About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Wednesday, January 31, 2024

सामाजिक घड़ाईयाँ

APEX Hospital (या कोर्ट?) 50% Off?

चलो एक छोटी-सी कहानी सुनाऊँ। कहानी? नहीं हकीकत। APEX hospital के बाद रितु PGI गई और उसकी लाश ही घर आई। ऊपर से मैं शायद बहुत शांत दिख रही थी, मगर। अंदर से जैसे कोई दिमागी दौरा। जिसे बच्चे को देखते हुए, आप उड़ेल भी नहीं सकते। और उसके बाद जो नौटंकियों का दौर चला, उससे घिनौना, शायद ही कुछ देखा हो, ज़िंदगी में। जैसे एक तरफ आसमान में चीलों को मँडराते देखा तो दूसरी तरफ कई सारी आदमी के खोल में चीलों को आते-जाते और उनके ड्रामों को देखा। 

इसके कई महीने बाद, मैं फिर से APEX हॉस्पिटल गई। 

क्यों?   

किसके साथ?

क्या खास था?

क्या तारीखें थी? 

APEX से आई एक नन्हीं कली? या परी? Kali या Pari? दोनों के मतलब कोढ़ के अनुसार अलग हैं? और पार्टियाँ भी अलग? ऐसे ही जैसे, किसी को बोलो Prince, Princess, King, Queen, Rani, Maharani, Raja, Maharaja, Lakshmi, Lakshmibai, Lakhmi, Bal, Her, Hari, Dev, Baldev, Her dev, Har dev, Har-Har, Devi, Deva, Mahadevi, Mahadeva, Kaal, Mahakal, Har Har Dev, Har Har Maha Dev  इनके, और इन जैसे कितने ही और शब्दों के कोढ़ के ज्यादातर, वो अर्थ नहीं होते, जो आम आदमी सोचता है। गुड़ का गोबर भी हो सकता है। और गोबर का गुड़ भी। खैर। वापस, 50% पर आते हैं।                            

आसपास कहीं एक छोटी बहन को लड़की हुई थी। इसमें क्या खास था? ड्रामे, 50% वाले।  

इसी छोटी बहन की पहली शादी से एक लड़की है। जिसे वो पीछे छोड़ आई। उस बच्ची को छाती में साँस की दिक्कत जैसा कुछ बताया, घर बनाते वक़्त CEMENT की वजह से। अब तक ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी, कितनी बच्चों की बीमारियाँ पढ़ चुके आप? सब यहीं आसपास से। 

उसके इलावा छोटी बहन को घर में रोक के रखना, खाने-पीने तक को कुछ ना देना, मारना-पीटना, वगरैह। और खुद राम-रहीम (शायद?) सत्संग में चले जाना। वैसे तो मैं ऐसे-वैसे और कैसे-कैसे गुरुओं को नहीं मानती। मगर, यहाँ से जैसे नफरत-सी हो गई, ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे गुरुओं पे और गुरु-भगतों पे। ये गुरु यही सब सिखाते हैं क्या, अपने भगतों (अंधभक्तों) या चेलों को? सोचो, ये केस कब का होगा? राजनीतिक सामाजिक घड़ाईयाँ रिश्तों की? फिर हूबहू कोढ़ वाले राजनीतिक तमासे, लोगों की असली ज़िंदगियों में? राम-रहीम के आसपास? H#30, Type-4 धमाल। एक और बिग बॉस हाउस। राजनीतिक, सोशल और सामाजिक कहानियों का अड्डा जैसे? वैसे, कैंपस क्राइम सीरीज की कोई फाइल भी मिलती-जुलती है शायद इससे? 

54-days Earned Leave? और राम रहीम? और स्टुडेंट्स की केस घड़ाई, मेरे खिलाफ। वो हरि याणा बंद तो भी टीचर ने नहीं पढ़ाया वाली शिकायतक्या तारीख थी? 25? 2017? और महीना? वैसे हरि याणा क्यों बंद था उस दिन? और दिवाली वाली छुट्टियों में स्टुडेंट कहाँ बैठा था? और हस्ताक्षर कहाँ? फिर से टीचर की झूठी शिकायत?                    

वैसे 

CEMENT क्या है?  

TILES क्या हैं?

TILES पे X टाइप खास डिज़ाइन क्या हैं?

और कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे DESIGN हैं, या रंग हैं?

अरे। ये BP से कहाँ पहुँच गई मैं?    

