About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Friday, June 30, 2023

दिमाग है तो सब है

दिमाग है तो सब है। दिमाग ही तो सब है। 

दिमाग तो सबके पास है। नहीं? हाँ! लेकिन कौन कितना प्रयोग करता है, ये भी तो है। आप शरीर को स्वस्थ रखने के लिए क्या-क्या करते हैं? खासकर बाहरी शरीर को? रोज नहाते-धोते हैं ? ब्रश करते हैं ? जरूरत पड़ने पे नाखुन भी काटते हैं। कसरत करते हैं ? व्याम करते हैं? टहलते हैं या सुबह-श्याम घुमते-फिरते हैं? तैरते हैं? साइकिल चलाते हैं? योगा करते हैं? ध्यान लगाते हैं? और भी कुछ न कुछ तो करते ही होंगे? इन सबमें ज्यादातर बाहरी सफाई है। कुछ में थोड़ी बहुत अंदर की भी होगी शायद?

दिमाग के लिए क्या करते हैं? इस शरीर और ज़िंदगी को पटरी पे रखने के लिए उसका स्वस्थ होना अहम् है। शायद कुछ खास नहीं? या शायद ध्यान लगाना, जैसा भी, जिस किसी तरह का आपके यहाँ होता है? ज्योत-बत्ती करना? मंदिर जाना, भगवान का नाम लेना? भजन या भक्ति-संगीत सुनना? कभी आपने सोचा की वो सब आप क्यों कर रहे हैं? क्या मिलता है उस सबसे? सबसे बड़ी बात, किस तरह का सुन रहे हैं? बाबे, संत-महंत, महाराज तो नहीं पाल रहे? जो न सिर्फ अपनों से दुर करने का काम करते हैं, बल्की संसार से ही मुक्ति दिलाने की तरफ बढ़ा रहे हों? लगता है बहुत परेशान हैं, अपने आसपास से? या अपने जीवन से? ऐसे-ऐसे बाबे तभी सुहाते हैं। या शायद जबरदस्ती भी थोंपे जा सकते हैं? हालात इतने बुरे न हों मगर बनाने या घड़ने की कोशिशें जरूर हों। मगर कौन चाहेगा किसी का बुरा? और क्यों? सोचिए?

इनसे बचने के लिए दिमाग को तंदरुस्त रखना जरूरी है। वो काम, सिर्फ ज्योतबत्ती, ध्यान, भजन-संगीत, पूजापाठ या मंदिर जाने से नहीं हो सकता। दिमाग को समझने से हो सकता है शायद। इसकी मरमत या रख-रखाव कैसे होगा, उसे जानने से हो सकता है।   

मानो दिमाग कम्प्युटर का एक हिस्सा है। कम्प्युटर मानव शरीर है। इसमें कुछ फाइल्स बना के डाल दी गयी हैं। वो कम्प्युटर क्या-क्या कर सकता है, ये इस पर निर्भर करता है की उन फाइल्स में क्या-क्या है। जिन्हें वो फाइल्स पढ़नी या समझनी आती हैं वो उस कम्प्युटर का जानकार है। उन फाइल्स में बदलाव करके उस कम्प्युटर को अपने अनुसार प्रभावित कर सकता है या चला सकता है। दुर बैठा भी, ऐसे -- जैसे उसके सामने बैठा हो। जिसके पास कम्प्युटर हो, हो सकता है उसे उस कम्प्युटर की उतनी जानकारी न भी हो। मगर वो दुर बैठा computer expert वो सब कर सकता है जो आप नहीं कर सकते। कैसे ? जिन्हें कम्प्युटर का थोड़ा बहुत ज्ञान है वो तो समझ गया। जिसे नहीं है उनके लिए कुछ उदाहरण लेने पड़ेंगे। हम सबके आसपास ऐसे-ऐसे कितने ही उदाहरण मिल जाएंगे। आते हैं इस विषय पर अगली पोस्ट में।            

Tuesday, June 27, 2023

तकनीकी संसार (दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)

 तकनीकी संसार, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (Delhi & NCR)

अगर हमें दुनियाँ को समझना है, तो उसे समझना अपने आसपास से ही शुरू करना चाहिए। वो सारा ज्ञान आपको आसपास के पर्यटन स्थलों में, उनके आसपास की इमारतों में, और उन सबमें छिपे गूढ़ (गुप्त) ज्ञान में मिलेगा। अगर आप दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र या इसके आसपास हैं तो इतना कुछ इस क्षेत्र में और इसके आसपास है, जो शायद पास होते हुए आपने न देखा हो। अगर देखा भी हो तो शायद वैसे न समझा हो, जैसे वो अपने साथ लिए रहस्यों में है। रोहतक से ही शुरू करें?

एक छोटा सा शहर, हालाँकि जनसँख्या और आसपास के इलाकों को मिलाकर बना रोहतक, इतना छोटा भी नहीं। इतिहास के हिसाब से पुराने वक़्त से ही काफी कुछ समेटे हुए है, अपने आप में। चलो उस इतिहास में कुछ नया देखते हैं। वो नया, वैसे तो यहाँ की यूनिवर्सिटीज में, अपने-आप में काफी कुछ समाये हुए है, मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से आम पर्यटक किसी भी पर्यटन स्थल को देखता है। तो चलो यहाँ के एक पर्यटक स्थल पे ही चलते हैं। और देखते हैं की आम पर्यटक उसे कैसे देखता है? 

तिलयार झील, रोहतक (Laser Light Show)

सोचिये, महर्षि दयांनंद यूनिवर्सिटी या स्वास्थ्य विज्ञान यूनिवर्सिटी, रोहतक से इसका क्या लेना-देना हो सकता है? मैंने ये Light-show पहली बार 2010 में सिंगापुर के सेंटोसा आइलैंड पर देखा था। तबसे अबतक काफी कुछ बदल चुका है। लगता है, एक बार फिर से देखना चाहिए।   


Songs of The Sea 


तिलयार का ये show उस वक़्त के MP Deepender Hooda का रोहतक को तोहफा है शायद? 
चलता भी है ये? या सफेद हाथी हो चुका? 


