About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Tuesday, November 28, 2023

सरवर, सर्वर, सर्वत्र और बिजली?

 ये झमाझम बारिश 

और ये बिजली का गुल होना 

दोनों हैं मानव निर्मित?

या प्रकृति की देन?

माँ के इस घर में बिजली की थोड़ी दिक्कत थी। स्विच कम थे। तो सोचा थोड़ा ठीक करवा लूँ। पड़ोस की ही एक आंटी को बोला और एक बिजली वाला पहुँच गया। एक खास तरह की नौटंकी के बाद, कुछ ऐसा काम भी हो गया जो बोला ही नहीं था। और कुछ ऐसा नहीं किया गया, जो बोला था। ये खास किस्म के 15 वाला कमीशन था? ये कमीशन वाली दुनियाँ, कुछ ज्यादा ही अजीब है। जितना आप इसे समझने की कोशिश करोगे, उतना ही इससे दूर होते जाओगे। उसपे जिस तरह के लोगों के बीच आप रह रहे हैं, कभी कभी तो समझ ही नहीं आएगा, की ऐसे-ऐसे लोगों की कमेन्ट्री पर क्या तो बोला जाए और क्या ना? एक होता है, कुछ गलत होने पे सॉरी फील करना। या सामने वाले को ठीक करने को बोलना। और एक होता है, ऐसा कुछ करने की बजाय बेहुदा कमेन्ट्री करना। और ऐसा भी नहीं है की ऐसे लोग सिर्फ आपपे ऐसी कमेन्ट्री करते हैं, वो बक्शते अपने खुद के बच्चों को भी नहीं। आदत से लचर लोग। कुछ तो अपना दिमाग कम प्रयोग करना। उसपे राजनीतिक पार्टियाँ अलग-अलग तरह के भावनात्मक तड़के लगाती हैं। मतलब, लोगों को किसी ठीक-ठाक काम पे ना लगा के, उनके दिमाग ब्लॉक करके, सिर्फ और सिर्फ फालतू और बकवास की तरफ धकेलना। अब ऐसी-ऐसी पार्टियाँ ये थोड़े ही बताएँगी की, जुर्म जुर्म होता है। वो सॉफ्ट क्राइम हो या लट्ठमार।  किसी भी तरह का बेहुदा साँड़ सिंड्रोम (Bulling Syndrome), उस केटेगरी में आता है।          

बड़े लोगों के करवाए जुर्मों की जानकारी या समझ, जिनसे ये छोटी-मोटी  नौटंकियाँ करवाई जाती हैं, उन्हें कितनी है, पता नहीं। यही सोचकर बहुत कुछ ऐसा, ज्यादातर इग्नोर करो के डिब्बे में जाता रहता है। हाँ। ये कुर्सियों पे बैठे उन लोगों के लिए जरूर है, जिनसे शायद कई बार बहस भी हुई और एक-आध अच्छा खासा लेक्चर भी दिया गया। खासकर वो, जिसमें बोला गया था की अगर इतने पढ़े-लिखे लोगों के ये हाल हैं तो बाहर जो कम पढ़ा-लिखा या तकरीबन अनपढ़ समाज है, उससे उम्मीद क्यों? उस समाज की दिशा या दशा ये पढ़े-लिखे लोग घड़ रहे हैं, कोई और नहीं। वो चाहे फिर सिविल में हों, या डिफेंस में।      

वापस बिजली पे आते हैं। क्या है, जो आम आदमी को भी समझना चाहिए, इस बिजली के बारे में? वो है, की बिजली क्या कुछ कर सकती है? कितना कुछ रिमोट कंट्रोल हो सकता है? और उसकी वजह से आम आदमी कितना परेशान हो सकता है ? वो भी उसकी जानकारी के बगैर, की दुनियाँ में बहुत कुछ अपने आप नहीं हो रहा। बल्कि किया जा रहा है। बिजली का ये राजनीतिक मकड़ज़ाल उनमें से एक है। बहुत कुछ तो नहीं मालूम इस विषय के बारे में। मगर हाँ, बिजली के इर्द-गिर्द घूमते, इधर-उधर हुए नौटंकियों और अनुभवों के हिसाब से आम आदमी से शायद थोड़ा ज्यादा मालूम है। तो आती हूँ उन अनुभवों को भी शब्दों में पिरोकर, किसी अगली पोस्ट में। 

Thursday, November 23, 2023

महारे 16-नंबरी

एक ने रक्खा 19 वाला रोड़ा 

वो ले आए 29 और ऐसे ही बढ़ाते रहे अपने खेल (जुए को आगे) 

19 वाले की शादी नहीं हुई या 29 वालों की? या उनके बच्चे नहीं हुए? 


16 को तो शिव का नंबर कहते हैं ना? फिर 16 वालों की इतनी बीरान-माटी क्यों?  

कौन-कौन हैं तुम्हारे आसपास 19 या 29 के जन्मदिन वाले? या शादी वाले? बताना कहाँ-कहाँ हैं, वो? या क्या कर रहे हैं? थोड़ी-सी निगाह तो अपने ही अड़ोस-पड़ोस या भाई-बँधो पे घुमा लो। सब ठीक-ठाक है या गड़बड़?   

और कौन-कौन हैं ये 16 के जन्मदिन वाले? या 16-नंबरी भक्ती वाले?  

