About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Friday, May 12, 2023

अन्धविश्वास, अज्ञानता, अंधभक्ति और --

अन्धविश्वास, अज्ञानता, अंधभक्ति और उसपे तड़का लगा हो राजनीति का, लोभ का, लालच का? 

Automation, Semiautomation and Enforced or the other way?

Can micromanagement create all this and makes humans robots to exploit different ways?

When we talk about superstition then generally keep illeterate people in mind. Though at times, it can be the other way.

अन्धविश्वास अज्ञानता है और अज्ञानता अन्धविश्वास। अंधभक्ति भी इन्हीं का मिश्रण है। 

सुना होगा कहीं, "माता धोकन जावां सां, माता निकल री सै" और आपने सोचा होगा शायद, की आज के वक़्त भी लोग इन सब में विश्वास रखते हैं?

या "पीलिया निकल आया, ना पीला देखना, ना पहनना, ना खाना"। और शायद आपने सोचा होगा, ये कौन सी दुनिया में आ गए?

और भी बहुत कुछ ऐसा ही। 

Then there is another world, comparatively new knowledge. The way they mix things and create complexities for the exploitation of common people, are some of cruelest ways. They are neither illiterate nor lilbit educated. Who are these people? What are they doing?

Docs, Scientists, Profs and so many other field experts, especially ones who are brains of different parties. They process things from higher level and different parties people micromanage them up to that last level.

2016, H#16, Type-3, कोई आम (दुशहैरी) के पेड़ पे ढेर सारा कच्चा सुत का धागा लपेट गया, पीछे वाले लॉन में। और आप सोच रहे हैं, कैसे-कैसे गँवारपट्ठे हैं यूनिवर्सिटी में भी! उसके पीछे के जुर्म की कहानी थोड़ा लेट समझ आयी।  

माता धोकन जावां सां, माता निकल री सै और पढ़े लिखे भेड़ियों के जाले बच्चों तक को नहीं बख्सते। 

पीलिया निकल आया, ना पीला देखना, ना पहनना, ना खाना ?

ऐसे-ऐसे कितने ही अंधविश्वासों के पीछे छुपे जुर्म की कहानियों (Scientific Way of Exploitation by abusing knowledge and exploiting illiterate, semi illiterate people via faith or religion) को कैसे समझाया जाए? शायद ये सब ज़्यादा जरूरी है।  

कम पढ़े-लिखे लोगों को अपने जाल में फसाना एक बात है। मगर पढ़े-लिखे लोगों का भी पत्ता काट देना, वो भी जब, जब ये सब करने वाले पढ़े-लिखे (भेड़िये)--?, कितने ही लोगों के Surveillance Radar पर हों? 

कुरकुरमुत्ते की तरह उगे हुए हॉस्पिटल्स। जहाँ हर बीमारी बढ़ाई जा सकती है, बनाई जा सकती है -- सिर्फ़ और सिर्फ़ कुछ पैसों के लिए। ये कहानियाँ हैं, कैंसर से लेकर, लकवे तक के अनोखे इज्जादों की। मलेरिआ, डेंगू, BP, Heart Attacks से लेकर, हर उस बीमारी तक, जो आप सोच, समझ और जान सकते हैं, या जानते हैं। 

मगर हॉस्पिटल्स तो आप बाद में जाते हैं। उससे पहले भी बहुत कुछ है, जो आपको वहाँ तक पहुंचाता है। क्या है वो सब? कैसे समझा और बचा जा सकता है, इन सबसे? और कैसे बचाया जा सकता है, आम आदमी को, जिसकी समझ में अन्धविश्वास ज़्यादा फलते-फुलते हैं?     

इसके लिए इनके जानकारों को, वो फिर चाहे डॉक्टर्स, वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स या संचार माध्यम से जुड़े लोगों को अपने आसपास के ऐसे इलाकों में ज़्यादा संवाद और प्रचार की जरूरत है। खासकर उनको, जिन्हें पैसे से ज़्यादा अपने प्रोफेशन से लगाव है। 

Tuesday, April 25, 2023

माटी के कच्चे-पुतले

बच्चे जैसे?

सीधे-साधे लोग? 

भोले-भाले लोग?   

अनपढ़-गँवार लोग? 

गँवारपठ्ठे?

अपरिपक्कव इंसान?  

आसानी-से धोखा खाने वाले लोग?

आसानी-से बहकाई में आ जाने वाले लोग?


Or Gullible Crowd? Gullible People? 

