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Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Sunday, December 31, 2023

चलें यूनिवर्सिटी की सैर पे? 1

बहुतों को शायद यूनिवर्सिटी का मतलब सिर्फ पढ़ाई-लिखाई ही समझ आता है। पढ़ाई भी बोर, उबाऊ, मोटी-मोटी किताबें और लम्बे-लम्बे लेक्चर? अजीबोगरीब लैब्स और उनके अजीबोगरीब पढ़ाकू टाइप जानवर? और यही सोच बहुत से भाग खड़े होते हैं? ऐसे ही जैसे, बहुतों को स्कूल या कॉलेज के नाम से भी ऐसा-सा ही लगता है? ये खास ऐसे लोगों के लिए ही है। खास उनके लिए भी, जिनका नया-नया सिस्टम, गवर्नेंस आदि को समझने में इंटरेस्ट पैदा हुआ है। मेरे जैसे। खासकर, जब ये समझ आने लगे की सिस्टम का मतलब ना तो सिर्फ राजनीती या राजनेता हैं। ना ही सिर्फ नौकरशाह या व्यवसायी। ये तो बड़े ही अजीबोगरीब ढंग से समाज के हर तबके को अपने में जोड़े हुए है। जिसमें एक तरफ कुर्सी पे बैठे पदाधिकारी हैं, तो दूसरी तरफ समाज का वो आखिरी तबका, जो सबसे आखिर में आता है।

एक तरफ सभ्य कहलाने वाला, साफ दिखने वाला, फैसले लेने या लेने में अहम भुमिका निभाने वाला समाज। तो दूसरी तरफ, वो समाज, जिसकी तरफ ये सभ्य कहलाने वाला या पढ़ा-लिखा समाज कम ही देखता या सोचता है। इन दोनों समाजों के बीच जितना ज्यादा फासला है, उस समाज का उतना ही ज्यादा हिस्सा कम विकसित और गरीब है। उस गरीबी को और ज्यादा गरीबी की तरफ धकेलता इस सिस्टम का ताना-बाना है। शातीर दिमागों द्वारा  बनाया गया वो ताना-बाना या जाल, जो आस्था, विश्वास और रीती-रिवाजों में शोषण को गूँथ देता है। इसलिए अगर किसी भी समाज को आगे बढ़ाना है या ये दो समाजों के बीच की खाई को दूर करना है तो आस्था, विश्वास और रीती-रिवाजों के द्वार पर पढ़ाई-लिखाई और संवाद को रखना होगा। ताकी शातीर लोगों द्वारा इनमें गुँथे गए शोषण पे प्रहार हो सके। शिक्षा के इन संस्थानों का दायरा सिर्फ बोर और उबाऊ किताबों तक ना रखकर, रोचकता की तरफ बढ़ाना होगा। जहाँ जबरदस्ती की बजाए, किसी भी विषय में रुची पैदा करने के तरीके हों। विकसित देशों का शिक्षा संसार शायद वही सब कर रहा है। जिसमें भारत जैसे देश आज भी काफी पीछे हैं। ये फर्क वहाँ के और यहाँ के डिग्री प्रोग्राम्स, उनका सिलेबस, पढ़ाने और सिखाने के तौर-तरीके और सुविधाओं से समझा जा सकता है।                 

पढ़ाई-लिखाई वाला ये सभ्य, साफ-सुथरा, हरा-भरा, वाद-विवाद या संवाद वाला ये संसार, सही मायने में किसी भी संसार की दिशा या दशा तय करता है। जहाँ-जहाँ इस संसार में गड़बड़ है, वहाँ-वहाँ के समाज में भी कुछ-कुछ वैसी-सी ही गड़बड़ है। जितना ये समाज सभ्य है या सही है या अपना योगदान जिस किसी तरह से समाज में दे रहा है, वैसा-सा ही, वहाँ का समाज है। हर जगह सामान्तर घड़ाईयों का समाज कैसा है, ये तो अभी ठीक से नहीं कह सकती। मगर जितना समझ आया, हकीकत हर जगह, कम या ज्यादा ऐसी-सी ही है।              

जब भी जहाँ कहीं आप घुमने जाते हैं, तो क्या सोचकर जाते हैं? आपके दिमाग में उस जगह के बारे में क्या खास होता है? और वहाँ जाने का आपका इरादा क्यों बना? यही सब आपकी उस घुमाई या सैर को परिभाषित करता है। दुनिया भर के अलग-अलग कोनों में, अलग-अलग यूनिवर्सिटी, एक अलग ही तरह के संसार को दिखाती, बताती और अनुभव कराती हैं। शिक्षा के इन संस्थानों में काफी कुछ एक जैसा-सा होते हुए भी, काफी कुछ अलग है और खास है। क्या है वो? चलो जानते हैं, उन्हीं के आँगन से कुछ शब्दों से, कुछ तस्वीरों से, कुछ वीडियो से, कुछ प्रोग्रामों से या उनके सिलेबस से, पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों से, सुविधाओं से या दुविधाओं से? उन्हें चलाने वाले या वहाँ काम करने वाले लोगों के नजरिये से, उनके कामों से और उन्हीं के शब्दों, शोधों या जुबानों से। कैसे शिक्षा के संस्थान वहाँ के समाज को प्रभावित कर रहे हैं या कोई भी दिशा या दशा, उस समाज को दे रहे हैं? कहाँ से शुरू करें?

2012, जब आखिरी बार मैं किसी विदेशी यूनिवर्सिटी की दहलीज़ पर थी, मॉस्को, रूस। कुछ कारणों की वजह से, उसके बाद मैंने खुद ही जैसे कांफ्रेंस पे एक फुल स्टॉप लगा दिया। और तय किया की अब कांफ्रेंस में कभी नहीं जाउँगी। जब भी जाना होगा, तो कुछ सिखने या सिखाने, पढ़ाने या शोध करने, थोड़ा लंबे वक़्त के लिए होगा। कम से कम, कुछ महीने या साल। मॉस्को से वापस आते वक़्त, मेरा स्टॉप अल्माटी, कजाकिस्तान था। वो भी पुरे 9 या 10 घंटे का स्टॉप। मैं थकी हुई थी और बुखार-सा अनुभव हो रहा था। दिमागी बुखार शायद। कुछ चल रहा था शायद उस दिमाग में। उन्हीं दिनों के आसपास, मैंने एक अलग-सा विषय उठाया हुआ था, पढ़ने और थोड़ा बहुत उसके बारे में जानने के लिए। ये विषय एक तरह से Bioinformatics से थोड़ा अलग राह चुनने के लिए था। या शायद उसके साथ जोड़ने के लिए। क्यूँकि जब Molecular Lab में समस्याएँ हल होती नज़र नहीं आई तो मैंने Bioinformatics विषय उठा लिया, मगर उसमें ज्यादा इंटरेस्ट नहीं हो पाया। उसे जबरदस्ती जैसे घसीट रही थी, बस। Evolution और Genetics कभी से मेरे इंटरेस्ट के विषय रहे थे। तो ये उसी इंट्रेस्ट का परिणाम था शायद। इन 9-10 घंटो में शायद ऐसा कुछ ही देख-समझ रही थी। और तो कुछ था नहीं करने को, आते-जाते लोगों को देखने के सिवाय। क्या था वो?   

आम भाषा में कहें तो इंसान का हुलिया। थोड़ी नई-सी ईजाद की गई भाषा में कहें तो IMAGE (छवि?)। जीव विज्ञान की भाषा में कहें तो Evolution of Human. मतलब, इंसान, आज जैसा दिखता है या है, दुनियाँ के किसी भी कोने में, वैसा क्यों हैं? इसकी उत्पत्ति और विकास की कहानी क्या है? सिर्फ किसी इंसान का हुलिया देखकर, हम उसके बारे में कितना कुछ बता सकते हैं? शायद काफी कुछ। जैसे, इतने सारे बदलावों के बावजूद, मैं खुद अपने सिर के बालों से उतना नहीं सीख पाई, जितना मेरी छोटी-सी भतीजी और भांजी के बालों ने मुझे सिखाया या समझाया, किसी सिस्टम के ताने-बाने को, जाल को। एक ऐसा सिस्टम, जो बच्चों तक को नहीं बक्सता। उसके बाद आसपास के कुछ एक और बच्चों की अजीबोगरीब बिमारियों (?) के बारे में भी जाना। और फिर तो जैसे एक के बाद एक छोटे क्या, बड़े क्या, सबकी बीमारियाँ शायद कुछ एक जैसा-सा ही इशारा कर रही थी -- सिस्टम की तरफ। 

तो शुरू करते हैं, इस पढ़े- लिखों की दुनियाँ (यूनिवर्सिटी) की सैर को जिससे शायद समाज के उस आखिरी तबके को सिखने, समझने और जानने को ज्यादा मिले। और पढ़े-लिखों को सोचने को, की विकसित समाज, अपने उस आखिरी तबके को भी कैसे साथ लेके चलता है? ना की सिर्फ उसका शोषण करता है, ज्यादा, ज्यादा और ज्यादा की चाहत में? और आज तक, 21वीं सदी में भी अविकसित या विकासशील देशों के हालात ऐसे क्यों हैं?

Friday, December 29, 2023

मत, विचार, विचारधारा, गुप्त धकेलवाहक संसार और ज़िंदगियों पे प्रभाव

Perspective or a Viewpoint, outlook, point of view, position, projection? 

Editor's Viewpoint?

Writer's viewpoint?

Script Writer's viewpoint?

Storyteller's viewpoint?

Drama's or Theatre persons viewpoint?

Some movie और serial viewpoint?   

Who's viewpoint?

Specific party or person viewpoint on any topic? But they enforce on you like it's your own viewpoint?  

किसी पार्टी का या किसी का मत या विचार ये है, की फलाना-धमकाना को, फलाना-धमकाना का पानी नहीं पीना चाहिए। खाना नहीं खाना चाहिए। उनके घर नहीं जाना चाहिए। उनसे बात नहीं करनी चाहिए। उनका कोई भी काम नहीं करना चाहिए। 

या इससे भी थोड़ा आगे चलकर उनको उलटी-सीधी, टिक्का-टिपण्णी करनी चाहिए। उनके काम में अवरोध पैदा करना चाहिए। उनका बनता काम भी बिगड़ना चाहिए। उन्हें आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए। उनके आपस में जूत बजवाने चाहिएँ। उनको पीटना चाहिए। उनके सामान को खराब करना या तोड़ना-फोड़ना चाहिए। उनको बुरी आदतों की तरफ धकेलना चाहिए। उनके पैसे यहाँ-वहाँ बर्बाद करवाने चाहिएँ। उनके आपस में मनमुटाव पैदा करना चाहिए। उनकी नौकरी, घर, जमीन-जायदाद, धोखाधड़ी से या जबरदस्ती मारपिटाई कर, अपने नाम कर लेनी चाहिए। उनके घर के आदमियों को खत्म करना और खदेड़ना शुरू करना चाहिए। और ये सब ऐसे करना चाहिए की लगे, की ये तो वो खुद कर रहे हैं। 

इसे क्या कहते हैं?

AI? Artificial Intelligence 

IOT? Internet of Things

Psychology, Human Behavior

Interdisciplinary Sciences (Including Social Sciences)  

Complex of Science, Arts, Commerce या सीधी-सी भाषा, ज्ञान (knowledge)   

Surveillance Abuse?

शायद इस सबसे ज्यादा कुछ? ये हमारा आज का संसार है।  

मगर आम-आदमी इसे कैसे देखता या समझता है?              

इससे पहले एक पोस्ट में सुशीला कार, शिव शक्ति बाजार की कहानी सुनाई। और भी बहुत तरह के कोड हैं उसमें।  

सिर्फ कहानी?

हकीकत?

हकीकत के आसपास?

या कोई नाटक?

किसी एक पार्टी का?

मत, विचार, पक्ष, किसी एक पार्टी का। जरूरी नहीं, कोई और उससे सहमत भी हो। या हो सकता है, बहुत ज्यादा विरोधाभास हो। मगर, कितनों को समझ आया की वही सच है?

सच है। कुछ हद तक। मगर किसका सच है? और किसपे थोंपने की कोशिश की गई है?

उससे भी अहम, किस, किस की ज़िंदगी को इस सच के आसपास घुमा दिया गया है? और किसने? और उससे भी अहम, क्यों? जिसकी या जिन किन्हीं की ज़िंदगियों को इस स्क्रिप्ट के आसपास घुमा दिया गया है, उनका अपना उस घुमाई में क्या योगदान है? सामाजिक सामान्तर घड़ाईयाँ। 

अगर आपको वो समझ आ जाएगा, तो आप इस सबसे दूर हो जाएंगे। और अपनी ज़िंदगी को अलग तरह से सही करने की कोशिश करेंगे। उसके लिए आपको ऐसे-ऐसे कुछ और स्क्रिप्ट्स के बारे में पता होना चाहिए। जो शायद विरोधी या दूसरी पार्टियों ने रचे हुए हैं, आपके आसपास भी। और जहाँ गड़बड़ है या ऐसा माहौल बनाया गया है, वहाँ भी।                        

Science Fiction Vs Reality?

Book from hostel?

Or maybe hotel?

cannot write all?

have to hide identity?

else game would not be game?

कौन सा जहाँ है ये? पता नहीं।  

आगे आते हैं, एकाध ऐसी ही पोस्ट पे। हॉस्टल से बुक लानी है। किसी ने उसको होटल बना दिया हो शायद? जाना था किसी होटल, पहुंचा दिया किसी और शायद। अब ये होटल की बजाय कोई घर या लाइब्रेरी या कोई और जगह भी हो सकता है। ऐसे ही बुक की जगह कुछ और भी हो सकता है। 

या Inn Lodge? आपने गलती से दरवाजा खुला छोड़ दिया या कुछ गड़बड़ घोटाला? जानेंगे इधर-उधर के, इसके या उसके किस्से कहानियों के बारे में। कोशिश रहेगी की लोगों की पहचान गुप्त रहे। अजीबोगरीब, गुप्त-गुप्त संसार। मगर इतना गुप्त होकर भी, इतनी सारी निगाहों और कैमरों के बीच। 

World of Surveillance? System? Strange Politics throughout world?   

मत ही मताधिकार है? आप किसका मत डाल रहे हैं?  

शिव-बाजार?

शिव कौन है?

क्या जानते हैं आप, इस इंसान या भगवान (?) के बारे में?

भगवान शादी करते हैं? 

भगवान के बच्चे भी होते हैं?

कितनी शादी करते हैं?

अब भगवान हैं, तो कितनी भी करें?

या भोले हैं, एक में ही गुजारा कर लेते हैं?

या परिस्तिथिवश दो, तीन, चार या ज्यादा भी कर सकते हैं?

परिस्तिथिवश? परिस्तिथियाँ, भगवानों के भी काबु से बाहर होती हैं? कैसे भगवान हैं ये? ये तो बड़े इंसान-से हैं। नहीं?

वैसे आपके भगवान पुरुष हैं या औरत? भगवान हैं तो भगवानी भी होंगी? मतलब, देव हैं तो देवियाँ भी होंगी? श्री देवी जैसी शायद? कुछ भी।     

अगर पुरुष या औरत भगवान हो सकते हैं, तो हिज़ड़े भी भगवान हो सकते होंगे? है कोई? या उन्हें ऐसा कोई हक़ नहीं होता?   

अरे भगवान को इस या उस लिंग की जरुरत ही कहाँ? 

