About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Wednesday, May 31, 2023

Wall Paper

पहली बार माँ के इस घर (जिसे मैं सूअरबाड़ा बोलती हूँ) में wall paper लगे थे,  थोड़े से हिस्से पे। और मुझे वो हद से ज्यादा भद्दे लग रहे थे। ऐसा क्या था उनमें? कौन लेकर आया था उन्हें? और कहाँ से? किसके द्वारा, कहाँ से मँगवाये गए थे? 

एक था स्लेटी रंग (Grey). उसपे पीछे से कुछ आ गया :) खून के धब्बे हैं या लाल ईंटें जिनका प्लास्टर उतर गया है? नंगी-पुंगी गुडियाएँ, जिनको हर तरह से निचोड़ा जा चुका, इधर के गुंड़ों द्वारा भी और उधर के गुंडों द्वारा भी। मतलब हर तरह से मरमत की हुयी है -- शायद कुछ-कुछ वैसे ही जैसे यहाँ दिख रहा है। Kinda लूट, कूट, पीट and Kick Out.        


सफ़ेद Wall Paper, उसपे 7-8 बार V जैसा-सा कुछ है, कहीं उल्टा, कहीं सीधा।  

    


यहाँ एक राजबीर अंकल की दुकान है। शायद उनके द्वारा मँगवाया गए हैं?
ये Automation है? Semiautomation या Enforced? 

माँ को कख्खा नहीं पता। बताने लगो तो सहन नहीं होता उनसे। उठके चल देती हैं। जिनसे लाये थे, शायद उन्हें भी कम ही पता है। माँ को समझ नहीं आता, की मैं हर चीज़ में ऐसी-ऐसी कहानियाँ कहाँ से घड लाती हूँ? अब उन्होंने शशि थरूर की सोशल मीडिया पे वाशिंगटन पोस्ट या न्यूयोर्क टाइम्स या इंडियंस newspapers वाली पोस्ट थोड़े ही पढ़ी हुयी हैं। वो जानती ही नहीं कौन शशि थरूर ?

वही पोस्ट्स जहाँ ये लिखा होता है की एक मिडिल क्लास फ़ैमिली 3-4 पीढ़ियों के बाद डुबने कैसे लगती है? या आप पड़ोस में कहीं किसी मोदी के यहाँ कोई Wall Paper देख फिर से कह रहे हो -- यहाँ भी? और उसी दिन शशि थरूर की वाल पे वो Wall Paper, Design ही मिलता है। या लंदन की किसी Street के बिल्डिंग का बाहर का डिज़ाइन कुछ-कुछ आपके इस So-Called हवेली वाले सूअरबाड़े के बाहर के डिज़ाइन से मिलता जुलता-सा दिखता है। 

अब माँ को कहाँ मालुम की दुनिया में ऐसे-ऐसे लिखने और पोस्ट करने वाले और कितनी तरह के राजनीतिज्ञ, मीडिया वाले, प्रोफेसर, डॉक्टर, साइंटिस्ट, आईएएस या आईपीएस हैं? और उन्हें कह दिया की मोदी, राहुल गाँधी, चौटाला आदि के सोशल साइट्स पे यही चल रहा है। तो शायद यही कहेंगी -- मेरा भेजा खराब मत कर, अपना तो किया हुआ है। पता नहीं कहाँ से क्या और कैसे-कैसे भिड़ा देती है। अब उन्हें क्या मालूम ये जोड़-तोड़-मरोड़ वाला प्रेजेंटेशन ज्ञान, कौन-कौन सी गुफाओँ (Crypts) की देन है और कौन-कौन सी टेक्नोलॉजी है उस सबके पीछे। हम जैसों को ही इतनी जद्दो-जहद और वक़्त के बाद भी उतना नहीं पता, जितना होना चाहिए शायद।  

Sunday, May 28, 2023

समाज अपने आप में एक बड़ी लैब है - 2

समाज अपने आप में एक बड़ी लैब है - 1  (पोस्ट : मई 26, 2023)

"मगर अचानक से काफी कुछ बदलने लगा था। Case Studies Publishing के चक्कर में उस तरफ मेरा ध्यान ही नहीं गया।  क्या था वो अचानक? अचानक था या मुझे ही अब समझ आने लगा था?" 

अपनी गाडी यहाँ खड़ी मत कर। वहाँ, उधर सामने वालोँ के यहाँ खड़ी कर ले। 

और आप मन ही मन सोच रहे हैं -- ये है कौन, तुझे ये सब बोलने वाला? कुछ ज्यादा ही नहीं बड़बड़ा रहा? और गाडी वहीँ खड़ी कर मैं घर आ गयी। माँ का घर। मेरा कमरा भी यही है। माँ और जहाँ भाई रहता है, उसके बीच में वो घर है, जहाँ गाडी खड़ी करने को बोला गया था। कभी आदत नहीं रही, किसी के यहाँ ज्यादा आने-जाने की, तो अपना कोई सामान रखना, चाहे गाडी ही क्यों न हो, थोड़ा अजीब था सुनने में भी। 

