About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Saturday, July 6, 2024

Hierarchy और संबोधन ?

मैंने तो सुना है, ये सब कोड हैं। चाहे वो फिर नाम हो या पोस्ट? सुना है, आपमें से ही कहीं से शायद? और सर, मैडम, महोदया, मिस, श्रीमती, श्रीमान, आदरणीय, मीलॉर्ड जैसे संबोधन भी? जब कोड की दुनियाँ में ही बात करनी हैं तो अमेरिकनों की तरह ही करो। क्यों खामखाँ के पचड़े में पड़ना? वैसे ये जो विडियो प्रोमोप्ट आते हैं, या खास वक़्त पे खास वीडियो, ये कितने सच होते हैं, इसका पता कैसे चले? मुश्किल है ना थोड़ा? और अगर सोशल मीडिया के द्वारा बात करें, तो कौन-सा MP या MLA सीधा बात करते होंगे? उनके प्रोफाइल तो उनकी टीम चलाती होंगी। नहीं? तो MP, MLA लिखना बहुत नहीं होगा, उनके ऑफिसियल कोड बिगाड़े बिना? हाँ, सीधे शायद हम ऐसे बात नहीं करते, भारतीय हैं ना। पर मेरे जैसे तो नेताओं से मिलने के कोई खास शौकीन नहीं होते। जब अवसर हों तब भी। अपनी ही अलग दुनियाँ में रहते हैं।    

और कोड, कुछ-कुछ ऐसे ही जैसे, विजय कुमारी दांगी है तो चलेगा। सिर्फ विजय दांगी है, तो बैठो घर? अजीब हैं ये कुमार, कुमारी, राजे-महाराजों वाले साँग जैसे? या महज कोड शायद?     

वैसे Hierarchy को हिंदी में क्या कहते हैं?                         

Monday, July 1, 2024

Morality and Illigal Experimentations in Living Labs (Society)?

 Living Labs?

ये क्या होती हैं?

जहाँ कहीं जीवित प्राणियों पे, उस वक़्त चल रही किर्याओं या पर्किर्याओं पर अध्ययन होता है, उसे जीवित लैब बोलते हैं। जानवरों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तक पर, परिक्षण करने के कुछ रुल होते हैं। मगर, आज की टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग ने, उसे दुरुपयोग करने वालों के लिए आसान कर दिया है। आज के वक़्त में सारा संसार एक अजीबोगरीब बुचड़खाना है या कहो जीवित लैब है। और अपने आप में बहुत बड़ा जुर्म का अड्डा भी। जैसे, इस या उस पार्टी के कोढों के अनुसार बीमारियाँ, जन्म, अबोरशंस या लोगों की मृत्यु भी इन्हीं सब का हिस्सा हैं।    

   

Monday, June 24, 2024

Death Or Murder Attempts?

Death Or Murder Attempts? लोगों को ऐसे मारो, की लाठी दिखाई भी ना दे और काम हो जाय?

अगर किसी के बैंक में पैसे हैं या किसी भी तरह की बचत है, मगर गुंडागर्दी के तहत किसी ने उसपे कुंडली मार रखी हो? जिसकी बचत है, वो बार-बार रिक्वेस्ट भी कर चुका, की मुझे एमर्जेन्सी है। फलाना-धमकाना हैल्थ इश्यूज हैं। और कभी भी एमर्जेन्सी पड़ सकती है। आप Urgently मेरे पैसे रिलीज़ करें। मुझपे कोई डिपेंडेंट भी हैं। उनके लिए भी चाहिएँ। मगर फिर भी, पैसे रिलीज़ ना किए जाएँ?

उसपे डिपेंडेंट में मान लो, कोई शराब का एडिक्ट भी हो। इसी नशे के तहत, उसे बोतल पकड़ा कर उसकी ज़मीन हड़प ली हो, कुछ अपने कहे जाने वाले लोगों ने। और अब ऐसे ही टेढ़े-मेढ़े रस्तों से, फिर से शराब सप्लाई हो रही हो, ताकी उसे दुनियाँ से ही उठाया जा सके। जब उसे ना सिर्फ, ऐसे आदमखोरों से दूर करने की जरुरत है, बल्की ईलाज की भी। क्यूँकि, डॉक्टर्स के अनुसार तो ये भी एक बीमारी है। और इसका ईलाज भी है। मगर, आपके पास इतने पैसे हैं ही नहीं। इस शराब एडिक्ट की हड़ियाँ निकली हुई हैं और तवचा बिलकुल काली पड़ चुकी है। मतलब, लिवर काफी डैमेज हो चूका। जिस बेचारे के पास खाने तक के पैसे नहीं, वो शराब कहाँ से पी रहा है? वैसे, जब उसके पास खाने तक को नहीं होता, ये शराब सप्लाई तभी होती है? ये, और ऐसी-ऐसी कहानियाँ, आगे किसी पोस्ट में।    

अगर ऐसे केस में ये शराब का एडिक्ट मरता है, तो वो Death कहलाएगी? या Murder? Assisted Murder? अरे नहीं। रोज, हजारों शराब के नशे वाले मरते हैं। खासकर, गरीबी की वजह से। कहाँ, किसे फर्क पड़ता है? ऐसे-ऐसों को तो वैसे भी, अपने ही ठिकाने लगा देते हैं। महज़ कुछ पैसों या ज़मीन की खातीर। और उन्हीं अपनों में से कुछ, ऐसी-ऐसी मौतों के बाद, रोने भी आते हैं? जाने ऐसे लोग, ऐसी परिस्थितियों में, ऐसे-ऐसे आँशु कहाँ से ले आते हैं?    