कौन हैं ये लोग? शायद हममें से हर कोई? किसी न किसी रूप में, कहीं न कहीं? कुछ थोड़े-से कम, तो कुछ थोड़े-से ज़्यादा?     

बच्चे दिल के सच्चे 

बच्चों के खेलों को देखना-समझना और उसका विश्लेषण करना, अपने आप में एक दुनिया दिखाता है। 

आस पड़ोस में कई सारे बच्चे हैं -- कुछ cousins, कुछ अड़ोसी-पडोसी, कुछ इधर-उधर के। इनमें से एक बच्चा या यूँ कहुँ बच्ची, मारने-पिटने में अव्वल थी। बाकी ज़्यादातर, मार-पिटाई खाते रहते थे और शिकायतों के ढ़ेर रखते थे, उसके खिलाफ़। 2-3 साल बाद ही, सारे बच्चे मार-पिटाई के खेल-खेलने लगे।  ये सब देखके अज़ीब भी लगता, और अटपटा भी। एक-दो बच्चों के व्यवहार को बदलना, कितना आसान या मुश्किल है? बजाय की सबको लड़ाका बना देना? 

यही हाल भाषा के हैं। अब ये सब दूर से तो कहीं आएगा नहीं। सीधी-सी बात, अपने वातावरण से सीख रहे हैं। वातावरण, आप अपने बच्चे का निर्धारित कर सकते हैं या ज़्यादातर कुछ खास अपनों का। उससे आगे तो थोड़ा मुश्किल है। हालाँकि इस मुश्किल का काफी हद तक हल है। वो स्कूल, जहाँ ये बच्चे पढ़ते हैं। क्युंकि, ये वो जगह है, जहाँ वो घर के बाद अपना सबसे ज्यादा वक़्त गुजारते हैं। और घर के बाद जहाँ की मानते भी हैं। 

अजीबोगरीब प्रतिस्पर्धा: माँ-बाप बच्चों में प्रतिस्पर्धा रखते हैं, किस का एक या दो अंक कम या ज़्यादा है। किसका एक या आधा अंक कट गया? मगर --

कौन कैसे बोलता है ? क्या-क्या खेलता है ? अब इसकी प्रतिस्पर्धा कौन रखे? क्युंकि, उसके लिए तो आपको खुद को भी जिम्मेदार ठहराना पड़ेगा। खुद में भी थोड़ा-बहुत बदलाव करना पड़ेगा। बस यही वो मार है, शायद जहाँ परवरिश कैसे लोगों के बीच हुयी है, का फ़र्क दिखने लगता है।  

माटी के कच्चे पुतले धीरे-धीरे ढलने लगते हैं, अपने आसपास के रंगों की घड़ाई में।

बच्चे वो साँचा हैं, जिन्हें जिस किसी साँचे में ढालोगे, वो ढल जाएँगे। उसके बाद इंसान जितना बड़ा होता जाता है, उतना ही मुश्किल होता जाता है। हालाँकि असंभव कुछ नहीं। 

माटी का कच्चा पुतला पे पहले भी शायद कहीं कुछ लिखा था: 

Click on: माटी का कच्चा पुतला 

Or copy-paste: https://worldmazical.blogspot.com/2016/08/blog-post.html

Saturday, April 8, 2023

तुम जहाँ रहते हो

तुम जिसके पास रहते हो, उसी जैसे-से दिखने लगते हो। कैसे? व्यवहार भी, वैसा-सा ही करने लगते हो। 

कुछ साल पहले, दो बच्चों के बालों में, कुछ अजीबोगरीब बदलाव महसुस किये गए।जेनटिक के हिसाब से, वो कुछ हज़म नहीं हो रहा था। एक बच्चे के पैदायशी, सीधे भारतीय भूरे-काले बाल, काले और  घुँघराले में बदलने लगे थे। दूसरे के पैदायशी, काले और घुँघराले बाल, सीधे और हलके काले में। कोई बड़ी बात नहीं। कितने ही तो कॉस्मेटिक्स हैं बाज़ार में, ऐसा करने के लिए। मगर, वो इन बच्चों के केस में संभव नहीं लग रहा था। माँ-बाप ही इतना पार्लर नहीं जाते, तो बच्चे कहाँ से जाएँगे?