वक़्त के साथ, ऐसी छोटी-छोटी सी, पर खोटी चीज़ें बढ़ती जा रही थी। मगर इनपे सोचने का वक्त ही कहाँ था? मैं तो case studies writing में व्यस्त थी। और शायद जिनके खिलाफ वो case studies books थी वो plotting में ! उसके साथ थोड़ा बहुत स्कूल का प्लान भी चल रहा था। मगर वक्त के साथ दोनों में ही दिक्कत आने लगी थी। जहाँ स्कूल बनना था, वहाँ की ज़मीन पे तु-तु, मैं-मैं, शुरू हो चुकी थी। इस सब में आसपास की भुमिका अहम् थी। इस सबसे निपटने के लिए मैंने जमीन भी देखनी शुरू दी। या कहना चाहिए की ये सलाह भी आसपास से ही मिली थी। 

कुछ-कुछ समझ आने लगा था की, "फूट डालो, राज करो" अभियान चल रहा है, मगर उसका हल नहीं समझ आ रहा था। आसपास इतनी तरह के लोग, इतनी तरह की बकवास। इतनी तरह के लोगों के, इतनी तरह के निहित स्वार्थ। 

मगर समाधान भी शायद उन्ही इतनी तरह के लोगों के बीच में ही था। क्युंकि, सब तो स्वार्थी होते नहीं। शायद कुछ को इस वातावरण की मुझसे ज्यादा समझ थी। और धीरे-धीरे, कुछ हद तक समझ भी आने लगा था की ये यहाँ क्यों नहीं होगा और वो वहाँ क्यों नहीं होगा। उसमें अहम् था या कहो, थे, वो सब करवाने वाले। राजनितिक पार्टियों के जाल। ये BJP है। ये Congress है।  ये JJP है।  ये AAP है। इनके ये निहित स्वार्थ हैं। उनके ये और उनके ये। इतने जालों में कोई भी उलझ जाए।   

एक दिन एक महान आत्मा (some outsider)  ने कहा, "तुमने हमारी ज़मीन पे कब्ज़ा कर लिया तो!" मेरे लिए बड़ा अजीब था वो सब सुनना। 

मन ही मन सोच रही थी, ये है कौन, मुझे ये सब कहने वाली? ये तो कुछ ज्यादा ही जा रहे थे। मगर ये सब इनके लिए आम है। क्यूंकि इन जैसों की सोच के अनुसार औरतोँ के कोई अधिकार ही नहीं होते। ये तो तब था, जब ऐसी कोई बात हुई ही नहीं थी, और मुझे यहाँ कोई ज्यादा रुकना नहीं था। 

मैंने कहा, "कौन ले गया है इस ज़मीन-जायदाद को, जो मैं ले जाऊँगी? वैसे भी सब आपका ही है। लड़कियों का तो यहाँ, वैसे भी कुछ नहीं होता। फिर मुझे ये माहौल कोई खास पसंद भी नहीं। बाहर जाना है, मेरे को तो। पता नही और कब तक हूँ यहाँ .......  " ज्यादातर इन लोगों के यहाँ ऐसी ही झल्ली-सी बातें होती थी। जिसमें बात-बात पे लगे, ये कहाँ पहुँच गए आप। मुझे लग रहा था, इस बहाने आसपास के कुछ निठल्लों का भी भला हो जाएगा। पर यहाँ तो वो तुम्हें ही भगाने पे तुले थे या यूँ कहना चाहिए अपने ही घर से निकालने पे तुले थे।   

फिर एक दूसरी साइड भी थी, "सबका खा गया वाली"  

और एक दो बार, वहाँ भी बहस हो जाती थी, की "गाँव में लोगों के पास इतना होता ही कहाँ है, की कोई यहीं पड़ा है और सबका खा गया? है ही क्या? किसका खा गया? दोनों कमाते है, तो गुजारा हो रहा है।" भाभी के पास कम ही वक़्त होता था। शायद वैसे ही, जैसे हर किसी नौकरी करने वाले के पास होता है। जब मैं यहाँ होती तो कभी-कभार श्याम की चाय होती थी वहाँ और उसी दौरान थोड़ा बहुत बातचीत। या छुट्टी वाले दिन, हम दोनों घर होते तो। 

इन सब घरों का, अपनी-अपनी तरह का हक़ जताने का तरीका था इस घर पे। कुछ का सही में था और कुछ का जबरदस्ती। फेज थे शायद इनके, के वो उस वक़्त पास थे। वो उस वक़्त और वो उस वक़्त। कहीं-कहीं तो ऐसा लग रहा था की घर वालों को ही घर से निकालने की कोशिश हुई, कई-बार। 

कुछ बातें थी जो इस दौरान हुई, जो पहले न कभी हुई, न सुनने को मिली। और थोड़ी नहीं, कुछ ज्यादा ही अजीबोगरीब थी। एक बाथरूम को लेके और दूसरा दादा जी वाले कमरे को लेके। वो कब हुई, ये जानना और भी अजीब था। जो समझ आया वो ये की बेवकूफ लोग समांनातर केसों में उलझाए जा रहे हैं। थोड़ा बचो। मगर ये सामान्तर घड़ाई करवाने वाले बन्दे कौन हैं? आसपास ही हैं या दूर हैं? इन गुफाओं को जानने की खास जरुरत थी। 