ये पब्लिक नोट किसी Academic Teachers Branch वाली संगीता मैडम के लिए भी। सुना है, पिछले 1 साल से भी ऊप्पर वक़्त से, फाइल उसी ब्रांच में पड़ी है। और उससे ऊप्पर बैठी Authorities के लिए भी। क्यूँकि, नीचे वाली कुर्सियों का महज़ बहाना होता है। VC जब चाहे, ऐसी-ऐसी फाइल्स को क्लियर करने के ऑर्डर दे सकता है।  

Prompt: ना सिर्फ ये हालात, बल्की, किसी नेता के सोशल पेज पर, शायद ऐसा ही देखा-पढ़ा। दादा जी जैसी-सी दिखने वाली किसी फोटो पे श्रद्धांजलि। और उस फोटो पे मुझे जो दिख रहा था, वो था, जैसे या तो चेहरा बहुत लाल हो रखा है या चेहरे पर, खासकर, नाक के आसपास चोट। मुझे ऐसा दिखा, मतलब? ऐसे-ऐसे ऑनलाइन कारनामों के बारे में, आगे किसी पोस्ट में। उसी दिन, इस शराब एडिक्ट भाई के चेहरे पर चोट। और भी जगह होंगी, ये चोट शरीर पे। टूटा-फूटा होगा कहीं या फोड़ा होगा किसी ने? होता रहता है, शराब एडिक्ट के साथ ऐसा? क्या नई बात है?           

Thursday, June 13, 2024

अलग-अलग स्तर, अलग-अलग प्रभाव या दुस्प्रभाव? Training

इस पोस्ट में सिर्फ पहले प्रश्न पे आते हैं। या जो कुछ चल रहा था, उसे जानने की कोशिश करते हैं। 

ट्रैनिंग

किसकी ट्रैनिंग? कैसी ट्रैनिंग? बच्चों की? बुजर्गों की? युवाओं की? कैसे देते हैं, वो ये ट्रैनिंग? कौन हैं ये लोग, या समुह जो ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी ट्रैनिंग देते हैं, लोगों को? और बच्चों और बुजर्गों तक को नहीं बक्शते? इन्हें कोई रोकने-टोकने वाले नहीं हैं क्या?   

राजनीती और राजनीती से जुड़े लोग?

बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ?

और?        

मैं अभी गाँव अपना सामान नहीं उठाकर लाई थी। मगर 26-29 April, 2021 का खास जेल ट्रिप हो चुका था। वहाँ जो कुछ देखा, सुना या अनुभव किया, उसमें काफी-कुछ ऐसा था, जिसपे शायद ध्यान कम दिया। या शायद थकान, गर्मी और सिर दर्द की वजह से ध्यान कम गया। ऐसा ही कुछ, जब यहाँ गाँव आने पे बच्चों या बुजर्गों को किसी ना किसी रुप में कहते सुना या भुगतते सुना, तो शुरु-शुरु में तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ा, शिवाय चिढ़ के। या ये क्या हो रहा है, और क्यों, जैसे प्रश्नों के। मगर धीरे-धीरे शायद समझ आने लगा। बच्चों और युवाओं की अजीबोगरीब ट्रैनिंग चल रही थी, उनकी समझ के बैगर। और बुजुर्ग भुगत रहे थे। कहीं ना कहीं युवा भी। और बच्चों की ऐसी ट्रैनिंग का मतलब? वो भविष्य में भुगतेंगे? और ऐसा भविष्य, शायद बहुत दूर भी ना हो, अगर वक़्त रहते रोका ना जाय तो?   

क्या थी ये ट्रैनिंग?

जैसे --

"जेल में औरतें अपना टाइम पास करने के लिए गाने गा रही थी। कुछ नाच भी रही थी। और कुछ दूर से सुन रही थी। मैं जो एक दिन पहले ही वहाँ पहुँची थी, सिर दर्द और गर्मी से हाल-बेहाल थी। मेरे सिर दर्द का मतलब, मुझे आसपास बिलकुल शाँत चाहिए और लाइट भी नहीं। मगर यहाँ तो उल्टा था। जैसे जबरदस्ती का दुगना अत्याचार। ऐसे में दवाई भी असर नहीं करती। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? वक़्त तो काटना था। आँख बंद कर, कानों को जैसे बंद कर, एक कोने में दुबकने की कोशिश? मगर इतना जबरदस्त शोर, एक छोटा-सा कमरा और इतनी सारी औरतें, सुनेगा तो फिर भी। उसपे गानों के नाम पे भद्दे आइटम नंबर्स और बेहुदा एक्शन्स। वो वक़्त तो आप काट आए।" 