ROHIT? 

AP? 

BULLET?


ROBIN? 

TB? एक कमरा कई बन्दे? 

HERNIA? 

ऐसे कैसे? और कैसे-कैसे बीमारियाँ होती हैं दुनियाँ में? धकाया हुआ Culture Media? सोशल कल्चर मीडिया? और लोगों की ज़िंदगियों से कैसे-कैसे खिलवाड़? और आप खुद जाने-अनजाने, इस सब का हिस्सा बने हुए हैं? किसके लिए? यही नहीं। अपने बच्चों को भी उसी Culture Media में धकेल रहे हैं। जाने-अनजाने?    

खास नंबर वाली AP Bullet पहले किसी छोटी बहन के पास आई। वहाँ से खास तारीखों को, वो कहीं और खड़ा होनी शुरू हुई। और कुछ वक़्त बाद, उस घर में भी कोई Bullet पहुँच गई? भाभी जा चुकी थी। किसी और जबस्दस्ती सामाजिक समान्तर घड़ाई के धकेल की, घर में आने की कहानी की शुरुआत? मुझे जब भी कोई Bullet दिखती है, ऐसा लगता है, बंद क्यों नहीं हो जाती ये Bullet? इसका तो नाम ही हिंसा जैसा-सा है। हालाँकि, किसी वक़्त मुझे भी बुलेट ठीक-ठाक लगती थी। हालाँकि, भारी-भरकम मशीनों की मैं फैन कभी नहीं रही।    

उसपे, पता है वो किसकी पहुंचाई हुई है? ये अहम है? 

इन सब ज़िंदगियों का, इनकी ज़िंदगियों के उतार-चढ़ावों का और फिलहाल इन ज़िंदगियों में जो चल रहा है उसका, किसी Hyderabad, Telangana या Andhra Pradesh से कोई लेना-देना हो सकता है क्या? या शायद ऐसे ही किसी और के, किसी घटना या दुर्घटनाक्रम से? मैं खुद जानना चाह रही हूँ, जानकारों से। क्यूँकि, पता नहीं क्यों, मुझे इन ज़िंदगियों में या आसपास के इन घरों में, सबकुछ जैसे उल्टा-पुल्टा सा लगता है। इसकी इस वक़्त की कहानी जैसे, इससे या इस फाइल से मिलती-जुलती है। उसकी, उस वक़्त की कहानी, जैसे उससे? पता ही नहीं, कैसे-कैसे जाले हैं? जोड़-तोड़ और मरोड़ हैं? और कैसे-कैसे कोढ़?              

गूगल ज्ञान और खास तरह की AI Enforcements?


अब कोई उस गुड़िया के नाम पे 50%, 50% करने लगे, तो आप क्या करेंगे? जबरदस्ती का Psycho war चल रहा है। यूँ लग रहा है, जैसे लोगों के दिमाग की common sense को ही ब्लॉक कर दिया गया है। Long Term में बच्चे पर ऐसे Enforced Dramas का प्रभाव क्या होगा? अगली पीढ़ी के खास रोबोट्स का उत्पादन और फिर उनकी पैदाइशी ट्रेनिंग ऐसे शुरू होती है और आगे चलती है। बच्चे की पैदाइश से लेकर, तारीख, जगह, हॉस्पिटल, डॉक्टर और कितने सारे छोटे-मोटे details, सब कौन कंट्रोल कर रहा है? और उससे भी अहम है, कैसे और क्यों?

हमारे बच्चों को Psycho Manipulations, Alterations, Psycho Wars, Psycho Operations (Military या Civil) जरुर पढ़ने चाहिएँ। 24 Hour, 365 Days, जब आप observations और Surveillance Abuse के घेरे में हों, तो ज़िंदगियाँ बिलकुल लैब-सी कंट्रोल होती हैं। समाज की इस लैब के Standards और Protocols भी बिलकुल ऐसे ही डिज़ाइन और operate होते हैं, जैसे किसी भी Scientific लैब में। 

ये उदाहरण इसलिए दिया, की एक तो ये तरो-ताज़ा है। उसपे, इससे पहले आसपास के ही कई बच्चों की पैदाइशों से लेकर, हॉस्पिटल, उन बच्चों की बीमारियों और फिर स्कूल जाने तक के सफर को थोड़ा पास से देखने का मौका मिला, इन पिछले कुछ सालों में। खासकर, जब से मैं घर आई हूँ।  
 