वो तो जैसे पौधों में Hermaphrodite होते हैं ना, मतलब, द्विलिंग, एक में ही दोनों औरत और पुरुष के लिंग, वो भी हो सकते हैं? नहीं? ना शादी करनी। ना किसी औरत की या पुरुष की जरुरत। ना औरत-पुरुष वाले जलन वाले झगड़े। शादी वाले सास-बहु सीरियल। और ना ही पति या पत्नी वाली तू-तू, मैं-मैं। सारे वाद-विवाद ही खत्म। कुछ-कुछ करण जौहर जैसे? फिर से कुछ भी? वैसे श्री देवी और करण जौहर दोनों ही मस्त हैं या रहे हैं अपनी-अपनी ज़िंदगी में। मेरा इरादा, यहाँ किसी खास इंसान या एक्टर या एक्ट्रेस पे कोई कटाक्ष या किसी तरह की खामखाँ टिका-टिप्पणी नहीं हैं। सिर्फ विषय पे कटाक्ष कह सकते हैं -- भगवानों या भगवानियों के भी बाजार?     

कैसे-कैसे विवाद होते हैं ना ये? पुरे समाज को उलझाए रखते हैं, अपने में। और तो जैसे कोई काम ही नहीं होते दुनियाँ में? कहीं पंचायतें लगी पड़ी हैं। हमारे जैसे so-called पढ़े-लिखे, जिन पंचायतों को कंगारू कोर्ट्स भी कहते हैं। और फिर अच्छी खासी सुनते भी हैं, अपने इधर-उधर के बुजर्गों से। इन ज्यादा पढ़े-लिखों के ज्यादा दिमाग खराब हो जाते हैं। समाज-वमाज में तो रहना नहीं होता। पड़े रहते हैं, यूनिवर्सिटी या कैंट्स में ज़िंदगी भर। उनसे बाहर भी दुनियाँ होती है। कोई समझ ही नहीं होती इनको, दुनियाँदारी की। थोड़ा बहुत बोल दो, तो देश छोड़ देंगे की धमकियाँ। मतलब?

मतलब,  ऐसा जहाँ या दुनियाँ भी है, या देश हैं, जहाँ शिव के नाम पे कुछ भी नहीं चलता? या शायद शिव को मानते ही नहीं? या हो सकता है, वहाँ के शिव अलग तरह के हों? मतलब दुनियाँ तो बड़ी है, हमारे बुजर्गों की दुनियाँ से? उन्हें उस दुनियाँ की खबर कम है और इन so-called ज्यादा पढ़े-लिखों को इनकी (अपने ही बुजर्गों की), इस दुनियाँ की? यही गड़बड़ है? एक ही घर के या आसपास के माहौल में, इतनी ज्यादा असमानता? किसी भी तरह की जितनी ज्यादा असमानता, उतने ज्यादा विवाद। वो भी ज्यादातर बेवजह के? इसमें कितना सच है और कितना झूठ, ये आप सोचें।  

चलो, ये तो समझ आया की समस्याएँ, सिर्फ इंसान को नहीं होती। इंसानों के भगवानों और भगवानियों को भी होती हैं। उनकी भी परिस्तिथियाँ, खुशी और गम वाली हो सकती हैं? वैसे ही जैसे, कभी खुशी, कभी गम, वाले इंसानों को होती हैं। परिस्तिथियाँ, उनकी भी औकात से बाहर हो सकती हैं? 

अब शिव को ही लो। सती मर गई। शिव को मालूम ही नहीं की उसे ज़िंदा कैसे करे? मचा दिया ताँडव? चल पड़ा उठा के सती के मर्त शरीर को? और बिखरा दिए उसके टुकड़े, यहाँ-वहाँ और कहाँ-कहाँ? जहाँ-जहाँ वो टुकड़े गिरे, वहीँ घड़ दिए मंदिर? New age, Nuclear Wars and Temples? और मंदिरों के नाम भी हर जगह अलग-अलग? नाम भी कैसे-कैसे? वो भी बदलते रहते हैं शायद, समय और राजनीती के हिसाब-किताब से? अब ये कहानियाँ घड़ने वाले या किताबें लिखने वाले लोग महान हैं? शातिर हैं? ज्यादा या कम पढ़े-लिखे हैं? या आम आदमी हैं? ये आप जानने की कोशिश करें और पता चले तो मुझे भी बताएं। किस किताब में क्या लिखा है? या किस मंदिर की कैसी या क्या श्रद्धा या रीती-रिवाज़ हैं? और उनका ज्ञान-विज्ञान, उस वक़्त की या राजनीती की जरुरतों से क्या लेना-देना हो सकता है या है? क्यूँकि, मैं खुद भी जानने की कोशिश में हूँ, भगवानों के नाम पे बाजार को या राजनीती को।   

भोला खड़ा बाजार में  

देख रहा रंग कैसे-कैसे?

रण (युद्ध) कैसे-कैसे?  

या रच रहा, रण कैसे-कैसे?  

एक तरफ, आज भी 

सर्प-मणि को मानने वाले 

Kinda Money-Honey? 

या? सच के भोले? 

(अनभिग-अज्ञान, आम-आदमी?)  

तो दूसरी तरफ,

सर्प-मणि के पीछे 

कैसी-कैसी तरंगों के खेलों वाले, शातीर दिमाग? 

रेडियो तरंगे, टीवी, सॅटॅलाइट, wi-fi, bluetooth, internet, infrared, fibre-optics etc. और भी पता नहीं कैसी-कैसी टेक्नोलॉजी का बाना पहने चालें, घातें और छल-कपट।     

क्या है ये? 

शिव? या शिव-बाजार? 

या इंसानी-सी जरुरतें और उन जरुरतों और वक़्त के हिसाब से हिसाब-किताब? 

Monday, December 4, 2023

M 4 ?

M 4 मोदी भी होता है, वैसे तो? अब वो रोड़ा है या खूंठा या तरक्की और समृद्धि का प्रतीक, ये पता नहीं? आपको पता लगे तो बताना। 4 पे M एक रोड़ा है? पता नहीं, कैसे-कैसे Co M P lex हैं?  वैसे ही जैसे, बहुत बार रैली निकालते वक़्त BJP वाले लिखते हैं, BJP 4? ब्लाह, ब्लाह, ब्लाह। कैसी-कैसी रैलियाँ पीटती हैं, ये पार्टियाँ? वैसे अभी हुए इलेक्शन से आपको क्या समझ आया? मुझे तो कुछ खास नहीं आया, सिवाय इसके 3-1, जहाँ का तहाँ (status quo) मतलब, ढाक के वही तीन पात? तो 24 और 29 में क्या हो सकता है? वही ढाक के 3 पात? या अलग ही तरह का विविकरण? अरे समीकरण बोलो, भी हो सकता है? ये कैसे इलेक्शन? किसके इलेक्शन? और किसके लिए? क्या है ये EVM और ऐसे-ऐसे, कैसे-कैसे कोढ़? कौन और कैसे कंट्रोल होता है ये इलेक्ट्रॉनिक्स? सिर्फ बिजली या उससे आगे भी कुछ है? कैसी-कैसी तरंगों के खेल हैं ये? कैसा-कैसा, ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी?              

और ये सुप्रीम कोर्ट क्या है? सुप्रीम कोर्ट भी अपाहिज-सा जैसे? अब रायगढ़ का या कॉंग्रेस का, इससे क्या लेना-देना है या हो सकता है, पता नहीं। किसी को ये भी समझ आए तो बताना प्लीज? 

वैसे ही जैसे, Supreme Court of India अपने आप में कोढ़ है। Sup R eme Co U R T of In D IA? कुछ और भी हो सकता है, जैसे ABCD Capital letter या small letter करके। या अलग-अलग, जोड़-तोड़ करके। 

सुप्रीम कोर्ट की Website भी रोचक है sci. gov. in    

और अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों के बारे में ABCD से जानना शुरू करें तो? शायद जन्मतिथि से ही शुरू करना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट के जजों के पेज पे, आपको खास ऑफिसियल फोटो (खास क्या है, वो फोटो में ढूँढों) के साथ-साथ जन्मतिथि, joining date or retirement date भी मिलेंगी। और ज्यादा जानना हो, तो उन जजों के केसों के बारे में पढ़ सकते हैं। और भी ज्यादा जानना हो, तो गूगल बाबा या Youtube जैसी सोशल साइट्स हैं ना।  






और भी कितना कुछ रोचक है, सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पे। जैसे किसी भी संस्थान की वेबसाइट पे। ऐसे ही, बिमारियों का समझ आ रहा है मुझे तो। बाकी, आगे किन्हीं पोस्ट में। 

Tuesday, November 28, 2023

सरवर, सर्वर, सर्वत्र और बिजली?

 ये झमाझम बारिश 

और ये बिजली का गुल होना 

दोनों हैं मानव निर्मित?

या प्रकृति की देन?

माँ के इस घर में बिजली की थोड़ी दिक्कत थी। स्विच कम थे। तो सोचा थोड़ा ठीक करवा लूँ। पड़ोस की ही एक आंटी को बोला और एक बिजली वाला पहुँच गया। एक खास तरह की नौटंकी के बाद, कुछ ऐसा काम भी हो गया जो बोला ही नहीं था। और कुछ ऐसा नहीं किया गया, जो बोला था। ये खास किस्म के 15 वाला कमीशन था? ये कमीशन वाली दुनियाँ, कुछ ज्यादा ही अजीब है। जितना आप इसे समझने की कोशिश करोगे, उतना ही इससे दूर होते जाओगे। उसपे जिस तरह के लोगों के बीच आप रह रहे हैं, कभी कभी तो समझ ही नहीं आएगा, की ऐसे-ऐसे लोगों की कमेन्ट्री पर क्या तो बोला जाए और क्या ना? एक होता है, कुछ गलत होने पे सॉरी फील करना। या सामने वाले को ठीक करने को बोलना। और एक होता है, ऐसा कुछ करने की बजाय बेहुदा कमेन्ट्री करना। और ऐसा भी नहीं है की ऐसे लोग सिर्फ आपपे ऐसी कमेन्ट्री करते हैं, वो बक्शते अपने खुद के बच्चों को भी नहीं। आदत से लचर लोग। कुछ तो अपना दिमाग कम प्रयोग करना। उसपे राजनीतिक पार्टियाँ अलग-अलग तरह के भावनात्मक तड़के लगाती हैं। मतलब, लोगों को किसी ठीक-ठाक काम पे ना लगा के, उनके दिमाग ब्लॉक करके, सिर्फ और सिर्फ फालतू और बकवास की तरफ धकेलना। अब ऐसी-ऐसी पार्टियाँ ये थोड़े ही बताएँगी की, जुर्म जुर्म होता है। वो सॉफ्ट क्राइम हो या लट्ठमार।  किसी भी तरह का बेहुदा साँड़ सिंड्रोम (Bulling Syndrome), उस केटेगरी में आता है।          

बड़े लोगों के करवाए जुर्मों की जानकारी या समझ, जिनसे ये छोटी-मोटी  नौटंकियाँ करवाई जाती हैं, उन्हें कितनी है, पता नहीं। यही सोचकर बहुत कुछ ऐसा, ज्यादातर इग्नोर करो के डिब्बे में जाता रहता है। हाँ। ये कुर्सियों पे बैठे उन लोगों के लिए जरूर है, जिनसे शायद कई बार बहस भी हुई और एक-आध अच्छा खासा लेक्चर भी दिया गया। खासकर वो, जिसमें बोला गया था की अगर इतने पढ़े-लिखे लोगों के ये हाल हैं तो बाहर जो कम पढ़ा-लिखा या तकरीबन अनपढ़ समाज है, उससे उम्मीद क्यों? उस समाज की दिशा या दशा ये पढ़े-लिखे लोग घड़ रहे हैं, कोई और नहीं। वो चाहे फिर सिविल में हों, या डिफेंस में।      

वापस बिजली पे आते हैं। क्या है, जो आम आदमी को भी समझना चाहिए, इस बिजली के बारे में? वो है, की बिजली क्या कुछ कर सकती है? कितना कुछ रिमोट कंट्रोल हो सकता है? और उसकी वजह से आम आदमी कितना परेशान हो सकता है ? वो भी उसकी जानकारी के बगैर, की दुनियाँ में बहुत कुछ अपने आप नहीं हो रहा। बल्कि किया जा रहा है। बिजली का ये राजनीतिक मकड़ज़ाल उनमें से एक है। बहुत कुछ तो नहीं मालूम इस विषय के बारे में। मगर हाँ, बिजली के इर्द-गिर्द घूमते, इधर-उधर हुए नौटंकियों और अनुभवों के हिसाब से आम आदमी से शायद थोड़ा ज्यादा मालूम है। तो आती हूँ उन अनुभवों को भी शब्दों में पिरोकर, किसी अगली पोस्ट में। 

Thursday, November 23, 2023

महारे 16-नंबरी

एक ने रक्खा 19 वाला रोड़ा 

वो ले आए 29 और ऐसे ही बढ़ाते रहे अपने खेल (जुए को आगे) 

19 वाले की शादी नहीं हुई या 29 वालों की? या उनके बच्चे नहीं हुए? 


16 को तो शिव का नंबर कहते हैं ना? फिर 16 वालों की इतनी बीरान-माटी क्यों?  

कौन-कौन हैं तुम्हारे आसपास 19 या 29 के जन्मदिन वाले? या शादी वाले? बताना कहाँ-कहाँ हैं, वो? या क्या कर रहे हैं? थोड़ी-सी निगाह तो अपने ही अड़ोस-पड़ोस या भाई-बँधो पे घुमा लो। सब ठीक-ठाक है या गड़बड़?   

और कौन-कौन हैं ये 16 के जन्मदिन वाले? या 16-नंबरी भक्ती वाले?  

16 को जहाँ मरण दिन बना दिया, उसपे इतने सारे हिसाब-किताब लगा दिए। तो क्या बचेगा, ऐसे हिसाब-किताब के बाद उनपे? तो वहाँ तो या आप शिव-भक्ती वाली राजनीति को नकारोगे या मरण-मरण ही रहोगे? ऐसा शिव और उसकी भक्ती किस काम की? उसपे शिव के नाम पे रखवा दिए, फलाना-धमकाना पथ्थर। तो इंसानों जैसी ज़िंदगी न जीकर, पथ्थरों जैसी-सी ही जिओगे। नहीं तो दे मारो, उन पथ्थरों को पथ्थर और कर दो उनका घमंड चूरचूर। कैसे काम के ऐसे पथ्थर, जो ज़िंदगी ही बना दें पथ्थर?

शिव और 16 तो पवित्र होना चाहिए? आइये जानते हैं, ऐसे नंबर वाले लोगों से ये राजनीती और ये कलाकार क्या-क्या करवाते हैं?