भाभी को 2019 या 2020 में शायद nerves की वो अजीब-सी problems शुरू हुई थी। अब तक वो कई बार हॉस्पिटल जा चुकी थी। 2-4 दिन बाद ठीक-ठाक घर आ जाती थी। शुरू-शुरू में तो मुझे उनका treatment ही अजीब लगा था। और मैंने बोला था की आपको इतना कुछ नहीं हो रहा। शायद आराम और खाने पे ध्यान देने की ज्यादा जरुरत है। ये हॉस्पिटल्स तो ऐसे भी खा रहे हैं और वैसे भी। शायद थोड़ा बहुत तो उन्हें भी समझ आने लगा था। क्यूंकि इस दौरान आसपास के कई केसों के बारे में उनसे बात हुई थी। फिर कोरोना के बाद तो लोगों का विश्वास, वैसे ही खिसका हुआ था। 

मगर कुछ और भी था शायद, जिसपे वक़्त रहते उतनी बात नहीं हो सकी, जितनी होनी चाहिए थी। क्यूंकि इस सारे तानेबाने की एक ख़ासियत और है, की जैसे ही सामने वाले को कुछ समझ आने लगता है, वैसे ही अजीबोगरीब दुरियाँ बढ़ने लगती हैं। वक़्त ही नहीं होता, किसी भी बहाने, इधर या उधर। फिर कोरोना के बाद तो कुछ ज्यादा ही समझदार (बेवकूफ) लोगों ने, मुझे अपने साथ हॉस्पिटल ही ले जाना बंद कर दिया था। पता चलने पे, मैं ही जबरदस्ती जाती थी। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था। रात 10. 30 के करीब बच्ची ही आयी थी रोते हुए, की पापा, मम्मी को हॉस्पिटल ले गए। उसे दादी ने समझा-बुझा के सुला दिया था, की पहले भी गए हैं न, आ जाएंगे ठीक होकर वापस। मगर अगली सुबह तक तो, सब जैसे कहानी था। उसके बाद जो शुरू हुआ, वो शायद और भी ज्यादा भद्दा।   

ऐसी कई और कहानियाँ और भी हैं इधर-उधर। कोरोना के बाद की इन खास बिमारियों जैसी-ही। जिनमें ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। या जाने क्या, वक्त रहते नहीं मिलता!  शायद फिर कभी। शायद तक तक बालों के केसों की तरह यहाँ भी, कुछ और समझ आने लगे। 

राजाओं के आत्मघाती-दस्ते

राजाओं के आत्मघाती दस्ते -- ज्यादातर खुद के लिए या अपनों के लिए, राजे-महाराजों के लिए नहीं। राजे महाराजे किसी के अपने नहीं होते। वो सिर्फ कुर्सी के होते हैं। 

या कहो इंसानों का रोबोट बनाना। जो चाहो वो करवाओ और वो करते जाएंगे। वो भी बिना सोचे-समझे की इसमें तुम्हारा अपना फायदा नुक्सान कितना है। या शायद पास का फायदा दिखा दिया और दूरगामी असर भूल गए? या उन तक या उनके आसपास वालों तक वो समझ ही नहीं।  

Offensive, disgusting, repulsive and can add as many such words as possible in this. What is that? 

कांडों पे मोहर, अपने तरीके की? 

या चालों में कांड? 

ये इनके वो उनके। 

लोगों को अपनी सेनाएँ बना लेना और आत्मघाती कामों में प्रयोग करना। मतलब, वो खुद ही अपने खिलाफ काम करने लग जाएँ। 

आप कहेंगे, कोई पागल है क्या? भला अपने ही खिलाफ क्यों काम करेगा? 

काला आपका पसंदीदा रंग है?

नहीं? कोई खास नहीं। पर कोई खास खुंदक भी नहीं ?

यहाँ इंसान के तवचा के रंग की बात नहीं हो रही। बल्की,आसपास की हर चीज़। 

फिर तो पसंद नहीं है। 

काला रंग सत्ता को बड़ा पसंद है। मगर इंसानों की तवचा का नहीं, बल्की अंदर की कालिख़ का। अंदर जितना कालिख़ बढ़ता जाएगा, बाहर उतना ही ज्यादा, काला-काला रंगता जाएगा। हो सकता है, आपको ऐसी कालिख पसंद न हो, मगर आप खुद ऐसा कुछ कर रहे हों, यहाँ-वहाँ ? खुद से कर रहे हैं या इसे बोलते हैं, इंसानो को रोबोट्स बनाना? आत्मघाती बनाना। जो वो कर रहे हैं, वो उन्हें पसंद नहीं, मगर कर रहे हैं। या पसंद ही बदल गयी? कब, कैसे और कहाँ?    

इस थोड़े से वक़्त में ऐसा बहुत कुछ यहाँ देखा, सुना और नज़र आया। जो इधर-उधर के झगड़ों में नजर आया, खान-पान, पेड़-पौधों में पाया। रिस्तों की दरारों में, घरों के फर्शों में, दीवारों में, खिड़कियों में, दरवाजों में, रसोई के बर्तनों में, बिजली के तारों में, खम्भों में, मीटरों में, बिजली के उपकरणों में, जमीनों के सौदों में, घरों-प्लॉटों की बिकवाली में। 

 सब कर तो ये लोग खुद ही रहे हैं। लग तो ऐसे ही रहा है। दिख तो ऐसे ही रहा है। मगर 

मगर -- इस सबका सच कितना है? 