यहाँ गाँव में ये क्या चल रहा था? कोई पियक्कड़ एक बुजुर्ग माँ को हद से परे, बेहुदा गालियाँ दे रहा हो और महाबेहुदा एक्शन कर रहा हो? इधर-उधर आसपास भी कुछ-कुछ ऐसा-सा ही। मगर वैसा ही कुछ CJI भी कह रहा था, शायद? सिर्फ भाषा और तरीके का फर्क था? या कहो समाज के अलग-अलग हिस्से के स्तर का? बात तो वही थी।     

दूसरी तरफ, कोई 5-6 साल की छोटी-सी बच्ची, "मेरा नाड़ा खोलन आवै स... "  जैसे बेहुदा आइटम नंबर पर अजीबोगरीब एक्शन कर रही हो और उस गाने या ऐसे-ऐसे गानों पर गुनगुना रही हो? और आसपास के बड़े बच्चे या बच्चियाँ या युवा वर्ग उसके मजे ले रहे हों? बच्चे को समझाने या रोकने की बजाय या ये तमाशा बंद करवाने की बजाय? बच्चा तो बच्चा है, अपरिपक्कव। मगर बड़े?   

किसी पियक्कड़ ने कोई दरवाजा तोडा हुआ हो। और कोई बुजुर्ग माँ, उसे जोड़ियों से यहाँ-वहाँ बाँधे हुए हो? या नाडों को या नवार जैसे गुच्छों से जैसे, यहाँ-वहाँ कहीं खूँटी, तो कहीं किसी पोल से बाँधे हुए हो? क्यों? दरवाज़ा ही ना ठीक करवा लें? 

कितना अंतर है ना बड़े लोगों (?) के नाड़े वाले जॉक्स में और आम लोगों, मध्यम वर्ग या गरीबों की ज़िंदगियों की सामान्तर घड़ाइयों में? ये सब अंतर देख नफ़रत नहीं होने लगेगी, ऐसे so-called बड़े लोगों से? मगर नफरत क्यों? वो उनकी ज़िंदगी है? उन्हें समाज के किन्हीं तबकों में ऐसी-ऐसी सामान्तर घड़ाईयोँ की शायद खबर तक ना हो? और हो भी, तो उन्हें क्या मतलब? या शायद से मतलब होना चाहिए? खासकर तब, जब आप ऐसे-ऐसे लोगों की वजह से ही शायद, कहीं चुनकर पहुँचते हैं?        

और फिर मैं ऐसे-ऐसे प्रश्नो पे, अपनी ही आवाज़ सुन रही हों जैसे? 

"हाँ! वैसे ही जैसे, तुने कितने लैपटॉप, कूलर या AC या गाड़ी, और कितना ही सामान ठीक करवा लिया? खाती वो खिड़की कर गया क्या ठीक? किसने रोका हुआ है, उसे? और उसके अलावा, कोई और नहीं है क्या, ठीक करने वाला? बड़े लोग भी ऐसे ही, इतने-इतने दिन AC, Coolers के बावज़ूद, यूँ गर्मी में मरते हैं? या यूँ आग लग जाती हैं? उनका आसपास यूँ गँवार या खुद so-called बड़े लोगों के जाल में नहीं होगा ना? वो भी तब, जब इतनी सारी एजेंसियाँ और मीडिया हाउस, देख, सुन और रिकॉर्ड तक कर रहे हों? वैसे ही जैसे, आपने कोई memoir या आपके साथ हुआ क्राइम, किन्हीं मीडिया हाउस को मेल किया हो और वो उसे इग्नोर के डस्टबिन में डाल चुके हों? अब कैसे मीडिया को किया, ये भी एक वजह हो सकता है, उसके डस्टबिन में जाने की? या शायद, आप इन मीडिया हाउसेस के बारे में अभी तक भी बहुत कम जानते हो? या शायद कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी? नहीं तो ऐसी-ऐसी खबरों को तो मीडिया हाउसेस ..... ? शायद अभी काफी कुछ जानना बाकी है, मीडिया हाउसेस के बारे में भी?"  

"ठीक ऐसे ही जैसे, यूनिवर्सिटी में GB (General Branch) वालों ने घर ठीक करके दिया था? XEN, JS Dahiya ने सब तो करवा दिया? कौन है ये JS Dahiya? रिपेयरिंग के नाम पे यूनिवर्सिटी में कट तो सबका बराबर लगता है ना? नहीं शायद? कुछ का ज्यादा लगता है? हद से ज्यादा? ऐसे लोगों की जहाँ नौकरी से छुट्टी होनी चाहिए और उनकी बचत पे चपत लगनी चाहिए, वहीं आप ना सिर्फ ऐसी जगह को छोड़ के चलना ही मुनासिब समझते हैं, बल्की ये तक कहते हैं, काट लो जितना बनता है। बुरी जगहों से और बुरे लोगों से जितनी जल्दी पिंड छुड़ा लो, उतना ही अच्छा?"  