16 को जहाँ मरण दिन बना दिया, उसपे इतने सारे हिसाब-किताब लगा दिए। तो क्या बचेगा, ऐसे हिसाब-किताब के बाद उनपे? तो वहाँ तो या आप शिव-भक्ती वाली राजनीति को नकारोगे या मरण-मरण ही रहोगे? ऐसा शिव और उसकी भक्ती किस काम की? उसपे शिव के नाम पे रखवा दिए, फलाना-धमकाना पथ्थर। तो इंसानों जैसी ज़िंदगी न जीकर, पथ्थरों जैसी-सी ही जिओगे। नहीं तो दे मारो, उन पथ्थरों को पथ्थर और कर दो उनका घमंड चूरचूर। कैसे काम के ऐसे पथ्थर, जो ज़िंदगी ही बना दें पथ्थर?

शिव और 16 तो पवित्र होना चाहिए? आइये जानते हैं, ऐसे नंबर वाले लोगों से ये राजनीती और ये कलाकार क्या-क्या करवाते हैं?

एक दिन एक गन्दा कालीन धोने के लिए रख दिया। एक 16 नंबरी आया और उसे पास ही रक्खी एक छोटी-सी सोफा कुर्सी पे रख गया। अजीब इंसान है? मगर पीने के बाद इतना होश कहाँ रहता है? उस कालीन को गुस्से में नीचे पटक दिया गया। मगर अगले दिन फिर वही। लगता है, उतरी नहीं अभी? कई दिन चला ये सांग। ज्यादा पीने वालों में दिमाग तो बचता नहीं। तो क्या तो बोलो और क्या ना बोलो? ऐसे-ऐसे मानव रोबोटों को? उनसे जो करवाया जाएगा वो कर देंगे, अपना दिमाग लगाए बगैर।    

यहाँ तक होता तो भी चल जाता। एक दिन, अपने 16-नंबरी परदे के पीछे डंडा रख गए और लड़खड़ाती जुबान गाए, "मारो साली को" । पता नहीं किसकी साली को मार दें, ये पीने वाले? अब साला या साली तो, ऐसे लोगों की कक्षा का क ख ग होता है। उससे आगे तो पता ही नहीं क्या-क्या आता है। गालियों से नफरत करने वालों को इनकी क्लास अटैंड जरूर करनी चाहिएँ। जुबान सिर्फ बेहुदा ही नहीं, बल्की कुछ खतरनाक भी गा रही थी। परदे के पीछे छुपा डंडा, उसका संकेत भर था। इधर-उधर से सावधान करने वालों के संकेत भी चल रहे थे, की गाँव से निकलवाने वाले, कहीं पुरे घर को ना खा जाएँ। ये खास भड़काने वाली पार्टियों की तरफ ईसारा था। जिनके कारनामों, खास तरह के भडकावों का खूँखार रूप, ये घर पहले ही भुगत चुका था। और उसे बहुत वक़्त भी नहीं हुआ था। मगर किन्हीं बाहरी पार्टियों को क्या कहोगे आप, जब आसपास से ही ऐसी-ऐसी साज़िशें चलने लगें? या कहना चाहिए की बहुत आसान होता है दिमाग से पैदल लोगों को, कोई भी भावनात्मक भड़काव पैदा कर, अपने फायदे के लिए उनका दुरुपयोग करना। और भी कई तरह के डरावे थे। कभी इस रंग का चाकू तोड़ के कहीं रख जाना। कभी उस रंग का चाकू तोड़के कहीं रख जाना। मगर, पीले रंग का चाकू, बिना तोड़े बैड पे रख जाना। वो भी किन्हीं खास-खास तारीखों को, वो भी चदर इधर-उधर फैंक के। एक तरफ ये 16-नंबरी के कारनामे। 

तो दूसरी तरफ, किसी पड़ोस से खास तरह का प्रचार, फलाना-धमकाना की पत्नी को फलाना-धमकाना ने ऐसे-ऐसे पीटा। वो भी खास तरह के इफेक्ट्स के साथ। चद्दर या कपड़ों वाले स्पेशल इफेक्ट्स। वो बच्चे जो आपके लैपटॉप से मारपिटाई के विडियो उड़ा दें, बगैर ये जाने-समझे, की उनकी कॉपी पता ही नहीं कहाँ-कहाँ पड़ी हैं। वो ऐसा कुछ गाएँ? दोगली सोच, व्यवहार या मानव रोबोट बन जाना?    

सबसे बड़ी बात, आसपास के लोगों द्वारा बच्चे को जिस तरह से किडनैप किया गया। और बच्चे ने फिर जो कुछ बताया। उसे कुछ खास ऐसे कहा गया या उसके सामने बहुत कुछ ऐसा बार-बार गाया गया। उसपे उसकी पढ़ाई का भठा बिठाने की कोशिश। वो लोग जो बच्चे पे मरते हैं, वो ऐसा कैसे कर सकते हैं? उससे सबकुछ छीनने की कोशिशें। जब ये सब पता करने की कोशिश की, तो वही इल्जाम मुझपर फेंकने की कोशिश हुई, उन्हीं लोगों द्वारा। बेवकूफ लोगों के दिमाग में अजीबोगरीब शुभ-अशुभ भर के, ईधर ऐसे भड़काओ और उधर वैसे? फुट डालो, राज करो विभाग?        

मतलब सबको आपस में ही भीड़ा-भीड़ा के मार डालो। इससे बढ़िया मानव रोबोटों वाली, एक के बाद एक, क्रूर  सामान्तर घढ़ाईयों की कोशिश, मैंने तो इतने पास से देखी, सुनी या अनुभव नहीं की ज़िंदगी में। कैंपस क्राइम सीरीज, फीकी पड़ गई, इन सबके सामने। कालीखी विभाग? ऐसे लोगों के लिए 16-नंबर, शिव या किसी भी भगवान के क्या मायने हो सकते हैं? सिवाय, उस माध्यम से राजनीति कूटने और अपनी स्वार्थ  सिद्धि के?   