एक दिन एक गन्दा कालीन धोने के लिए रख दिया। एक 16 नंबरी आया और उसे पास ही रक्खी एक छोटी-सी सोफा कुर्सी पे रख गया। अजीब इंसान है? मगर पीने के बाद इतना होश कहाँ रहता है? उस कालीन को गुस्से में नीचे पटक दिया गया। मगर अगले दिन फिर वही। लगता है, उतरी नहीं अभी? कई दिन चला ये सांग। ज्यादा पीने वालों में दिमाग तो बचता नहीं। तो क्या तो बोलो और क्या ना बोलो? ऐसे-ऐसे मानव रोबोटों को? उनसे जो करवाया जाएगा वो कर देंगे, अपना दिमाग लगाए बगैर।    

यहाँ तक होता तो भी चल जाता। एक दिन, अपने 16-नंबरी परदे के पीछे डंडा रख गए और लड़खड़ाती जुबान गाए, "मारो साली को" । पता नहीं किसकी साली को मार दें, ये पीने वाले? अब साला या साली तो, ऐसे लोगों की कक्षा का क ख ग होता है। उससे आगे तो पता ही नहीं क्या-क्या आता है। गालियों से नफरत करने वालों को इनकी क्लास अटैंड जरूर करनी चाहिएँ। जुबान सिर्फ बेहुदा ही नहीं, बल्की कुछ खतरनाक भी गा रही थी। परदे के पीछे छुपा डंडा, उसका संकेत भर था। इधर-उधर से सावधान करने वालों के संकेत भी चल रहे थे, की गाँव से निकलवाने वाले, कहीं पुरे घर को ना खा जाएँ। ये खास भड़काने वाली पार्टियों की तरफ ईसारा था। जिनके कारनामों, खास तरह के भडकावों का खूँखार रूप, ये घर पहले ही भुगत चुका था। और उसे बहुत वक़्त भी नहीं हुआ था। मगर किन्हीं बाहरी पार्टियों को क्या कहोगे आप, जब आसपास से ही ऐसी-ऐसी साज़िशें चलने लगें? या कहना चाहिए की बहुत आसान होता है दिमाग से पैदल लोगों को, कोई भी भावनात्मक भड़काव पैदा कर, अपने फायदे के लिए उनका दुरुपयोग करना। और भी कई तरह के डरावे थे। कभी इस रंग का चाकू तोड़ के कहीं रख जाना। कभी उस रंग का चाकू तोड़के कहीं रख जाना। मगर, पीले रंग का चाकू, बिना तोड़े बैड पे रख जाना। वो भी किन्हीं खास-खास तारीखों को, वो भी चदर इधर-उधर फैंक के। एक तरफ ये 16-नंबरी के कारनामे। 

तो दूसरी तरफ, किसी पड़ोस से खास तरह का प्रचार, फलाना-धमकाना की पत्नी को फलाना-धमकाना ने ऐसे-ऐसे पीटा। वो भी खास तरह के इफेक्ट्स के साथ। चद्दर या कपड़ों वाले स्पेशल इफेक्ट्स। वो बच्चे जो आपके लैपटॉप से मारपिटाई के विडियो उड़ा दें, बगैर ये जाने-समझे, की उनकी कॉपी पता ही नहीं कहाँ-कहाँ पड़ी हैं। वो ऐसा कुछ गाएँ? दोगली सोच, व्यवहार या मानव रोबोट बन जाना?    

सबसे बड़ी बात, आसपास के लोगों द्वारा बच्चे को जिस तरह से किडनैप किया गया। और बच्चे ने फिर जो कुछ बताया। उसे कुछ खास ऐसे कहा गया या उसके सामने बहुत कुछ ऐसा बार-बार गाया गया। उसपे उसकी पढ़ाई का भठा बिठाने की कोशिश। वो लोग जो बच्चे पे मरते हैं, वो ऐसा कैसे कर सकते हैं? उससे सबकुछ छीनने की कोशिशें। जब ये सब पता करने की कोशिश की, तो वही इल्जाम मुझपर फेंकने की कोशिश हुई, उन्हीं लोगों द्वारा। बेवकूफ लोगों के दिमाग में अजीबोगरीब शुभ-अशुभ भर के, ईधर ऐसे भड़काओ और उधर वैसे? फुट डालो, राज करो विभाग?        

मतलब सबको आपस में ही भीड़ा-भीड़ा के मार डालो। इससे बढ़िया मानव रोबोटों वाली, एक के बाद एक, क्रूर  सामान्तर घढ़ाईयों की कोशिश, मैंने तो इतने पास से देखी, सुनी या अनुभव नहीं की ज़िंदगी में। कैंपस क्राइम सीरीज, फीकी पड़ गई, इन सबके सामने। कालीखी विभाग? ऐसे लोगों के लिए 16-नंबर, शिव या किसी भी भगवान के क्या मायने हो सकते हैं? सिवाय, उस माध्यम से राजनीति कूटने और अपनी स्वार्थ  सिद्धि के?   

ऐसी-सी ही कुछ कहानियाँ बीमारियों, लोगों को हॉस्पिटल तक पहुँचाने और वहाँ से उठाने, खास तरह के ऑपरेशन करने, या वापस घर भेजने की हैं। इतने तरह के enforced एजेंडा, इतने तरह के लोगों को, कितनी ही तरह से काबू करना और कितने ही तरह के यहाँ-वहाँ सूक्षम कंट्रोल। मानव संसाधनों और टेक्नोलॉजी का कितना दुरुपयोग? कितनी ही तरह से? कितनी ही तरह के मानव द्वारा ईजाद किए गए दुख, परेशानियाँ और हादसे? सबसे बड़ी बात, आम आदमी को अहसास तक ना होने देना की ये सब कैसे किया जा रहा है। और साहब लोग चाहें, की लोगबाग ज़ुबानों को सील कर बैठ जाएँ? कलमों को पेंसिल बना दें या तोड़ डालें? लैपटॉप, इंटरनेट से दूर रहें या उन्हें वायरस के हवाले कर दें। दिमाग बंद कर, बस उनके भक्त बने रहें?   

Monday, November 20, 2023

समस्याएँ और समाधान ?

कहीं पुस्तैनी जमीन जायदाद के झगडे, तो कहीं सरकारी भी हमारे बाप की प्राइवेट लिमिटेड? 

नागीन-सपेरा? 100-100 नाग पड़े रहं गल मैं, सामान्तर घड़ाई? जहाँ-जहाँ नाश उठाना हो, वहीं छुपम-छुपाई खेल शुरू हो जाते हैं?    

कमजोर वित्तीय स्थिति के लोगों के विवाद हैं ये? ऐसे विवाद, तब ज्यादा होते हैं, जब एक ही घर हो और उसे प्रयोग करने वाले कई। सबके अपने-अपने घर होंगे, तो ऐसे विवाद ही कहाँ से पनपेंगे? बढ़िया है ना, की अपने-अपने घर ढूँढो या बनाओ। इन पुस्तैनी जमीनों के वाद-विवादों से दूर कहीं।  

मगर उसके हिसाब से पैसा चाहिए। उसपे जहाँ आप रहना चाहते हैं, उसके हिसाब से पैसा चाहिए। वो तो कमाना पड़ेगा। बगैर, काम-धाम या मेहनत किए तो कुछ नहीं हो सकता। मगर यहाँ पे अजीबोगरीब तरह के किस्से-कहानियाँ हो सकते हैं। जैसे, दो भाई या दो बहन हों। एक मेहनत करके खाए। दूसरे ठगु को पता ही ना हो, वो क्या बला होती है? गलती शायद बहुत ज्यादा उसकी भी ना हो। माहौल, संगत, जो अच्छे भले लोगों को कामचोर और अपाहिज बना देता है। ज्यादातर गरीब इलाकों की या गरीब लोगों की अलग-अलग तरह की अजीबोगरीब सोच। जिसका इलाज सिर्फ और सिर्फ मेहनत है। ये तो हुई पुस्तैनी घरों या जमीनों की बात। 

तुम, खास किस्म के महान लोग, कब-कब और कहाँ-कहाँ, कह सकते हो उसे, की मेरे घर से निकल? वो भी पुस्तैनी मकान या जमीन पर बने घर से? ये कहानी भी, किसी एक औरत की नहीं है यहाँ। हर कमजोर औरत की? कमजोर औरत? या शायद कमजोर तबका। फिर वो चाहे औरत हो, या पुरुष? 

क्या हो अगर आपको पुस्तैनी चाहिए ही नहीं? आपके पास सरकारी हो और उस मकान के कोई खसम बने बैठे हों?  

एक वजह 

राजनीती के मकड़जाल और सामान्तर घड़ाईयों की सोच की पैदा की गई सोच है। जिसमें, जिसकी लाठी, उसकी भैंस का महान मंत्र है। सोचो, आप यूनिवर्सिटी में टीचर हों। वहाँ का कर्मचारी होने की वजह से कैंपस घर, आपकी नौकरी की वजह से, बहुत सारी और सुविधाओं की तरह ही, एक सुविधा हो। कुछ अलग से खास नहीं। और आपको किन्हीं ऐसे लोगों से सुनने को मिले, "मेरा घर खाली कर", जिनकी कम से कम योग्यता भी, उस नौकरी के आसपास ना हो? और ना ही वो यूनिवर्सिटी के कर्मचारी, किसी भी स्तर पर। एक बार तो आप यही सोचेंगे, की खिसके हुए बन्दे हैं। या अगर कोई लड़की हो, जो ससुराल से घर आ बैठी हो, तो शायद ज्यादा ही दुखी है, ससुराल वालों से। शायद इसलिए दिमाग खराब हो गया है। थोड़ी मेहनत घर के कामकाज की बजाय, अगर ध्यान पढ़ाई पे दे, तो शायद कुछ भला हो जाए, ऐसे-ऐसे लोगों का भी। क्यूँकि, ऐसा भी नहीं है, की दिमाग या मेहनत की कमी है। मेहनत, घर के वाद-विवादों और कामकाज में व्यस्त है। और दिमाग, मानव रोबोट वाली राजनीतिक सामान्तर घड़ाईयों का मारा। मानव रोबॉट, खुद का दिमाग ही नहीं प्रयोग हो रहा हो, जैसे। मतलब गड़बड़ फिर से माहौल, मीडिया (वही बायो वाला मीडिया), जिसके मकड़जाल में लोगबाग हकीकत और भावनात्मक-भड़काव तक का फर्क नहीं महसूस कर पाएँ। चलती-फिरती गोटियाँ या मानव रोबॉट।     

यूनिवर्सिटी के माहौल से निकलने के बाद, आपको वहाँ का माहौल ही, अपने लिए सबसे बड़ा अवरोध नजर आने लगे। आपको लगने लगे की उस माहौल से निकलना भी जरूरी है। क्यूँकि, आप उस नौकरी की वजह से, खुद को मकड़जाल में फँसा हुआ अनुभव करने लगें? 

दूसरी साइड/वजह 

कहीं से नेक सलाह, वो भी धमकी की तरह जैसे। वो भी फिर किसी ससुराल से घर बैठी हुई लड़की से। कितनी नेक? " तुम्हारे पास और कोई विकल्प नहीं है। ये नौकरी या भारत से बाहर।" ये नौकरी का मतलब है, यहाँ-वहाँ, कोरे पन्नो पे दस्तखत। जो पहले ही बहुत नहीं हो चुका? वही साइको तमाशा। और सोचो, ये सब हमारे महान सुप्रीम कोर्ट और सरकार की देखरेख में हो? बाकी पार्टियाँ भी पार्टी हों, ऐसे-ऐसे समझौतों में? बहुत से प्रश्न खनकने लगते हैं, ये सब जानकर या सोच समझकर। 

कमजोर वित्तीय स्थिति के लोगों के विवाद? या जुआरियों और शिकारियों की वजहें हैं, इन सब विवादों की? क्यूँकि, देश तो हैं ही नहीं। ना ही कोई कानुन। बस जुआ और शिकार? जिसका दाँव चल जाए, जैसे भी, जहाँ कहीं भी। और महान देश के कर्ता-धर्ता कहें, इस जुए से बाहर कोई दुनियाँ ही नहीं है। मतलब, समस्या ही समाधान है? या समाधान भी समस्या?           

Wednesday, November 15, 2023

खास बच्चों के लिए और उनके अभिभावकों के लिए

कुछ वक्त पहले सुनने में आया की किसी बच्चे को बहुत ही छोटी उम्र में हॉस्टल भेझ दिया गया। जहाँ कोई और समाधान ना हो, वहाँ तो शायद सही है। लेकिन, अगर कोई सिर्फ ये सोचकर भेझने की सोचें, की इससे उस बच्चे का ज्यादा भला होगा, तो सही नहीं है। अगर घर के हाल बहुत बुरे नहीं है, तो कम से कम स्कूल तक तो उसे घर का माहौल चाहिए। उसका कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता। पैसे से आप उसे घर का माहौल या माँ-बाप का प्यार या देखभाल नहीं दे सकते। हाँ। अगर आपके पास अपने बच्चों के लिए वक्त ही नहीं है, तो मान के चलो कुछ भी नहीं है। स्कूल के बाद तो ज्यादातर पढ़ाई, वैसे ही घर से दूर रहके होती है। इतने छोटे बच्चे उतने परिपक्कव भी नहीं होते की अपना भला या बुरा समझ सकें। और ज्यादातर मिडिल क्लास के स्कूलों के हॉस्टल, ना ही उतने अच्छे। Day Boarding तक तो फिर भी समझा जा सकता है। क्यूँकि, ज्यादातर बच्चे स्कूल के बाद टूशन पे होते हैं, खासकर जिनके यहाँ पढ़ाने वाले नहीं होते।   

जो माँ-बाप जितनी ज्यादा मेहनत अपने बच्चों के साथ उनके काम करवाने में करते हैं, उतना ही उन्हें इस चूहा-दौड़ में कम झुझना पड़ता है। जरुरी नहीं आप उतने पढ़े लिखे हों या आपको एक क्लास से आगे सबकुछ आता हो। बहुत जगह देखा है, की छोटी-छोटी सी चीजें, जैसे बच्चा जब पढ़ रहा है, तो सच में पढ़ रहा है या इधर-उधर वक्त ज्यादा बर्बाद कर रहा है, देखना मात्र ही बहुत होता है। कभी-कभार उसके साथ देर रात तक जागना, खासकर पेपरों के वक्त या सुबह उठाकार पढ़ने की आदत डालना ही काफी कुछ बदल देता है। ऐसा मैंने अपने कुछ cousins के यहाँ या दोस्तों के यहाँ देखा है। बच्चा रात को लेट पढ़ रहा है और माँ या बाप साथ में जाग रहे हैं। वो भी स्कूल के स्तर पे नहीं, बल्की यूनिवर्सिटी के स्तर पे। जबकी सुबह माँ-बाप को नौकरी पे भी जाना होता है, वो भी घर का काम करके। और अगर पूछो की ये तो खुद ही पढ़ लेता है या पढ़ लेती है, फिर आप क्यों जगरता करते हैं? जवाब मिलेगा, अरे उसे लगेगा कोई और भी साथ जाग रहा है, तो नींद कम आएगी। अब हॉस्टल में तो बच्चे रातभर जागते हैं। एक-दूसरे से होड़ रखते हैं, तो माहौल ही अलग होता है। घर पे सब सोते दिखेंगे तो उसे भी नींद जल्दी आएगी। क्यूँकि हॉस्टल में, खासकर पेपरों के दिनों में ऐसा ही होता है। जैसे कोई सो ही नहीं रहा।    

हालाँकि, जिन्हें लगन होती है, वो ये आदतें खुद भी बना लेते हैं। मगर बहुतों को शायद थोड़ा-सा दिक्कत होती है, खासकर ऐसे माहौल में, जहाँ पढ़ाई का मतलब या तो जबरदस्ती का टूशन हो या धमकाना और डराना। कुछ तो उससे आगे चलके, दे पटापट भी शुरू हो जाते हैं। वो दे पटापट या जबरदस्ती वाले ज्यादातर, 10-12 के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। और फिर ज्यादातर उन्हीं माँ-बाप का सिर फोड़ते हैं। और ऐसे माँ-बाप ऊपर से ये भी कहते मिल सकते हैं, की हमने तो बहुत किया, अपने बच्चों के लिए। क्यूँकि उन्हें शायद मालूम ही नहीं, की बहुत वाले कितना करते हैं। बहुत कुछ ना करके भी, पढ़ाई का माहौल देने की कोशिश करना, कहीं ज्यादा काम करता है। ऐसा माहौल, जहाँ बच्चा अपने आप पढ़ना शुरू करे। क्यूँकि, जबरदस्ती की बजाय, माहौल और लगन ज्यादा कारगार होता है। यहाँ माँ-बाप पे बेवजह का प्रेशर डालना नहीं है, सिर्फ ये बताना है, की पैसा सबकुछ नहीं दे सकता। जब तक आप अपने बच्चे को वक्त तक नहीं दे सकते।  