अपने बच्चों को जहाँ कहीं भी घुमाने ले जाएँ, सिर्फ पुरानी इमारतें न दिखाएं। थोड़ा बहुत उनके पीछे छिपे ज्ञान-विज्ञान से भी अवगत कराएं।  नहीं तो वो भूत-प्रेतों या माता निकल आई, जैसे भरमों और अन्धविश्वाशों में ही उलझे रहेंगे। 

अगर आप किसी भी तरह की आस्था रखते हैं या भगवान को मानते हैं, तो भी, अंधविस्वासों  से बाहर निकल कर, तकनीकों से रचे गए जालों और उनके आमजन पर प्रभावों को जानने के लिए, नए युग के धार्मिक स्थानों की सैर करें। ये धार्मिक स्थल, न सिर्फ वक़्त के साथ ताल मिलाते नज़र आते हैं, बल्की भव्य हैं और साफ़ सुथरे भी। चारों तरफ विज्ञान से औत-प्रोत, पुराने मंदिर-मस्जिदों से, अलग तरह की कहानियाँ गाते हुए।  

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र या इसके आसपास ही ऐसे कई पर्यटन स्थल हैं। खासकर जो पिछले एक-दो दशक में ही बने हैं। कौन-कौन से ध्यान आ रहे हैं आपको? जानते हैं आगे की किसी और पोस्ट में।  

Thursday, June 15, 2023

राजनीतिक-रंगमंच

राजनीतिक-रंगमंच -- जिधर देखो उधर नजर आये। 

ये दुनिया एक रंगमंच है, और सबको अपना किरदार निभाकर जाना है। सुना, सुना-सा लग रहा है ना कहीं? अपना किरदार निभाकर तो जाना है। मगर, वो किरदार कितना आप खुद निभा रहे हैं और कितना आपसे निभवाया जा रहा है? आइए जानते हैं इस राजनीतिक मंच के बारे में -- थोड़ा बहुत जितना मुझे समझ आया। 

आप टीवी या फोन या लैपटॉप पे जो ख़बरें देखते हैं ना, वो ज्यादातर राजनीतिक रंगमंच है। आपके आसपास उन खबरों से जुड़ा, जो कोई अहम् धरना या प्रदर्शन चल रहा है, वो भी राजनीतिक रंगमंच है। उसमें आम आदमी की समस्याएं, इसी राजनीतिक रंगमंच की देन होती हैं जो उसे सुलझाने के नाम पर आज दुसरी तरह का राजनीतिक रंगमंच पेश कर रहा है। जो समाज जितना ज्यादा सरकारों पे निर्भर है या राजनीतिक पार्टियों पे निर्भर है, वो उतना ही ज्यादा गरीब और पिछड़ा है? क्युंकि, बाकी या तो ये सरकारें चला रहा होता है या कहीं न कहीं स्टेकहोल्डर होता है। इस निर्भरता को कम करके आगे बढ़ने के रस्ते किसी और पोस्ट में। 

अभी चलो रंगमंच पे चलते हैं --

आज की ताजा खबर? Breaking News? भूकंप आ गया? बाढ़ आ गयी? तूफ़ान आ गया? आग लग गयी? किसानों का धरना? या शायद मणिपुर हिंसा। इंटरनेट बंद ?

BIPA R JOY -- यूँ लग रहा है सागर में जैसे कहीं आम दिनों की तरह ही आम-सी लहरें हैं। मगर Animated-World ने जाने क्या से क्या बना दिया है। हौवा जैसे कोई? आम-आदमी दहशत में और मीडिया कुटे पैसे! है ना मजेदार? कोरोना भी कुछ-कुछ ऐसा ही था। मीडिया के इस जहाँ में सबकुछ ऐसा ही होता है क्या? जानकारी लेना चाहते हो तो कई जगह वो ज्ञान-विज्ञान भी मिल जाएगा। मगर गुप्त कोड में।   

चलो आप कोड ढूंढो। मुझे तो सागर के नाम से कुछ गाने याद आ रहे हैं --बचपन में सुने होंगे कभी। जैसे ? 

ये सब cryptic है। मतलब गुप्त कोड हैं। अब अलग-अलग चैनल, इनपे अपनी-अपनी, अलग-अलग तरह की स्क्रिप्ट पे काम करते हैं। 

कौन-कौन से चैनल कौन, कौन-सी पार्टी के हैं? ये आप उन पर चल रही खबरों से पता कर सकते हैं, अगर इस गुप्त ज्ञान और पटकथा (scripted) को समझ पाएं। नहीं तो गूगल बाबा या कोई और सर्च इंजन भी बता देगा। इन गुप्त पटकथाओं में कभी-कभी आपको ज्ञान भी मिल सकता है और विज्ञान भी। बाकी मिर्च-मसाला, बढ़ा-चढ़ा कर, तोड़-मरोड़ कर पेश करना तो ज्यादातर चैनल को चलाने के लिए ऐसा लगता है, जैसे पत्रकारिता का धर्म हो? 

राजनीतिक रंगमंच का एक उदहारण पीछे PPF ना निकालने देना या उसपे ड्रामे दिखाना, आप पहले वाली पोस्ट्स में पढ़ सकते हैं। वो राजनीतिक रंगमंच दिल्ली के CM और LG के बीच जैसे कोई फुटबॉल खेल रहा है। कहाँ की फाइल्स, किसका PPF, कहाँ के बैंक, कहाँ की mail या जाने male और कहाँ के सरकारी बाबु? घपलम-घपला प्रेजेंटेशन की So Sorry Script । अब आम आदमी को ये सब कैसे समझ आए?

कुछ-कुछ वैसा ही है ये किसान आंदोलन। जानते हैं अगली पोस्ट में इसके बारे में भी। 

Joke :

एक बै एक अंडी बोला, अक आलिया को यही नहीं पता PM कौन है?

जो पढ़ रहा था वो बोला, की आलिया को ये पता है की आलिया कौन है? 

बोले तो कुछ भी? ईब घणा नै हांसी ना आयी होगी :)  मदीना मैं बैठके हांसी क्युकर आ जागी बावले, वा ते महम तै भी आगै बताई।  

संस्कृति

कभी-कभी कुछ बातों पे यही नहीं समझ आता की दुख प्रकट किया जाए या गुस्सा ? हंसी या गम? 