वहीं कुछ दूसरी साइड भी हैं। जो देखते-देखते कुछ ना आते हुए भी, ना सिर्फ प्रमोशन के पायदान नापते हैं, बल्की एक से दूसरा सरकारी घर ऐसे बदलते हैं, जैसे आप जैसे लोग काम ही उनके लिए करते हैं? SLAVE कहीं के। कहीं दूर क्यों जाएँ, मेरे अपने डिपार्टमेंट का डायरेक्टर। ऐसे लोग जिनके खिलाफ शिकायत हों और वही शिकायत निवारण committees के चेयरपर्सन या मैम्बर? जहाँ तकरीबन सब शिकायत निवारण committees के यही हाल हों, जाना चाहेंगे आप वहाँ वापस?          

"वो यूनिवर्सिटी थी। ये तो तेरा अपना घर और अपना आसपास या गाँव है ना?"  

बड़बड़ाना खुद से ही जैसे?

हर जगह की अपनी समस्याएँ हैं। कुछ से आप थोड़ा आसानी से निपट सकते हैं। और कुछ से थोड़ा मुश्किल से? और कुछ को हाथ जोड़ चलते बनते हैं, जैसे गुनाह आपने ही किए हों? कुछ समस्याएँ वक़्त के साथ, अपने आप ठीक हो जाती हैं। कुछ वक़्त माँगती है। और कुछ वक़्त से आगे, थोड़ी-बहुत मेहनत भी और कसमकस भी या इधर-उधर की खटपट और चकचक, पकपक भी। गाँव का कुछ-कुछ ऐसा ही लगा। कुछ ऐसे नुकसान या भुगतान हो गए, जो वक़्त रहते रोके जा सकते थे। मगर नहीं रुके। कुछ धीरे-धीरे ही सही, मगर कुछ हद तक सही दिशा में चल पड़े शायद? कुछ को, कुछ और वक़्त और थोड़ी बहुत मेहनत चाहिए। और इधर-उधर का साथ और थोड़ी-बहुत समझ  भी। 

जैसे शराब कहाँ से और कैसे सप्लाई होती है और कौन करता है या करते हैं? पीने वाला कब पीता है और कब-कब नहीं? सिस्टम या राजनीती से इस सबका क्या लेना-देना है? क्या कहीं का सिस्टम लोगों को जबरदस्ती कोई दिशा या दशा देता है? जी हाँ। हकीकत यही है। जैसे एक पार्टी आपको यूनिवर्सिटी से बाहर का रस्ता दिखाए, तो दूसरी गाँव से बाहर का या देश से ही बाहर का। चाहे ऐसा करने के लिए उन्हें, खून-खराबा ही क्यों ना करना पड़े। या जेलम-जेल ही क्यों ना खेलना पड़े। समाज का अलग-अलग स्तर, अलग-अलग जगह पे, काफी कुछ एक जैसा-सा दिखता हुआ भी, बहुत कुछ अलग कहता है। इसीलिए शायद सबसे सही वो समाज हैं, जहाँ ये फर्क कम है। जहाँ समाज का एक बड़ा हिस्सा, कम से कम, मूलभूत जरुरतों के लिए तो तरसता नहीं नज़र आता।  

जहाँ की सरकारें अपने समाज की मूलभूत आवश्कताओं तक की जरुरतों को पूरा नहीं कर पाती, क्या करती हैं वो सरकारें? किसके लिए बनती हैं, ऐसी सरकारें? मंदिर-मस्जिद के गोबर के नाम पे लोगों को मानसिक तौर पर जकड़े रहने के लिए? या नाडों या बेल्टों के नाम पे तमासे करते रहने और करवाते रहने के लिए? 

शायद, इसका एक ही समाधान है, सरकारों से उम्मीदें ही क्यों? आप इतने काबिल क्यों नहीं हैं की आपका समाज कम से कम ऐसी सरकारों पे निर्भर ना हो? अगर ऐसा होने लगेगा, तो ऐसी सरकारें अपने आप खत्म होने लगेंगी। और सिर्फ वही सरकार बना पाएँगे, जो तमाशों के लिए नहीं या किसी cult में लोगों को मानसिक-तौर पर जकड़ने के लिए नहीं, बल्की समाज को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।          

सीधे-रस्ते या घुमाऊ-रस्ते और सामान्तर घड़ाईयाँ ? 1

सीधे रस्ते और घुमाऊ रस्ते में फर्क क्या है?

सीधा रास्ता आपको जल्दी कहीं पहुँचायेगा या घुमाऊ?

आम आदमी बहुत ही सीधा और सरल सोचता है। मगर राजनीती के खिलाडियों के पास ऐसा कोई रस्ता नहीं। क्यूँकि, वो जुआ है। खतरनाक जुआ। कोई भी पार्टी उस जुए को कैसे घुमाती है, ये सिर्फ वही बेहतर जानते हैं। 

घुमाऊ रस्ते का मतलब बहुत ही टेढ़ा-मेढ़ा, उलझ-पुलझ और बहुत-कुछ छुपा हुआ है। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं। आपके अपने कौन हैं? वो जिन्हें आप हकीकत में जानते हैं? जो आपके आसपास रहते हैं? जिनसे आप अक्सर बात करते हैं? जिनके आप अक्सर काम आते हैं या जो आपके काम आते हैं? 