उस वक़्त ये शायद किसी ने लिखा था कहीं, "तुम जिसके पास रहते हो, उसी जैसे-से दिखने लगते हो।" मुझे समझ नहीं आया तब। शायद, अब कुछ-कुछ आ रहा है।  

व्यवहार भी, वैसा-सा ही करने लगते हो। 

खाते-पीते वही हो। नहाते-धोते उसी पानी से हो। रखरखाव भी, वैसा-सा ही रखते हो। नहाने-धोने के लिए, रखरखाव के लिए, प्रोडक्ट्स भी तक़रीबन वही प्रयोग करते हो। छोटी-मोटी बिमारियों के नाम पे, दवाईयाँ भी वहीं की लेते हो। तो क्या होगा? 

पहले मैं यहाँ से कोई प्रोडक्ट कम ही लेती थी। चाहे वो खाने-पीने का हो या किसी और तरह का। क्युँकि, इतनी देर रुकना ही नहीं होता था। अब जब रूकना पड़ा, तो काफी-कुछ समझ आया। दिनप्रतिदिन प्रयोग होने वाला कुछ  सामान, मैंने यहाँ से लेना शुरू कर दिया। 

ये भी समझ आया की Molecular Bio के Codon Usage की तरह, हर प्रोडक्ट का अपना एक कोड है और वो किस कोड वाली जगह या दुकान पे फिट बैठता है, वो प्रोडक्ट भी वहीं आएगा। इसमें काफी कुछ automation पे है और काफी कुछ semi-automation ऐसे ही जैसे, इस जगह इनके हॉस्पिटल हैं, उस जगह उनके। इन हॉस्पिटल्स में, इन-इन कंपनियों की दवाईयाँ मिलेंगी। उन हॉस्पिटल्स में उनकी। बदल गए, उनको बनाने वाली सामग्री और तरीके। तो प्रभाव भी बदलेंगे।   

सोचो, एक ही कंपनी, एक ही प्रोडक्ट, मगर थोड़ी-सी जगह बदलते ही, उसपे कुछ अजीब-सा, कोई शब्द बदला मिले? ऐसा एक नहीं कई प्रोडक्ट्स के साथ हुआ। आपने कोई खाने का सामान लिया है। याद ही नहीं कब से वही ले रहे हैं। दोनों जगह पैकेजिंग वही, स्वाद भी वही, दिख भी वैसा ही रहा है। मगर बड़ा-सा लिखा एक शब्द, आपको उत्सुक बनाता है। और आप सोचते हैं, ये क्या है? वैसे भी मेरी आदत का हिस्सा है, तारीख़, ingredients वैगरह जाँच कर लेना।   

एक जगह के उसी कवर पे अंदर की साइड M, और दूसरी जगह B। अब किसी खाने-पीने की वस्तु के अंदर के कवर पे भी, ऐसा क्या फर्क हो सकता है? ये कौन-सा, electronic-items की chip हैं? 

कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे, कहीं सीधे और खुले बालों का चलन हो। बाँधना हो, तो इक्क्ठ्ठे किये, सिम्पल सा रुफल डाला और हो गया। मतलब, जो काम आसानी से और कम वक़्त में हो सके और ठीकठाक भी लगे। और कहीं चलन में,जलेबी-जैसी, सीधी-सी-चोटी (Braid)। वहां पर शायद वही अच्छी लगती है। उनके लिए खुले बाल मतलब, भूतनी! भांध ले इन्ह, भुंडी लाग्य सै। दादियों के वक़्त में, एक जबस्दस्त गुँथा-हुआ, सिर के ऊपर जुड़ा जैसा-सा चुण्डा होता था, जो वो खुद नहीं बनाती थी, बनाने वाली आती थी। तो कहीं बच्चों को नए-नए शौक थमाए जा रहे हों। आज इधर से, कल उधर से, परसों उधर से, टेढ़ी-मेड़ी, उलटी-पुल्टी, कभी आगे से, कभी पीछे से, कभी इस साइड से, तो कभी उस साइड से, कभी एक, कभी दो, कभी और भी ज्यादा। आओ, पार्लर-पार्लर खेलते हैं। खामखाँ की रोकटोक, शायद किसी को भी अच्छी नहीं लगती। खासकर जबतक बताया ना जाए, की ऐसे या वैसे करने से फर्क क्या पड़ता है। हमें क्या करना है, या क्या बनना है, उसके हिसाब से वक़्त कहाँ लगाना चाहिए। वक़्त, जरूरतों, जगह और समय के हिसाब से काफी कुछ बदलता है।   