जब युनिवर्सिटी छोड़, गावँ की तरफ रूख किया तो कई जगह से सलाह आ रही थी, की सोच-समझ के निर्णय लेना। संघर्ष तो हर जगह होगा। मगर किस तरह का और कितना तुम झेल सकते होऔर कितना उस माहौल में तुम्हे समर्थन करने वाले होंगे, इस पर जरूर गौर कर लेना। बहुत से और भी हैं जो वो संघर्ष चुपचाप झेल रहे हैं। तुम कम से कम वो भड़ास तो निकाल पा रहे हो, चाहे आम-आदमी को जागरूक करने के मकसद के माधयम से ही। बहुतों के पास शायद न इतनी हिम्मत है और न ही ऐसा कोई साधन, शायद। 

एक माहौल में अगर जुर्म होता है तो उसके खिलाफ बोलने वाले होते हैं। और जिसके साथ जुर्म होता है, उसके समर्थन में खड़े होने वाले भी होंगे। दूसरी जगह शायद उल्टा ही हो। समझ भी आ रहा था की ये किस तरह की सोच की तरफ इशारा था। मगर मैंने कौन-सा ज़िन्दगी भर ऐसे माहौल में रहने का निर्णय लिया था। शायद उस वक़्त कोई और रस्ता भी नहीं था। या शायद मैंने किसी और तरफ देखा ही नहीं, रस्ते तो बहुत थे। और शायद बेहतर भी? या शायद, जो लिखाई-पढ़ाई मैं कर रही थी, उस हिसाब से ये जगह जानी-पहचानी और आसान थी।   

हर संस्कृति के अच्छे और बुरे पहलु होते हैं, वैसे ही, जैसे हर इंसान के। कोई भी संस्कृति जड़ नहीं है। वो समय और सहुलियतों के हिसाब से बनती-बदलती रहती है। और होना भी चाहिए। जो कुछ समय के अनुसार नहीं बदलता, वो या तो खड़े पानी की तरह, सड़ांध मारने लगता है या ख़त्म हो जाता है। जैसे इंसान रोज ना नहाये-धोये, घर-आसपास को साफ़ ना रखे, तो वो किसी कुरड़ जैसा हो जाएगा। जहाँ सड़ांध ही सड़ांध होती है। जैसे नदिया-झरनो का पानी लगातार बहता रहता है, तो साफ़ होता है। जोहड़, झीलों, मटकों का पानी, अगर वक़्त-वक़्त पर साफ़ करके, फिर से ना भरा जाए, तो सड़ने लगता है। संस्कृति भी वैसे ही है। संस्कृति इंसानो से है, इंसान संस्कृति से नहीं। जैसे-जैसे इंसान की समझ, जरूरते और रहन-सहन के तरीके वक़्त के साथ-साथ बदलते जाते हैं, वैसे-वैसे ही वो संस्कृति में घुलते-मिलते जाते हैं। 

मुझे याद है, जब 2005 में मेरे छोटे भाई और कुछ और बच्चों ने आसपास लव-मैरिज की थी तो हंगामे और आसपास टिपण्णियाँ किस तरह की थी। बड़े भाई (cousin) ने तो दोनों को स्कूल से ही निकाल दिया था, वो भी अच्छा-खासा धमकाकर। उस वक़्त, भाई-भाभी दोनों उस स्कूल में काम करते थे। साथ वालों को तो जो सुनने को मिला था, सो अलग। उनकी बेइज्जती हो गयी थी शायद? या शिक्षा नामक स्कूली-धंधे पर किसी तरह का असर पड़ने के प्रभावों की वजह से? मतलब स्कूली-धंधे की वजह से कोई cousin अपने ही भाई को बस्ते और आगे बढ़ते नहीं देख सकता था? कैसे रिश्ते थे ये, जो उसके बाद वैसे कभी नहीं हुए। मगर शायद उधर का भी एक पक्ष हो। जिस तरह से इधर-उधर से पैसे इक्क्ठे कर और अपने जेवर तक देकर, बड़ी भाभी ने उस स्कूल की नीँव रखवाई थी। हालाँकि, वक़्त के साथ-साथ, उस स्कूल के भी हिस्से और हिसाब-किताब, घरों जैसे से हो चले थे। वही स्कूल और उसके आसपास घुमती राजनीति, उस लड़की को ही खा गयी, जो अपरिपक्कव किशोरी, इस घर में एक बहु बनकर आयी थी। मगर आज वो इतनी बड़ी हो गयी थी की उस स्कूल के साथ वाली जमीन पे अपना खुद का स्कूल खोलने चली थी? अब भाइयों की जमीनें भी तो आसपास ही होती हैं। अक्सर डौले से डौले मिलते हैं। जैसे घर की छतों से छत। कई केसों में तो घरों के आधे-आधे हिस्से ऐसे होते हैं, जैसे एक-दूसरे का प्रतिबिम्ब। कुछ-कुछ ऐसे, जैसे राजनीतिक-रंगमंच, संस्कृति, प्यार-जुर्म, लठ-गोली, रार-तकरार के बीच, डर और डरावे भी। शोध-प्रतिशोध, अहम्-अहंकार और उसपे भाईचारा भी। कुछ-कुछ, रामायण और महाभारत जैसा-सा? संस्कृति और संगीत जैसे, अपने आप में कितना कुछ गाता-सा? 


आज गांवों में भी उस तरह की टिक्का-टिपण्णियों का उतना असर नहीं रह गया है। जब मेरा या मेरी तरह कुछ और लड़कियों का पहनावा जींस-शर्ट हुआ तो वो कुछ एक अपवाद थे। आज ज्यादातर घरों में वो कोई वाद-विवाद या तकरार का विषय ही नहीं है। पहले गाँवों में शॉर्ट्स नाम का कोई पहनावा नहीं होता था। कोई डाले दिख भी जाता तो कच्छाधारी बोलकर जलील किया था। आजकल शायद उतना टिक्का-टिपण्णी नहीं रह गयी है। हाँ, औरतों के लिए कुछ-कुछ ऐसे घरों में, अभी तक भी घुंघट तक नहीं गया है। ये अपने भाई-भतीजा लोगों के लिए सोचने का विषय होना चाहिए, या नहीं पता नहीं ? सुना है so-called हिन्दुओं में पर्दा-प्रथा नहीं थी। मुस्लिम आये तो हिन्दू औरतों को उठाने लगे। हिन्दू मर्दों से अपनी बहन-बेटियों की रक्षा ना हो पायी तो उन्हें घुन्घट पकड़ा दिए। क्यों भाई-भतीजा लोगो, आज भी ऐसा ही है क्या?

पहले के हिन्दु घरों में जनाना-मर्दाना, अलग-अलग होते थे। कोई जनाना की तरफ जाता भी, तो खाँस के, या किसी का नाम बोलकर, ये बताने के लिए की वो उधर आ रहें हैं। अब बैडरूम-बाथरूमों तक विशेष तरह के कैमरे (camera)  फिट कर, औरतों के विरोध के बावजूद एक्सपेरिमेंट हो रहें हैं? ये कौन-सी संस्कृति है? ऐसा करने वालों के चरित्र कहाँ हैं? ये तो ऐसे नहीं लग रहा की संस्कृति को कुछ राजनीतिक गुंडों ने, अपनी सहुलियत के हिसाब से, अपने कांडों पे परदे डालने के लिए, खुद को बचाने का हथियार बना लिया है? आपको क्या लगता है?   