Saturday, November 11, 2023

राजनीतीक तड़क-भड़क वाले त्यौहार, धर्म और रीती-रिवाज

राजनीती के साँचे में ढलते त्यौहार, धर्म और रीती-रिवाज? राजनीती के अनुसार बदलते, पुरातन में लिखी गई कहानियों के अवतार, भगवान? हों चाहें फिर वो, राम-शिव, हनुमान या दुर्गा, संतोषी और काली। समय के साए में रमते, बाजार की राह चलते, हर तरह के रीती-रिवाज। राजनीती की जरूरतों के अनुसार बदलते, होली-दिवाली। वो लगाएंगे तड़के, तुम्हारी भावनाओं पे ऐसे भी, और वैसे भी। और तुम बहते जाना इन भावनात्मक भड़काओं में, बगैर सोचे-समझे, उनके पीछे छुपे षड़यंत्र। राजनीती वाले सेकेंगे उनपे, अपनी-अपनी कुर्सियों के लिए चालें और घातें। तुम्हें क्या मिलेगा उनमें? ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे प्रसादों के पीछे क्या छुपा होता है? वैसे ही जैसे, आपको नहीं मालुम, की ये LEGEND और HERO क्या होता है। और इसका उल्टा PLATINUM या SPLENDER या ऐसा कुछ और नहीं होता। बल्की अज्ञानता के दायरे से बाहर निकल, अपने-अपने कामों पे आगे बढ़ना होता है। भावनात्मक भड़क नहीं लेनी होती।   

ट्रैक्टर-ट्रॉली शो। वो भी दिवाली पे? वो भी राम के नाम पे नहीं, बल्की शिव के नाम पे? धुआं-धुआँ? कितना धुआँ? इनका उल्टा POP-UP शो नहीं होता। ना ही पटाखे या फुलझड़ी शो होता है। बल्की, दिमाग की वो बत्तियाँ on करनी होती हैं, की तुम्हारे आसपास कैसा समाज है? कैसे लोग हैं? और क्या कुछ करते हैं या व्यस्त कहाँ रहते हैं? क्युंकि, उसका कुछ ना कुछ असर तो आपपे भी होगा। राजनीती लोगों से क्या करवा रही है और क्यों? और लोगों को कहाँ व्यस्त रखती है? जितने ज्यादा कम विकसित समाज या लोग होंगे, उतने ही ज्यादा ऐसे-ऐसे राजनीतिक भावनात्मक भड़कों के जालों के आसपास मिलेंगे। ऐसे जालों से थोड़ा दूर रहना है, निकलना है। ना की उनका हिस्सा हो जाना। 

दिवाली मुबारक हो राम और सिया वाली। बुराई पे अच्छाई वाली। दीयों वाली। ना की बाजारू दिखाओं वाली या राजनीती की अजीबोगरीब भावनात्मक भड़क, आम इंसान में पैदा करने वाली। दिवाली ना तो भंडेलों का तांडव है और ना ही गरीबों का दोहन। एक तरफ सुना है, वो योद्धा होते थे, जो अपने से ज्यादा ज्ञानवान का सम्मान करते थे, दुश्मन होते हुए भी। एक तरफ आज के भंडोले हैं, जो कुछ ना आता जाता हो तो भी कहें, की बस हम ही हम हैं।

Saturday, November 4, 2023

शब्दों के खेल

हर शब्द विशेष है। उसके अपने मतलब, अपनी खासियत है। जैसे पूजा  

गणेश पूजा ? 

या सरवस्ती पूजा ?

या बजरंगी पूजा ?

या शिव पूजा ?

पूजा शब्द एक है, मगर उसके साथ, अगर कुछ और जुड़ा है, तो वो उसका अर्थ एकदम से बदल देगा। एक शब्द की महिमा से राजनीती भी बदल जाएगी। उसके पीछे छिपा, विज्ञान भी। और आम-आदमी से उस राजनीतिक विज्ञान का, वाद-विवाद और संवाद भी। क्यूँकि, आम-आदमी से वाद-विवाद या संवाद का मतलब, भावनात्मक भड़क । हम किसी विषय को लेकर कितने सवेंदनशील हैं। उसी सवेंदनशीलता को हमारे खिलाफ भी प्रयोग किया जा सकता है। कुछ सवेंदनशीलता एक दुखती रग जैसी होती हैं। जिसे थोड़ा-सा छुआ नहीं, की भड़क गए। यही भावनात्मक भड़क है। भड़काने वालों के लिए, वही आम-आदमी से छल-कपट का माध्यम भी। जैसे राजनीती, इतना मंदिर-मस्जिद क्यों करती हैं? खासकर, चुनाओं के दिनों में? राजनीती को मालूम है, की धर्म-अधर्म, जात-पात के विषय, आम-आदमी के लिए संवेदनशील मुद्दे हैं। कितना ही गरीब आदमी क्यों न हो, अपनी गरीबी भूलकर, जीवन के अहम मुद्दे, रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य भूलकर, ऐसे-ऐसे मुद्दों पर अड़ जाएगा। जैसे उससे आगे दुनियाँ खत्म है। 

बड़ी-बड़ी कंपनियों को तो और भी कैसी-कैसी, आम-आदमी की दुखती रगों का ज्ञान है। सब डाटा-खनन की वजह से। और वो उनको भुना के आम आदमी को खाती हैं। सिर्फ और सिर्फ पैसे और कुर्सियों के लिए। वो भी गुप्त तरीकों से। और आम आदमी को उसका ज्ञान भी नहीं। डाटा-खनन वो ज्ञान और विज्ञान है, जो आपके बारे में वो सब जानता है, जो खुद आप और आपके बहुत अपने भी नहीं जानते। अब आपका तापमान कितना है? 10 दिन पहले कितना था? 10-20 दिन बाद कितना होगा? या आपको कौन-सी बीमारी हो चुकी, अभी है या आगे हो सकती है? या कौन-कौन सी ना हुई, ना हैं, और ना हो सकती? मगर घड़ी जा सकती हैं, बड़ी आसानी से। है ना आपके अपने डाटा का कितना बड़ा शोषण, खुद आपके खिलाफ? सब राजनीती और बड़ी-बड़ी कंपनियों की मिलीभगत से। जब राजनीती वाले आम-आदमी से डाटा की बात करेंगे, तो शायद कुछ ऐसा बताएं, दिखाएं या सुनाएं; जो आपकी भावनाओं को भड़काए। मगर, हकीकत के पास होकर भी, बहुत दूर हो। इसी को मानव-रोबोट बनाना बोलते हैं। आपके बारे में जानकारी जितनी ज्यादा होगी, उतना ही आसान होगा, आपको मानव-रोबोट बनाना। यही नहीं, इल्जाम भी आपपे ही लगा देना। यही आज की SMART दुनियाँ है। अब शब्द भेद देखो। एक तरफ, SMART मतलब बुद्धिमान और दूसरी तरफ, हद दर्जे के गिरे हुए छल और कपट।                          

जुड़ाव, रीती-रिवाजों के माध्यम से, धर्म-कर्मों के माध्यम से। और संस्कृति के जालों के माध्यम से। जैसे किसी संस्कृति में काला कपड़ा शादी भी पे पहना जाता है, तो किसी में सफेद। किसी का शादी का कपड़ा लाल होता है, तो कहीं कुछ और भी हो सकता है। वही रंग जो एक धर्म या संस्कृति या रीती-रिवाज में शुभ अवसर पे पहना जाता है, किसी दूसरी संस्कृति या रीती-रिवाज में अशुभ पे। जैसे हिन्दुओं में, सफेद ज्यादातर किसी की मौत पे पहनते हैं, तो ईसाईयों में शादी पे। इसको PK में अच्छे से दिखाया गया है। 

शुभ-अशुभ क्या है? जो आपको नुकसान ना करे, या फायदा पहुँचाए, वो शुभ है। जो किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाए, वो अशुभ। गलत तरीकों को अपनाके भी, किसी का नाजायज फायदा लेने की कोशिश करना भी अशुभ ही है। जैसे काला रंग, एक तरफ रहस्य्मय माना जाता है, इसलिए आम आदमी के लिए थोड़ा खतरनाक भी। इसलिए ज्यादातर अशुभ माना जाता है। तो दूसरी तरफ, सत्ता के लिए रहस्य्मय होना, मतलब, अपनी चालों, घातों और छलों को छुपाना। हर तरह का साम, दाम, दंड, भेद प्रयोग करके भी, शुभ है। सत्ता के गलियारों के ज्यादातर शीशे काले होते हैं। खुद को और अपने गुनाहों को छुपाने के लिए। मगर वही शीशे, सफेद मिलेंगे या कहो ऐसे मिलेंगे, जिनके आर-पार, साफ-साफ दिखता हो। जब-जब कुछ "दिखाना है, बताना नहीं" का सवाल हो। क्यूंकि, वो साफ-साफ तो आम जन को दिखाने के लिए है। कालिख उसके पीछे छुपा है। जिसमें ज्यादातर विज्ञान का दुरूपयोग है। 

एक माँ अपने बच्चे के कान के पीछे काला टिक्का लगाती है और बोलती है, किसी की नजर ना लगे। मतलब, बुरी नजरों से बचाना। अब कोई काला टिक्का, वो भी कान के पीछे लगा, किसी काली नज़र से कैसे बचा सकता है? क्या विज्ञान या मनोविज्ञान होगा इसके पीछे? वैसे ही जैसे चौराहे पे, पैर आ गया या माता धोकन जाऊँ सूं? और भी कितने शब्दों के अर्थ वैसे नहीं होते, जैसे वो समझ आते हैं या दिखते हैं। 

जैसे कोई बोले आप मंजु हैं। और आपको घर पे कोई मंजु बोलते हों। माँ ने दिया हो, वो नाम। फिर वो बोलें, मंजु रानी? और आप बोलें ना बेटा, हमारे यहाँ रानी-महारानियाँ नहीं होती। वो काम करने वाली होती हैं, घर पे। फिर बोलें, अच्छा तो आप फलाना-धमकाना की बेटी हैं या पोती हैं? किसी और का नाम लेके। आपके अपने माँ-बाप या दादा-दादी का नहीं। और आपको बोलना पड़े, हाँ, वैसे-ही, जैसे आप अपने माँ-बाप के नहीं, किसी और के माँ-बाप के हैं। कितना बेहुदा हो सकते हैं ना लोग? अब एक शब्द किसी और शब्द या शब्दों के मिलकर बनने से मौलिक नहीं रह जाता, बल्की कृत्रिम (Synthetic) जैसा हो जाता है। जैसे, हर शब्द की अलग पहचान है। अलग अर्थ है, वैसे ही हर इंसान अपने आपमें अनोखा है। वो कोई और हो ही नहीं सकता। हाँ। राजनीती या जुए के खिलाड़ी, उसे alter-ego बता सकते  हैं । 

Alter, शब्द का अर्थ क्या है? बदलना। अपने अनुसार फिट करना। इधर-उधर से जोड़ना-तोडना, काटना वैगरह। जैसे कोई कपडा आपको फिट ना हो और आप टेलर को कहें, इसे alter कर दो। Ego, मतलब अहंकार। खासकर, जब आप इसे आदमी पे प्रयोग करते हैं। यही है alter ego।  बड़े कहे जाने वाले लोगों में, शायद ये अहंकार ज्यादा होता है। तुम जैसा मैं चाहता हूँ, वैसे क्यों नहीं हो? हम अब तुम्हें, अपनी मन चाही alter ego बनाएंगे। Alter ego, एक तरह की छवि भी। जैसे कोई बोले, मुझे पता है, तुम्हारी छवि क्या है। आप बोलें क्या है? अब एक इंसान के लिए वो अच्छी भी हो सकती है। किसी दूसरे के लिए, शायद बहुत अच्छी। किसी तिसरे के लिए, शायद उतनी अच्छी ना भी हो। राजनीती में इसे Perception War भी कहते हैं। आम-आदमी के बीच, जब राजनीतिक पार्टियाँ लड़ती हैं, तो इसी Perception War को लड़ती हैं। उनके प्रचार-प्रसार माध्यम, इसी छवि के इर्द-गिर्द, पैसा पानी की तरह बहा रहे होते हैं। उसमें मीडिया और राजनीतिक शाखाएँ अहम भूमिका निभाती हैं। इसीलिए राजनीती में चीरहरण भी होते हैं जिन्हे Character-Assassination बोला जाता है। इसीलिए वो दिखाना है, बताना नहीं जैसे खेल खेलते हैं। खेल, आम आदमी की ज़िंदगियों के साथ। जहाँ हर तरह की बुद्धिमता, छल और कपट प्रयोग होता है। इसीलिए कहा जाता है, की जो दिखता है, वो होता नहीं। और जो होता है, वो दिखता नहीं। मगर देखना चाहो, तो दिखने भी लगता है और सुनने भी।                      

Wednesday, November 1, 2023

समाज का अमानवियकरण (Dehumanization of a Society)

पहले भी कई बार लिख चुकी की राजनीती के इन जालों के सामान्तर घढ़ाईयों का नुकसान, वहाँ का समाज भुगगता है। जितना ज्यादा किसी भी समाज को, ऐसे राजनीतिक जालों का हिस्सा बनाया जाता है, वो उतना ही ज्यादा पिछड़ता जाता है। 

शुरू में मुझे जब ऐसे कई क्रूर और अमानवीय तथ्यों की जानकारी हुई, तो हजम ही नहीं हुआ, की लोगबाग इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं ? किसी को तो बक्सें। बच्चे, बुजुर्ग, अपाहिज, बेजुबान जीव-जंतु, पेड़-पौधे, ये तो किसी को भी नहीं बक्शते। मौत पे भी किसी की रैली पिट या पिटवा सकते हैं और शादी पे मातम मनवा सकते हैं। कुर्सियों के चक्कर में, कितने अंधे हो जाते हैं लोग?

कुछ सामान्तर घड़ाईयाँ   
      
मैं रिलायंस से सामान लाती थी। एक दिन ऐसे ही ऑफिस के बाद पहुँच गई और गाड़ी उसके सामने पार्क कर दी। सामान लेके वापस आई, तो मेरी गाड़ी के साइड में, SP के घर और रिलायंस के बीच, एक बुजुर्ग औरत, तकरीबन आधे से ज्यादा नंगी और लैट्रिन से लथ-पथ कपड़े, बिखरे-उलझे गंदे बाल, मक्खियों की उसपे भरमार, वहाँ खड़े कुछ लड़कों से जैसे खुद को दिवार की तरफ छिपा रही हो। उस जगह पे ऐसा नज़ारा? मैं उस औरत को बोलने ही वाली थी, की पीछे से किसी ने बोला, मैम, गाड़ी उठाओ और निकलो। दिखता नहीं, वो SP के घर के बाहर जैसी जगह बैठी हुई है। उन दिनों ड्रामे बहुत हो रहे थे, मुझे भी लगा हो सकता है, कुछ गड़बड़ हो। इसलिए चुपचाप निकल आई। मगर हजम नहीं हुआ। अगले दिन फिर ऑफिस के बाद, मैं वहाँ से गुजरी। मगर वहाँ सब साफ था। उस वक्त समझ नहीं आया, की वो सब क्या था? 