आगे और कई ऐसे उदाहरण मिल सकते हैं, अजीबोगरीब ड्रामों के, जहाँ बच्चों तक को शामिल कर लिया जाता है। जो मेरे हिसाब से इन बच्चों और माता-पिता के लिए भी सही नहीं है। वो उनकी ज़िंदगियों को कोई अजीबोगरीब दिशा दे रहे हैं। जिनसे ना सिर्फ सावधान रहने, बल्की बचने की जरुरत है।  
    
मगर बचोगे कैसे, जिनके बारे में तुम्हें मालूम ही नहीं? ये भी अहम है। वो भी जानने की कोशिश करेंगे।                     

Wednesday, January 17, 2024

Store H#16, Type-3

आपमें से कौन-कौन हैं, जो स्टोर में अपना मंदिर बनाते हैं? 

जब मुझे 2011 में H#16, Type-3 घर मिला, तो कुछ अजीब-सा था उसमें। रंग-रोगन करवाने के बावजूद,  उसके स्टोर में जैसा जो पहले था, बिलकुल वैसे ही था। बहुत कुछ अजीब-सा दीवारों पे और ढेर सारा घी या तेल जैसा कुछ रमा हुआ, जैसा फर्श पे। पता नहीं, उसके स्टोर पे पेंट किया भी गया था या नहीं। शायद मैंने ध्यान नहीं दिया। या शायद, बिना दीवारों को साफ किए, ऊपर से हल्का-सा कर दिया, पेंट करने वालों ने। क्यूँकि, जब मैंने सामान शिफ्ट करने के पहले साफ-सफाई चैक की, तो पता चला की स्टोर तो बहुत गन्दा है। 

पड़ोस से ही, मेरे एक Colleague के यहाँ से, एक सफाई वाली (Domestic Help) को भी बुला लिया। और फिर वही साफ-सफाई करने आने लगी। मैंने उसे स्टोर को अच्छे से साफ करने को बोला। उसने स्टोर देखते ही कहा, मैडम आपने ये स्टोर साफ नहीं करवाया क्या? इसपे पेंट भी नहीं हो रखा शायद।  

मैंने कहा, हाँ शायद रह गया। आपको थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। ये तो कुछ ज्यादा ही गन्दा है। उसे ऐसा बोल के मैं नीचे आ गई। अगले दिन, जब वो काम वाली आई तो उसे फिर से बोला, अरे शायद कल आप भूल गए। आज साफ करके जाना स्टोर को। 

उसने बोला, मैडम आपने देखा इसपे (दीवारों पे) क्या-क्या लिखा हुआ है?

मैंने कहा, हाँ ! बड़ा अजीब-सा है। जो भी है, आप साफ कर दो। 

उसने कहा, मैडम आपने नीचे फर्श देखा?

मैंने कहा, हाँ ! दिवार और फर्श दोनों ही बहुत गंदे हैं। देख लिए। अब कर भी दो साफ। इसके एक्स्ट्रा पैसे ले लेना। 

उसने कहा, मैडम बात पैसों की नहीं है। मैं नहीं करुँगी ये साफ?

मैंने कहा, क्यों? ज्यादा गन्दा हो तो आप साफ नहीं करते?

उसने कहा, कर देती हूँ। पर इसे नहीं करुँगी। 

ऐसा क्यों? मैंने पूछा 

उसने कहा, आपको पता है, यहाँ कौन रहता था?

हाँ। बाहर नाम लिखा है ना। 

उसने कहा, अरे आपने अपना नाम भी नहीं लिखाया अभी?

नहीं, अभी यूनिवर्सिटी वाले आएँगे लिखने। उन्होंने बोला है। 

पर मैडम, वो तो पहले लिखा नाम भी नहीं मिटा कर गए। उसके ऊपर भी पेंट नहीं हो रखा। 

यार, तुम बहुत गप्पेड हो। कर जाएँगे। अभी काम करो अपना। 

और मैं आज फिर से नीचे आ गई, ये सोच के की ऐसे तो ये बोलना ही बंद नहीं होगी। मैंने ध्यान नहीं दिया, ये सोच के की स्टोर साफ कर गई होगी। मगर देखा, तो फिर से नहीं। 

अगले दिन आई, तो उसे बोला पहले स्टोर, बाद में बाकी कुछ। चलो ऊपर, मेरे सामने करो। 

मैडम, बोला ना, मैं नहीं करुँगी ये। 

मगर क्यों?