 चरित्र प्रमाण-पत्र 

इस माहौल में प्यार के किसी भी तरह के इजहार के लिए, आपको न सिर्फ खास तरह की और खास लोगों से अनुमति चाहिए, बल्की चरित्र प्रमाण पत्र भी चाहिए, शायद। लगता है, हरियाणा या हरियाणा जैसे किसी सरकारी स्कूल में प्रवेश कर चुके हैं आप या शायद छोड़ के कहीं और जा रहे हैं? मगर लठैत लोगों को न किसी की कहीं से अनुमति चाहिए और न ही किसी तरह का चरित्र प्रमाण पत्र? वो तो मर्दानगी की निशानी है शायद? उस सबकी वजह से न घर-मौहल्ले का वातावरण खराब होता? न वो सब बिमारियों की वजह होता? न बच्चों पे कोई बुरा असर पड़ता? और शांति या भाईचारा तो कहीं का भंग नहीं होता? आखिर हमारी संस्कृति का हिस्सा है ना ये सब तो?       

पहले हुक्का बैठक तक ही होता था। अब तो वो कहीं भी जा सकता है। बैठकों के बाहर, चबूतरों की शोभा या so-called जनाना तक में। बच्चों या औरतों तक वो धुएँ के गुब्बारे जा रहे हों, ये परवाह तक ना किए बैगर। सुना है, पहले हिन्दुओं में स्वयंवर प्रथा थी? सुना है, देखा थोड़े ही है। आजकल उसकी जगह थोंपो-प्रथा ने अपनी जगह बना ली है क्या? ये एक, दो, तीन, चार जैसा एक्सपेरिमेंटेशन तो ऐसी ही किसी प्रथा का हिस्सा हो सकता है। सुना है, पहले विवाह होते थे, लड़कियों से पुछकर। अब कोई गंधर्व-विवाह के नाम पे टुच्चागिरि-एक्सपेरिमेंटेशन और विडियो मार्केटिंग (Women Trading) ने ले ली है क्या? क्या ऐसी औरतों के कोई अधिकार हैं आपकी इस महान संस्कृति में ? सुप्रीम कोर्ट बता सके शायद? या वो भी कुत्ते-बिल्ली के खेलों में वयस्त है? इंसानों की फ़िक्र करने या उन्हें न्याय देने कोई और आएगा शायद।     

संस्कृति के नाम पे बहुत कुछ घिनौना और विकृत है। खासकर, जब किसी संस्कृति के नाम पे राजनीती होने लगे, तब। राजनीतिक-रंगमंच (Political Theatres) के बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट हैं, दुनियाभर की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज में। भारत में वो अभी पिछले दशक या कुछ सालों में ही शुरू हुआ है, शायद?  क्या संस्कृति को हम राजनीतिक रंगमंच से देख सकते हैं? या राजनितिक-रंगमंच और संस्कृति अलग-अलग विषय हैं? दोनों को एक करना मतलब, गुड़ का गोबर करना। 

क्या हो अगर राजनितिक-रंगमंच, आम-आदमी की ज़िंदगी का अहम् हिस्सा हो जाएँ?  जानते हैं, अगली किन्ही पोस्ट्स में। 

Tuesday, June 13, 2023

कहाँ हो? ये क्या चल रहा है?

कुछ समझ आए तो मुझे भी बताना। मेरी एक, दो, तीन, चार वालों में ना कभी रुची थी, ना है और ना होने वाली। हाँ। जितना ज्यादा, इस वाले जुए को जानना या समझना शुरू किया है, उतनी ही ज्यादा इससे नफरत जरूर होने लगी है। और इसके दुस्प्रभावों को जानने की उत्सुकता भी। खासकर, जबसे बेहुदा और घिनौने लोगों का लूट, कूट, पीट और खदेड़ बाहर कर का, हर जगह तमाशा समझ आना शुरू हुआ। वो चाहे क्लास में रहा हो, लैब्स में रहा हो। मिटिंग्स में रहा हो। पत्राचार या इमेल्स में रहा हो। रोड पे रहा हो। बाजार में रहा हो। कैंपस घर में रहा हो या अड़ोस-पड़ोस में रहा हो। ऑनलाइन रहा हो। गूगल सर्च में या किसी और सर्च इंजन में रहा हो। यूट्यूब पे रहा हो। इधर-उधर के सोशल मीडिया पे रहा हो। नेशनल या इंटरनेशनल मीडिया में रहा हो। गवर्नमेंट्स या नॉन गवर्नमेंट्स की websites पे रहा हो। 

इन्हीं सब ने शायद मुझे इंटरनेशनल organizations और उनकी websites पे घुमाया। शायद ये जानने के लिए की यहाँ से निकल भी गए तो आगे क्या होगा? क्या चल रहा है वहाँ? कहाँ जाया जा सकता है? स्तर अलग-अलग हैं। किस स्तर को झेलने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी? और कहाँ इस सबसे निकलके आगे बढ़ने के भी अवसर होंगे? और यही खोजते-खोजते, पता नहीं कहाँ-कहाँ पहुँच गई और क्या-क्या पढ़ा या थोड़ा बहुत समझ आया। उसके साथ ये भी, की ये मोदी क्यों उड़ रहा है और ये राहुल गाँधी? ये प्रोग्राम अचानक होते हैं क्या? पढ़ा, यहाँ-वहाँ थोड़ा बहुत कहीं। अब हकीकत तो जानकार ही बेहतर बता पाएंगे।   

हर जगह Grey एरिया नहीं है। कहीं नारंगी है -- जैसे UF, USA? कहीं हरा है, कहीं पीला है, कहीं काला है, कहीं नीला है। तो फिर कहीं सफेद भी है, जैसे Nordic Region? और कहीं न कहीं, उन सबके programms, सिलेबस और रिसर्च भी उसी विचारधारा से, शायद, कुछ न कुछ मिलता जुलता-सा लगता है? कोड जैसे? जैसे मीडिया स्टडीज़ या रिसर्च की ही बात करें तो Screen Media या Smoke Screen कहाँ है ? Digital Communication?  कहाँ whiteboard specility हैं और कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे तारों के जंजाल भी? फाइबर फिल्टर्स कहाँ हैं और रेडिओ या टीवी कहाँ?  AI on focus and related? और IOT का लोटा कहाँ-कहाँ रखा हुआ है? लैब 4 स्पेशल जोन में क्या है? 1, 2, 3 etc. में क्या और कहाँ-कहाँ? Storytellers specialities कहाँ हैं? कहाँ अच्छी-खासी information मिल रही है, बैगर किसी दाएँ-बाएँ के भेदभाव के? और कौन इधर tilted है या उधर tilted है और बहुत ज्यादा prejudiced भी। इसके इलावा भी बहुत कुछ है। ये सब जानकारी उनके लिए जिनके प्रश्न थे, ये चल क्या रहा है और तुम हो कहाँ? 10-15 दिन US,  10-15 दिन यूरोप और ऑस्ट्रेलिया भी। क्यों वक़्त बर्बाद कर रहे हो खामखाँ या कुछ खास मिल गया? मिला कुछ नहीं, बस थोड़ी कोशिश है, थोड़ा बहुत जानने-समझने की।     