ऐसी-सी ही कुछ कहानियाँ बीमारियों, लोगों को हॉस्पिटल तक पहुँचाने और वहाँ से उठाने, खास तरह के ऑपरेशन करने, या वापस घर भेजने की हैं। इतने तरह के enforced एजेंडा, इतने तरह के लोगों को, कितनी ही तरह से काबू करना और कितने ही तरह के यहाँ-वहाँ सूक्षम कंट्रोल। मानव संसाधनों और टेक्नोलॉजी का कितना दुरुपयोग? कितनी ही तरह से? कितनी ही तरह के मानव द्वारा ईजाद किए गए दुख, परेशानियाँ और हादसे? सबसे बड़ी बात, आम आदमी को अहसास तक ना होने देना की ये सब कैसे किया जा रहा है। और साहब लोग चाहें, की लोगबाग ज़ुबानों को सील कर बैठ जाएँ? कलमों को पेंसिल बना दें या तोड़ डालें? लैपटॉप, इंटरनेट से दूर रहें या उन्हें वायरस के हवाले कर दें। दिमाग बंद कर, बस उनके भक्त बने रहें?   

Monday, November 20, 2023

समस्याएँ और समाधान ?

कहीं पुस्तैनी जमीन जायदाद के झगडे, तो कहीं सरकारी भी हमारे बाप की प्राइवेट लिमिटेड? 

नागीन-सपेरा? 100-100 नाग पड़े रहं गल मैं, सामान्तर घड़ाई? जहाँ-जहाँ नाश उठाना हो, वहीं छुपम-छुपाई खेल शुरू हो जाते हैं?    

कमजोर वित्तीय स्थिति के लोगों के विवाद हैं ये? ऐसे विवाद, तब ज्यादा होते हैं, जब एक ही घर हो और उसे प्रयोग करने वाले कई। सबके अपने-अपने घर होंगे, तो ऐसे विवाद ही कहाँ से पनपेंगे? बढ़िया है ना, की अपने-अपने घर ढूँढो या बनाओ। इन पुस्तैनी जमीनों के वाद-विवादों से दूर कहीं।  

मगर उसके हिसाब से पैसा चाहिए। उसपे जहाँ आप रहना चाहते हैं, उसके हिसाब से पैसा चाहिए। वो तो कमाना पड़ेगा। बगैर, काम-धाम या मेहनत किए तो कुछ नहीं हो सकता। मगर यहाँ पे अजीबोगरीब तरह के किस्से-कहानियाँ हो सकते हैं। जैसे, दो भाई या दो बहन हों। एक मेहनत करके खाए। दूसरे ठगु को पता ही ना हो, वो क्या बला होती है? गलती शायद बहुत ज्यादा उसकी भी ना हो। माहौल, संगत, जो अच्छे भले लोगों को कामचोर और अपाहिज बना देता है। ज्यादातर गरीब इलाकों की या गरीब लोगों की अलग-अलग तरह की अजीबोगरीब सोच। जिसका इलाज सिर्फ और सिर्फ मेहनत है। ये तो हुई पुस्तैनी घरों या जमीनों की बात। 

तुम, खास किस्म के महान लोग, कब-कब और कहाँ-कहाँ, कह सकते हो उसे, की मेरे घर से निकल? वो भी पुस्तैनी मकान या जमीन पर बने घर से? ये कहानी भी, किसी एक औरत की नहीं है यहाँ। हर कमजोर औरत की? कमजोर औरत? या शायद कमजोर तबका। फिर वो चाहे औरत हो, या पुरुष? 

क्या हो अगर आपको पुस्तैनी चाहिए ही नहीं? आपके पास सरकारी हो और उस मकान के कोई खसम बने बैठे हों?  

एक वजह 

राजनीती के मकड़जाल और सामान्तर घड़ाईयों की सोच की पैदा की गई सोच है। जिसमें, जिसकी लाठी, उसकी भैंस का महान मंत्र है। सोचो, आप यूनिवर्सिटी में टीचर हों। वहाँ का कर्मचारी होने की वजह से कैंपस घर, आपकी नौकरी की वजह से, बहुत सारी और सुविधाओं की तरह ही, एक सुविधा हो। कुछ अलग से खास नहीं। और आपको किन्हीं ऐसे लोगों से सुनने को मिले, "मेरा घर खाली कर", जिनकी कम से कम योग्यता भी, उस नौकरी के आसपास ना हो? और ना ही वो यूनिवर्सिटी के कर्मचारी, किसी भी स्तर पर। एक बार तो आप यही सोचेंगे, की खिसके हुए बन्दे हैं। या अगर कोई लड़की हो, जो ससुराल से घर आ बैठी हो, तो शायद ज्यादा ही दुखी है, ससुराल वालों से। शायद इसलिए दिमाग खराब हो गया है। थोड़ी मेहनत घर के कामकाज की बजाय, अगर ध्यान पढ़ाई पे दे, तो शायद कुछ भला हो जाए, ऐसे-ऐसे लोगों का भी। क्यूँकि, ऐसा भी नहीं है, की दिमाग या मेहनत की कमी है। मेहनत, घर के वाद-विवादों और कामकाज में व्यस्त है। और दिमाग, मानव रोबोट वाली राजनीतिक सामान्तर घड़ाईयों का मारा। मानव रोबॉट, खुद का दिमाग ही नहीं प्रयोग हो रहा हो, जैसे। मतलब गड़बड़ फिर से माहौल, मीडिया (वही बायो वाला मीडिया), जिसके मकड़जाल में लोगबाग हकीकत और भावनात्मक-भड़काव तक का फर्क नहीं महसूस कर पाएँ। चलती-फिरती गोटियाँ या मानव रोबॉट।     