वो सामने मैडम ये बोल रही थी, जो पहले यहाँ रहते थे ना, वो पता नहीं क्या-क्या करते थे?  

क्या-क्या करते थे, मतलब?

अरे, पता नहीं क्या भूत-वूतों से बातें करते थे। 

ओह हो। तो डरा दिया आपको किसी ने?

नहीं और भी एक-दो ने बोला। 

अच्छा? भूतों को मानते हो तुम?

आप नहीं मानते?

मन का वहम होता है। मानों तो हैं। नहीं तो नहीं। इंसान से बड़ा भूत क्या होगा? डर का भूत होता है। 

अच्छा? तो आप ही साफ करना। या किसी और को बुला लेना। मैं तो नहीं करुँगी। 

मुझे लगा उसे किसी ने डरा दिया है। ऐसे तो कोई उसे काम से भी भगा देगा। मैंने उसे कहा, चाय पीते हो?

हाँ ! 

आओ चाय पीते हैं। सोचा, इस बहाने थोड़ा गप्पे भी हांके जाएँगे उसके साथ और शायद बातों-बातों में उसका डर भी खत्म हो जाएगा। 

उसने कहा, मैं बना देती हूँ। 

नहीं बैठो आप। आज मैं ही बनाती हूँ। फिर कभी पीनी हो तो आप बना लेना। 

और लो जी, हो गई वो शुरू। वो मैडम, ऐसे बोल रहे थे और वो वैसे बोल रहे थे, उनके बारे में। कई तरह की उल्टी-पुल्टी सी बातें, उनके मंदिर के बारे में। जो मुझे खामखाँ और बकवास लग रही थी। लगा ज्यादातर कम पढ़े लिखे और गरीब तबकों के साथ शायद ज्यादा होती है, ये समस्या। लोगबाग पता नहीं कैसे-कैसे डर बिठा देते हैं, उनके मन में। मगर फिर कुछ उसने ऐसा बोला, जिसने मेरा ध्यान खींचा, उस घर में लगे पेड़-पौधों के बारे में। ये थोड़ा बहुत मेरी रुची का विषय था। मेरे समझाने पे उसने थोड़ी-बहुत सफाई तो कर दी। मगर सिर्फ फर्श की। जाने क्यों, जब वो दीवारें साफ करने लगी तो मैंने टोक दिया। आज बहुत कर दिया। ये फिर कभी कर देना। 

उसके जाने के बाद, मैंने दीवारों पे उन अजीबोगरीब चिन्हों को थोड़ा ध्यान से देखा। मगर, कुछ पल्ले नहीं पड़ा।  सिवाय इसके, की पता नहीं ज्यादा धर्म में विश्वास करने वाले लोग क्या-क्या बनाते रहते हैं। शायद इसलिए भी, की उस वक़्त तक मेरे लिए वो सब अंधविश्वास और बेवकूफी के इलावा कुछ नहीं था। उस घर में बहुत ज्यादा पेड़ तो नहीं थे। मगर दो पेड़ दक्षिण भारत से थे। सीधी-सी बात, वो उधर से होंगे। तो उनपे भी कोई खास ध्यान नहीं दिया। 

एक दो बार उन मैडम से मुलाकात भी हुई, जब वो अपने पुराने घर देखने आए की अब वहाँ कौन आया है। और शायद एक बार बेल के सीजन में या अपना कोई लैटर वगैरह या शयद पार्सल पूछने, जिनके पते अभी तक उसी घर के थे। वो बेल का पेड़ भी शायद उन्हीं का लगाया हुआ था। मुझे उनमें कुछ खास अलग नज़र नहीं आया। मीठा बोलते हैं। अपने जूनियर्स से, ऐसे ही व्यवहार करते हैं, जैसे ज्यादातर पढ़े-लिखे सभ्य लोग। 

हाँ। वक़्त के साथ-साथ कई बातें पता चली, जिनसे लगा की शायद कुछ तो खास होगा, जो इतने सारे लोगबाग कह रहे हैं। जैसे, मेरे एक पड़ोसी ने खास धन्यवाद दिया, जब मकान के अंदर के कुछ पेड़ और बाहर खाली प्लॉट की दिवार के साथ लगते झाड़ को साफ करवाया। मैडम धन्यवाद आपका, साँपों के छुपने की जगह बने हुए थे, ये झाड़। हो सकता है, उन्होंने सिक्योरिटी को मध्यनजर रख ऐसा किया हो। वैसे भी हर इंसान और उसका स्वाभाव अलग होता है। जैसे मैंने उन्हें साफ करवा, फूलों के, मगर कांटो वाले पौधे लगवा दिए थे, गुलाब और bougainvillea की अलग-अलग वैरायटी। 