शायद कोई extreme hype? असलियत या महज ड्रामा? पता नहीं। 

मैं किन्ही के यहाँ गई हुई थी। वहाँ अकसर एक बुजुर्ग-अपाहिज खाना या पानी माँगने आता था। वो चलता भी बैठ के ही घिसट-घिसट के था। मगर जिस अकड़ और शब्दों से उनसे माँगता था, यूँ लगता था, क्या है ये। वो जिनसे ऐसे बोल रहा था, उन्हें बोला भी, आप डाँटते क्यों नहीं इसे? ये क्या तरीका है, बोलने का? उन्होंने कहा गरीब है, उसपे अपाहिज। यहीं थोड़ा पीछे जाके, मियाँ-बीबी एक झोपड़ी में रहते हैं। कई बार गुस्सा भी आता है और डाँट भी चुकी, मगर आदत से लाचार है। दया आ जाती है, तो दे देती हूँ। मैंने नोटिस किया की वो सिर्फ उस घर की औरत से ऐसे बोलता था। बाकी से नहीं, क्यूँकि डरता था। थोड़ा और जाना उसके बारे में। बस इतना ही कहा जा सकता है की अजीबोगरीब दुनियाँ है।      

जब कैंपस क्राइम सीरीज को लिखा और समझा जा रहा था, उसी दौरान जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की तरफ भी ध्यान गया। मेरे H#30, Type-4 के पीछे एक अमरुद का पेड़ था। लाल अमरुद, मगर बहुत ज्यादा बीज। खाने में कोई खास नहीं। मैंने नोटिस किया की उस पेड़ पे कुछ मोटी-मोटी सी गाँठे उभर आई थी। और वो बढ़ती ही जा रही थी, जैसे कैंसर में होता है। एक दिन एक दोस्त घर आई हुई थी, जो अकसर आती थी। उसने पेड़ की तरफ देखा और बोला, ये तो खोखला होने लगा, खत्म समझो। मुझे भी समझ आ रहा था। उसपे किसी घर में ऐसे पेड़ की कोई अहमियत भी नहीं होती, जिसका फल कोई खास खाने लायक ना हो और पेड़ भी खोखला या भद्दा लगे। हालाँकि, बचाना चाहो तो बचा सकते हो। क्यूँकि, कुछ वक़्त बाद समझ आया की वो बीमारी क्या थी। पैदा की हुई बीमारी, वो भी इंसानों द्वारा। क्यूंकि कई और पेड़-पौधों के साथ भी छेड़छाड़ हो रही थी। किसी में ऐसे हॉर्मोन्स डाल देना की फूल ही ना आएँ। और किसी में ऐसे हॉर्मोन्स डाल देना की फूल आने के बाद भी फल ना आए। हॉर्मोन्स एक तरह के रसायन होते हैं, और बहुत तरह के होते हैं। इनकी जीवों में अलग-अलग तरह की भूमिका होती है। अहम, ये था जानना, की किस पौधे में फूल या फल ना आएं, वाले हॉर्मोन्स डाले जा रहे थे और किन घरों या इंसानो तक वैसे दुष्प्रभाव थे? वैसे पौधे और किन-किन घरों में पहुंचाए जा रहे थे और उनका वहाँ क्या हो रहा था ?  

यूनिवर्सिटी के साथ-साथ, इस अध्ययन का दायरा,मेरे अपने गाँव और आसपास के दोस्तों और रिश्तेदारों के घरों पे भी होने लगा था। और उसके साथ-साथ दूरियाँ भी बढ़ने लगी थी। जहाँ कहीं ऐसा करने वाले लोगों को लगता है, की उनके नापाक इरादों को कोई देखने और समझने लगा है और जैसे ही वो समझ आम-आदमी तक पहुँचेगी, उनका सिर्फ खेल खत्म नहीं होगा, बल्की जहाँ ऐसे लोग अच्छे और अपने बने बैठे हैं, उनकी वो इमेज भी खत्म हो जाएगी। ऐसे में, ऐसे लोग फूट डालना शुरू कर देते हैं।       

राजनीती के छद्दम युद्धों की ये विद्या पुरानी है। जितना ज्यादा आप इसे पढ़ने और समझने लगेंगे, उतना ही ज्यादा इसके दुस्प्रभावों से बचते जाएँगे। छद्दम युद्ध में हमले आमने-सामने नहीं, बल्की गुप्त रूप से और चालाकियों और छल से होते हैं। मतलब, करने और करवाने वाले दिखाई भी ना दें और सामने वाले का काम तमाम। ज्यादातर बीमारियों के राज यहीं छिपे हैं। हालाँकि, आज हम उस युग में हैं, जहाँ छुपा कुछ नहीं है। आम-आदमी का तो कभी भी नहीं छुपा हुआ था। मगर आज राजे-महाराजों का भी नहीं छुपा हुआ। काफी हद तक, वो भी इधर-उधर से निकल के आ रहा है। और ये अच्छा है, आम आदमी के लिए।     
           

Friday, October 27, 2023

टेक्नोलॉजी की नंग-धड़ंग दुनियाँ

आपको लगे घर की लाइट खराब हो गई और आप किसी बिजली वाले को बुला लें, ठीक करने? वो कहे, लाइट तो बदलनी पड़ेगी। वो पुरे घर की भी हो सकती है, और किसी खास कमरे या एरिया की भी। और कोई एक-आध प्लग की भी। ऐसा 2012 या 2013 में हुआ था, H#16, टाइप-3 में। बिजली विभाग के बन्दे ने बोला, कॉपर तार है, बहुत पुरानी। इसलिए बार-बार, शार्ट-सरकट हो रहा है। आप पुरे घर की बदलवा लो, सही रहेगा। वैसे भी आजकल यूनिवर्सिटी ये खुद करवा रही है, पुराने घरों में, जहाँ वायरिंग बहुत पुरानी हो चुकी। आपको भी लगे, की ये भी सही है। रोज-रोज शिकायत करने से तो। और हो गई नई वायरिंग, पुरे घर की। मगर उसके साथ-साथ, दूसरे तरह की समस्याएँ भी। Privacy Rights Violations और उसपे हद बेहुदा दर्जे की गिरी हुई bullying (बेहुदा साँड़ सिंड्रोम)।आप क्या करोगे? शिकायत, जहाँ कहीं होनी चाहिए। VC ऑफिस के माध्यम से SP, रोहतक। जब वहाँ से कोई जवाब ना मिले, तो DGP, हरियाणा। जब वहाँ से भी कोई खास कारवाही ना होती लगे, तो महिला आयोग, दिल्ली। मानवाधिकार आयोग, दिल्ली। जब वहाँ भी ढुलमुल रवैया लगे, तो CM, PM, MPs इस पार्टी के, उस पार्टी के, न्यूज़ चैनल्स और सुप्रीम कोर्ट।          

इसके साथ-साथ जानकारी जुटाना भी शुरू हो चुका था, यहाँ-वहाँ से, की आखिर ये निगरानी टेक्नोलॉजी (Surveillance) बला क्या है?

इसी जदोजहद में आपको खबर होती है, एक नंग-धड़ंग दुनियाँ की। टेक्नोलॉजी की दुनियाँ, जो दूर बैठे कंट्रोल होती है। इसी दौरान, बहुत से दोस्ताने दूर होने लगते हैं। लोगों के फोन नंबर बदलने लगते हैं। कुछ के शहर और देश भी। बहुतों से आप दूरी बनाने लगते हैं, या शायद दूसरी तरफ से लोगबाग दूर होने लगते हैं, जिस किसी वजह से। कोड की भाषा में इन्फेक्शन का खतरा? जो कोरोना के दौरान समझ आया। अगर आप कोई गुप्त जानकारी बाहर निकालने लगें तो उससे कुछ लोगों को इंफेक्शन का खतरा हो जाता है। इसलिए बहुत से अंजान और अनभिज्ञ लोगों को भी, आपसे दूर कर दिया जाता है। ताकी सही जानकारी उन तक ना पहुँचे। सिर्फ उतनी ही जानकारी दी जाए जो उन पार्टियों के अपने स्वार्थ के लिए जरूरी हो। यही है राजनीती का रंगमंच। 

इसी दौरान कुछ और फिल्में  इधर-उधर से हिंट के रूप में आती हैं। उनमें से एक है, DEJA VU। जब इंवेस्टीगेशन ही, या भी, जुर्म बन जाए?   

सोचो इतना कुछ होने पर भी news channels, वो सब सीधा-सीधा ना दिखाके, गुप्त भाषा में ही प्रशारित करें? धीरे-धीरे, एजेंडा-सेटर्स का भी जाल समझ आने लगता है। ये इधर हैं, वो उधर हैं, वो उधर हैं और वो उधर। कौन-सी दुनियाँ है ये? किस तरह के संसार में हैं, हम? और उस संसार की खबर भी, कहीं न कहीं, इन्हीं माध्यमों से होती है। मतलब दुनियाँ इतनी भी बुरी नहीं, मगर फिर भी इतनी गुप्त क्यों है और उसमें बदलाव उतना क्यों नहीं हो रहा, जितना होना चाहिए?

दुनियाँ एक कोढ़ है। कोडॉन वाला कोढ़। आपसे पहले भी शिकार हुए हैं और आपके बाद भी। और अगर कहीं न कहीं, इस गंदे धंधे वाले गुप्त युद्ध को रोका नहीं गया, कहीं न कहीं टेक्नोलॉजी पे लगाम नहीं लगी, तो आम-आदमी जैसे मरता रहा है, कीड़े-मकोड़ों की तरह, मरता ही रहेगा। और अहम बात ये, की उसे खबर भी नहीं होगी की हकीकत, "दिखाना है, बताना नहीं" से परे है। सीधा-सीधा षड्यंत्र (Implanting) के तरीके या गुप्त तरीकों से मानव-रोबोट घड़के या दोनों साथ-साथ प्रयोग करके।      

Tuesday, October 24, 2023

दशहरा

त्यौहारों के रंग, राजनीती के संग? तथ्य, अपने-अपने तो रीती रिवाज़ भी अपने-अपने? 

कहानियाँ, जो लिखी किसी ने। फिर पढ़ी किसी ने। फिर बढ़ी आगे ऐसे ही, पीढ़ी दर पीढ़ी। त्यौहार, जिनमें छुपी होती है, अच्छाई की जीत, बुराई पे। त्यौहार जिनपे होती है, साफ-सफाई घरों की, दफ्तरों की, आसपास की, मोहल्ले की। त्यौहार, जिनपे होती है साज-सज्जा, बनते हैं अच्छे-अच्छे पकवान। त्यौहार, जिनपे होते हैं लोगबाग खुश, और बँटती हैं खुशियाँ चारों और। यही जानते हैं ना हम सब, त्यौहारों के बारे में?    

या फिर कुछ और भी?

त्यौहार जिनके बदलते हैं, किस्से और कहानियाँ वक़्त के साथ? त्यौहार, जिनकी बदलती हैं तारीखें, सत्ताधारी पार्टी के अनुसार? त्यौहार, जो सजते हैं और ढलते हैं, बाज़ारी ताकतों के अनुसार? त्यौहार, जिनके शुभ और अशुभ मुहूर्त निकलते हैं, सत्ताधारी पार्टी के अनुसार? त्यौहार, जिनके रीती-रिवाज़ बदलते हैं, राजनीतिक तथ्यों के अनुसार? त्यौहार, जिनके रूप, स्वरूप, किस्से होते हैं, अलग-अलग,अलग-अलग राज्यों या देशों में। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे, जो हमारे भगत सिंह हैं वो उनके आतंकवादी? या जो उनके आतंकवादी हैं वो हमारे भगत सिंह? हम पूजें राम को और वो रावण को? हमारे मंदिरों में राम, तो उनके मंदिरों में रावण? इनका दश हरा तो उनका विजय दशमी? त्यौहार, रीती-रिवाज़ और बाजार? त्यौहार, रीती-रिवाज़ और राजनीती? हर त्यौहार पे, हर रीती-रिवाज़ पे, थोड़ा-सा संवाद जरूरी है, शायद? उनके बदलते रूप-स्वरूपों और उनके रीती-रिवाज़ों के, ढलते बाजारू ताकतों के इर्द गिर्द या राजनीती के अनुसार? जैसे किसी इंसान के दश सिर होना, तर्कसंगत नहीं है। वैसे ही, जैसे देवी या देवताओं के दो से अधिक हाथ होना। लिखने वालों ने कहानियों के किरदारों में कितनी कल्पना का प्रयोग किया होगा? और वक़्त के अनुसार, उनमें क्या-क्या नया जुड़ गया होगा? या जोड़ दिया गया होगा? या शायद कुछ पुराना मिट गया होगा या मिटा दिया गया होगा? शायद, धर्म या रीती-रिवाज़ पढ़ाते वक़्त, तर्कशील होना भी, शिक्षा का अहम उद्देश्य होना चाहिए।

तो आज जब आप रावण, मेघनाथ या कुम्भकरण के पुतले फूंकेंगे, उसके साथ अपने बच्चों को, उनके बारे में क्या बताएँगे? रावण के दश मुँह क्यों? या उन दश मुँहों से लेखक ने क्या कहना या बताना चाहा होगा? या हमें उनसे क्या शिक्षा लेनी चाहिए या अपने बच्चों को देनी चाहिए? श्री लंका या  दक्षिण भारत या कई और देशों में रावण को क्यों पूजते हैं? और बाकी भारत या और कई और देशों में राम को क्यों? और भी कितने ही ऐसे-ऐसे और कैसे-कैसे, कितने ही तो प्रश्न हो सकते हैं। अगर आपको मौका मिले, तो आप किन-किन के पुतले फूँकना चाहेंगे? आपके भी अपने ही राम और रावण हो सकते हैं?  

क्या फायदा इतने पुराने पुतलों के फुंकने का? आज के रावण ढूंढों और उनके पुतले फूंको। या शायद उन बुराईयों के, जो आप फूँकना चाहते हैं। ये सदियों पुराने तो कबके फुंके नहीं जा चुके?   

तो इंटरनेट का एक फायदा ये भी है की हम, हर त्यौहार के बारे में कितना ही तो जान सकते हैं। और अपने बच्चों को सिर्फ अपने यहाँ वाला ज्ञान ना पेलकर, उनके, उनके और कितने ही तरह के ज्ञानों को पेलकर, हकीकत उनमें से खुद निकालो, वाले निचोड़ पे छोड़ सकते हैं।   

Tuesday, October 3, 2023

रैली निकालना (राजनीतिक-विज्ञान वाली)

Degrading, meanness, demeaning, goonish, pejorative, offensive, criminal mindset and conduct, puzzling tricks to score in demeaning way? सीधी-सीधी भाषा में बोलें तो गुंडों वाली भाषा और तरीके, या शायद शातीर राजनीतिक, नीचा दिखाने के तरीके? 

ऐसी-ऐसी, वैसी-वैसी और ना जाने कैसी-कैसी रैलियाँ, खासकर आम आदमी की। यहाँ-वहाँ और न जाने कहाँ-कहाँ, निकलती ही रहती हैं।  

हर नेता का अपना खास एरिया और उसके लिए खास तरह के प्रोग्राम या specialty मिलेंगी। जानने-समझने की कोशिश करें उन्हें, शायद सिस्टम का कोढ़ कुछ समझ आए। उन्हीं में कहीं न कहीं, छिपे होते हैं, अपमानजनक, तुच्छ बताने या दिखाने वाला या बनाने वाला, बेहुदा तरीके से नीचा या छोटा दिखाना, तिरस्कार करने की या इस तरह की मोहर ठोकने की अपनी ही तरह की कोशिश। शायद ऐसे ही कुछ अच्छा भी होता होगा। आएंगे उसपे भी, किसी और पोस्ट में। 

जैसा आप सोचते हैं या आम आदमी को दिखता या समझ आता है, वैसा नहीं, बल्की उसके बिलकुल उल्टा। भद्दा और बेहुदा भी। जले पे नमक जैसे? और आपको दिखे या समझ आए? 