या वो जिन्हें आप किसी के द्वारा जानते हैं? जिनसे आप शायद ही कभी मिलते हैं? जो शायद ही कभी आपके आसपास होते हैं? आपका उनके या उनका आपके काम आना तो बहुत दूर की बात।   

सामान्तर घड़ाईयाँ, इन्हीं टेढ़े-मेढ़े रस्तों और छुपम-छुपायियों की देन हैं। इसीलिए, इनमें राजनीती खुद आपको आपके अपने खिलाफ या आसपास के खिलाफ प्रयोग कर पा रही है।   

Common Sense को भूलकर, जब आप स्मार्ट बनने या दिखने या दिखाने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर धरे जाते हैं। या शायद ये भी कह सकते हैं की अपने दिमाग का जब आप थोड़ा-सा भी प्रयोग नहीं कर पाते, तो दिमाग का थोड़ा ज्यादा प्रयोग करने वाले, आपको अपना रोबॉट बना देते हैं। वो भी ऐसे, की आपको पता तक नहीं चलता की ऐसा हो रहा है। 

मान लो आपको अपने घर से किसी जगह जाना है। तो एक तो होगा सीधा-सा रास्ता। और ढेरों होंगे उल्टे पुल्टे या टेढ़े मेढ़े रास्ते। कहाँ से जाएंगे आप? कौन सा रास्ता कम वक़्त लेगा और कम संसाधनों या पैसे में होगा? टेढ़ा मेढ़ा रास्ता कब प्रयोग करेंगे? जब सीधे रस्ते में कोई रुकावट हो? या रुकावट ना हो और किसी के कहने पर बेवकूफ बन गए हों? या किसी ने थोड़ी देर की कहीं रुकावट कर, आपको घुमाने के लिए या तंग करने के लिए ऐसा कर दिया हो। समझदार भी एक-दो बार तो बेवकूफ बन सकता है। मगर पता लगने के बावजूद कितनी बार? सामान्तर घड़ाइयों में खास है, झूठ, धोखा, हकीकत से दूर दिखाना या बताना, छुपम-छुपाई और फूट डालो, राज करो। 

Tuesday, June 11, 2024

Different Levels of Pyramid and Different Level Plays Differently? Training

समाज के अलग-अलग स्तर पर, एक जैसी-सी कहानियाँ जैसे? मगर अलग-अलग स्तर पर लोग, भुगतते अलग-अलग हैं? ऐसा क्यों?

क्यूँकि, स्तर अलग-अलग है। लोग अलग-अलग हैं। उनके आसपास का समाज या तबका भी अलग है। उनका शिक्षा का स्तर, सोच, रहन-सहन, पैसा, घर, जमीन-जायदाद सब अलग-अलग है। जिसके पास ये सब जितना ज्यादा है, वो उतना ही कम भुगतता है। ज्यादातर फाइल्स तक का खेल रहता है। जिनके पास ये सब कम है या कहो, जो इस स्तर पर जितना कमजोर है, वो उतना ही ज्यादा भुगतता है। जिसका समाधान, अपने विरोधियो पर फोकस करना नहीं, बल्की अपनी और अपने आसपास की स्तिथि को सुधारना है। so-called बड़े लोग, अक्सर वही नहीं होने देते। वो एक तरफ, आपकी अच्छाईयों को डुबोने में लगे होते हैं तो बुराईयों को बढ़ाने-चढ़ाने में। क्यूँकि, उन्हें पता होता है, की आपकी strenghts क्या हैं और weaknesses क्या। और आपको ये तक नहीं पता होता, की आपके ये so-called विरोधी हैं कौन। इसलिए, सामान्तर घड़ाईयाँ दिखती एक जैसी-सी हैं। मगर परिणाम? 

दूसरा, बड़ों के किस्से कहानियों को अगर बच्चों पे या बुजर्गों पे थोंपने की कोशिश होंगी तो सोचो वहाँ क्या होगा? नाड़े की कहानी से जानते हैं। 

मैं अभी गाँव अपना सामान नहीं उठाकर लाई थी। मगर 26-29 का खास जेल ट्रिप हो चुका था। वहाँ जो कुछ देखा, सुना या अनुभव किया, उसमें काफी-कुछ ऐसा था, जिसपे शायद ध्यान कम दिया। या शायद थकान, गर्मी और सिर दर्द की वजह से ध्यान कम गया। ऐसा ही कुछ, जब यहाँ गाँव आने पे बच्चों या बुजर्गों को किसी ना किसी रुप में कहते सुना या भुगतते सुना, तो शुरु-शुरु में तो कुछ खास पल्ले नहीं पड़ा, शिवाय चिढ़ के। या ये क्या हो रहा है और क्यों, जैसे प्रश्नों के। मगर धीरे-धीरे शायद समझ आने लगा। बच्चों और युवाओं की अजीबोगरीब ट्रैनिंग चल रही थी, उनकी समझ के बैगर। और बुजुर्ग भुगत रहे थे। कहीं ना कहीं युवा भी। और बच्चों की ऐसी ट्रैनिंग का मतलब? वो भविष्य में भुगतेंगे? और ऐसा भविष्य, शायद बहुत दूर भी ना हो, अगर वक़्त रहते रोका ना जाय तो?   