मगर इन्ही के अंदर छिपा होता है सिस्टम, राजनीतिक कोड्स और पार्टियों के द्वन्द्व। बच्चों से लेकर बड़ों तक, सिर्फ उनका अनुशरण कर रहे होते हैं। ज़्यादातर बिना जानकारी के। इसीलिए, अगर आप किसी या किन्हीं बिमारियों का बार-बार शिकार हो रहे हैं या लगता है, की ये किया हुआ है -- राजनीतिक बीमारी है, तो जगह बदल कर देखिये, शायद ठीक हो जाएं। वो कहते हैं ना, कुछ बीमारियाँ हवा-पानी बदलने से ही खत्म हो जाती हैं। क्युंकि, उस हवा-पानी के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है। वैसे ही, जैसे, भाषा, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान आदि। ये सब पेड़ पौधों से ज्यादा सीखा जा सकता है। 

Friday, April 7, 2023

छोटी-छोटी सी बातें, जब सिरदर्द लगने लगें

Creation of Parallel Cases in Society

कल की ही तो बात थी, जब मेरा जन्मदिन, मेरे उपहार, आपका जन्मदिन भी मेरा जन्मदिन और बच्चों की खुली-सी मस्ती। मगर, एक ही दिन में घुट-सी गयी थी वो। बदल गयी थी, उदासी में । उसके बाद जो हुआ, वो तमाशा पहली बार देखा था। बच्चा जैसे उठा लिया गया था। किसी अपहरण की तरह। शायद पसंद नहीं आया, कुछ लोगों को उसका यूँ शिकायत करना कहीं। चाहे वो शिकायतें थी, डरे-सम्हे, एक दबे-से बच्चे की। 

मेरी नजरों से ही ओझल कर दिया गया था उसे। घर रहके भी घर नहीं थी वो। जैसे वो घर उसका कभी था ही नहीं। जैसे निकाला दे दिया हो, उसे उस घर से -- पड़ोसियों के यहाँ या गली में। कौन पड़ौसी? कैसे पड़ौसी? किसके पड़ौसी? क्या लेना-देना उनका, किसी के बच्चे से? बच्चे के पेपर सिर पे और माँ है नहीं। घर में सब अनपढ़-गवाँर। कोई पढ़ाने वाला नहीं। गररररररर 

सच में?

अब tution तो लगाना पड़ेगा ना? अरे वो पहले से पढ़ाती है, तो अब भी पढ़ा लेगी?

सच में?

पहले से, कब से? अभी 2022 में पढ़ाना शुरू किया है। Correspondence से MA कर रही है। नहीं कर चुकी।    

बढ़िया। 

तुम्हे छोटे बच्चों को पढ़ाने का तजुर्बा नहीं है ना। 

और आप हक्के-बक्के से, सामने वाले के मुँह की तरफ देख रहे हैं। और सोच रहे हैं, 31st जनवरी तक तो था, शायद। कम से कम अपने घर के बच्चे को पढ़ाने का। हाँ, tution का जरूर नहीं है। इजाज़त नहीं होती, सरकारी नौकरी में और ना ही कभी महसुस किया, ऐसा करने का। फिर ऐसा क्या बदल गया? शायद बहुत कुछ, 1st, फरवरी को। 

आसपास एकाध और आवाज़ आती हैं, क्यों सिरदर्द ले रहे हो। वो ...... है ना।  

और आप मन ही मन सोचते हैं, "सिरदर्द? अपने बच्चे को पढ़ाना सिरदर्द?"

अब बच्चा आपके पास थोड़ी बहुत देर खेलने के बहाने आता है, बस। 

1-2 दिन बाद वो भी बंद। अब खेलेगा भी वहीँ। वही पड़ोस में tution वाली madam के पास।- Correspondence-MA  

उसके बाद खाना-पीना भी वहीं। कई बार तो दादी भी रस्ता ही देखती रह जाए। 

आपको लगता है, बच्चा ज्यादा ही बाहर खेलने लगा। रात के 9.00 बजे तक। 9.30 बजे तक। आप भी उसके पीछे-पीछे रहने लगे। और इसी के साथ इधर-उधर खटपट भी रहने लगी। और आप मन ही मन सोचते हैं --एक माँ, कितनी जरूरी है, बच्चे के लिए। कितना कुछ करती है। उसे पल-पल की खबर है, अपने बच्चे की। कितनी देर पढ़ना है। कितनी देर खेलना है। कहाँ खेल सकते हो और कहाँ नहीं। कब तक खेल सकते हो, और कब तक नहीं। और भी पता नहीं क्या-क्या। कितना कुछ बदल जाता है, सिर्फ एक इंसान के ना होने से -- खासकर माँ। दादी या बुआ वो सब करने लगें तो खामखाँ की बड़बड़ क्यों? सब जैसे सिर के ऊपर से जा रहा था। 