कुछ वक़्त बाद मुझे खुद लगने लगा था, की कुछ अजीब-सा है उस घर के आसपास और अंदर भी। मगर मेरे लिए वो भूत नहीं थे। वो था Surveillance Abuse । और था, डराने के अजीबोगरीब तरीके, खासकर, आप अकेले रहते हों तो। वो भी धीरे-धीरे समझ आए। यहाँ-वहाँ से कुछ दोस्तों, पत्रकारों या जाने-अनजाने सोशल प्रोफाइल्स पढ़के, जिन्हें मैं यहाँ-वहाँ के लिंक्स से पढ़ने लगी थी। वैसे तो टोने-टोटकों के कई वाक्या सामने आए थे। मगर, 2016 में, दुशहरी के आम के पेड़ पर कच्चे धागे वाले कारनामे ने, शायद, एक तरह से उस स्टोर या ऐसे-ऐसे कितने ही स्टोरों के राज खोलने में मदद की वक़्त  साथ। धर्मो और आस्थाओं के नाम पे रीती-रिवाजों और उनसे जुड़े जुर्मों और उससे जुड़े विज्ञान के आम-आदमी पे मानसिक जाल को समझने में भी सहायता की। इन्हीं सब में जैसे गूँथ-सा दिया है, पढ़े-लिखे शातीर लोगों ने, आम-आदमी की ज़िंदगी के उतार चढ़ाओं को। उसकी ज़िंदगी की खुशियों को, गमों को। त्योहारों को, उत्सवों को। उससे भी अहम पैदाइशों को, बिमारियों को और मौतों को भी। 

मुझे तो शायद उन मैम का धन्यवाद करना चाहिए और उनके स्टोर और पेड़ों के बारे में जानकारी देने वालों को भी। क्यूँकि, अगर मुझे वो घर ना मिला होता और जो कुछ वहाँ था या हुआ, अगर उसे जानने की रुची ना हुई होती, तो रीती-रिवाजों का या धर्मों का ये जाला, विज्ञान और राजनीती के साथ कहाँ पता लगता? अन्धविश्वाशों के भी, समाज के अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग मायने हैं, ये भी कहाँ पता होता? किसी के लिए, वो सिर्फ श्रद्धा और विश्वास, किसी के लिए अंधविश्वास तो किसी के लिए विज्ञान। वो विज्ञान, जो लोगों को और उनकी ज़िंदगियों को काबु करता है। उन्हें मानव रोबोट बनाता है। 

यूनिवर्सिटी वाले, ना उस नाम को बदलने आए, और ना ही उस नाम प्लेट को। और ना ही वक्त के साथ, मैंने जरुरी समझा, क्यूँकि, अजीबोगरीब अटैक होने लगे थे। और वो नाम तकरीबन दिखाई देना बंद हो गया था। ध्यान से देखने पे ही हल्का-सा दिखता था। उन मैम का नाम भी वि से ही था और उसका अर्थ भी बड़ा ही कोमल-सा। बाद में भी,  Type-4 में भी, वो मेरे पड़ोसी थे। कभी-कभार उनके यहाँ आना-जाना भी हुआ या आते जाते वक़्त हाय-हैलो। मालूम नहीं, उन्हें अपने स्टोर वाले मंदिर के बारे में या उस घर के पेड़ों के बारे में, ये वाली जानकारी कितनी थी या है। क्यूँकि, मैंने उनसे ऐसा कभी पूछा नहीं। शायद यही जानकर की वो धर्म और रीती-रिवाजों को काफी मानते हैं और उसपे विज्ञान से भी शायद कम ही नाता है। 