राजनीती वाली रैलियाँ   

Digital and graves (3D)? 

एक दिन ऐसे ही क्लास में किसी टॉपिक पर बात हो रही थी। हर क्लास में कुछ ऐसे तत्त्व हमेशा होते हैं, जो हद से ज्यादा झल्लाहट पैदा करने वाले हों। हालाँकि, वक़्त और तजुर्बे के हिसाब से टीचर ऐसे तत्वों से निपटना भी सीख जाते हैं। वक़्त के साथ, ये भी समझ आता है की well behaved and soft spoken students की बजाए, ऐसे rude तत्वों से ज्यादा सीखने और समझने को मिलता हैं। Life Sciences या BioSciences में ऐसा, शायद ही देखने-सुनने को मिले। मगर साथ में जहाँ Engineering मिल जाता है, वहाँ कुछ भी संभव है। शायद इसीलिए, इस डिपार्टमेंट को मैं कभी अपना नहीं पाई। हमेशा ऐसा अनुभव होता रहा, की आप गलत जगह हैं। सबसे बड़ी बात, यहाँ पे joining ही बड़े बेमन से की थी। पहले ही दिन का अनुभव ही ऐसा था। खैर, वापस क्लास पे आते हैं। किसी स्टुडेंट ने कुछ बड़ा अजीब-सा शब्द प्रयोग किया। Indirectly, जो गिरे हुए स्तर का था। और पता नहीं क्यों मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आ गया, जो कम ही होता है। और मैंने कुछ वैसे से ही शब्द प्रयोग कर दिए, जो शायद एक टीचर को नहीं करना चाहिए, चाहे जो भी परिस्थिति हो। मैंने बोला, "ज्यादा बकवास की तो यहीं गाड़ दुंगी। हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी?" और उसने वापस बोला, "मैडम गाड़ा हुआ तो आपको already स्टूडेंट ने ही है। आपको पता ही नहीं, उस ग्रेवयार्ड का?" एकदम सही शब्द ध्यान नहीं, पर कुछ-कुछ ऐसा ही। हालाँकि बाद में, कुछ स्टूडेंट्स ने सॉरी भी फील किया, उस स्टूडेंट के behalf पे। क्यूँकि उसे मैं क्लास से निकाल चुकी थी। पर वो शब्द जाने मुझे कैसी-कैसी graveyards पे ले गया। 

उसके बाद तो ये graveyard, कई जगह, कई तरह से सुनने-समझने को मिली। ईधर-उधर की, कुछ पोस्ट में, एक खास तरह की सोशल फोटो में, जहाँ हड़ियाँ ही हड़ियाँ पड़ी हैं और कोई कुत्ता जैसे कह रहा हो, और ये सब बिल्ली (या बिल्ला शायद?)  ने किया है (And cat did it all)? तब तक भी मुझे किसी छद्द्म-युद्ध का अंदाजा नहीं था। हाँ। ये सब चल क्या रहा था, जानने की जिज्ञासा जरूर बढ़ गई थी। मेरे दिमाग में कोई 16 घुम रहा था। या कहना चाहिए की घुमाया गया था, शायद? 

16, Type-3   

16. 04. 2010 

16. 06. 2010 

उसके बाद तो पता ही नहीं, ऐसी-ऐसी कितनी ही तारीखें या नंबर थे, दिमाग को घुमाने के लिए। जिनमें से ज्यादातर के बारे में, मेरी समझ बहुत कम थी। 

इस सबके कुछ साल बाद, एक किताब मिली पढ़ने को, किसी जानकार की लिखी हुई। और फिरसे graveyards दिमाग में घुमने लगी। दो पैराग्राफ, उसमें काफी कुछ गा रहे थे। एक किसी शादी का scene और दूसरा किसी की grave। तीन किताबों में से, ये ज्यादा interesting थी, शायद। पढ़कर ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे, किसी बहुत ज्यादा नफरत करने वाले इंसान ने लिखी हो। छोटी-सी, मगर, बड़ी-ही, अजीबोगरीब-सी किताब। एक मैंने किसी सलाह पे खरीदी। किसी ने पढ़ने को माँगी। मगर जिस हिसाब से उसे लेने कोई आ रहा था, वो जाने क्यों और भी ज्यादा अजीब था। और मैंने बहाना बना, की मैं तो घर पे हूँ ही नहीं, वो नहीं दी। शायद ही कभी हुआ हो, की किसी ने कोई किताब माँगी हो और मैंने मना कर दिया हो। चल क्या रहा था, ये सब? राजनीतिक रंगमंच? अब तक शायद थोड़ा-बहुत समझ आने लगा था, की इन्हें राजनीतिक रंगमंच कहा जाता है। फिर उस इंसान का तो थिएटर से शायद खास लगाव रहा है।      

उस अजीबोगरीब किताब में, शायद एक ऐसी शादी थी, जिसमें दूल्हे ने अपनी सगाई की फोटो फाड़ कर, FB पे चिपकाई थी, हकीकत में। और शादी की फोटो में पति और पत्नी को एक दूसरे के विपरीत दिशा में मुँह किए। उस FB पे काफी कुछ आता है आज तक। थोड़ा-बहुत समझ आता है शायद, और थोड़ा-बहुत नहीं भी। इतने सालों के उतार-चढ़ावों का आईना जैसे। कुछ ज़िंदगियों की, कोई अजीबोगरीब कहानी गाता हुआ जैसे।  

अब असली वाली राजनीती वाली रैलियों पे आते हैं।   

Digital and graves, कहाँ सुनने को मिलता है? DIGITAL libraries के यहाँ वहाँ पैसे बाँटते और उदघाटन करते? और श्मशान घाटों के रखरखाव के लिए ? किसानों की रैलियाँ?   

हर नेता का अपना खास एरिया और उसके लिए खास तरह के प्रोग्राम या specialty मिलेंगी। जानने-समझने की कोशिश करें उन्हें, शायद सिस्टम का कोढ़ कुछ समझ आए। 

एक रैली वो जिनमें आम आदमी जाता है, और राजनीतिक नेता करते हैं। 

एक वो, जिसे किसी की रैली निकालना कहते हैं। या और ठेठ या लठमार भाषा में कहें तो, "या किस की रैली-सी पीट-री है"? ये ठेठ लोग (सिर्फ ठेठ? या जाहिल-गँवार?), ऐसा किसी भी माहौल और मौके पे कह या कर सकते हैं। क्यूंकि यहाँ मौका नहीं, राजनीतिक चौके-छक्के देखे जाते हैं। ये लगा चौका, इस पार्टी के खिलाफ। ये लगा छक्का, उस पार्टी के खिलाफ। अरे, पार्टी की बजाए, देश बोलना था ना शायद?  जितनी भी रैलियाँ होती हैं, उनमें किसी न किसी की रैली निकल रही होती है, गुप्त रूप से। राजनीती के लोगबाग, राजनीतिक रंगमंच पर रैलियाँ निकाल रहे होते हैं, हम उसे क्या सोचते हैं? और वो वहाँ नौटंकी, क्या कर रहे होते हैं? या शायद उनसे भी कोई करवा रहे होते हैं ? 

और ये अजीबोगरीब रैलियाँ सिर्फ राजनीतिक रैलियों में ही नहीं निकलती बल्की जोकरों की तरह यहाँ-वहाँ, जाने कहाँ और कौन-कौन लगे ही रहते हैं। 

कभी सोचा रैलियों में कौन जाते हैं? इतने ठाली भला कौन होते हैं? आओ किसान रैली पे ही आते हैं किसान रैली मतलब? किसान की रैली निकाल रखी है। खासकर ऐसी रैली, जैसे लालकिले पे 26 जनवरी को किसानों का रैली में ट्रेक्टर प्रदर्शन। उसी रैली में किसी किसान की मौत भी। ऐसे ही जैसे, इससे काफी पहले अरविंद केजरीवाल की रैली और किसी किसान का उसी रैली में फांसी लगाना। ऐसे-ऐसे, सिर्फ किसान ही नहीं बल्की और भी कितनी ही तरह की रैलियाँ और उनके कितनी ही तरह के कारनामे मिल जाएँगे। एक बार जानने-समझने तो लगो, इस गुप्त सिस्टम और राजनीती के गुप्त कोड़ों को। 

26 जनवरी वाली लाल किले पे ट्रैक्टरों वाली रैली और किसान की मौत। मगर कैसे? या थोड़ा और पीछे चलें? अरविंद केजरीवाल की रैली और किसी किसान का उस रैली में ही फाँसी लगाना। मगर कैसे? और क्यों? अभी पीछे कुछ विडियो देखे, दुष्यन्त चौटाला की FB पेज पे और दीपेंदर हुडा के FB पेज पे। स्टेज पे कितना कुछ स्टेज होता है ना? कोई गाए, उन्होंने पीटा और कोई ये बताए की इसे क्यों पीटा और उसे क्यों पीटा। और भी काफी कुछ आता ही रहता है, कभी अरविंद केजरीवाल के पेज पे तो कभी मोदी के। बड़ी कुर्सियों पे बैठे लोग और बड़ी-बड़ी बातें ? या शायद बड़ी कुर्सियों पे बैठे लोगों की, कितनी छोटी-छोटी सी बातें? हमेशा तो नहीं, पर शायद बहुत बार। राजनीती के इस स्टेज को आम-आदमी भला कैसे समझे? अब उसे क्या पता है की पिटने का यहाँ मतलब क्या है? खुद मुझे बहुत वक़्त के बाद समझ आया।  

विज्ञान वाली रैलियाँ 

जैसे? अभी पीछे वो कोई चंद्रयान को किसी कक्षा में बिठा रहे थे, अपने कौन-से वाले नेता लोग? मतलब ये वैज्ञानिक सिर्फ stand up कॉमेडी ही नहीं करवाते या करते, बल्की चाँद-सूरज को भी कक्षाओं में बिठाते हैं। या चंद्र और सूरज-ग्रहण भी खास वाले और खास तरीके से करवाते हैं। जब वैज्ञानिक ऐसा कर सकते हैं तो नेताओँ को क्या बोलें? 

कहने वाले तो युं भी कह दें, पता है ये DIGITAL और GRAVE का क्या रिस्ता है? और इनका दुष्यंत चौटाला से क्या लेना-देना हो सकता है ? नेताओँ के प्रॉपर्टी, घर, खेती या व्यवसाय वाली जमीन, कितनी और कौन-कौन सी गाड़ियाँ और किसके नाम हैं ? सबकुछ जानकार ऐसे लगेगा, राजनीतिक कोढ़-सा जैसे।  

अब कहने वाले तो ये भी कह दें की DLF और वाड्रा का क्या कनेक्शन? वो भी राजनीती से? या हुडा का गुडगाँव की प्रॉपर्टी के झमेलों से? एक तरफ राजनीती है, तो दूसरी तरफ, इधर और उधर का मीडिया। ऐसे-ऐसे और भी पता नहीं कैसे-कैसे, राजनीतिक किस्से-कहानियों वाले कोढ़ हर नेता के मिलेंगे। 

अब अरविंद केजरीवाल, अपने साथ ये शराब के घोटाले वालों को क्यों लिए घुमता है? जरूरी है, इतने शराब के ठेके खुलवाना, वो भी इतनी रात तक? एक तरफ प्रचार-प्रसार स्कूल और दूसरी तरफ शराब और ठेके? हज़म नहीं हो रहा ना? वैसे ही जैसे, एक तरफ DIGITAL, किसान और दूसरी तरफ GRAVES के लिए खास पैसे देने में रूची? शायद जाने वालों के लिए सम्मान की भावना? और तो क्या ही कहें?

राजनीती भी और विज्ञान भी। हो गया राजनीती-विज्ञान?  

ऐसे ही, किसी भी नेता के स्पेशल राजनीती वाले interests को जानने और समझने की कोशिश करें। और जिन्हें थोड़ा ज्यादा पता है, वो अपना ज्ञान इधर बाँटते रहें। 

ये तो हुआ राजनीतिक-विज्ञान वाली खास तरह की रैलियाँ। ऐसे ही आम आदमी भी, ऐसी-ऐसी रैलियाँ पीटता ही रहता है। मगर उससे ऐसा ज्यादातर, अनजाने में होता है। और शातीर लोग करवा रहे होते है, छल-कपट से।  उसके खुद के खिलाफ, अपनों के खिलाफ और भी ना जाने किस-किस के खिलाफ। उसमें हमारे आसपास की हर वस्तु, जीव, निर्जीव, रीती-रिवाज और भी पता नहीं क्या-क्या होता है। जानेंगे उसे भी आने वाली कुछ पोस्ट में।         

Tuesday, September 12, 2023

दस्तुर कैसे-कैसे, चल रहे बदस्तूर?

दस्तुर कैसे-कैसे, चल रहे बदस्तूर? या बढ़ रहे नई नई तकनीकों के दुरुपयोगों से?  

बीमारियाँ जब कहानियाँ-सी लगें 

जुबाने, जब हूबहू-सा बकें 

रिस्ते जब जमा-घटा, गुणा-भाग 

फाइल्स-सा करें 

वो भी दूर, बहुत दूर, कहीं उन फाइल्स से 

तो मानव रोबोट रचने की प्रकिर्या पे गौर करें 

"दिखाना है, बताना नहीं", कोई खेल नहीं हैं, बल्की घिनौने कांड हैं, राजनीति के। बचो, जहाँ भी बच सकते हो।       

आओ हुबहु रचें? कैसे? कैसे रचती होंगी, ये पार्टियाँ हूबहू (ditto)?

जो मुझे समझ आया (जहाँ नहीं आया, वहाँ आप अपने विचार रख सकते हैं)   

राजनीतिक पार्टियों के कोडों वाले रिश्ते-नाते वो नहीं हैं, जो आम-आदमी के असली ज़िंदगी में है। जैसे इनकी माँ किसी की GF या X हो सकती है और बेटी उस GF का अगला कोई अवतार। ऐसे ही इनके बाप कोई BF या X हो सकता है और बेटा कोई उस बाप का अगला अवतार। राजनीति के नाटकों के खानदान, इन्हीं XYZ के आसपास घुमते हैं। इनके नाटकों में माँ, बहन, बेटा, बेटी, भतीजा, भतीजी और ऐसे ही, कितने ही आम आदमियों की हकीकत की ज़िंदगी के रिश्ते हैं ही नहीं। हाँ XYZ की भरमार हैं। ये इसकी, वो उसकी या उसका और न जाने कौन कहाँ-कहाँ और किसका? 