अब इन अजीबोगरीब पड़ोसियों पे, अजीबोग़रीब शक होने लगा। भला कोई क्यों करेगा ऐसा? किसलिए? और इसमें बच्चे की भलाई कहाँ है? क्या-क्या सीख रहा है वो, ऐसे माहौल में? धीरे-धीरे, आप ये सब, कुछ अपने बड़ों से, इधर-उधर बाँटने लगते हैं। जो शायद कुछ कर सकते हैं। और थोड़ा बहुत बदलाव होता भी है। बच्चा वापस घर दिखने लगता है। दैनिक दिनचर्या में कुछ-कुछ पहले की तरह लौटने लगता है। मगर कुछ जगह, कुछ अजीबोगरीब सख्ताई भी होने लगती है। ये जिसकी शिकायतों से हुआ है, उससे जितना और जैसे हो सके, दुर रखने की कोशिशें।  

वो नयी-नयी tution वाली मैडम, उसकी माँ वाले स्कूल में पढ़ाने लगती है। चलो अच्छा है। सब निठल्ले, जितनी जल्दी, अपने-अपने कामधाम लगें, उतना अच्छा। इधर-उधर, फालतु का दिमाग कम चलेगा। उलटे-पुल्टे काम कम होंगे। इधर-उधर परेशानियाँ कम होंगी। 

मगर 

अब बच्चे का स्कूल बदलने की भी खबरें चलने लगी। हाँ। ख़बरें चलने लगी। अब ये क्या बकवास है? और क्यों? वो भी, वहीँ tution वाली madam के साथ जाएगा। अच्छा? अगर वो स्कूल इतना अच्छा था, तो उसकी माँ अपने साथ ही ना ले जाती? मैंने तो सुना है, वो खुद भी स्कूल बदलने .....

एक समझदार (?) पड़ोसन: अरे दो पैसे बचेंगे। 

और आप फिर से चुप, मन ही मन सोचते हुए। पढ़ाई में भी दो पैसे बचाने हैं? क्या सोच है। और सच में ऐसी कोई नौबत आ गयी और तुम्हें खबर ही नहीं। कैसे अपने हो तुम?

थोड़ा रूककर आप बोलते हैं। पैसे की दिक्कत, किसी की तरफ देखते हुए? जो कल देता था, अब भी वही देगा। बस कुछ महीने की दिक्कत थी। लड़की स्कूल नहीं बदलेगी और ना ही पैसे की ऐसी कोई दिक्कत। यहाँ, स्कूल की पढ़ाई में तो फिर कुछ लगता ही नहीं। 

मामला कुछ और है? क्या है? क्यों है? किसलिए है? महज़ राजनीति? खतरनाक राजनीति? और क्या कहा जाए?

ऐसे ही बनते हैं Parallel Cases?

Twists, Turns, Manifestations, Manipulations as per requirements.

Monday, April 3, 2023

बाहरी दखल और सामानांतर केस

जितना ज़्यादा आप सामानांतर केसों का विश्लेषण करेंगे, उतना ही समझ आएगा की अपने आप जैसा कुछ नहीं है। बहुत जगह, बहुत तरह के जबर्दस्ती घड़ने के तरीके हैं। चालाकी और धूर्तता के तरीके हैं। 

जो केस जितना ज्यादा एक जैसा-सा दिखता है, उसमें उतनी ही ज्यादा जबरदस्ती घड़ाई हुई है। जो बाहरी दख़ल के बिना संभव ही नहीं है। जहाँ Campus Crime Cases में इनके प्रमाण Documented हैं। वहीँ सामाजिक घड़ाई में बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना। आधी-अधूरी जानकारी देना। इधर का उधर, उधर का इधर करना या बताना। कुछ-कुछ हेराफेरी जैसा-सा ही। हेराफेरी करने के लिए कुछ उपयुक्त परिस्थितियाँ, जैसे:  

जिस जगह मनमुटाव या आपस में फुट ज्यादा होगी। 

विचारों में मदभेदों को स्वीकार करने की सहनशीलता कम होगी।

लोग कान के कच्चे ज्यादा होंगे। 

आपस में बात करने की बजाय, बाहर वालों से ज्यादा बात करते हों। 

या किन्ही केसों में एक दूसरे के बारे में जानकारी किसी और से लेते हों, किसी भी परिस्थिति वस। 