यहाँ कबुतर बहुत हैं, अड़ोस-पड़ोस में। उड़ाते रहो, बस उन्हें। एक दिन जाने क्यों उन्हें भगाते हुए कुछ याद आ गया। 

दी, थोड़ा इधर। 

हूँ?

अरे, अब थोड़ा ईधर। 

क्या है?

थोड़ा उधर?

पर क्यों?  

वो कबुतर था सिर पे, उसे हटा रही थी। खामखाँ, बीट कर जाता सिर पे। 

और आप ऊपर देखते हुए, यहाँ कहाँ है?

उड़ा दिया। 

कुछ भी? बच्चों वाली हरकतें। 

अरे मज़ाक कर रही थी।   (R Zone)

I am kinda searching, थोड़ा ईधर, और थोड़ा उधर Zone.                 

Sunday, June 11, 2023

कितने अवतार हैं तुम्हारे?

कितने अवतार हैं तुम्हारे? 

रावण के कितने सिर और हाथ थे? 

संतोषी माँ के? दुर्गा के? काली के?  

और भी कितने ही देवी, देवताओं या राक्षसों के कितने सिर और हाथ हो सकते हैं?  

या शायद शरीर ही बदल सकते हैं ? विष्णु के कितने अवतार हैं, हिन्दु धर्म के अनुसार? या कृष्ण के कितने हैं? शरीर बदलने वाले अवतारों को क्या कहते हैं? छलिया? या कुछ और?

चलो ये तो बड़े-बड़े, देवी-देवताओं की बातें हुई। क्या आम आदमी भी ऐसा कर सकता है? सम्भव है? शायद, वैसे ही जैसे बड़े-बड़े, देवी-देवता कर लेते हैं? इंग्लिश में कुछ शब्द हैं, जैसे  

Alter Reality

Alter Ego

Reality Bending


Warping

Reality Warping: To manipulate Reality 

Operation Warp Speed (Corona), USA 

अंग्रेजी के इन खास शब्दों या इसी तरह के और  शब्दों और इनके करने के तरीकों का जिक्र किन्ही और पोस्ट में।  

हकीकत को बदलना या बदलने की कोशिश करना। 

चलो फिर से नाटकों के किरदारों पे आते हैं। या शायद हकीकत के किसी और वयक्ति पर? क्यों न खुद से ही शुरू किया जाए?  

असली ज़िंदगी में विजय दांगी एक लड़की है। टीचर है, बायोटेक्नोलॉजी में। थोड़ा बहुत लिख लेती है। और आगे की उम्मीद भी लिखाई-पढ़ाई के आसपास ही घुमती है।   

क्या वो या उसके साथ कुछ और जोड़-तोड़-मरोड़ कर कोई और इन्सान या किरदार घड़ा जा सकता है? जो लड़की भी हो सकता है मगर किसी और फील्ड में, बहुत अमीर या उससे बहुत गरीब। जरूरी नहीं आसपास ही हो। किसी दूसरे शहर या दूसरे देश में भी हो सकता है। जरूरी नहीं पढ़ाई-लिखाई के आसपास ही हो। हो सकता है, पॉलिटिक्स में हो। बिज़नेस में हो। खेलों में हो। या किसी और फील्ड में। जरूरी नहीं उम्र, सुरत या कुछ और ही मिलता हो। वो बच्चा भी हो सकता है और बुजुर्ग भी।  और ये भी जरूरी नहीं की लड़की ही हो। वो लड़का भी हो सकता है या ट्रांसजेंडर भी। जैसे ?    

जया?

साध्वी?

प्रियंका?

रिया चकर्वर्ती?

श्री देवी?

गोलु?

विजय मालया?

मायावती?

कविता 

बबिता 

नविता और भी पता नहीं क्या-क्या !

हकीकत क्या है? और घड़े हुए किरदार? कुछ भी मेल नहीं खाता ना? मगर क्या हो आम आदमी असली इंसान की बजाय घड़े हुए किरदारों को उस इंसान पे हकीकत में थोपने लग जाए तो? सोचने को तो कुछ भी सोच लो मगर किसी भी असली इंसान को किसी और का किरदार थोपने से बचे। क्यूंकि थोपने की कोशिश मतलब उस इंसान को कुछ-कुछ वैसा ही बनाने की कोशिश। कभी-कभी ऐसा करना खतरनाक भी हो सकता है या कहो की अक्सर होता है। तो जहाँ तक हो सकता है बचें, किसी पे भी कुछ भी थोपने की कोशिशों से। क्युंकि, ऐसे उदाहरण आसपास भरे पड़े हैं, जिनपे कुछ का कुछ थोपने की कोशिशें हुई हैं या अभी भी हो रही हैं। जिनके परिणामस्वरूप वो जिंदगियाँ तबाह हुई हैं या अभी भी हो रही हैं।    

हर इंसान अलग है, विशेष है। अपने आप में अद्भुत है। वो कोई और हो ही नहीं सकता। और न ही कोई उसका स्थान ले सकता। इसलिए कोशिश हर इंसान की खास विशेषताओं को आगे बढ़ाने की होनी चाहिए। न की उसे कोई और बनाने की।   

Wednesday, June 7, 2023

सत्ता और सामाजिक व्यवस्था?

सत्ता और सामाजिक व्यवस्था  (Governance, System, Files, Ordinance, Revolving or Fighting Chairs)  

क्या कोई फाइल्स की खिंचतान कुछ ट्रेनों के एक्सीडेंट की वजह हो सकती है? पता नहीं। मगर So Sorry जैसी सीरीज हमारे सिस्टम और गवर्नेंस के बारे में जरूर काफी कुछ बताते हैं। 

क्या किसी की PPF ट्रांसफर एडजस्टमेंट या सर्विस और यूनिवर्सिटी आर्डिनेंस, दिल्ली में CM और LG के बीच की विवाद की वजह हो सकते हैं? या ओडिशा में किन्ही रेलों के हादसे की?