यूनिवर्सिटी के माहौल से निकलने के बाद, आपको वहाँ का माहौल ही, अपने लिए सबसे बड़ा अवरोध नजर आने लगे। आपको लगने लगे की उस माहौल से निकलना भी जरूरी है। क्यूँकि, आप उस नौकरी की वजह से, खुद को मकड़जाल में फँसा हुआ अनुभव करने लगें? 

दूसरी साइड/वजह 

कहीं से नेक सलाह, वो भी धमकी की तरह जैसे। वो भी फिर किसी ससुराल से घर बैठी हुई लड़की से। कितनी नेक? " तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है। ये नौकरी या भारत से बाहर।" ये नौकरी का मतलब है, यहाँ-वहाँ, कोरे पन्नो पे दस्तखत। जो पहले ही बहुत नहीं हो चुका? वही साइको तमाशा। और सोचो, ये सब हमारे महान सुप्रीम कोर्ट और सरकार की देखरेख में हो? बाकी पार्टियाँ भी पार्टी हों, ऐसे-ऐसे समझौतों में? बहुत से प्रश्न खनकने लगते हैं, ये सब जानकर या सोच समझकर। 

कमजोर वित्तीय स्थिति के लोगों के विवाद? या जुआरियों और शिकारियों की वजहें हैं, इन सब विवादों की? क्यूँकि, देश तो हैं ही नहीं। ना ही कोई कानुन। बस जुआ और शिकार? जिसका दाँव चल जाए, जैसे भी, जहाँ कहीं भी। और महान देश के कर्ता-धर्ता कहें, इस जुए से बाहर कोई दुनियाँ ही नहीं है। मतलब, समस्या ही समाधान है? या समाधान भी समस्या?           

Wednesday, November 15, 2023

खास बच्चों के लिए और उनके अभिभावकों के लिए

कुछ वक्त पहले सुनने में आया की किसी बच्चे को बहुत ही छोटी उम्र में हॉस्टल भेझ दिया गया। जहाँ कोई और समाधान ना हो, वहाँ तो शायद सही है। लेकिन, अगर कोई सिर्फ ये सोचकर भेझने की सोचें, की इससे उस बच्चे का ज्यादा भला होगा, तो सही नहीं है। अगर घर के हाल बहुत बुरे नहीं है, तो कम से कम स्कूल तक तो उसे घर का माहौल चाहिए। उसका कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता। पैसे से आप उसे घर का माहौल या माँ-बाप का प्यार या देखभाल नहीं दे सकते। हाँ। अगर आपके पास अपने बच्चों के लिए वक्त ही नहीं है, तो मान के चलो कुछ भी नहीं है। स्कूल के बाद तो ज्यादातर पढ़ाई, वैसे ही घर से दूर रहके होती है। इतने छोटे बच्चे उतने परिपक्कव भी नहीं होते की अपना भला या बुरा समझ सकें। और ज्यादातर मिडिल क्लास के स्कूलों के हॉस्टल, ना ही उतने अच्छे। Day Boarding तक तो फिर भी समझा जा सकता है। क्यूँकि, ज्यादातर बच्चे स्कूल के बाद टूशन पे होते हैं, खासकर जिनके यहाँ पढ़ाने वाले नहीं होते।   

जो माँ-बाप जितनी ज्यादा मेहनत अपने बच्चों के साथ उनके काम करवाने में करते हैं, उतना ही उन्हें इस चूहा-दौड़ में कम झुझना पड़ता है। जरुरी नहीं आप उतने पढ़े लिखे हों या आपको एक क्लास से आगे सबकुछ आता हो। बहुत जगह देखा है, की छोटी-छोटी सी चीजें, जैसे बच्चा जब पढ़ रहा है, तो सच में पढ़ रहा है या इधर-उधर वक्त ज्यादा बर्बाद कर रहा है, देखना मात्र ही बहुत होता है। कभी-कभार उसके साथ देर रात तक जागना, खासकर पेपरों के वक्त या सुबह उठाकार पढ़ने की आदत डालना ही काफी कुछ बदल देता है। ऐसा मैंने अपने कुछ cousins के यहाँ या दोस्तों के यहाँ देखा है। बच्चा रात को लेट पढ़ रहा है और माँ या बाप साथ में जाग रहे हैं। वो भी स्कूल के स्तर पे नहीं, बल्की यूनिवर्सिटी के स्तर पे। जबकी सुबह माँ-बाप को नौकरी पे भी जाना होता है, वो भी घर का काम करके। और अगर पूछो की ये तो खुद ही पढ़ लेता है या पढ़ लेती है, फिर आप क्यों जगरता करते हैं? जवाब मिलेगा, अरे उसे लगेगा कोई और भी साथ जाग रहा है, तो नींद कम आएगी। अब हॉस्टल में तो बच्चे रातभर जागते हैं। एक-दूसरे से होड़ रखते हैं, तो माहौल ही अलग होता है। घर पे सब सोते दिखेंगे तो उसे भी नींद जल्दी आएगी। क्यूँकि हॉस्टल में, खासकर पेपरों के दिनों में ऐसा ही होता है। जैसे कोई सो ही नहीं रहा।    