हालाँकि, अपने एक और साथ वाले पड़ोसी से समझ आया, की जरुरी नहीं रीती-रिवाजों और विज्ञान की राजनीती के इस जाल की कहानी, विज्ञान वालों को ही पता हो। बहुत बार शायद उल्टा भी हो सकता है। जैसे मेरे साथ वाले घर वाली मैम से पेड़-पौधों का शायद थोड़ा बहुत समझ आया। और खनन वाले ज्ञान और विज्ञान का भी। थोड़ा बहुत ये भी, की क्या कहाँ रखा है और उसका क्या मतलब हो सकता है, को पढ़ते कैसे हैं, सिर्फ देखकर। ये ज्ञान बाहर की यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पे तो ऐसे है, जैसे थोड़े देर भी किसी वेबसाइट पे ठहरे तो गप्पे हाँकने लगेगा। अब पता नहीं, खुद उन यूनिवर्सिटी के ज्यादातर Stake Holders को इसके बारे में कितना पता है? क्यूँकि, आज भी शायद ये सब, बहुत से स्टूडेंट्स और स्टाफ को वैसे नहीं पता, जैसे कुछ लोगों को पता होता है? शायद? जानकार शायद ज्यादा बता पाएँ। 

इस स्टोर जैसी-सी ही, कितनी ही जानकारियों ने, इस कल्चर को "मीडिया कल्चर और सोशल इंजीनियरिंग" से अवगत कराया। ठीक वैसे, जैसे लैब में होता है। 

इंसानों के साथ-साथ, अगर पशु-पक्षियों के कल्चर मीडिया को जानोगे, तो शायद जरुर लगे, जैसे जादू है कोई। इतनी आसान है क्या ये ट्रैंनिंग, मानव-रोबॉट बनाने की? या automated सिस्टम के साथ-साथ जैसे सब बदलता है? क्यूँकि, उनमें तो दिमाग वैसे ही नहीं होता। इंसान का तो फिर भी ब्लॉक करना पड़ता है शायद, कोई खास हिस्सा या जानकारी या लालच या डर जैसे, इंसानी व्यवहार को इधर-उधर खिसकाना? या कुछ जरुरतें खत्म करके, कुछ ना जरुरी जरुरतें पैदा करना? 

Sunday, January 14, 2024

आज का ज्ञान

दान का तिनका भी दिखाकर और बताकर,  

मगर बड़ी धोखाधड़ी और काँड भी छुपाकर करें।  

Friday, January 5, 2024

यूनिवर्सिटी की सैर पे चलें?

आओ नजरों से जाले हटाएँ 

ये फोटो किसी यूनिवर्सिटी के ऑफिसियल पेज से ली गई है 
कौन सी यूनिवर्सिटी?

चलो आएंगे इस जहाँ पे भी। आपको इस फोटो को देखके क्या समझ आ रहा है? अगर आप कम पढ़े लिखे हैं और विज्ञान से कम नाता है तो मकड़ी के जाले-सा कुछ? या आँख पे जैसे कोई जाला सा छा गया और दिखाई भी कम दे रहा है?
मुझे सिर दर्द रहता था, एक सीनियर ने सलाह दी, आँख चैक करवाओ। डॉक्टर ने बोला आँखे ठीक हैं, थोड़ी आँखों की muscle कमजोर हैं। आँखों की exercise किया करो।  उसके बाद पेपर थे तो सिर दर्द और बढ़ गया। अबकी बार डॉक्टर ने चस्मा लगवा दिया। उस चश्में को पहन के ऐसे लग रहा था जैसे ऊपर जाने वाली सीढ़ियां, नीचे की तरफ जा रही हों और जब नीचे की तरफ जाना हो, वहाँ एक दो step ही गुल हो जाएँ। मतलब फूटने का सही इंतजाम। फिर से डॉक्टर को दिखाया तो सलाह मिली, चश्में नए-नए हैं, थोड़ा वक़्त लगेगा एडजस्ट होने में। कुछ दिन कोशिश की लगाने की मगर कुछ ही वक़्त बाद उन्हें संभाल के पैक करके रख दिया।
 