मालूम नहीं। आपको क्या लगता है?







क्या सत्ता का मतलब सिर्फ सट्टा बाजार है ?
तो जो वो इलेक्शन का ड्रामा होता है, वो क्या है ?
और crypts में सट्टा या खुलेआम बोली कैसे लगती है?

ज्यादा तो अपनी समझ अभी तक आया नहीं, लेकिन जितना आया, वो तो आम लोगों के साथ बाँटा ही जा सकता है। अगली किन्हीं पोस्ट में।  

Politics of Persuasion ?

Politics of Persuasion मतलब किसी को ऐसे बोलो, दिखाओ या सुनाओ, की वो जहर को अमृत समझ खा जाएँ और अमृत को जहर समझ ठुकरा दें। ये तरीके बहुत से विषयों के मिश्रित ज्ञान की देन हैं। जिन्हे राजनीति ही नहीं, बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ भी प्रयोग करती हैं, अपना सामान बेचने के लिए। ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी तरफ लुभाने के लिए। अपनी साख बनाये रखने के लिए। 

PR (Public Relations), Communications, मीडिया : प्रचार-प्रसार के माध्यम, इन सबका अहम् हिस्सा हैं। आम आदमी आज आपस में बात करने की बजाय, इन सब पर ज्यादा वक़्त बिताता है। तो क्या होगा? वही जो हो रहा है।

Google बाबा के अनुसार

Persuasion: वह अंतर्वैयक्तिक या सामाजिक प्रक्रिया होती है जिसमें एक व्यक्ति, समूह या संगठन किसी अन्य व्यक्ति, प्राणी, समूह या संगठन को तर्क, बल या प्रभावित करने के अन्य मार्गों द्वारा उनके दृष्टिकोण, विचारों या व्यवहारों को किसी विशेष दिशा में ले जाने का प्रयत्न करता है।

बहुत से विषयों का मिश्रित ज्ञान इसके लिए प्रयोग होता है। जिनमें विज्ञान, कला, सामाजिक विज्ञान सब है। इन विषयों का मिश्रित संसार टेक्नोलॉजी के विकास के साथ-साथ, आज के इंसान के तकरीबन हर वाद-विवाद से जुड़ा है। दिमाग से जुड़ा हर विषय उसमें अहम् भुमिका निभाता है। चाहे फिर वो जैव विज्ञान हो, रसायन विज्ञान, मनोविज्ञान या कोई और। अलग-अलग तरह के विषयों की खिचड़ी, अपने आप में अलग तरह का विषय बना देती हैं। उस सबका अध्ययन, नए-नए आयाम, अवसर और अवरोधों का स्त्रोत होता है। दिमाग भी ऐसे ही है। अलग- अलग वातावरण में अलग-अलग तरह से काम करता है। वो दिमाग है तो सबके पास, मगर उसका उपयोग कहाँ, कैसे, कितना और किस दिशा में होता है, इसपे निर्भर करता है, इंसान का पूरा अस्तित्व। समाज की दशा और दिशा। अगर उस दिमाग को आप प्रयोग करें तब तो सही। मगर आपकी बजाय अगर वो किसी और के अधीन काम करने लगे तो? सम्भव है क्या ये?  

आप किसी के बारे में क्या सोचते हैं? ये इस पर निर्भर करता है की आपको उसके बारे में क्या-क्या पता है? और इस पर भी की किसी विषय पर आपकी सोच क्या है? अब एक ही विषय पर एक देश और दूसरे देश के आदमी की सोच अलग हो सकती है। और एक ही घर में बच्चे और बड़े की सोच भी अलग हो सकती है। 

जैसे Enjoy एक बच्चे ने बोला तो उसके लिए इसका मतलब होगा, खेलना, थोड़ी-सी घुमाई अपनी पसंदीदा जगहों पे, जैसे वाटर पार्क और हो सकता है कोई कंप्यूटर गेम, कोई serial, cartoon सीरीज, शायद थोड़ी बहुत खरीददारी, थोड़ा अपनी पसंद का खाना। 

बड़ों के लिए भी कुछ-कुछ ऐसा ही होगा। अपनी-अपनी पसंद और उम्र के हिसाब से। 

किसी के लिए उसका मतलब 3-IDIOT के Joy सुसाइड के खिड़की सीन पे टिक सकता है क्या? बताया ना निर्भर करता है, की उस बन्दे की जानकारी किसी विषय वस्तु की कितनी है, और वो उसे कैसे समझता है?   

कुछ बातें या चीज़ें हो सकता है आपको बताई, दिखाई या समझायी ऐसे जा रही हों, जो आपके लिए सही न हो। जिन्हे आप या तो बहुत पीछे छोड़ चुके या वो सब इतना और इस तरह से हो चुका की महत्व ही खो चुका हो। इन्हीं बातों और तरीकों में क्रुरता भरी होती है। राजनीतिक पार्टियों की ये क्रुरता किसी भी भले-बुरे वक़्त पे सामने आ सकती है। वो मौत पे स्टेनगन दिखाने पहुँच सकते हैं, और शादी पे, मौत के सौदागर बनकर। हिन्दुओं को मुसमानों की तरह के तरीके जोड़-तोड़ कर फूँक सकते हैं और मुसलमानों को हिन्दुओं की तरह। उनके दिमाग की क्रुरता अक्सर उनके पहनावे, आसपास के संसाधनों, कामों को करने के तरीकों में झलकती है। ऐसे सामाजिक ताने-बाने अक्सर औरतों और कमजोर समझे जाने वाले वर्ग को बल के तान धकेलते हैं। क्युंकि दिमाग ऐसे लोगों के काम कम ही आते हैं। उनके हाथो में डंडे जैसे या इससे भी खूँखार साधन मिलते हैं। ऐसे लोग औरतों के नाम पर या कमजोर कहे जाने वाले तबकों के नाम पे पद पाते हैं। और बनने के बाद उन पदों को अपने ही नाम लिख लेते हैं। सोचो, ऐसी सोच औरतों को क्या समझती होगी और उनसे कैसे पेश आती होगी? फिर चाहे अपने ही घर या आसपास की औरतें क्यों न हों?    