क्या थी ये ट्रैनिंग?

कौन और कैसे चला रहे थे इसे? 

क्या अभी भी ऐसा कुछ चल रहा है? 

सिर्फ यहाँ या हर जगह?   

जानते हैं ऐसे और कैसे-कैसे प्रश्नो के उत्तर, हकीकत में जो देखा, सुना या अनुभव किया उससे। आगे पोस्ट्स में। 

Friday, June 7, 2024

सोए हुए को जगाना या जागते हुए को सुलाना जैसे? Training

Amplifying the latent or dormant?

बुल्लेट? 

पिस्टल? 

डंडा? 

चाकू? 

झगड़े या गुंडा-गर्दी वाले पैसे?  

झगड़े या गुंडा-गर्दी वाली ज़मीन? 

टूटे-फूटे से रिश्ते? 

बदहाली? 

ज़ंजीरें, चाहे सोने की ही क्यों ना हों? 

लड़ाई-झगड़े?

खंडहर?

 

या 


शांति? 

खुले रस्ते? 

खुशहाल ज़िंदगी? 

समृद्धि? 

खुला आसमां और उड़ते पंछी ?

धरोहर? 


किसको सुलाना चाहते हैं, आप?

और किसको जगाना?

ये सब निर्भर करता है की आप व्यस्त कहाँ हैं? अपनी और आसपास की ज़िंदगी को सवाँरने में? या लूटपाट में, एक दूसरे का बुरा चाहने और करने में?

रुकावटों, अवरोधों को खड़ा करने में? या बंद रस्तों को भी खोलने में? बीमारियाँ पनपाने में, मंदिर-मस्जिद के नाम का गोबर (गोबर क्यों कहा?) फैला, मारकाट करने में? खुशहाल ज़िंदगियों को उजाड़ने में? या बदहाल ज़िंदगियों को भी सँवारने में? अपना ना कमाकर, दूसरों का भी हड़पने के चक्कर में? कुछ ज्ञान बाँटने में? या ज्ञान-विज्ञान का दुष्प्रयोग कर, कम पढ़े लिखे लोगों में अंधविश्वास और अज्ञान फैलाने में? अपने आसपास कचरा फ़ैलाने में या साफ़-सफाई करने में? आपकी और आपके आसपास की ज़िंदगी, उसी हिसाब से आगे बढ़ेगी।              

Thursday, May 2, 2024

गुलामी की मानसिकता और आपकी पहचान ? (Hide Information to Control)

जब आपकी मानसिकता गुलाम होती है तो आपकी अपनी कोई पहचान या कोई स्टैंड नहीं होता। जो होता है, वो जिसकी आप गुलामी कर रहे हैं, उन्हीं का होता है। कौन-सी पार्टी आपके काम की है? कितनी काम की है? आपके अपनों, आसपास के लोगों से भी ज्यादा?  

जो कोई पार्टी, आपसे जितना छिपा रही है या पारदर्शी नहीं है, वो आपके काम की नहीं है। जनता का भला करने वालों को छिपाने की क्या जरुरत? ऐसे में तो कोई भी पार्टी जनता की हितेषी नहीं है, शायद। सभी कुछ ना कुछ, नहीं, बल्कि, बहुत कुछ छिपा रही हैं। कोढ़ के अनुसार काम कर रही हैं। सविंधान या देश नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। फिर ये सेनाएँ क्या है और किसके लिए लोगबाग लड़ते-मरते हैं? बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए? राजे-महाराजों के लिए? 

सबसे बड़ी बात, आप भी अपने या अपनों के लिए काम ना कर, कहीं इन्हीं की गुलामी तो नहीं कर रहे? इसीलिए आज भी छोटी-मोटी गोटियाँ (so-called), कीड़े-मकोड़ों की तरह यहाँ से वहाँ, उठा कर पटक दी जाती हैं। या ख़त्म कर दी जाती हैं। राजे-महाराजों द्वारा? या आपकी राजे-महाराजों की गुलामी की मानसिकता द्वारा? अपने छोटे-मोटे लालच की वज़ह से? या हक़ीक़त से दूर, अँधे-बहरे होने की वजह से? अपनों से दूर और औरों के पास होने की वजह से?

ये सब सामान्तर घड़ाईयोँ से समझ आता है। आसपास के कुछ लोगों ने अपना या अपने किन्हीं आसपास वालों का भला करने के लिए, पता ही नहीं, कैसे-कैसे नुकसान कर डाले। आसपास वालों के तो किए जो किए, अपने भी। क्यूँकि, इन पार्टियों ने उन्हें अँधा और बहरा बनाया हुआ है। जहाँ कहीं से इन्हें सचाई पता लग सकती है, वहीं से भगा देते हैं। या उस इंसान को कहीं दूर पटक देते हैं या दुनियाँ से ही उठा देते हैं। पार्टियों के स्क्रिप्ट्स के अनुसार, सामान्तर घड़ाईयाँ घड़ने के लिए, ऐसी दूरियों या दीवारों का होना बहुत जरुरी होता है। क्यूँकि, आम इंसान इतना बुरा नहीं होता, जितनी निर्दयी और क्रूर राजनीतिक पार्टियाँ होती हैं। ज्यादातर, कोई खास बेईमान या लालची नहीं होते। मगर, इन पार्टियों के पास उन्हें ऐसा बनाने के तरीके होते हैं। इसलिए आम-आदमी के पास सूचनाएँ सिर्फ वो पहुँचती हैं, जिससे इन पार्टियों का काम आसान हो जाता है। जितना ज्यादा इस सही सूचना को छिपाने या तोड़ने-मरोड़ने वाली दिवारें (shield) को ख़त्म किया जाएगा, उतना-ही इन पार्टियों के बुरे जालों से मुक्ति मिलेगी। और आपकी पहचान, इनके चिपकाए स्टीकरों की गुलाम नहीं रहेगी।  