Saturday, May 27, 2023

Writing Machine, Pen Plotter, Drawing Machine

नोट: कहीं से प्रेरित पोस्ट। 

सोचो, अगर आपका लिखने का काम कोई मशीन कर दे, तो?  

जब खुद लिख सकते हैं तो आपको लिखने की मशीन की क्या जरुरत? वो भी पैन से लिखने की मशीन? टाइप करना बहुत नहीं है शायद? हमारी लिखाई जैसा यूँ का यूँ, अगर कोई मशीन लिख दे तो? बहुतों का काम आसान हो जाएगा। नहीं? 

खासकर, छोटे-छोटे स्कूल जाने वाले बच्चों का। आजकल के ये स्कूल, इतना लिखाई का काम दे देते हैं। पहले स्कूल, फिर इत्ता सारा होमवर्क। उफ़! और कोई ऐसा घर में ही पढ़ाने वाला हो, जो थोड़ा-सा भी बच्चे का राइटिंग का होमवर्क करने को मना करदे? उसपे होमवर्क पुरा किये बिना sign करने से भी मना कर दे? तो कोई तो बाहर tution वाला या फ्रेंड ढूंढ़ना पड़ेगा, जो ये काम भी करदे और किसी को बताये भी ना ! नहीं ? 

आसान चीटशीट? और टीचर, उन्हें पता तक नहीं चलता की, राइटिंग थोड़ी अलग है? अब टीचर इतना कहाँ नोटिस करते हैं? वैसे कितने सारे बच्चे या बड़े करते हैं ऐसा? 

Pen Plotter 

Writing Machine 

Or maybe even Drawing Machine ? 

Interesting Technology :) 




ऐसे ही अगर किसी खास विषय का Pressure दिया जाए, तो क्या होगा? वो बच्चा उस Subject से डरने लग जाएगा शायद? 
उसपे इधर-उधर का शॉर्टसर्किटस का डर अलग?     

Friday, May 26, 2023

समाज अपने आप में एक बड़ी लैब है

2021, की इस खास छुट्टी का मतलब था, Official Stress और Unproductive जोन से दूर, अपने हिसाब से लिखना-पढ़ना। अब घर भी ज्यादा आने-जाने लगी थी। कुछ वक्त यहाँ, कुछ वक्त यूनिवर्सिटी कैंपस। यहाँ माँ का घर, कोई खास रहने लायक नहीं है। कभी पड़दादा के वक़्त का है। तो सोचा, अपना एक छोटा सा Writing Zone या कहो Home Office बनाना सही रहेगा। उनके भी थोड़ा बहुत काम आ जाएगा। और शायद कुछ लोगों का भला हो जाएगा। भाभी उसमें अहम् थी। वो खुद शायद अपनी प्राइवेट स्कूल की नौकरी से परेशान थी। और उसे मेरा प्राइमरी स्कूल का विचार पसंद भी आ गया था। मेरे लिए गाँव एक पड़ाव था। मगर कब तक के लिए, ये खास जानकारी नहीं थी। शायद दो तीन-साल? मेरा कहीं रस्ता खुल जाता, तो शायद बाकी के लिए भी आसान होता।  

कुछ महीने सब सही लग रहा था। मगर धीरे-धीरे, जब यहाँ का माहौल और चीज़ें समझ आनी शुरू हुई, तो ये दुनियाँ मेरे लिए काफी हद तक उससे अलग थी, जिसे मैं जानती थी। Politics, Codes, और Cryptic संसार, Campus Crime Series के साथ-साथ यहाँ भी दिखने लगा था। वो भी भलाई में कम, यहाँ की ज्यादातर बुराईयों और नुकसान में ज्यादा। पढ़ाई-लिखाई का दायरा अब बढ़ गया था। या यूँ कहो, समाज अपने आप में एक बड़ी लैब नजर आ रहा था। मेरी Official लैब की जरुरत, जैसे अचानक से खत्म हो गयी थी। इसके सामने वो लैब, समुन्दर में जैसे किसी पानी की एक छोटी सी बूँद की तरह थी। अब दुनियाँ में कहीं भी रहो, ये लैब आपके पास रहेगी।  एक ऐसी लैब, जिसे कोई नहीं छीन सकता। जिसके लिए आपको न ही कोई फाइल चलाने की जरूरत थी और न ही requests की। मगर इस दौरान कुछ और भी शुरू हो गया था। एक खास पार्टी द्वारा मुझे गॉवं से निकालने का अभियान! 