राजनीती अक्सर ऐसे केसों में काले धागे फेंकती है और कहती है चमार-चूड़े (Lower Cast) आ गए। इस तरह के धागे और जातियाँ और धर्म, राजनीति की घिनौनी देन ज्यादा हैं। इसमें भी अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के, अपने-अपने उदेश्य भुनाने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। राजनीति के लिए कुछ भी अछूत नहीं है। 

वो भाइ-बहन, बाप-बेटी, दादा-पोती, माँ-बेटा जैसे रिश्तों कों तार-तार करने की कोशिश कर सकते हैं। कौन हैं ये लोग? पहले तो इन कुंठित मानसिकताओं को पहचानों। और जितना हो सके, अगर दूर न हो सको तो कम से कम सावधान जरूर रहो। कोड्स की भाषा में BC, MC, CC, SF, MF और भी पता नहीं क्या-क्या होता है। सामने वाले के प्रयोग और नज़रिये पे है। अब अगर लोगबाग ऐसे-ऐसे नाटक लिखेंगे या तोड़-मरोड़ कर समाज में पेश करने की कोशिश करेंगे तो उस समाज में या ऐसे तबके में औरतों या इस कमजोर कहे जाने वाले वर्ग की स्थिति क्या होगी? शायद आप कहें शिक्षा उसका समाधान हो सकती है? क्या पता ऐसे लोग शिक्षा में भी घुसे हों? और उनके लिए वो शिक्षा की बजाय धंधा मात्र हो? उसपे बाहर छवि ये बना ली हो की हम तो लोगों के उत्थान के लिए, भले के लिए काम करते हैं?     

ऐसी सोच मुर्दाघरों से मुर्दे निकाल बेच सकते हैं और ज़िंदा लोगों को मुर्दा घरों में सजा सकते हैं। वे माता कह के ले सकते हैं और रातों जगराते करवा सकते हैं। काम ख़त्म होने पे उन्ही सजी-धजी मुर्तियों का विषर्जन कर सकते हैं। मतलब, वोटों के लिए हर तरह का गंद फैला सकते हैं। आम आदमी की ऐसे लोगों के बीच जीत हो ही नहीं सकती। क्यूंकि, आम-आदमी उतना नहीं गिर सकता। वो सफ़ेद धागों को ब्रामणों या जाटों या राजपूतों या किसी भी ऊँची जाती का धागा गा सकते हैं। ऊँची जाती कितनी ऊँची? क्या पैमाने हैं उस उंचाईं के? नीची जाती कितनी नीची? कितनी गहरी खुदाई है उस जाती की? अगर वो आपको इन सब जालों में उलझा रहे हैं, तो बचो उनसे। उनका तो धंधा है ये। हाँ! पर गन्दा है ये।  

Monday, June 5, 2023

सामान्तर केसों की घड़ाई (ताबीज़-कबीज?)

(ताबीज़-कबीज?) 

FB के होम पेज पे एक विज्ञापन आया -- काला धागा पहने और पैसा ही पैसा पाएँ। पहली बात तो मैं ऐसे चक्रों में पड़ती नहीं। दूसरा, जहाँ कहीं ऐसी-ऐसी लॉटरी का जिक्र हो वो spam के इलावा किसी और जगह के लायक नहीं होते। Online Security में थोड़ा बहुत पढ़ा होगा। 

ऐसा ही कुछ ताबीजों की कहानियाँ हैं शायद। जो दिखाई गयी शुभ हैं, मगर अशुभ हैं। अच्छा, पीछे किन-किन ने काले धागे बाँधे? और कहाँ-कहाँ? हाथ में? पैर में? गले में? या कहीं और? कितना वक़्त हो गया बाँधे हुए? किसने दिया या बताया वो सब बाँधने के लिए? और क्या बोलके बँधवाया गया? वैसा कुछ हुआ क्या? या उसके विपरीत? और फिर भी बाँधे हुए हैं? किसी शुभ कहके बँधवाने वाले के सिर मत होना। उन बेचारों या बेचारियों को भी उतना ही पता होगा, जितना आपको। सबसे बड़ी बात ये की ये पहली बार नहीं हो रहा। ऐसा आपके बड़ों के साथ हो चुका है। इसलिए कभी-कभी बड़ों के अनुभवों को जानना भी सही होता है। शायद भार नहीं होते वो आप पे, रक्षा कवच होते हैं।   

किसी की कहीं कोई समस्या चल रही थी। नौबत, गाइड बदलने तक की आ गयी। समाधान भी पास ही मिल गया। ज्यादातर दोस्त जिस लैब में थी उन्होंने बोला हमारे सर के पास सीट है और शायद वो तुम्हे ले भी लें। क्यूंकि तुम्हारा काम वो है जो उन्हें शुरू करना है। मेरे लिए भी सही था और वहाँ से हाँ भी हो गयी। सब सही जाता लग रहा था। मगर कुछ दिन बाद एक दोस्त ने बोला, शायद तुम इस लैब में नहीं रह पाओगे। मैंने कहा, क्यों, ऐसा क्यों कह रही हो? उसने बताया की मैम किसी के पास भविष्य पूछने या समस्याओं के समाधान पुछने जाते हैं। और उस ब्राह्मण ने बोला है की तुम्हारी लैब में कोई नया बंदा आया है और वो तुम्हारे लिए सही नहीं है। अब तुम्हारे सिवाय तो कोई आया नहीं। और मुझे यक़ीन नहीं हुआ की ऐसा भी होता है। इतने पढ़े-लिखे लोग भी समस्याओं के समाधान या भविष्य पूछने ऐसे किसी ब्राह्मण-पंडों के पास जाते होंगे? और किसी के कहने भर से वो सब कर भी देंगे? मगर, वैसा हुआ। अब क्या सच था या क्या झूठ, मुझे आज तक समझ नहीं आया। 

हाँ! इतने सालों बाद, खासकर पिछले कुछ सालों के अध्ययन के बाद, ये जरूर समझ आया की जब परेशान होते हैं या कुछ ज्यादा की चाहत में, तभी ऐसे लोगों के पास जाते हैं। और उनका कहा हुआ कर भी देते हैं। बिना सोचे समझे, की उनको हमसे ज्यादा पता कैसे हो सकता है। जब इतने पढ़े-लिखे लोग ऐसा कर सकते हैं तो आम आदमी के बारे में क्या बोलें?   

