी डॉक्टर थी। उसके आसपास कई PG डॉक्टर शायद, जिन्हें वो ये नमूना (specimen) दिखा रही थी। 
उसने बोला, लैंस लगाते हो?  
मैंने कहा, जी हाँ। 
उतारना भूल गए?
मैंने कहा नहीं, आखिर शनिवार को लगाए थे और डिपार्टमेंट से आते ही उतार दिए थे। 
फिर उन्होंने पूछा, कहाँ रहते हो?
मैंने कहा, हॉस्टल। 
उन्होंने कहा, जाओ अपने लैंस लेके आओ। 
मैं वापस हॉस्टल आई और पता चला, एक लैंस उतार दिया, दूसरा भूल गई। दो लैंस के डिब्बे थे। एक  डिब्बे का एक लैंस थोड़ा कट गया था, इसलिए फेंक दिया। उसी में एक उतार के रख दिया और लगा दोनों उतर गए। ध्यान ही नहीं दिया। इसलिए एक आँख में जाला था और सिर दर्द भी। उस लैंस को भी उतार के, अच्छे से आँखे पानी से साफ की। जाला भी खत्म और अचानक से सिर दर्द से भी काफी राहत। लैंस लेके वापस हॉस्पिटल गई और डॉक्टर को बताया की गलती से इस आँख में लैंस रह गया था। उतार दिया, अब कोई जाला नहीं है और सिर दर्द भी काफी कम हो गया। उन्होंने कहा लैंस इतने अच्छे नहीं होते की दिन में भी लगाओ और रात भर लगा के सो भी जाओ। आगे से ध्यान रखना। अब आँख और टैस्ट करवा लो, कहीं कोई damage तो नहीं हुआ। सब सही था और मैं वापस हॉस्टल। उसके बाद लैंस को भी पैक करके रख दिया और फिर कभी नहीं पहने। 

इतने सालों बाद ये सब बताने का उद्देश्य क्या है?
ये की आपको चश्में ना लगने हों तो लग सकते हैं। लैंस की जरुरत ही ना हो, तो भी जरुरत जैसे पैदा की सकती है। और इन्हें शायद से सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ कहते हैं? शुरू में बहुत ही छोटी-छोटी-सी सामान्तर घड़ाईयाँ, वक़्त और अपराधों के साथ-साथ खुंखार होती जाती हैं।  
क्यूँकि इसके कुछ सालों बाद मुझे वापस से पता चलता है की मेरी आँखों का नंबर सही है। और जो आपने चश्में लिए वो शायद अपने तकरीबन ना के नंबर से ज्यादा ले लिए या यूँ कहो दे दिए? इसीलिए उन्हें पहनने पे ऐसा अनुभव हो रहा था।  
ये जानकारी तो थी आम आदमी के लिए, अजीबोगरीब जालों की, खासकर जिनका विज्ञान से कम नाता है। अब चलते हैं, थोड़ा-सा विज्ञान की तरफ। विज्ञान को जानने वालों के लिए इस जाले वाली फोटो के कितने मायने हो सकते हैं? सबसे बड़ी बात, ऐसी-ऐसी टेक्नोलॉजी को भूत घड़ने में प्रयोग किया जा सकता है। भूत, कैसे-कैसे? जानते हैं आगे किसी पोस्ट में, इस यूनिवर्सिटी जैसी कितनी ही दुनियाँ भर की यूनिवर्सिटी के शोधों के माध्यम से या सहायता से। मगर फोटो यहाँ से क्यों? क्यूँकि कुछ तो खास होगा इस यूनिवर्सिटी में?