हालाँकि, जिन्हें लगन होती है, वो ये आदतें खुद भी बना लेते हैं। मगर बहुतों को शायद थोड़ा-सा दिक्कत होती है, खासकर ऐसे माहौल में, जहाँ पढ़ाई का मतलब या तो जबरदस्ती का टूशन हो या धमकाना और डराना। कुछ तो उससे आगे चलके, दे पटापट भी शुरू हो जाते हैं। वो दे पटापट या जबरदस्ती वाले ज्यादातर, 10-12 के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। और फिर ज्यादातर उन्हीं माँ-बाप का सिर फोड़ते हैं। और ऐसे माँ-बाप ऊपर से ये भी कहते मिल सकते हैं, की हमने तो बहुत किया, अपने बच्चों के लिए। क्यूँकि उन्हें शायद मालूम ही नहीं, की बहुत वाले कितना करते हैं। बहुत कुछ ना करके भी, पढ़ाई का माहौल देने की कोशिश करना, कहीं ज्यादा काम करता है। ऐसा माहौल, जहाँ बच्चा अपने आप पढ़ना शुरू करे। क्यूँकि, जबरदस्ती की बजाय, माहौल और लगन ज्यादा कारगार होता है। यहाँ माँ-बाप पे बेवजह का प्रेशर डालना नहीं है, सिर्फ ये बताना है, की पैसा सबकुछ नहीं दे सकता। जब तक आप अपने बच्चे को वक्त तक नहीं दे सकते।  

Saturday, November 11, 2023

राजनीतीक तड़क-भड़क वाले त्यौहार, धर्म और रीती-रिवाज

राजनीती के साँचे में ढलते त्यौहार, धर्म और रीती-रिवाज? राजनीती के अनुसार बदलते, पुरातन में लिखी गई कहानियों के अवतार, भगवान? हों चाहें फिर वो, राम-शिव, हनुमान या दुर्गा, संतोषी और काली। समय के साए में रमते, बाजार की राह चलते, हर तरह के रीती-रिवाज। राजनीती की जरूरतों के अनुसार बदलते, होली-दिवाली। वो लगाएंगे तड़के, तुम्हारी भावनाओं पे ऐसे भी, और वैसे भी। और तुम बहते जाना इन भावनात्मक भड़काओं में, बगैर सोचे-समझे, उनके पीछे छुपे षड़यंत्र। राजनीती वाले सेकेंगे उनपे, अपनी-अपनी कुर्सियों के लिए चालें और घातें। तुम्हें क्या मिलेगा उनमें? ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे प्रसादों के पीछे क्या छुपा होता है? वैसे ही जैसे, आपको नहीं मालुम, की ये LEGEND और HERO क्या होता है। और इसका उल्टा PLATINUM या SPLENDER या ऐसा कुछ और नहीं होता। बल्की अज्ञानता के दायरे से बाहर निकल, अपने-अपने कामों पे आगे बढ़ना होता है। भावनात्मक भड़क नहीं लेनी होती।   

ट्रैक्टर-ट्रॉली शो। वो भी दिवाली पे? वो भी राम के नाम पे नहीं, बल्की शिव के नाम पे? धुआं-धुआँ? कितना धुआँ? इनका उल्टा POP-UP शो नहीं होता। ना ही पटाखे या फुलझड़ी शो होता है। बल्की, दिमाग की वो बत्तियाँ on करनी होती हैं, की तुम्हारे आसपास कैसा समाज है? कैसे लोग हैं? और क्या कुछ करते हैं या व्यस्त कहाँ रहते हैं? क्युंकि, उसका कुछ ना कुछ असर तो आपपे भी होगा। राजनीती लोगों से क्या करवा रही है और क्यों? और लोगों को कहाँ व्यस्त रखती है? जितने ज्यादा कम विकसित समाज या लोग होंगे, उतने ही ज्यादा ऐसे-ऐसे राजनीतिक भावनात्मक भड़कों के जालों के आसपास मिलेंगे। ऐसे जालों से थोड़ा दूर रहना है, निकलना है। ना की उनका हिस्सा हो जाना। 

दिवाली मुबारक हो राम और सिया वाली। बुराई पे अच्छाई वाली। दीयों वाली। ना की बाजारू दिखाओं वाली या राजनीती की अजीबोगरीब भावनात्मक भड़क, आम इंसान में पैदा करने वाली। दिवाली ना तो भंडेलों का तांडव है और ना ही गरीबों का दोहन। एक तरफ सुना है, वो योद्धा होते थे, जो अपने से ज्यादा ज्ञानवान का सम्मान करते थे, दुश्मन होते हुए भी। एक तरफ आज के भंडोले हैं, जो कुछ ना आता जाता हो तो भी कहें, की बस हम ही हम हैं।

Saturday, November 4, 2023

शब्दों के खेल

हर शब्द विशेष है। उसके अपने मतलब, अपनी खासियत है। जैसे पूजा  

गणेश पूजा ? 

या सरवस्ती पूजा ?

या बजरंगी पूजा ?

या शिव पूजा ?