जैसे 2016 में मेरे कैंपस के घर 16 में पीछे आम के पेड़ पे, किसी द्वारा पीछे से कच्चा सूत का धागा लपेटना, मेरे लिए अनपढ़ गँवारों की निशानी था। मगर काफी वक़्त बाद पता चला की वो तो किसी जुर्म की कहानी था। और ऐसे-ऐसे तरीके ज्यादातर जुर्म दिखाने के लिए, Show, Don't Tell की कहानियाँ भी गाते हैं। घुमा फिराकर या चढ़ा बढ़ा कर भी दिखाते  हैं। और होने के सालों बाद भी, जब आप आसपास भी नहीं होते तो भी तरो-ताज़ा रखने की कोशिशें भी होते हैं। चाहे वो शख्स ज़िंदगी के कितने ही और पड़ाव पार क्यों न कर चुके हों। 

शायद इन सबका मतलब ही आम इंसान को इस साइको (Psychology) के जाल में उलझाकर रखना होता है। और राजनीतिक पार्टियों को क्या चाहिए? आम आदमी खामखाँ के जालों में उलझेगा नहीं तो उनसे काम की बातों पे आओ, बकवास पे नहीं, बोलने नहीं लगेगा?

Sunday, June 4, 2023

सामान्तर घड़ाई कैसे होती हैं ?

सामान्तर घड़ाई कैसे होती हैं?

मानो किसी ने कोई नाटक लिखा। उसमें उन्होंने बहुत ही घिनौना लिखा। जहाँ बाप बेटी को खा जाता है। बहन भाई को। बेटा माँ को। जैसी सोच, वैसा ही स्क्रिप्ट तैयार। इसमें कुछ और भी हो सकता है। बेटी बाप को, बहन भाई को या माँ बेटे को। और भी कितने ही तरह के किरदार हो सकते हैं। 

माँ, बाप, बहन, भाई, बेटा, बेटी, बुआ, चाचा, ताऊ, मामा, फूफी आदि। सब आराम से रहते हैं। एक दूसरे को जरुरत पड़ने पे काम आते हैं और एक दूसरे का भला चाहते हैं। नाटक तो ऐसे भी होते है। और उन्हें लिखने वाले भी। अब ये देखने वाले पे भी है की वो क्या देखता है, क्या सुनता है और क्या समझता है। आप कहेंगे सब सोच पे निर्भर करता है। 

ये सोच कहाँ से आती है? आपकी अपनी है ? आपको जहाँ आप पैदा हुए हैं उस माहौल से मिली है? या आप उस माहौल से आगे निकल और भी संसार देख चुके हैं, उस सबके निष्कर्ष के बाद निकली है? या आप अपने पैदाइशी माहौल से बाहर कहीं निकले ही नहीं और जिनके आसपास रहते हैं उस सबकी मिलीजुली देन है?

या इसके आगे भी कुछ है? एक माहौल में आप शालीन, सभ्य व्यवहार करते हैं और आगे बढ़ने की बातें और काम। दूसरे में असभ्य, गाली-गलौच, मारपिट। एक माहौल में आप आपस में मिल बैठकर एक दूसरे को सुनते है, समझते हैं। साथ खाते-पीते हैं। दूसरे में, दूसरों के या शायद अपनों की चर्चा किसी और से करते हैं और सुनते हैं। मतलब एक माहौल में लोग मिलजुल कर रहते हैं। दूसरे में, शायद एक दूसरे के ही खिलाफ जहर उगलते हैं। 

आईये, फिर से नाटकों पे आते हैं। और उनके रचे सामान्तर संसार और उन ज़िंदगियों पर। एक जगह आप घिनौना लिखने वालोँ के किरदारों के पास रहते हैं। लिखने वालों के नहीं, बल्की नाटक के रचने वाले किरदारों के पास। वो जानते ही नहीं लिखने वाले कौन हैं? ये भी नहीं जानते, वो दूर हैं या पास हैं। क्या करते हैं और क्या चाहते हैं। मानो, लिखने वाले इस पार्टी या उस पार्टी के हैं। तो क्या चाहिए उन्हें? सत्ता। कैसे भी। मगर समाज में ऐसे सामांतर केस घड़ने से क्या होगा? जैसा समाज वो चाहते हैं, वो? या शायद उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता की समाज कैसा हो। बस, जैसे-तैसे उनकी सीट और उनके नंबर आने चाहिएं। 

सामान्तर केस घड़ने से वो लोगों को अपने अनुसार उलझाते हैं और उसका फायदा उन्हें मिलता है। 

कैसे हो सकता है ये? थोड़ी जटिल प्रकिर्या है मगर एक बार आपको वो नजर आने लगेगी तो समझने में देर नहीं लगेगी। आपको किसी ने बोला ये सोडा की बोतल ले, और अपने फलां-फ़लां दोस्तों के साथ जाके, ये ये नौटंकी करके आ। आपको लगता है, क्या बड़ी बात है? और आप कर आए। एक बार कर दी और सही नहीं लगा या परिणाम सही नहीं रहे तो आप दुबारा नहीं करेंगे। मगर आपको कोई फर्क नहीं पड़ रहा की आपकी वो हरकत सामने वाले पे क्या असर कर रही है तो आप शायद बारबार करेंगे। रैगिंग पता है क्या होती है? जब ऐसा करने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता तो उनके हौसले बढ़ते जाते हैं और परिणाम? कुछ आत्महत्याओं के बाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को ऑर्डर निकालने पड़ते हैं, इस सबकी रोकथाम के लिए। भारत में भी ऐसा हुआ है क्या ? कब हुआ था?    

कहीं ऐसा तो नहीं की एक तरफ कुछ लड़कियों की या जूनियर्स की कहीं छोटे-मोटे किस्म की कोई testing शुरू हो गयी। और दूसरी तरफ रैगिंग को बढ़ावे? सामान्तर घड़ाई?

मतलब एक तरफ कोई एक शर्त लगाने वाली पार्टी हार गयी और दूसरी तरफ परिणाम? Hyped and Twisted! मतलब जोड़-तोड़-मरोड़ कुछ ज़िंदगियाँ तक ले गयी। 

लिखा या शर्त कहीं? शर्त हारने वाले कोई और। मगर सामान्तर घड़ाई में तो सिर्फ छोटी-मोटी, हार-जीत नहीं थी। बल्की ज़िंदगियाँ ही चली गयी। क्या कोरोना को हम ऐसे ही देख सकते हैं ? या यूँ कहें इस समाज का सच यही है? तो कैसे समाज का हिस्सा हैं हम, ये सब जानने के बावजूद? देखने-समझने के बावजूद? क्यों नहीं रोक सकते इन सामान्तर घड़ाईयोँ को? हर सामान्तर घड़ाई में बहुत-से छेद हैं। बहुत कुछ अटपटा है। वैसे ही जैसे Campus Crime Series में। 

जैसे के लिए कुछ उदाहरण लेने पड़ेंगे। कोशिश रहेगी, नाम, जगह की बजाय, आम आदमी को सम्बोधन हो।