शांत दिमाग की बजाय जल्दी गुस्सा करने लगते हों। 

और भी ऐसी ही कितनी परिस्तिथियाँ हो सकती हैं, जहाँ इन्हे घड़ना आसान हो जाता है । जहाँ फुट या मनमुटाव ना भी हो, या ऊपर दी गयी जैसी कोई परिस्थियाँ न भी हों, वहाँ भी शातिर  लोग जाने कैसी-कैसी परिस्थियाँ पैदा करने का मादा रखते हैं।

आजकल ऐसा ही कुछ आसपास चल रहा है, जिसके परिणाम 2024 तक ही शायद खतरनाक रूप में सामने आ सकते हैं। जो इस घड़ाई के मोहरे बने हुए हैं, उन्हें खुद नहीं मालूम की वो रोबोट्स की तरह प्रयोग हो रहे हैं। उनके अपने लिए इसके परिणाम सही नहीं होंगे।  

Sunday, April 2, 2023

हेराफेरी, शब्दों की, इरादों की

थोड़ा हेरफेर इधर, थोड़ा हेरफेर उधर, शब्दों का, इरादों का, क्या-क्या करवा सकता है?  

आप इस विषय और इससे संभंधित हो सकने वाले प्रभावों पर विचार करिये। आते हैं इस विषय पर भी। इसके इंसान के रोबोट्स की तरह प्रयोग कर पाने की क्षमता पर। भावानात्मक प्रहार, भावानात्मक रूप से बदल पाने की क्षमता। सिर्फ़ थोड़ा-सा दिमाग प्रयोग करके शांति को बवंडर में और बवंडर को शांति में बदल पाने की क्षमता। रिश्तों के  जोड़-तोड़ करने की क्षमता। रिश्ते बदलने की क्षमता। घरों को, समाज को तोड़ने या जोड़ने की क्षमता। परिणामों को इधर से उधर कर पाने की क्षमता। 

बड़ी-बड़ी कंपनियों के जोड़-तोड़ की क्षमता। राजनीतिक उथल-पुथल मचाने की क्षमता। कुर्शियों के द्वंद्वों का शातिर हेर-फेर। जिन्हें ज़्यादातर करते हैं, कहीं दूर बैठे शातीर इंसान, और भुगतान करता है अक्सर आम आदमी।  

छोटे स्तर पर भी, आप रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कितने ही ऐसे वाक्यों से वाक़िफ़ होते होंगे। कभी इधर तो कभी उधर देखते होंगे। तो शायद कहीं खुद भी भुक्तभोगी होंगे। 

इन सबके पीछे कोई जादू नहीं है। साइंस है, साइकोलॉजी है और उनके अलग-अलग तरीके से बदलाव कर पाने की क्षमता।  

Thursday, March 16, 2023

फुट डालो, राज करो-- राजनीती!

उन्हें ये तो मालुम है, की जो कुछ हो रहा है, वो सही नहीं हो रहा। मगर, ये सब गड़बड़ क्यों और कैसे हो रहा है, ये नहीं मालूम।  

ज़्यादातर बच्चे इस कुंबे में माँ-बाप में से किसी एक ने पाले हैं, क्यूँकि दूसरा किसी भी कारणवश दुनियाँ में ही नहीं रहा। इस कुन्बे की ज़्यादातर लड़कियाँ युवावस्था में ही, किसी भी कारणवश वापस घर बैठ गयी। और भी कुछ-कुछ ऐसा ही, इस दौरान सुनने में आया। काफ़ी हद तक हकीकत भी। क्या कारण हो सकते हैं?  ये सब सुनकर या जानकार, सीधा सा प्रश्न दिमाग़ में यही आएगा। 

किसी भी मौत के बाद का शौक समय, खासकर तेहरवीं तक का, मेरे लिए पहली बार इतने पास से देखने-समझने का था। इतने सारे सवालों के साथ-साथ, कहीं न कहीं, बहुत से जवाब भी लिए हुए था।  

राजनीती 

उनमें, राजनीती और उसकी क्रूरता और निर्दयता एक है। मौत पे भी राजनीतिक जुआ! -- Kinda Checkmate! आप राजनीती को पसंद करते हैं या नहीं? आपके आसपास कोई राजनीती में है भी, या नहीं?  ये सब भी जरूरी नहीं है। राजनीती फिर भी, आपकी ज़िंदगी का हर पहलु तय करती है। 

फुट डालो, राज करो 

ये वो जुआ है, जिसमें राजे-महाराजों ने पुरे समाज को ही एक दुसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया हुआ है। जो जितने बेवकूफ़ हैं, वो उतने ही राजे-महाराजों के सैनिक ज्यादा हैं। वो, जो ये तक नहीं सोच सकते, की इसमें तुम्हारा अपना या अपनों का कितना भला है? 