पूजा शब्द एक है, मगर उसके साथ, अगर कुछ और जुड़ा है, तो वो उसका अर्थ एकदम से बदल देगा। एक शब्द की महिमा से राजनीती भी बदल जाएगी। उसके पीछे छिपा, विज्ञान भी। और आम-आदमी से उस राजनीतिक विज्ञान का, वाद-विवाद और संवाद भी। क्यूँकि, आम-आदमी से वाद-विवाद या संवाद का मतलब, भावनात्मक भड़क । हम किसी विषय को लेकर कितने सवेंदनशील हैं। उसी सवेंदनशीलता को हमारे खिलाफ भी प्रयोग किया जा सकता है। कुछ सवेंदनशीलता एक दुखती रग जैसी होती हैं। जिसे थोड़ा-सा छुआ नहीं, की भड़क गए। यही भावनात्मक भड़क है। भड़काने वालों के लिए, वही आम-आदमी से छल-कपट का माध्यम भी। जैसे राजनीती, इतना मंदिर-मस्जिद क्यों करती हैं? खासकर, चुनाओं के दिनों में? राजनीती को मालूम है, की धर्म-अधर्म, जात-पात के विषय, आम-आदमी के लिए संवेदनशील मुद्दे हैं। कितना ही गरीब आदमी क्यों न हो, अपनी गरीबी भूलकर, जीवन के अहम मुद्दे, रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य भूलकर, ऐसे-ऐसे मुद्दों पर अड़ जाएगा। जैसे उससे आगे दुनियाँ खत्म है। 

बड़ी-बड़ी कंपनियों को तो और भी कैसी-कैसी, आम-आदमी की दुखती रगों का ज्ञान है। सब डाटा-खनन की वजह से। और वो उनको भुना के आम आदमी को खाती हैं। सिर्फ और सिर्फ पैसे और कुर्सियों के लिए। वो भी गुप्त तरीकों से। और आम आदमी को उसका ज्ञान भी नहीं। डाटा-खनन वो ज्ञान और विज्ञान है, जो आपके बारे में वो सब जानता है, जो खुद आप और आपके बहुत अपने भी नहीं जानते। अब आपका तापमान कितना है? 10 दिन पहले कितना था? 10-20 दिन बाद कितना होगा? या आपको कौन-सी बीमारी हो चुकी, अभी है या आगे हो सकती है? या कौन-कौन सी ना हुई, ना हैं, और ना हो सकती? मगर घड़ी जा सकती हैं, बड़ी आसानी से। है ना आपके अपने डाटा का कितना बड़ा शोषण, खुद आपके खिलाफ? सब राजनीती और बड़ी-बड़ी कंपनियों की मिलीभगत से। जब राजनीती वाले आम-आदमी से डाटा की बात करेंगे, तो शायद कुछ ऐसा बताएं, दिखाएं या सुनाएं; जो आपकी भावनाओं को भड़काए। मगर, हकीकत के पास होकर भी, बहुत दूर हो। इसी को मानव-रोबोट बनाना बोलते हैं। आपके बारे में जानकारी जितनी ज्यादा होगी, उतना ही आसान होगा, आपको मानव-रोबोट बनाना। यही नहीं, इल्जाम भी आपपे ही लगा देना। यही आज की SMART दुनियाँ है। अब शब्द भेद देखो। एक तरफ, SMART मतलब बुद्धिमान और दूसरी तरफ, हद दर्जे के गिरे हुए छल और कपट।                          

जुड़ाव, रीती-रिवाजों के माध्यम से, धर्म-कर्मों के माध्यम से। और संस्कृति के जालों के माध्यम से। जैसे किसी संस्कृति में काला कपड़ा शादी भी पे पहना जाता है, तो किसी में सफेद। किसी का शादी का कपड़ा लाल होता है, तो कहीं कुछ और भी हो सकता है। वही रंग जो एक धर्म या संस्कृति या रीती-रिवाज में शुभ अवसर पे पहना जाता है, किसी दूसरी संस्कृति या रीती-रिवाज में अशुभ पे। जैसे हिन्दुओं में, सफेद ज्यादातर किसी की मौत पे पहनते हैं, तो ईसाईयों में शादी पे। इसको PK में अच्छे से दिखाया गया है। 

शुभ-अशुभ क्या है? जो आपको नुकसान ना करे, या फायदा पहुँचाए, वो शुभ है। जो किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाए, वो अशुभ। गलत तरीकों को अपनाके भी, किसी का नाजायज फायदा लेने की कोशिश करना भी अशुभ ही है। जैसे काला रंग, एक तरफ रहस्य्मय माना जाता है, इसलिए आम आदमी के लिए थोड़ा खतरनाक भी। इसलिए ज्यादातर अशुभ माना जाता है। तो दूसरी तरफ, सत्ता के लिए रहस्य्मय होना, मतलब, अपनी चालों, घातों और छलों को छुपाना। हर तरह का साम, दाम, दंड, भेद प्रयोग करके भी, शुभ है। सत्ता के गलियारों के ज्यादातर शीशे काले होते हैं। खुद को और अपने गुनाहों को छुपाने के लिए। मगर वही शीशे, सफेद मिलेंगे या कहो ऐसे मिलेंगे, जिनके आर-पार, साफ-साफ दिखता हो। जब-जब कुछ "दिखाना है, बताना नहीं" का सवाल हो। क्यूंकि, वो साफ-साफ तो आम जन को दिखाने के लिए है। कालिख उसके पीछे छुपा है। जिसमें ज्यादातर विज्ञान का दुरूपयोग है। 

एक माँ अपने बच्चे के कान के पीछे काला टिक्का लगाती है और बोलती है, किसी की नजर ना लगे। मतलब, बुरी नजरों से बचाना। अब कोई काला टिक्का, वो भी कान के पीछे लगा, किसी काली नज़र से कैसे बचा सकता है? क्या विज्ञान या मनोविज्ञान होगा इसके पीछे? वैसे ही जैसे चौराहे पे, पैर आ गया या माता धोकन जाऊँ सूं? और भी कितने शब्दों के अर्थ वैसे नहीं होते, जैसे वो समझ आते हैं या दिखते हैं। 