सब साफ़-साफ़ नजर भी आ रहा था और छुपा हुआ भी था। और भी बहुत-सी, छोटी-छोटी मगर खोटी चीज़ें शुरू हो चुकी थी। यूनिवर्सिटी में जो कुछ चल रहा था, वो सब यहाँ भी शुरू हो चुका था। वहां में और यहाँ में एक फर्क ये था, की उस माहौल को मैं जानती-समझती थी। यहाँ बहुत-सी चीज़ों को समझने में ही ज्यादा वक़्त लग रहा था। बहुत-सी बातें या चीज़ें जिस हिसाब से हो रही थी, उनसे साफ़-साफ़ समझ आ रहा था की ये सब अपने आप नहीं हो रहा। बीमारियाँ, उनमें से एक थी। कुछ के कारण भी कुछ हद तक समझ आये। कई में तो तकरीबन पार्लर वाली ट्रिक्स, मगर रोजमर्रा के आम संसाधनों से। बालों के Cases। 

ऐसे ही शायद Vitiligo है। शायद, क्यूंकि अभी कुछ-कुछ समझ आया है।  Bougainville Plants Leaves, Vitiligo like signs, कैंपस हाउस 30, टाइप -4, towards 29 wall. Variegated leaves और Chemicals Abuse?   

कुछ वक़्त के बाद एक छोटी-सी बिल्डिंग का नक्सा भी तैयार हो चुका था। मगर बजट उस हिसाब से नहीं था। मैंने बजट कट करके उसे  Green Sustainable Design में बदल दिया था। अब शायद सही था। थोड़ा अलग भी और शायद उसमें कुछ और करने की संभावनाएं भी थी। 

मगर अचानक से काफी कुछ बदलने लगा था। Case Studies Publishing के चक्कर में उस तरफ मेरा ध्यान ही नहीं गया।  क्या था वो अचानक? अचानक था या मुझे ही अब समझ आने लगा था? 

Wednesday, May 24, 2023

शोषण कितनी तरह से हो सकता है?

शोषण, दमन या दुर्व्यवहार कितनी तरह से हो सकता है?

मार पिटाई  (Physical Attack) ?

मानसिक शोषण (Emotional और Psychological Attack) ? 

आर्थिक या वित्तीय शोषण (Financial Abuse) ?  

 मानवाधिकार उलंघन (Human Rights Violations) ? 

और भी शायद कई तरह का शोषण हो सकता है। 

इनमें मार-पिटाई, सीधा-सीधा दिखाई देता है। दूसरे तरह के शोषणों में सब कुछ इतना सीधा नहीं दीखता। हाँ! दिखाया, या शायद समझाया जा सकता है, कई तरह से।  मगर कई बार उसके दुष्प्रभाव जानलेवा तक हो सकते हैं। 

मानसिक शोषण (Emotional और Psychological Attack)  

आपसे एक अच्छी-खासी SURROUNDING छीन लेना या छीनने की कोशिश करना। ये बच्चों के साथ भी हो सकता है और बड़ों के भी, वो भी उनको भनक लगे बगैर। Kinda छीन ले, झपट ले, मगर सामने वाले को खबर तक न लगने दे। इंसानों को अलग-थलग करना या करने की कोशिश करना। ऐसा करने के पीछे ज्यातातर, सिर्फ सजा देना अहम् नहीं होता। असली मुद्दा अलग-थलग करने के बाद शुरू होता है। शायद हर तरह से खत्म करने की कोशिश। या शायद कुछ और दुष्चक्र रचना। 

बदमाशी, डराना, धमकाना (Bullying) और गैर कानूनी सजा (Lynching) भी मानसिक शोषण का हिस्सा हैं। उलटी-सीधी टिप्पनी करना या उलटे-सीधे इशारे करना। सीधे-सीधे कुछ न कहकर, उलटी-सीधी भाषा में फेंकना। या शायद वो सब समझाने की कोशिश करना, जिसे आप सीधा-सीधा कहने में संकोच करें, खासकर जब ये पता हो की सामने वाला बर्दास्त नहीं करेगा या उल्टा जवाब देगा। क्युंकि, शायद जो आप सीधा-सीधा कह ही नहीं पा रहे, वो सही नहीं है। सीधे लोग, सीधी और स्पस्ट बात करते हैं। ना की उल्टे-सीधे रस्ते, न की उल्टी-सीधी बकवास।     

आर्थिक या वित्तीय शोषण (Financial Abuse) 

जब बाकी सब तरीके फेल हो जाएँ तो ये तरीका काम आता है। या इसे साम, दाम, दंड, भेद वाले बाकी तरीकों के साथ भी प्रयोग में लाते हैं। अगर किसी की वित्तीय स्थिति कमजोर है तो उसका कई तरह से शोषण किया जा सकता है। ज्यादातर शोषणों से बचने के लिए वित्तीय स्तिथि को मजबूत और स्थिर रखना जरूरी होता है। बहुत बार सामने वाले को पता भी नहीं चलता की ऐसा अपने आप नहीं हो रहा, बल्की किया जा रहा है।  

ये मान के चलिए की ज्यादातर शोषण गरीबों के होते हैं। ज़्यादातर, हमेशा नहीं। 

मानवाधिकार उलंघन (Human Rights Violations) 

इसको इसी पोस्ट में निपटा देना इस टॉपिक के साथ न्याय नहीं होगा। 

Tuesday, May 23, 2023

ये राजनितीक पार्टी, वो राजनितीक पार्टी !

ये राजनितीक पार्टी, वो राजनितीक पार्टी! घर, आस-पड़ोस कहाँ गुम गए? 