इन्हें हम बीमारियों से या कहना चाहिए की राजनीतिक बीमारियों की हकीकतों से ज्यादा अच्छे से समझ सकते हैं।   

Monday, April 29, 2024

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, जैसी-सी कहानियाँ (Parallel Case Creations)

अभी पिछले साल (?) दो भाई-बहन दुबई की सैर पे गए। हाँ, तो क्या खास है? दुनियाँ जाती है। बहन की फिर शादी हो गई, इंटरकास्ट और भाई ने ज़मीन हड़प ली, किसी अपने की ही। होता रहता है, इसमें भी क्या खास है? किसी पियक्कड़ की ज़मीन, कोई भी हड़प ले? फिर ये तो शायद किसी अपने ने ही ली है, protection के लिए। बिचौलिया अहम है।   

सोचो इन सबका दुबई-बाढ़ से क्या लेना-देना?    

रैली पीटें थोड़ी? भाई-बहन की? बिचौलिए की? ऐसी शादी की? और ऐसे protection की? ये रैली कौन और किसकी पीट रहा है? या पीट रहे हैं? कहाँ-कहाँ और किन-किन लोगों की? कौन-कौन पार्टियाँ या उनके कर्ता-धर्ता? इस सबका किसी को दुनियाँ से ही खिसकाने से भी कोई लेना-देना हो सकता है? खिसकाने वाले कौन और नाम किसका लगाने की कोशिश हुई? अजीबोगरीब जाले हैं, ना? वहाँ फिर क्या लाकर रख दिया? किसने और कैसे? ये कौन अपने हैं, जिन्होंने ये सब रचा? आम आदमी? उसकी समझ से बाहर है, ये कहानी। या ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी, कहानियाँ। ये वो बता सकते हैं, जो आदमी को रोबॉट बनाते हैं। वो फैक्टरियाँ, जो दुनियाँ भर में ये सब करती हैं। अहम? कैसे? और आम आदमी को ये सब कैसे समझ आएगा? उसके लिए उसे कैंपस क्राइम सीरीज़ को समझना होगा।        

अच्छा ये ED-ED क्या है? ये ED-ED? कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे EC-EC?      

ED के आगे B लगे तो क्या बनता है? B. ed? या B. ED? या Bed? या खाटू? खाटू के कितने रंग हैं? झंडे के? इतने क्यों? ये हिन्दू है? मुस्लिम है? क्रिस्टियन? या सिख?

B. ED कितने में होती है?

जो B.ED करवाते हैं, वो खुद कितने पढ़े-लिखे हैं? 75000, एक साल के, एक B.ED करने वाला देता है? एक साल में, एक ही कॉलेज से कितने B.ED करते हैं? ये so-called कॉलेज वाले, एक साल में सिर्फ B.ED से ही कितना कमाते हैं? वो भी शायद, घर बैठे? टीचर्स क्या करते हैं? और उसके बावजूद कितना कमाते हैं? उनकी कमाई घर बैठे-बैठे ही कौन-कौन खा जाता है? क्यों? वो इतने नालायक क्यों हैं? कैसी डिग्री के लिए इतने पैसे देते हैं? ये शायद वो प्रश्न हैं, जो मुझे रितु (भाभी) ने या उस वक़्त मेरे कुछ अपनों के यहाँ विजिट्स ने समझाए। बहुत कुछ उसके काफी बाद में समझ आया। शायद ये भी, की रितु को और उसके घर को कौन खा गए? और नाम फिर किसका लगाने की कोशिशें हुई? 


ये भी की आज तक यूनिवर्सिटी, मेरा पैसा क्यों रोके हुए है?

ये भी की भाभी के जाते ही, ये किस खास अपने बिचौलिए ने, so-called अपनों को ही, दूसरे भाई की ज़मीन थमा दी? 