फुट डालो राज करो, जैसे उनकी माँ, बेटी या बेटे की आपस में नहीं बनेगी, तो तुम्हारा भला होगा। वो या ये, घर बैठेगी या बैठेगा, या इसकी या उसकी आपस में बिगड़ेगी, तो मेरा वैवाहिक वक़्त ठीक होगा। वो गाँव आ गया या आ गयी तो हमारी नैया पानी में गयी। वो शहर गया या गयी तो हमारी। और भी पता नहीं क्या-क्या! वैसे इसमें अज़ीब जैसा क्या है? इंसानी फिदरत है। खासकर, अंदर से असुरक्षित या कमज़ोर इन्सान की? या कुछ ज़्यादा ही ठाली इंसानो की? 

या शायद कुछ और भी है? राजनीतीक जुआ? और इन असुरक्षित मह्सूस करने वाले इंसानों के दिमाग़ में, अलग-अलग पार्टीयों द्वारा, भेझे में ठूस-ठूस कर भरा गया कूड़ा? ये वो है, जो होता है, मगर दिखता नही। या यूँ कहें , "जो होता है, वो दिखता नहीं और जो दिखता है, वो होता नहीं"? या शांत दिमाग से देखने-समझने लगो -- दिखेगा भी, और समझ भी आने लगेगा, की जो दिख रहा है या सुन रहा है, उसके पीछे वज़ह क्या हैं?   

इसका सबसे बुरा असर किसपे होता है? शायद बच्चों पे? और बुज़र्गों पे? 

Friday, March 10, 2023

होलिका दहन (7.3.2023)

बचपन से बहुत बार होलिका दहन देखा या ज्यादातर सुना। बहुत सालों बाद, अबकी बार जो देखा, वो होलिका दहन के नाम पर एक डरावना-सा सांग था। किसी मंदिर के नाम पे कोई राजनीतिक तांडव जैसे। आगे ट्रैक्टर, पीछे ट्रॉली। ट्रॉली में आग की लपटें ऐसे जैसे -- (some assisted murder). 

(I will write with time about that in details, how that happened? Rather must say kinda enforced by creating such conditions? And creations of such conditions are not that difficult by experts of political designs and political fights. Common people must be aware about such things to stop them). Read somewhere some term about that I guess, Cult Politics? Sinister designs, by twisting or altering, manipulative ways to represent something contrary? 

उन लपटों से पहले आसमान में धुएँ का कहर, सामने गली से ऐसे गुजर रहा था, जैसे लीलता जा रहा हो, गली दर गली, धुआँ ही धुआँ। 

कहते हैं, किसी समाज को, वहाँ के जनमानस को, उनकी खुशहाली या समस्याओं को जानना है तो उनके रीतिरिवाज़ों को जानना बहुत जरूरी है। रीतिरिवाज़ बताते हैं वो समाज अपने जनमानस को कैसे जोड़ता है या तोड़ता है। ऐसे ही, शायद जानना जरुरी है उन रीतिरिवाज़ों में आते बदलाओं को -- क्यूँकि वो बदलाव आईना होते हैं उस बदलते समाज का, भले के लिए या बुरे के लिए। बदलाव आगे बढाते हैं या पिछड़ा बनाते हैं? औरतोँ को, बच्चोँ को, समाज के कमज़ोर तबके को शशक्त करते हैं या दबाते हैं?        