जबकि, आम आदमी की असलियत की ज़िंदगी में ऐसा कुछ होता भी है तो ज्यादातर केसों में, वो एक वक़्त के बाद अगर खत्म, तो हकीकत में खत्म हो जाता है। उसका फिर उसकी ज़िंदगी से शायद ही कोई लेना-देना रहता हो। कहीं-कहीं तो सालों-साल या Decades तक भी लोगों को पता ही नहीं होता की कौन कहाँ है, क्या कर रहा है या कर रही है। ज़िंदा भी है या मर चुका या मर चुकी। मगर, राजनीति के इन नाटकों के जालों में वो न सिर्फ ज़िंदा रहता है या रहती है बल्की जहाँ हकीकत की ज़िंदगी में है ही नहीं, वहाँ भी ज़िंदगी को प्रभावित करते रहते हैं और तोड़फोड़ तक मचाते रहते हैं। इन्हीं को कहा जाता है, भूतिया प्रभाव

मतलब, भूत राजनीती के, भगवान राजनीती के पैदा किए हुए। ऐसे ही उनके बारे में कहानियाँ भी, राजनीती की घड़ी हुई। डरावे, छल-कपट, राजनीती के बनाए हुए। इंसानों को यहाँ से वहाँ धकेलती है राजनीती। मतलब, कौन कहाँ जाएगा और कौन कहाँ रहेगा, ये भी राजनीतिक पार्टियाँ निर्णय लेती हैं। क्या करेगा या नहीं करेगा, वो भी वहाँ की राजनीती तय करती है। आज के टेक्नोलॉजी के वक़्त में तो और भी बुरे हाल हैं। जो तकनीकें या उन तकनीकों का प्रयोग करने वाले लोग 24 घंटे लोगों को देख सुन या रिकॉर्ड कर रहे हों, सोचो वो इस समाज को कितना प्रभावित कर रहें हैं ? और कैसे-कैसे प्रभावित कर रहे हैं? आम आदमी की तो कोई ज़िंदगी है ही नहीं। वो जीता है इनकी मर्जी से, मरता है इनकी मर्जी से। जो कुछ खाता-पीता है या पहनता है, सब इनकी मर्जी से या कहो इनके घड़े automated, semiautomated या enforced घड़ाईयों की मर्जी से। आम-आदमी अपनी मर्जी से क्या करता है ? कुछ भी नहीं? आप तब तक सोचिए, आते हैं इस विषय पे भी, किसी अगली पोस्ट में, की आप अपनी मर्जी से कितना ये सब करते हैं और कितने धकेले हुए होते हैं? और इन धकेले हुए दुष्प्रभावों से कैसे निपटा जाए?  

Monday, August 14, 2023

पक्ष? विपक्ष? आम आदमी कहाँ है?

जर, जोरू और जमीन। क्या यही होती है इंसान के झगड़ों की वजह?

या किसी भी तरह का लालच और अहंकार, शायद?

पहले ज्यादातर के कई कई बच्चे होते थे। जब तक कम से कम एक लड़का न हो, तब तक तो स्टॉप लगता ही नहीं था। और जमीन-जायदाद होती थी लड़के की। लड़कियाँ तो खुद जमीन-जायदाद होती हैं, इस समाज में। उस जमीन-जायदाद को तो कहीं आगे जाना है। माँ बाप उन्हें किसी को सौंपने के लिए ही तो पैदा करते हैं। मतलब, जमीन-जायदाद भी movable, न की  immovable। तो भला जमीन-जायदाद की भी अपनी कोई जमीन-जायदाद हो सकती है? 

हाँ। अगर लड़कियों को भी इंसान मानने लगें, बजाय की जमीन-जायदाद समझने के, तब तो जमीन-जायदाद उनकी भी होगी। ऐसे ही, जैसे लड़कों की होती है। आजकल जब ज्यादातर के एक या दो से ज्यादा बच्चे नहीं होते, तो बहुतों के तो शायद लड़कियाँ ही होंगी। हो सकता है लड़का हो ही ना। फिर? वो अपनी जमीन-जायदाद अपने दुसरे भाइयों को दे दें? या लड़कियों का हक़ है? वो भी इंसान हैं? न की कोई जमीन-जायदाद? हाँ ! जिनको लगता है की मेरे पास मेरे लायक है, या बहुत है, तो अपनी मर्जी से वो चाहे जिसे दें। वहाँ जबरदस्ती नहीं। 

एक पक्ष 

कुछ केसों में ऐसा भी हो सकता है की किसी भी वजह से किसी की पत्नी की जल्दी मृत्यु हो गई और सिर्फ लड़की है। तो इस चक्कर में की सारा उस लड़की का ही हो, किसी की शादी ही ना होने दी जाए? कुछ अडोसी-पड़ोसी और रिस्तेदार इस चक्कर में लग जाएँ। तो कुछ लड़की को ही घर से बाहर निकालने में। या शायद दिखाई अडोसी-पडोसी या कुछ रिस्तेदार नज़र आ रहे हों। मगर, हकीकत में राजनीती के तड़के हों। कोई सामान्तर घड़ने की कोशिश? ये पार्टी इस तरह का और वो पार्टी उस तरह का। और ये भी हो सकता है की राजनीती की कहानी की हकीकत कुछ और ही हो। वहाँ सिर्फ किसी राजनीतिक ड्रामे में कोई किरदार मरा हो। न की हकीकत में। तुम्हारे ड्रामे और किसी की ज़िंदगी। और भी बहुत तरह के लालच और पेचीदगियाँ हो सकती हैं। तो एक में हकीकत में कोई इंसान गया है और दूसरे में आभाषी (ड्रामे में)। केस अलग, इंसान अलग, जगह अलग, परिस्थितियाँ अलग, तो समाधान एक कैसे हो सकता है? और कहीं किन्हीं फाइल्स से या राजनीतिक ड्रामों से, दूर कहीं किन्हीं ज़िंदगियों की हकीकत कैसे बदल जाती हैं? चाहे वो फिर रिश्ते हों या बीमारियाँ। मतलब, इंसान नहीं, सिस्टम बीमार है। अब उस सिस्टम को कौन सुधरेगा? फाइलों वाले पढ़े-लिखे या आम-आदमी? या शायद सब मिलकर?     

Numerology की राजनीति 

किसी एक पक्ष के पास 8 है तो किसी के पास 9 । 8 मतलब, बच्चा पैदा कर सकते हैं। 9 मतलब, रुकावट है। या शायद, 8 मतलब, काँड रच सकते हैं। 9 मतलब, किसी बाधा को पार करना है। कोड के मतलब, आप किस पार्टी में हैं, उसके हिसाब से अलग-अलग होते हैं। यहाँ जिसकी पत्नी किसी भी कारणवश दुनियाँ में नहीं रही, उसे बोला जाए की 8 ले। 8 भी ऐसा, जिसपे एक ने 9 लगा रखा हो, मतलब रुकावट। जैसे एक पे रुकावट, 19 लगा रखा हो। 19 18 19 28 19 38 और भी कुछ हो सकता है। जैसे 2 पे, 3 पे, 4 पे, 5 पे या किसी और नंबर पे। अब 8 का मतलब शादी तो है नहीं। फिर ऐसे राजनीतिक तड़के लगाने का मतलब? काँड? जो बचा है उसे भी खत्म करने की कोशिश? राजनीति संभानाओं का खेल है। खेलते रहो, राजनीतिक खिलड़ियों के साथ। और बच्चों तक को ऐसी घटिया राजनीती का मोहरा बनाने वालों को तो कहें ही क्या? 

एक और पक्ष है 

या तो तलाक हो रखा है। या केस चल रहा है। या जिस किसी वजह से अलग हैं। और पहले केस में बच्चा या बच्चे भी हैं। अब लड़की वाले चाहें की लड़के की दूसरी शादी न होने दें। या कम से कम तब तक रोक के रखें की आने वाली के बच्चे न हों। हक़? जमीन जायदाद? या वर्चस्व के लड़ाई-झगड़े? अलग-अलग केसों की अलग-अलग हकीकतें हैं। मगर, राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें एक लाठी से और अपने-अपने, हिसाब-किताब से हांकने की कोशिश करती हैं। जबकि सबकी हकीकत बहुत ज्यादा अलग-अलग हैं। अहम, ये रिश्ते करवाने वाले भी कहीं न कहीं ये राजनीतिक तड़के हैं। तो शायद तुड़वाने में भी यही होंगे? सोचो, हम कैसे सिस्टम में रह रहे हैं? जहाँ राजनीतिक पार्टियों को अपनी जनता की भौतिक जरूरतों की चिंता नहीं है। बल्की, चिंता ये हैं की किसके रिश्ते जुड़वाने हैं और किसके तुड़वाने हैं। किसके बच्चे पैदा करवाने हैं और किसके नहीं। किसके घर से भगाने हैं और किसके लाने हैं।   

सरकार मानो आपको कह रही हो 

रोटी, कपडा, मकान, साफ खाना, पानी, हवा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य इसकी चिंता नागरिक अपने आप करें। क्युंकि, आपके रिश्ते-नाते, तोड़ने-जोड़ने के लिए ही तो आपने हमें चुना है।      

अलग-अलग समस्या, अलग-अलग समाधान।

अलग-अलग समस्या का मतलब है की समाधान भी अलग-अलग ही होगा। मगर सामान्तर केसों का मतलब है, अलग-अलग तरह के केसों को एक जैसा दिखाना। जितना ज्यादा एक जैसा-सा दिखाया जा सके, उतना बढ़िया। तो समाधान भी, वो एक जैसा सा ही दिखाने (करने?) की कोशिश करते हैं। इसीलिए हकीकत के तथ्यों की छुपम-छुपायी चलती है। राजनीती के लिए तो ये सही है। मगर आमजन के लिए? आमजन के लिए ये मकड़ी का वो जाला है, जिसमें आमजन को फँसा दिया गया है। जिससे, उसे बाहर निकलने की जरूरत है। 

आईये कुछ आमजन की समस्यायों और उन पर राजनीतिक तड़कों की मार देखें 

मान लो घर के किन्हीं दो बन्दों में कोई कहासुनी हो गई। ज्यादातर घरों में होती है। तकरीबन सब रिश्तों में होती है। बस, फर्क थोड़ा-सा समझ का होता है। कहीं ये सब सिर्फ विचारों के ना मिलने से उपजे मामुली वाद-विवाद होते हैं। तो कहीं अपने विचार सामने वाले पे थोपने की कोशिश। जितना ज्यादा अपपरिपक़्व व्यक्ति या तानाशाह शक्शियत होगी, ये थोंपने वाला तरीका बढ़ता जाएगा। क्युँकि, ऐसे लोगों में मिल-बैठकर, सुनने-समझने की क्षमता नहीं होती। सिर्फ मैं और मैं होता है। तो सीधी-सी बात, विवाद भी ज्यादा होते हैं। मगर जहाँ विचारों में विभिन्नता के बावजूद, एक-दूसरे को सुनने-समझने की क्षमता होती है, वहाँ ज्यादा देर कहासुनी या झगड़े नहीं टिकते। जैसा की अक्सर बहन-भाईयों, माँ-बेटी, माँ-बेटा, बाप-बेटी या अन्य रिश्तों में होता है। क्या हो, अगर घर में किन्हीं दो बन्दों की कोई कहासुनी हो गई या झगड़ा हो गया? शाम तक या शायद अगले दिन तक वो फिरसे बोलते और मिलजुलकर काम करते मिलेंगे। 

मगर, अगर ऐसे रिश्तों में राजनीतिक तड़के लगने लग जाएँ, तो? अरे कल तो तू-तू, मैं-मैं हो रखी थी, आज एक दूसरे के जन्मदिन याद आ रहे हैं ! अरे कल तो झगड़ रहे थे, आज एक भी हो गए? थोड़ा और बढ़ाना हो तो? तू अपना हिस्सा ले ले। लड़कियों के क्या अधिकार नहीं होते? आप किसी का भला करने चले हों और कुछ वक़्त बाद सुनाई दें, कुछ ऐसी जुबाने, "वो तुम्हारी जमीन खा जाएगी।" कौन? उन्हें मालूम है वो किसके बारे में बोल रहे हैं? वो उस घर को नहीं जानते। मगर, किसी एक पार्टी की तरफ के तड़के शुरू हो गए। यही नहीं। ऐसे लोग, ये कहने से भी नहीं चुकते, की जितना उन्हें उस घर के बारे में पता है, उतना तो उस घर वालों को भी नहीं पता। कुछ-कुछ, वैसे ही, जैसे मोदी के आने से पहले दुनियाँ थी ही नहीं। कुछ लोग तो किसी घर में घुसे ही उसके भी बाद हैं। मगर, कोशिशें ऐसी की बस करता-धरता सब वही हैं। अब यहाँ पे सामान्तर राजनीतिक घड़ाई की सच्चाई और हकीकत नहीं मिलती। मतलब, समाधान भी राजनीतिक नहीं हो सकता।  

एक पक्ष, फिरसे राजनीतिक तड़का। कोई बहुत अपना और समझदार इंसान कहे, की वो माँ-बेटी तो जमीन बेचकर दिल्ली चली जाएँगी। किसी राजनीतीक पार्टी का ये कोई कोड है। मगर आम आदमी इसे हकीकत मान बैठे? और आप सोचें, ये हो क्या रहा है? राजनीतिक कहानी को हकीकत बनाने की कोशिश। राजनीती के ड्रामे की माँ-बहन और हकीकत की माँ-बहन अलग हैं। हकीकत में, उनमें कुछ नहीं मिलता। और उस बेटी को दिल्ली सच में इतनी पसंद है क्या? माँ तो है ही गाँव का प्राणी। हकीकत ये है की जब राजनीती की गिरी हुई नीचता के तड़के समझ आने लगे, तो मैंने अपनी जमीन खरीदना सही समझा। क्युंकि पुरखों की जमीन इतनी है ही नहीं, की उसे वाद-विवाद का विषय बनाया जाए। वो जिनके नाम है, वहाँ सही है। कम सही, मगर राजनीतिक तड़कों से दूर, अपनी जमीन। और ये भी शायद कम को ही पता है की जबसे ये जुआरी सांग समझ आने लगा है, कुछ पसंदीदा लोग तो नजरों से ही गिर चुके हैं। आगे क्या होना जाना है? शायद कोई इन सबसे दूर रहना चाहता है। ना इधर के जुआरी पसंद, ना उधर के। शायद बहुत पहले लिख चुकी ऐसा कुछ। Life Funda is अकेला चलो रे। To hell with gamblers and predators!    

दूसरा पक्ष, भालोट ले ले। माउंट आबू ले ले। या कुछ और बढ़िया गाँव बता देंगे। बिना सामने वाले का पक्ष जाने। या ये जाने बैगर की क्या पसंद है और क्या नहीं है। सबसे बड़ी बात, जरूरत किस काम के लिए है। 

किसी को राजनीतिक जमीन चाहिए या शुकुन की जिंदगी? राजनीतिक जमीन मतलब, इधर और उधर के सांडों की लड़ाई के बीच फंसना। भला राजनीती से बाहर जमीन कहाँ है? वही तो। लोगों की जमीन उनकी अपनी क्यों नहीं है? सरकारी जमीन हो या प्राइवेट, उन्होंने या इन्होने कहा, ये हमारी, तो हमारी। जैसे यूनिवर्सिटी के घर! ये नंबर इस पार्टी का और वो नंबर उस पार्टी का। क्यों?    