"हम,आपसे दूसरी पार्टी से हैं।" यहाँ आपके कुछ खास अपनों का आना-जाना है। "I call such people unnecessary outsiders interfere, even up to the level of finishing up that home!"

दूसरी पार्टी? आप मन ही मन सोच रहे हैं। ओह! घरों में राजनितीक पार्टियाँ? तो क्या होगा ऐसे घरों में? मुझे तो लगा था, मैं अपनों के बीच हूँ। यहाँ तो राजनीती के लोग और उनके रचे ताने-बाने, उन्हीं की दी हुयी बीमारियाँ और इज़ाद मौतों में शामिल किरदार रहते हैं। जिन्हें खुद नहीं मालुम, कैसे? 

वही मेरे मामा के लड़के, पी... वाली पार्टी? या दीदी कैप्टेन बोल रहा हूँ -- वाली पार्टी? कितने खासमखास किरदार हैं, इस पार्टी के? लड़कियों की टेस्टिंग का दो-दशक से भी ज्यादा का धंधा है इनका? वो गौरवमयी राणा वाले गान****? या शायद लड़कों से छोटी-मोटी गलतियां हो जाती हैं, वाले संस्कारी लोग? खैर, मन की बातें, मन तक रहें, तो ही अच्छा होता है। नहीं? और फिर तुम्हे यहाँ रहना ही कितना है? बच्चा भी तुम्हारे साथ-साथ निकल जाएगा। या शायद जरूरी होता है, थोड़ा बहुत मन की बात को भी बाहर निकाल देना? शायद कभी-कभी जरूरी हो जाता है? बच्चे को घर से छीनकर एक ऐसे वातावरण में धकेला जा रहा है -- जहाँ सीधे-सिल्की बाल, घुंघराले और भद्दे होने लगते हैं। आइटम नम्बर्स पे बच्चे ठुमके लगाने लगते हैं, और ये मोहतरमा कहती हैं, अर्रे फिरसे से दिखाओ। तुम्हारी बुआ आ गयी, उसे भी दिखाओ ना। हा! हा! हा! हा! हंसी ऐसे लग रही थी, जैसे कोठे पे बैठी, कोई धंधा एजेंट, बच्चों को धंधे में जाने की प्रैक्टिस करवा रही हो। ऐसा डांस नंबर और एक्शन शायद इससे पहले जेल के स्पेशल ट्रिप में देखा था। देखा, ना देखा-सा, हद दर्जे के, सिर दर्द के हालात में। जिस बच्चे को वो ये सब कह रही थी वो तो और भी छोटी है। धीरे-धीरे वहाँ की बातें और व्यवहार जानकार, आप इन बच्चों को घर में ही खेलो या पढ़ो का ज्ञान पेलने लगते हैं। कुएँ के टरटर मेंढकी की तरह, कार वाली लड़कियाँ तो उसके लिए बस अय्याशी का काम करती हैं। लड़के, ऐसे लोगों के लिए गलतियाँ नहीं करते, वो तो lucky होते हैं! झल्लाहट हो रही है? 

"अर्रे! बुआ ने tution के पैसे दिए हैं, आओ पिज़्ज़ा पार्टी करें। हा! हा! हा! हा!" बच्चा किसी बात पे माँ को याद करते लगता है, और आप बोलते हैं -- "उधर देख , बड़ी माँ हैं ना।" क्युंकि वो अपनी दादी और छोटी दादी को भी प्यार में माँ ही बुलाती है। और ये चुड़ैल बोलती है --"म...., माँ ! हा! हा! हा! हा!"  थोड़े से ही वक़त में ऐसे जाहिल-गवाँर लोग, सिर के ऊपर से उतरने लगते हैं। वो आपको ये बताने की कोशिश करने लगते हैं की आपके अपने घर में आपकी औकात क्या है और उसकी क्या! और उस जाहिल को ये तक नहीं पता होता की कुछ वस्तुएँ जो आज आपके पास आयी हुयी हैं, एक बार पता कर वो कहाँ से, कैसे, किसके लिए और किस अवसर पे आयी थी। हाँ! बच्चा जरूर कभी-कभार ऐसा कुछ गाने लगता है, वो भी डरा सहमा-सा। पर शायद सब गाना अच्छा नहीं होता। कुछ जगहों और लोगों से चुपचाप दुर खिसक लेना अच्छा होता है। नहीं तो आप अपना अच्छा कुछ दे पाएं या न, ऐसी छोटी-छोटी, मगर खोटी बकबक जरूर आपको अपने जाले में लेने लगती हैं।    

वहाँ के खेलों का जिक्र शायद मैं पहले ही कर चुकी, किसी पोस्ट में। नंगी-पुंगी गुड़ियाओं के खेल, पार्लर-पार्लर। बच्चों की असली ज़िंदगी में असर? पढ़ते-पढ़ते भी आइटम्स नंबर वाले ठुमके, चलते-फिरते भी बम पे मारना और भी बहुत कुछ ऐसा ही। बालों पे अलग-अलग तरह की चोटियाँ बनाने के प्रयोग। और भी ऐसा ही बहुत कुछ। सोचने की बात है की बच्चे वहाँ पढ़ते क्या होंगे? शायद यही की tution से KVS की नौकरी पाने का रस्ता क्या है ? या मैथ्स में कोई specific position कैसे आएगी? या शायद, ऐसे माहौल में बच्चों के सपने होंगे Dance Reality Show में पार्टिसिपेट करना, वो भी हद दर्जे के बेहुदा गानो और एक्शन्स के साथ? फिर मन में कहीं ये ख्याल भी आता है, की आप कुछ ज्यादा नहीं सोच रहे? 