शायद आप कोई पढ़ाकू टाइप बच्चे हैं, मगर चश्में अच्छे नहीं लग रहे, लैंस लगवा लो, ऐसा किसी ने सलाह दी। और आपने लैंस लगवा लिए। मगर आजकल तो सुना है की लैंस भी अच्छी खासी quality के आने लगे हैं। 2002 के आसपास ऐसा नहीं था। विदेशों में तो पता नहीं, पर उस वक़्त भारत में आँखों के लैंसों का उदय थोड़ा नया ही था। और उस वक़्त लैंस की quality भी आज जितनी अच्छी नहीं थी। लैंस लगवा लिए। मगर उन्हें आप 5-7 घंटे से ज्यादा लगाएंगे तो फिर सिर दर्द होगा। कुछ ही दिन हुए थे लैंस लगाते हुए। एक दिन हॉस्टल वापस आकर लैंस उतार के रख दिए। मुझे ऐसा ही समझ आया। अगले दिन सिर दर्द से हाल बेहाल। समझ नहीं आया, ऐसा क्या हुआ? एक आँख के सामने भी जैसे जाला-सा छा गया। उस दिन रविवार था। ऐसे ही निकाल दिया की शायद आराम करने से राहत मिल जाए। मगर सोमवार को भी ऐसा कुछ नहीं हुआ और सिर दर्द और जाला दोनों बढ़ गए। आखिर हॉस्पिटल गई। डॉक्टर को जाते ही समझ आ गया। लेडी डॉक्टर थी। उसके आसपास कई PG डॉक्टर शायद, जिन्हें वो ये नमूना (specimen) दिखा रही थी। 
उसने बोला, लैंस लगाते हो?  
मैंने कहा, जी हाँ। 
उतारना भूल गए?
मैंने कहा नहीं, आखिर शनिवार को लगाए थे और डिपार्टमेंट से आते ही उतार दिए थे। 
फिर उन्होंने पूछा, कहाँ रहते हो?
मैंने कहा, हॉस्टल। 
उन्होंने कहा, जाओ अपने लैंस लेके आओ। 
मैं वापस हॉस्टल आई और पता चला, एक लैंस उतार दिया, दूसरा भूल गई। दो लैंस के डिब्बे थे। एक  डिब्बे का एक लैंस थोड़ा कट गया था, इसलिए फेंक दिया। उसी में एक उतार के रख दिया और लगा दोनों उतर गए। ध्यान ही नहीं दिया। इसलिए एक आँख में जाला था और सिर दर्द भी। उस लैंस को भी उतार के, अच्छे से आँखे पानी से साफ की। जाला भी खत्म और अचानक से सिर दर्द से भी काफी राहत। लैंस लेके वापस हॉस्पिटल गई और डॉक्टर को बताया की गलती से इस आँख में लैंस रह गया था। उतार दिया, अब कोई जाला नहीं है और सिर दर्द भी काफी कम हो गया। उन्होंने कहा लैंस इतने अच्छे नहीं होते की दिन में भी लगाओ और रात भर लगा के सो भी जाओ। आगे से ध्यान रखना। अब आँख और टैस्ट करवा लो, कहीं कोई damage तो नहीं हुआ। सब सही था और मैं वापस हॉस्टल। उसके बाद लैंस को भी पैक करके रख दिया और फिर कभी नहीं पहने। 

इतने सालों बाद ये सब बताने का उद्देश्य क्या है?
ये की आपको चश्में ना लगने हों तो लग सकते हैं। लैंस की जरुरत ही ना हो, तो भी जरुरत जैसे पैदा की सकती है। और इन्हें शायद से सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ कहते हैं? शुरू में बहुत ही छोटी-छोटी-सी सामान्तर घड़ाईयाँ, वक़्त और अपराधों के साथ-साथ खुंखार होती जाती हैं।  
क्यूँकि इसके कुछ सालों बाद मुझे वापस से पता चलता है की मेरी आँखों का नंबर सही है। और जो आपने चश्में लिए वो शायद अपने तकरीबन ना के नंबर से ज्यादा ले लिए या यूँ कहो दे दिए? इसीलिए उन्हें पहनने पे ऐसा अनुभव हो रहा था।  
ये जानकारी तो थी आम आदमी के लिए, अजीबोगरीब जालों की, खासकर जिनका विज्ञान से कम नाता है। अब चलते हैं, थोड़ा-सा विज्ञान की तरफ। विज्ञान को जानने वालों के लिए इस जाले वाली फोटो के कितने मायने हो सकते हैं? सबसे बड़ी बात, ऐसी-ऐसी टेक्नोलॉजी को भूत घड़ने में प्रयोग किया जा सकता है। भूत, कैसे-कैसे? जानते हैं आगे किसी पोस्ट में, इस यूनिवर्सिटी जैसी कितनी ही दुनियाँ भर की यूनिवर्सिटी के शोधों के माध्यम से या सहायता से। मगर फोटो यहाँ से क्यों? क्यूँकि कुछ तो खास होगा इस यूनिवर्सिटी में?