जैसे कोई बोले आप मंजु हैं। और आपको घर पे कोई मंजु बोलते हों। माँ ने दिया हो, वो नाम। फिर वो बोलें, मंजु रानी? और आप बोलें ना बेटा, हमारे यहाँ रानी-महारानियाँ नहीं होती। वो काम करने वाली होती हैं, घर पे। फिर बोलें, अच्छा तो आप फलाना-धमकाना की बेटी हैं या पोती हैं? किसी और का नाम लेके। आपके अपने माँ-बाप या दादा-दादी का नहीं। और आपको बोलना पड़े, हाँ, वैसे-ही, जैसे आप अपने माँ-बाप के नहीं, किसी और के माँ-बाप के हैं। कितना बेहुदा हो सकते हैं ना लोग? अब एक शब्द किसी और शब्द या शब्दों के मिलकर बनने से मौलिक नहीं रह जाता, बल्की कृत्रिम (Synthetic) जैसा हो जाता है। जैसे, हर शब्द की अलग पहचान है। अलग अर्थ है, वैसे ही हर इंसान अपने आपमें अनोखा है। वो कोई और हो ही नहीं सकता। हाँ। राजनीती या जुए के खिलाड़ी, उसे alter-ego बता सकते  हैं । 

Alter, शब्द का अर्थ क्या है? बदलना। अपने अनुसार फिट करना। इधर-उधर से जोड़ना-तोडना, काटना वैगरह। जैसे कोई कपडा आपको फिट ना हो और आप टेलर को कहें, इसे alter कर दो। Ego, मतलब अहंकार। खासकर, जब आप इसे आदमी पे प्रयोग करते हैं। यही है alter ego।  बड़े कहे जाने वाले लोगों में, शायद ये अहंकार ज्यादा होता है। तुम जैसा मैं चाहता हूँ, वैसे क्यों नहीं हो? हम अब तुम्हें, अपनी मन चाही alter ego बनाएंगे। Alter ego, एक तरह की छवि भी। जैसे कोई बोले, मुझे पता है, तुम्हारी छवि क्या है। आप बोलें क्या है? अब एक इंसान के लिए वो अच्छी भी हो सकती है। किसी दूसरे के लिए, शायद बहुत अच्छी। किसी तिसरे के लिए, शायद उतनी अच्छी ना भी हो। राजनीती में इसे Perception War भी कहते हैं। आम-आदमी के बीच, जब राजनीतिक पार्टियाँ लड़ती हैं, तो इसी Perception War को लड़ती हैं। उनके प्रचार-प्रसार माध्यम, इसी छवि के इर्द-गिर्द, पैसा पानी की तरह बहा रहे होते हैं। उसमें मीडिया और राजनीतिक शाखाएँ अहम भूमिका निभाती हैं। इसीलिए राजनीती में चीरहरण भी होते हैं जिन्हे Character-Assassination बोला जाता है। इसीलिए वो दिखाना है, बताना नहीं जैसे खेल खेलते हैं। खेल, आम आदमी की ज़िंदगियों के साथ। जहाँ हर तरह की बुद्धिमता, छल और कपट प्रयोग होता है। इसीलिए कहा जाता है, की जो दिखता है, वो होता नहीं। और जो होता है, वो दिखता नहीं। मगर देखना चाहो, तो दिखने भी लगता है और सुनने भी।                      

Wednesday, November 1, 2023

समाज का अमानवियकरण (Dehumanization of a Society)

पहले भी कई बार लिख चुकी की राजनीती के इन जालों के सामान्तर घढ़ाईयों का नुकसान, वहाँ का समाज भुगगता है। जितना ज्यादा किसी भी समाज को, ऐसे राजनीतिक जालों का हिस्सा बनाया जाता है, वो उतना ही ज्यादा पिछड़ता जाता है। 

शुरू में मुझे जब ऐसे कई क्रूर और अमानवीय तथ्यों की जानकारी हुई, तो हजम ही नहीं हुआ, की लोगबाग इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं ? किसी को तो बक्सें। बच्चे, बुजुर्ग, अपाहिज, बेजुबान जीव-जंतु, पेड़-पौधे, ये तो किसी को भी नहीं बक्शते। मौत पे भी किसी की रैली पिट या पिटवा सकते हैं और शादी पे मातम मनवा सकते हैं। कुर्सियों के चक्कर में, कितने अंधे हो जाते हैं लोग?

कुछ सामान्तर घड़ाईयाँ   
      
मैं रिलायंस से सामान लाती थी। एक दिन ऐसे ही ऑफिस के बाद पहुँच गई और गाड़ी उसके सामने पार्क कर दी। सामान लेके वापस आई, तो मेरी गाड़ी के साइड में, SP के घर और रिलायंस के बीच, एक बुजुर्ग औरत, तकरीबन आधे से ज्यादा नंगी और लैट्रिन से लथ-पथ कपड़े, बिखरे-उलझे गंदे बाल, मक्खियों की उसपे भरमार, वहाँ खड़े कुछ लड़कों से जैसे खुद को दिवार की तरफ छिपा रही हो। उस जगह पे ऐसा नज़ारा? मैं उस औरत को बोलने ही वाली थी, की पीछे से किसी ने बोला, मैम, गाड़ी उठाओ और निकलो। दिखता नहीं, वो SP के घर के बाहर जैसी जगह बैठी हुई है। उन दिनों ड्रामे बहुत हो रहे थे, मुझे भी लगा हो सकता है, कुछ गड़बड़ हो। इसलिए चुपचाप निकल आई। मगर हजम नहीं हुआ। अगले दिन फिर ऑफिस के बाद, मैं वहाँ से गुजरी। मगर वहाँ सब साफ था। उस वक्त समझ नहीं आया, की वो सब क्या था? 