मगर शायद ये सब समझना भी जरूरी है, इन जालों- जंजालों को समझने के लिए? इस घर और आसपास में हुए कुछ हादसों को समझने के लिए? गवाँरपठे, इतनी छोटी-छोटी चीज़ों को कहाँ समझ पाएंगे? वो तो इसके अगले पायदान को भी नहीं समझते?

गाली-गलौच, मारपीट! ये इसके आगे के खेल हैं। कुछ बच्चों के ऐसे माहौल में बात-बात में डायलाग ही इस तरह के होते हैं, "छीन ले, झपट ले, मार दे, पीट दे, फिर भी ना मिले तो रगड़ दे" चकराइये मत! और क्या सिखाएगा ऐसा माहौल? 

ये कोई मनघडंत कहानी नहीं है, हकीकत बता रही हूँ। आँखों देखी, कानो सुनी, अपनी सामने कही हुयी या हुई। पीछे शायद किसी पोस्ट में बच्चोँ के मार-पिटाई के खेल भी बताये होंगे? कहाँ से आता है, ये सब? सीधी-सी बात, आसपास के ही वातावरण से। यही वातावरण, यहाँ पे बहुत-सी ज़िंदगियाँ खा जाता है -- वक़त से पहले। खासकर, औरतों की और कमजोर तबकों की। बहुत से ऐसे लोगों की ज़िंदगियाँ, यहाँ इन्हीं वजहों से बेहाल हैं। खासकर, औरतों की। ये वजहें, ना सिर्फ घर का माहौल बिगाड़ती हैं, बल्कि अलग-अलग तरह की बीमारियाँ भी लाती हैं। और अस्पताल भी पहुंचाती है। यही कारण, बहुत सी मौतों के ज़िम्मेदार भी हैं। बहुत मुश्किल नहीं है, शायद इस ताने-बाने को समझना? खासकर, जब आपको उस जगह रहने का मौका मिले। और आप खुद उन सबका शिकार होने लग जाएँ। अब ऐसी पार्टियाँ, ऐसे माहौल में आग में घी का काम करती हैं। उन्हें बार-बार कहने के बावजूद, की मेरे घर से दूर रहो, या इस बच्चे से दूर रहो, भद्दे, बेहूदा, बेशर्मों की तरह, और ज्यादा घुसती जाती हैं। कौन घुसा रहा है उन्हें? ये जानना शायद ज्यादा अहम् है? और क्यों? ये शायद, उससे भी ज्यादा अहम् है? क्या ऐसे इंसानों के हवाले किसी बच्चे को किया जा सकता है? वो फिर चाहे कोई भी क्यों ना हो। 

अब कल की ही तो बात है। क्या हुआ है? कुछ नहीं। यहाँ पे ये सब छोटी-मोटी बातें है। ऐसी शुरुआत के बाद, इस समानान्तर केस की घड़ाई का अगला स्टेप क्या है? ऐसा ही कुछ हादसा, जो पीछे हुआ है? आग लगाने वाले वहां क्या कारण थे? या कौन लोग थे? अब कौन हैं? जब कहीं मार-पिटाई हो रही हो, तो सिर्फ ये सुनकर पीछे हटा जा सकता है, की ये हमारा घर का मामला है? या ऐसे मामले पुलिस के मामले होते हैं? और उन्हें जितना जल्दी रोका जाए, उतना ही बेहतर होता है? शायद कोई बड़े हादसे बचाये जा सकें?

और शायद उससे भी ज्यादा अहम् है, ऐसे लोगों से संवाद। ऐसे माहौल में बदलाव की कोशिश। क्युंकि, यहाँ तो ये यूँ लगता है, घर-घर की कहानी है। और उसपे भद्दी, बेहुदा, गवाँर जुबाने -- "मर्द-मानस ते मार-ए दिया करें! " शायद कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे, "लड़कों से छोटी-मोटी गलती हो जाती हैं?" और कौन-कौन भुग्गते हैं, उन गलतियों के परिणाम? पुरा घर, आसपड़ोस, मोहल्ला और सारा समाज? नहीं?                         