कितने ही पक्ष, वो तिकोना है ना हाईवे और गाँव के बीच, वो ले ले। अरे, वो रेडियो स्टेशन के साथ वाली जमीन कैसी है? वो गाँव से बाहर गड्डे वाली जमीन। अब आपने पूछा है तो लोग तो बताएँगे। इतनी सी तो मदद कर ही सकते हैं। मगर इस जमीन देखने के चक्कर ने और भी काफी कुछ समझाया। वो किसी और पोस्ट में।    

ये खुद के साथ हुई कहानी है, जो अभी तक चल ही रही है। इसलिए लिख दी। मगर यहाँ आसपास ऐसा ही कुछ बहुत-सी जिंदगियों में चल रहा है। अब दूसरों की ज़िंदगियों की समस्याएँ तो ऐसे खुलकर नहीं लिखी जा सकती। मैं औरतों के अधिकारों की हमेशा आवाज रही हूँ। जहाँ तक हो सके, उनके साथ रहने की कोशिश होती है। मगर, किसी भी राजनीतिक तड़कों की मददगार नहीं हूँ। और ये सब पार्टियों के लिए है। कोई अपना अगर मिलने आए या बात करे तो अपना रहकर ही करे तो ही सही है। किसी भी राजनीतिक पार्टी का संदेशवाहक, मतलब अपनापन खत्म। क्युंकि आपको मालुम ही नहीं की हकीकत क्या है और राजनीति क्या। 

हकीकत: बच्चा माँ के जाते ही घर से बाहर रहने लगा। जैसे अपहरण हो गया हो। किसी अपने बड़े को बोला। असर, बच्चा वापस घर और काफी हद तक नार्मल। 

राजनीतिक तड़का: ये तो बात नहीं बनी। और किसी राजनीती ने उस अपने को आपके और शायद आपके घर के ही खिलाफ भड़का दिया। बच्चा, अपहरण के बाद जैसे किसी जेल में। 

और भी कैसे-कैसे किस्से हैं यहाँ। जिधर देखो उधर राजनीतिक तड़के। शायद दुनियाँ में हर जगह यही हो रहा है। कोरोना ने तो ऐसा ही कुछ समझाया। 

बहुत-सी चीज़ें समझ आई, इस थोड़े से वक्त में। इतने कम वक्त में, किसी बच्चे या बड़े के व्यवहार में इतना फर्क कैसे लाया जा सकता है? व्यवहार को बदलना। यही है मानव रोबोट बनाना। किसका फायदा हो रहा है, इस सबमें? जिनका आप चाहते हैं, उनका हो रहा है क्या? भोले और हकीकत से अनजान लोगों के साथ दिक्कत यही होती है की उन्हें फुसलाना बहुत आसान होता है। दिल में कोई द्वेष न होते हुए मार खाते हैं। और उसके लिए तड़के का काम करता है, आपस में मिल बैठकर बात करने की बजाय, दूसरों से हकीकत जानने की कोशिश करना। 

Artificial Intelligence (AI) और ऐसी-ऐसी टेक्नोलॉजी के तड़के, आम आदमी की जिंदगियों में जानोगे तो दिमाग ही घुम जाएगा की हम किस दुनियाँ में रहते हैं। और आम-आदमी उससे कैसे निपट सकता है?  

Wednesday, July 19, 2023

हकीकत, आभाषी, और मिथ्याभाषी दुनियाँ?

हकीकत की दुनियाँ?

आभाषी दुनियाँ?

मिथ्याभाषी दुनियाँ?

और खिचड़ी दुनियाँ?   

और भी पता नहीं कैसी-कैसी दुनियाँ? 

जैसे हकीकत के जीव, फोटोजीव, विडियोजीव? और भी पता नहीं कैसे-कैसे जीव?

चलो इसे थोड़ा अपने नेताओं के सफाई अभियान से समझते हैं।  

कुछ लोग होते हैं जो सही में सफाई पसंद होते हैं। कुछ दिखावे के सफाई पसंद होते हैं। दिखावे वालों को हकीकत की इमेज से ज्यादा, शायद सामाजिक इमेज ज्यादा पसंद होती है। अब इमेज के अपने फायदे-नुकसान हैं। तो बनाने में क्या जाता है? जैसे एक झाड़ू उठाओ, थोड़ा सफाई करते फोटो करवाओ और दुनियाँ को दिखाओ। देखो कितना सफाई पसंद लोग हैं। या गरीबों को दान-दक्षिणा दो और फोटो करवाओ या विडियो बनाओ और डाल दो ऑनलाइन। कितने दयालु लोग हैं? पब्लिक जगहों को साफ़ करने वाले लोग? स्टेजों पे, प्रोग्रामों में दान देने वाले लोग? ऐसे लोगों की हकीकत सच में वही होती है? या धोखा, दिखावा? उसके बदले कुछ ज्यादा पाने की खातिर? दोनों ही सच हो सकते हैं शायद। इंसान-इंसान पे निर्भर है। 

बहुत से ऐसे लोग, जो ऐसे-ऐसे ऑनलाइन फोटो या विडियो डालते हैं, यहाँ सफाई अभियान का हिस्सा, वहाँ सफाई अभियान का हिस्सा। यहाँ दान, वहाँ कल्याण में दिखते हैं, फोटो या विडियो में। क्या वो अपने खुद के घरों या आसपास का भी ऐसे ही ध्यान रखते हैं? या वहाँ की हकीकत कुछ और ही होती है? कई बार तो उनके अपने खाली प्लॉट, पुराने-घर सड़ांध मार रहे होते हैं, जहाँ अक्सर उनका बचपन बीता होता है। और उनके बाहर ताले लटके होते हैं। कभी-कभी तो इतने टूटे-फूटे से मकान, की अड़ौसी-पड़ोसियों को भी खतरा रहने लगे। कई पडोसी तो शायद बोल भी चुके हों ऐसा कुछ कई बार। थोड़ा बड़े होते ही, कुछ लोग तो ऐसी-ऐसी जगह शायद आना-जाना तक पसंद नहीं करते। हालाँकि, उनका बचपन वहीँ गुजरा होता है। और धरोहर बताते हैं, वो ऐसी-ऐसी जगहों को? जैसे हाथी के दाँत खाने के और, और दिखाने के और? थोड़ा ज्यादा हो गया शायद? सफाई पसंद लोगो, आओ ऐसी-ऐसी जगहों की भी खबर लें।

ये कैसा संसार और कैसा लोकतंत्र?

हम उस महाभारत की दुनियाँ में नहीं हैं, जहाँ राजदरबार में पाँडव और कौरव आमने-सामने हैं और मामा शकुनि अपने खास अंदाज में, भाँजे दुर्योधन कहके गोटियाँ फेंक रहा है। और कह रहा है, ये भी गई। ये भी गई। और ये भी। भांजे युधिष्ठर! कुछ और है दाँव पर लगाने को?

हम उस महाभारत की दुनियाँ में हैं, जहाँ इन जाहिल जुआरियों, जो अपने आपको योद्धा कह रहे हैं और बेहुदा किस्म के खिलाडियों के लिए, हर इंसान एक गोटी/कोड है। वो कोड जिसके नाम पे या कहो नंबरों पे, या मिश्रित चिन्हों पे, राजनीतिक पार्टियाँ चाल (दांव) चलती  हैं। आखिर सबजन राजा-महराजाओं की ही तो प्रॉपर्टी हैं? भला वो इंसान थोड़े ही हैं? उनके कोई अधिकार थोड़े ही हैं, जो उनको चलने से पहले, उनसे पूछा जाए या इजाज़त ली जाए?  

क्यों धर्तराष्ट्र महाराज? अब ये धर्तराष्ट्र और इनके राजदरबारों में, चारों तरफ बैठे बड़े-बड़े लोग, न्यायलय और उनके न्यायधीश? बेचारे! बिलकुल महाभारत की तरह मुसीबत में फँसे, लंजु-पंजु हुए, कोई भीष्मपितामह जैसे? या ये भी किसी पार्टी के योद्धा (खिलाड़ी) हैं? या कहना चाहिए मात्र कोड हैं। कौन सा कोड कहाँ बैठेगा, ये भी ये गुप्त सिस्टम बताता है।  

इस महाभारत में, कितनी ही गोटियाँ, कोड आप जैसे, हम जैसे, पता नहीं कब और कहाँ भेंट चढ़ जाएँ। इन खिलाडियों/जुआरियों के checkmate/s के दाँवों पे! कहीं accidents में, कहीं बिमारियों में, कहीं रिश्तों में फेंकी गई दरारों में। कहीं ऐसे, तो कहीं वैसे, जालों में, जंजालों में।

इन जुआरियों से परे, कथित खिलाडियों से परे, इन राजाओं और राजदरबारों से परे, कोई और जहाँ भी है क्या? होना तो चाहिए। वो संसार, जहाँ कोई इंसान, अगर इनका हिस्सा न होना चाहे या इनकी रची बेहुदा दुनियाँ से परे रहना चाहे, तो रह सके। उस संसार में जिसमें लोकतंत्र है, जुआरियों से परे, शिकारियों से परे। उस संसार में जहाँ सजा है, कुर्सियों पे बैठकर गुंडागर्दी करते या करवाते, शामिल होते या जुर्मों के खिलाफ आँख  बंद कर बैठे अधिकारियों के लिए। जहाँ जुर्म भुगतने वाले को अपना ऑफिसियल घर और नौकरी नहीं छोड़नी पड़ती, क्युंकि जुआरियों के गुप्त दाँवों के अनुसार ऐसा ही होना है। बल्की ऐसे करने या करवाने वाले अधिकारीयों को सिर्फ वो कुर्सियां ही नहीं छोड़नी पड़ती, बल्कि जेल भी जाना पड़ता है। ये कैसा संसार और कैसा लोकतंत्र, जहाँ डर ही नहीं है, इन कुर्सियों पे बैठे जुआरियों या जुआरियों का साथ देने वाले अधिकारियों को?  

मुझे 2018 में, जब इस संसार और इन गुप्त लोकतंत्रों के नाम पे धब्बों की खबर होने लगी थी, तो मेरी दुनियाँ तो उल्ट-पुलट हो चुकी थी। ऐसा जानकर-समझकर, किसी भी आम इंसान की होनी थी। क्युंकि जो मुझे दिखाया जा रहा था, वो दुनियाँ, वो थी ही नहीं, जिसे इस दिमाग ने बचपन से देखना और समझना शुरू किया था। जिन्हें योद्धा और खिलाडी कहा जा रहा था, उनकी जगह, मुझे सिर्फ और सिर्फ, चाल चलते, घात लगाते, checkmate करते, जुआरी और शिकारी नजर आ रहे थे। उस ऑफिस और कैंपस में, मैंने इन कोडों को समझने के लिए ही, बेवजह बंद पड़े स्टोरों और लैबों के ताले तोड़ उन्हें खोलना शुरू कर दिया था। तब तक भी मालुम नहीं था की वो सिर्फ academics वाले ऑफिस की राजनीती की वजह से बंद नहीं थे, बल्की उनके पीछे तो उससे कहीं बड़ी राजनीती थी। धीरे-धीरे वो भी समझ आने लगा था। उसके बाद 2018 में ही VC ऑफिस में एक खास मीटिंग के बाद, मेरा Psycho पहुंचना, वो इंजेक्शन और वो हिमाचल में चैल के स्कूल का विजिट। किसी ऐसे स्कूल का, भला एक यूनिवर्सिटी में टीचर से क्या लेना-देना? और मेरा वहाँ से नौ, दो, ग्यारह होना।   

उसके बाद की चालें, यूनिवर्सिटी घर छोड़ो। मेरा ओमेक्स में किराए पे घर लेना। 2-महीने किराया भी देना, मगर चालों को समझते हुए शिफ्ट न करना। क्युंकि ड्रामे हर कदम पर बहुत कुछ कह रहे थे। 

अब इलाज तो होना ही था। आखिर चिड़िया पिंजरा तोड़ कहाँ तक उड़ेगी? और 2019 की कैंपस मार-पिटाई! अब तो इस दुनियाँ को जानना और जरूरी हो गया था। नहीं?             

Friday, July 14, 2023

Cult Politics (लगान-राजनीती?)

Cult Politics हिंदी में उचित शब्द क्या होगा इसके लिए? लगान-राजनीती? कभी गोरों की, तो कभी कालों की? या यूँ कहें की कभी गैरों की, तो कभी अपनों की?    

14.07.2023 (Around/After 4.00 PM) शिव मुर्ति स्थापना और मंदिर वही होलिका दहन (7.3.2023) वाला? पहली बार देखा गया अजीबोगरीब और डरावना-सा-होलिका-दहन। गुप्त कोड हैं क्या किसी पार्टी के, ऐसे-ऐसे धर्मों के प्रचार-प्रसार में? आप क्या कहते हैं?     

आभासी दुनियाँ पे राजनीती के तड़के: भगवानों की हकीकत बस इतनी-सी है? आप सोचिए। इस विषय पर आने से पहले ये पढ़िए:     

तिकोने लाल रंग के झंडे और पीला उसके बहार। हरयाणवी नाच-गाना। गाने के बोल-- तु राजा की राजदुलारी --

उसके पीछे-पीछे दूसरा ट्रेक्टर, झंडा नारंगी। 

शिव मूर्ति स्थापना?        

पहली बार कब सुना था ये गाना? 2009? FB वाल Y-D 

शायद ये?   


और आज का राज? 
नीचे बोलती तस्वीर और गाना?
बड़ा ही उलझ-पुलझ 
खेल काफी पुराना।   

"धुम्मां ठा दिया कती" 
नीचे जो शिव के अवतार की फोटो है--
"धुम्मां ठा दिया कती" इसी को कहते हैं क्या?
सोचो, कैसे-कैसे तो भगवान पाल रखे हैं हमने?
इनकी मुर्तियाँ दूध भी पी जाती हैं?

चाहे छोटे-छोटे गरीब बच्चों तक को देने को दूध ना हो, ऐसे भगतों के पास! अपनी या किसी अपने की लगा के देखो न एक-आध मूर्ति, क्या पता वो भी पीती हो दूध? और दूध ही क्यों? पानी, चाय, लस्सी, नीम्बू-पानी, कॉफ़ी, शरबत और भी पता नहीं कितनी ही तरह के जलपान। पिला के तो देखो। 
मुर्ति-पूजा पे इतना सांग और इतना खर्च? ये सब किसी गरीब को दो तो शायद ज्यादा भला होगा। उसपे मंदिरों के चढ़ावों पे पुजारियों के जूत बजने भी कम हो जाएंगेनहीं?
      

ऐसे-ऐसे भक्तों की भी कमी नहीं मिलेगी, जिन्हें इंसानों से कैसे व्यवहार करते हैं, चाहे ये तक न पता हो। मगर ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे भक्त बने जरूर घुम रहे होंगे। या ज्यादातर ऐसे ही लोग भक्त होते हैं?

राजनीती के भगवानों के उप्पर अगर घर के भगवानों को रख दें, तो शायद कुछ दब जाएँ ये ताँडव-वाले?
राजनीतिक-भगवान? 
भगवान और ताँडव?  
भगवान और धुआँ-धुआँ?
भगवान और भाँग? 
और भी पता नहीं क्या-क्या!     
ये सामंती-व्यवस्था, गरीबों के किस काम की?
और सबसे ज्यादा भक्त भी गरीबों और कम पढ़े-लिखों में ही मिलेंगें। 

थोड़ा भी पढ़ा-लिखा और इन ऐसे-ऐसे भगवानों का जानकार व्यक्ति, शायद यही कहेगा,
 मोदी जेलर, यहाँ तो विकल्प है -- अंगुठा या हस्ताक्षर। 
आप जबरदस्ती उठा के जेल में रोक के उंगलिमाल या अँगूठामाल बनना चाहते हो क्या? 
थोड़ी बहुत तो शर्म करलो आदमखोरो। जेल भेझेंगे क्या सच लिखने या बोलने पर भी? कितनी बार?    
   

आभासी या थोपे हुए लॉर्ड्स पे या बुत्तों वाली मूर्तियों पे, हमने तो अपने भगवान धर दिए, अपने वाले मंदिर में।  
इनके भगवानों की ये जाने। समझ अपनी-अपनी और भगवान भी अपने-अपने।

कुछ-कुछ ऐसा ही पहले भी लिख चुकी शायद?
पढ़ने के लिए दिए गए लिंक को चैक करें  पथ्थरों में भगवान या मंदिर?