बहुत से so-called अपनों के शब्द भूलते नहीं हैं। जम गए हैं, जैसे कहीं। जैसे, "देख दम, मेरी आपणे घर मैं भी चालय, अर थारे भी। थाम भी चला लो न (माँ-बेटी)।" भाभी के जाने के बाद, जब बुआ-दादी को भी किनारे करने की कोशिशें हो रही थी। और गुड़िया को कहीं और पार्शल करने की। कहना तो चाह रही थी, की चाल्या तो तब करेय ना, जब कोई चलाना चाहे। पर ना वक़्त था इतना बोलने का और ना अकसर मन होता, ऐसे गँवारों से तू-तू, मैं-मैं करने का। यहाँ तो यही नहीं समझ आता, की लोग दूसरों के यहाँ अपनी चलाना क्यों चाहते हैं? अपनी ज़िंदगी अपने अनुसार चल जाय, वो बहुत नहीं होता? ज्यादातर, अपना शरीर ही नहीं चलता, अपने अनुसार तो। पता नहीं कब, कहाँ और क्या हो जाता है? और ठेकेदारी औरों के घर, अपने अनुसार चलाने की चाहतें? पता चल गया होगा अब तक तो, ऐसे लोगों को भी थोड़ा-बहुत शायद? ये वो दुनियाँ है, जहाँ बीमारियाँ और ऑपरेशन तक, राजनीती के कोढों के अनुसार होते हैं। इधर वालों को कोई पार्टी धकेल रही होती है और उधर वालों को कोई और। काटते रहो, एक दूसरे को ही।  

बहुत ज़बरदस्त खिचड़ी पकी होती है, ऐसे सामान्तर घड़ाईयोँ में। और भी अहम। ये घढ़ाईयाँ घड़ती राजनीतिक पार्टियाँ हैं। और आम-आदमी, एक-दूसरे को ही कौस रहा होता है। कैसे?

जैसे एक भाभी ने बताया की उसने B.ED करने के 60000 एक साल के दिए थे। तो दूसरी ने बताया, 75000 लेते हैं। नहीं। ये उन्होंने नहीं बताया। मैं जहाँ कहीं जाती, अकसर वहाँ उन लोगों के पास कहीं से भी फ़ोन आ जाते थे, उन्होंने बताया? उसपे कमेंट्री फिर कहीं, किसी आर्टिकल में, या सोशल मीडिया पे मिलती, की यहाँ घड़ाई क्या चल रही है। बहुत-सी पार्टियों की इधर या उधर पहुँच या घुसपैठ, कुछ हद तक ऐसे समझ आई।  

ऐसे ही जैसे, जब कुछ अपनों ने बोला, तुम अपना हिस्सा क्यों नहीं ले लेते। इस सोशल मीडिया या आर्टिकल्स ने ही बताया, की ये सब क्या था। Indirect ways to inform about indirect tunnels of different parties . अलग-अलग पार्टियों के अलग-अलग तरह के उकसावे, तरीके फूट डालो, राज़ करो के? 

आप जहाँ कहीं जाते हैं या देखते हैं या समझने की कोशिश करते हैं, यूँ लगता है, ये तो इन्हीं के खिलाफ रखा हुआ है। और ये, ये सब ऐसे कर रहे हैं, जैसे किसी और के खिलाफ। ऐसे ही शायद, जैसे कोई आपको चिढ़ाने या तंग करने की कोशिश में, खुद की ही रैली पीटने लगें?   

कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा? जैसी-सी कहानियाँ हैं ये। इधर भी और उधर भी।          

दुबई में बाढ़? (Artificial Rain)

इससे पहले भी कभी सुना की दुबई में बाढ़ आई हो? मैंने तो नहीं। हो सकता है, मेरी जानकारी में ना हो। अभी जो दुबई बाढ़ का जिक्र हुआ, वो कौन-कौन से चैनल्स पे हुआ? अहम?

उन्हीं चैनल्स पे क्यों हुआ? बाकी पे क्यों नहीं?

जिन-जिन चैनल्स पे हुआ, वो किस-किस पार्टी के हैं? या किनके पक्ष में हैं? और भी ज्यादा अहम है, शायद?

चलो मान लिया की सच में बाढ़ आई। तो ऐसा कैसे संभव है? क्या बाढ़, आँधी, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदायेँ, कृत्रिम रुप से लाई जा सकती हैं? अगर हाँ, तो कैसे? कहाँ-कहाँ, ऐसी विज्ञान और टेक्नोलॉजी का प्रयोग हो रहा है? और कहाँ-कहाँ दुरुपयोग?     

बच्चों की किताबों को थोड़ा अपडेट करने की जरुरत है। अगर वो अपडेट ना भी हों, तो भी कम से कम टीचर्स को तो ये काम अपनी जिम्मेदारी समझ करना चाहिए। 

साथ में ये भी बताएँ की प्रकृति से ऐसा खिलवाड़, इंसान के लिए कितना फायदे या नुकसान का सौदा है?

कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे इस या उस पार्टी के कोढ़ के अनुसार, बिमारियों की भरमार। जैसे ना हुई बीमारियाँ बनाई जा रही हैं या कहो की घड़ी जा रही हैं। वैसे ही रेगिस्तान जैसे इलाकों में बाढ़ है। 

टेक्नोलॉजी और पैसा इतना ही फालतु है, तो अमेरिका जैसे देश, एरिज़ोना जैसे राज्यों में कैक्टस की बजाय, कुछ अच्छा क्यों नहीं उगाते? भारत जैसा पिछड़ा देश, मुंबई जैसे शहरों में ऐसे एक्सपेरिमेंट की बजाय, राजस्थान जैसे इलाकों को क्यों नहीं हरा-भरा कर लेता? संभव तो शायद बहुत कुछ है मगर?