जब ऑफिस में मार-पिटाई हो और सुनने को मिले, की ये तो Domestic Violence है
तो अगर घर पे या उस घर के आसपास ऐसा कुछ हो, तो उसे, ये तो office Violence का नाम दिया जा सकता है? क्यों नहीं? 
Universities समाज को राह दिखाती हैं, आगे लेके जाती हैं। दिखा तो रही हैं? आगे लेके तो जा रही हैं? ये वही तो समाज है, जिसको भद्र, पढ़ा-लिखा समाज बना रहा है? आगे का रास्ता दिखा रहा है? कहीं खुनी-रस्ता तो नहीं दिखा रहे, ये शिक्षा के महान पायदान? इनमें यूनिवर्सिटीज ही नहीं, बल्कि उस पढ़े लिखे समाज का हर तबका शामिल है। वो फिर चाहे डॉक्टर हों, वैज्ञानिक हों, या कोई और इंटेलिजेंस विंग्स -- फ़ौज या सिविल।    
ये शायद उन लोगों के लिए खासकर है, जिन्हें लगता है की गलत हो रहा है। या बहुत कुछ हुआ है। वो, जो नहीं होना चाहिए था। वो जिसे बचाया जा सकता था, पर नहीं बचा सके -- शायद बहुत सी ज़िंदगियाँ। बहुत से घर, जो उजड़ गए या उजाड़ दिए गए, इन्ही राजनितिक ताने-बानो ने। कुछ पढ़े-लिखे दबुओं की ख़ामोशी की वजहों से, या ऐसे तानेबानों के साथ होने की वजहों से? वो जो ज़ुबाँ से जैसे कहर उड़ेलते हों, और इशारों में हाथ जोड़ते हों? जिन्हें पता तो सब है। क्या हुआ है, क्यों हुआ है। किसके लिए या कैसे हुआ है। किसके इशारों पे या चालों पे हुआ है। तो ऐसे लोगों को समाधान नहीं मालुम क्या?     

Friday, May 12, 2023

अन्धविश्वास, अज्ञानता, अंधभक्ति और --

अन्धविश्वास, अज्ञानता, अंधभक्ति और उसपे तड़का लगा हो राजनीति का, लोभ का, लालच का? 

Automation, Semiautomation and Enforced or the other way?

Can micromanagement create all this and makes humans robots to exploit different ways?

When we talk about superstition then generally keep illeterate people in mind. Though at times, it can be the other way.

अन्धविश्वास अज्ञानता है और अज्ञानता अन्धविश्वास। अंधभक्ति भी इन्हीं का मिश्रण है। 

सुना होगा कहीं, "माता धोकन जावां सां, माता निकल री सै" और आपने सोचा होगा शायद, की आज के वक़्त भी लोग इन सब में विश्वास रखते हैं?

या "पीलिया निकल आया, ना पीला देखना, ना पहनना, ना खाना"। और शायद आपने सोचा होगा, ये कौन सी दुनिया में आ गए?

और भी बहुत कुछ ऐसा ही। 

Then there is another world, comparatively new knowledge. The way they mix things and create complexities for the exploitation of common people, are some of cruelest ways. They are neither illiterate nor lilbit educated. Who are these people? What are they doing?

Docs, Scientists, Profs and so many other field experts, especially ones who are brains of different parties. They process things from higher level and different parties people micromanage them up to that last level.

2016, H#16, Type-3, कोई आम (दुशहैरी) के पेड़ पे ढेर सारा कच्चा सुत का धागा लपेट गया, पीछे वाले लॉन में। और आप सोच रहे हैं, कैसे-कैसे गँवारपट्ठे हैं यूनिवर्सिटी में भी! उसके पीछे के जुर्म की कहानी थोड़ा लेट समझ आयी।  

माता धोकन जावां सां, माता निकल री सै और पढ़े लिखे भेड़ियों के जाले बच्चों तक को नहीं बख्सते। 

पीलिया निकल आया, ना पीला देखना, ना पहनना, ना खाना ?

ऐसे-ऐसे कितने ही अंधविश्वासों के पीछे छुपे जुर्म की कहानियों (Scientific Way of Exploitation by abusing knowledge and exploiting illiterate, semi illiterate people via faith or religion) को कैसे समझाया जाए? शायद ये सब ज़्यादा जरूरी है।  

कम पढ़े-लिखे लोगों को अपने जाल में फसाना एक बात है। मगर पढ़े-लिखे लोगों का भी पत्ता काट देना, वो भी जब, जब ये सब करने वाले पढ़े-लिखे (भेड़िये)--?, कितने ही लोगों के Surveillance Radar पर हों? 

कुरकुरमुत्ते की तरह उगे हुए हॉस्पिटल्स। जहाँ हर बीमारी बढ़ाई जा सकती है, बनाई जा सकती है -- सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ पैसों के लिए। ये कहानियाँ हैं, कैंसर से लेकर, लकवे तक के अनोखे इज्जादों की। मलेरिआ, डेंगू, BP, Heart Attacks से लेकर, हर उस बीमारी तक, जो आप सोच, समझ और जान सकते हैं, या जानते हैं। 

मगर हॉस्पिटल्स तो आप बाद में जाते हैं। उससे पहले भी बहुत कुछ है, जो आपको वहाँ तक पहुंचाता है। क्या है वो सब? कैसे समझा और बचा जा सकता है, इन सबसे? और कैसे बचाया जा सकता है, आम आदमी को, जिसकी समझ में अन्धविश्वास ज़्यादा फलते-फुलते हैं?     

इसके लिए इनके जानकारों को, वो फिर चाहे डॉक्टर्स, वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स या संचार माध्यम से जुड़े लोगों को अपने आसपास के ऐसे इलाकों में ज़्यादा संवाद और प्रचार की जरूरत है। खासकर उनको, जिन्हें पैसे से ज़्यादा अपने प्रोफेशन से लगाव है।