शायद कोई extreme hype? असलियत या महज ड्रामा? पता नहीं। 

मैं किन्ही के यहाँ गई हुई थी। वहाँ अकसर एक बुजुर्ग-अपाहिज खाना या पानी माँगने आता था। वो चलता भी बैठ के ही घिसट-घिसट के था। मगर जिस अकड़ और शब्दों से उनसे माँगता था, यूँ लगता था, क्या है ये। वो जिनसे ऐसे बोल रहा था, उन्हें बोला भी, आप डाँटते क्यों नहीं इसे? ये क्या तरीका है, बोलने का? उन्होंने कहा गरीब है, उसपे अपाहिज। यहीं थोड़ा पीछे जाके, मियाँ-बीबी एक झोपड़ी में रहते हैं। कई बार गुस्सा भी आता है और डाँट भी चुकी, मगर आदत से लाचार है। दया आ जाती है, तो दे देती हूँ। मैंने नोटिस किया की वो सिर्फ उस घर की औरत से ऐसे बोलता था। बाकी से नहीं, क्यूँकि डरता था। थोड़ा और जाना उसके बारे में। बस इतना ही कहा जा सकता है की अजीबोगरीब दुनियाँ है।      

जब कैंपस क्राइम सीरीज को लिखा और समझा जा रहा था, उसी दौरान जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की तरफ भी ध्यान गया। मेरे H#30, Type-4 के पीछे एक अमरुद का पेड़ था। लाल अमरुद, मगर बहुत ज्यादा बीज। खाने में कोई खास नहीं। मैंने नोटिस किया की उस पेड़ पे कुछ मोटी-मोटी सी गाँठे उभर आई थी। और वो बढ़ती ही जा रही थी, जैसे कैंसर में होता है। एक दिन एक दोस्त घर आई हुई थी, जो अकसर आती थी। उसने पेड़ की तरफ देखा और बोला, ये तो खोखला होने लगा, खत्म समझो। मुझे भी समझ आ रहा था। उसपे किसी घर में ऐसे पेड़ की कोई अहमियत भी नहीं होती, जिसका फल कोई खास खाने लायक ना हो और पेड़ भी खोखला या भद्दा लगे। हालाँकि, बचाना चाहो तो बचा सकते हो। क्यूँकि, कुछ वक़्त बाद समझ आया की वो बीमारी क्या थी। पैदा की हुई बीमारी, वो भी इंसानों द्वारा। क्यूंकि कई और पेड़-पौधों के साथ भी छेड़छाड़ हो रही थी। किसी में ऐसे हॉर्मोन्स डाल देना की फूल ही ना आएँ। और किसी में ऐसे हॉर्मोन्स डाल देना की फूल आने के बाद भी फल ना आए। हॉर्मोन्स एक तरह के रसायन होते हैं, और बहुत तरह के होते हैं। इनकी जीवों में अलग-अलग तरह की भूमिका होती है। अहम, ये था जानना, की किस पौधे में फूल या फल ना आएं, वाले हॉर्मोन्स डाले जा रहे थे और किन घरों या इंसानो तक वैसे दुष्प्रभाव थे? वैसे पौधे और किन-किन घरों में पहुंचाए जा रहे थे और उनका वहाँ क्या हो रहा था ?  

यूनिवर्सिटी के साथ-साथ, इस अध्ययन का दायरा,मेरे अपने गाँव और आसपास के दोस्तों और रिश्तेदारों के घरों पे भी होने लगा था। और उसके साथ-साथ दूरियाँ भी बढ़ने लगी थी। जहाँ कहीं ऐसा करने वाले लोगों को लगता है, की उनके नापाक इरादों को कोई देखने और समझने लगा है और जैसे ही वो समझ आम-आदमी तक पहुँचेगी, उनका सिर्फ खेल खत्म नहीं होगा, बल्की जहाँ ऐसे लोग अच्छे और अपने बने बैठे हैं, उनकी वो इमेज भी खत्म हो जाएगी। ऐसे में, ऐसे लोग फूट डालना शुरू कर देते हैं।       

राजनीती के छद्दम युद्धों की ये विद्या पुरानी है। जितना ज्यादा आप इसे पढ़ने और समझने लगेंगे, उतना ही ज्यादा इसके दुस्प्रभावों से बचते जाएँगे। छद्दम युद्ध में हमले आमने-सामने नहीं, बल्की गुप्त रूप से और चालाकियों और छल से होते हैं। मतलब, करने और करवाने वाले दिखाई भी ना दें और सामने वाले का काम तमाम। ज्यादातर बीमारियों के राज यहीं छिपे हैं। हालाँकि, आज हम उस युग में हैं, जहाँ छुपा कुछ नहीं है। आम-आदमी का तो कभी भी नहीं छुपा हुआ था। मगर आज राजे-महाराजों का भी नहीं छुपा हुआ। काफी हद तक, वो भी इधर-उधर से निकल के आ रहा है। और ये अच्छा है, आम आदमी के लिए।