Wednesday, March 8, 2023

मानव-संसाधन और सामाजिक-घड़ाई

थोड़ी दिशा मिले तो 

चल निकलेंगे 

ऐसा मेरा विश्वास है 

बेकार नहीं हैं वो 

दिशाहीन कह सकते हैं 

वो भी, अज्ञानता की वजह से 


मानव संसाधन (Human Resource) का ज्यादा ज्ञान तो नहीं मुझे, पर शायद थोड़ी-बहुत समझ  जरूर है।  इंसान, बेरोज़गार तो हो सकते हैं, मगर बेकार नहीं।  बेकार है तो वो सिस्टम, वो सामाजिक-राजनितिक तानाबाना, जो उन्हें सही दिशा नहीं दे पाता। क्यूँकि अपने-अपने निहित स्वार्थों के लिए उन्हें ठाली लोगों की एक फ़ौज़ चाहिए। सब अपने-अपने काम लग गए, तो "टुकड़े डालो, कुत्ते पालो" या प्रश्न करने वालों के लिए "लठ्ठ लाओ, मार भगाओ", वाली सोच की राजनीती कैसे चलेगी?

फुट डालो, राज करो के शिकार हैं ये। जिन्हे अपने ही आसपास के लोगों को नीचे गिरने या गिराने में अपना फायदा नजर आता है। जहाँ से ये प्रचंड चल रहे हैं और जो लोगों को अपने शिकार कर रहें हैं, उन लूकी-छिपी-सी गुफाओं की समझ भी नहीं है इन्हे। वैसे ही, जैसे मुझे नहीं थी। इन्हें मालूम ही नहीं की इनका रोबोट्स की तरह इस्तेमाल करने वाले खिलाड़ी, दूर बैठे भी कैसे इनकी ज़िंदगियों को रिमोट कंट्रोल कर रहे हैं। इन्हें लगता है, सबकुछ ये खुद ही कर रहे हैं। 

 हक़ीकत हाँ में भी है और ना में भी 

हाँ -- क्यूँकि ऐसा होता प्रतीत हो रहा है, दिख रहा है 

ना खुद नहीं कर रहे -- क्यूँकि इन्हें मालूम ही नहीं लैब कैलिब्रेशन्स (Lab Calibrations) कैसे होते हैं? और सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) क्या है?

कौन और कैसे उन्हें बदल सकता है? तोड़, जोड़, मरोड़ सकता है? विचलित या भर्मित कर सकता है ? चालाकी से, धूर्तता से, दिमाग से इधर से उधर कर सकता है? वो, जो उन्हें चोबीसों घंटे अध्ययन या अवलोकन पर रखता है। उसे इंटेलीजेंसीआ भी कहते हैं। वैज्ञानिक, डॉक्टर, प्रोफेसर, इंटेलिजेंस शाखाएँ -- सिविल या फ़ौज़ और पत्रकार शायद यही सब करते हैं। 

समाज अपने आप में एक बड़ी लैब है --सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) अर्थात सामजिक तानेबाने को समाज के हित के लिए सँरचना, घड़ना।  घड़ना, वैसे ही, जैसे कुम्हार घडता है। जुलाहा बुनता है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे पक्षी बुनते हैं, रेशमी कीड़ा बुनता है, मधुमखी बुनती है।  सुनार तापता है।    

या सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) -- राजनीतीक लाभ के लिए या बड़ी-बड़ी कंपनियों के फायदे के लिए, राजे-महाराजों के लिए करना। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे गीद्ध झपटता है,  मकड़ी बुनती है, शेर, चीता घात लगाते हैं, शिकार करते हैं --छुपकर, स्फुर्ति से, कोई छद्धम युद्ध जैसे। 

मोबाइल आज के वक़्त, सामाजिक घड़ाई (Social Engineering) का सबसे बड़ा हथियार है। और प्रोद्योकी  (technology), किसी भी फॉर्म में उसका अभिन्न अंग।  ज्यादातर ऐसे लोगों को आज भी पता नहीं है की दिनरात जिस मोबाइल को वो साथ लिए घुमते हैं, वो क्या-क्या करता है? और  किन-किन के लिए करता है? कैसे ये लोगों की ज़िंदगियों को रिमोट कंट्रोल करता है? छद्धम युद्ध के सैनिकों की तरह कौन-कौन इसमें घुसे बैठे हैं?   

मानव-संसाधन के लिए इन सबकी जानकारी, ज्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत लाभकारी तो जरूर होगी। 

Saturday, February 18, 2023

F-Block?

I was watching some zone curiously since some time. One day in 2017, read something like, "Modi G, give her all money in one installment and let her go."

My curiosity increased a bit more. Who is this person on F-Block?

Next day, while I was in my office room, some student came and asked me, "Ma'am where is "S Pho..... ma'am room"?

S Pho..... ma'am?

Music teacher.

Did not you read the name of this department before entering this building? It's Biotechnology.

Oh! Sorry ma'am. We asked someone at the entry gate and had been informed to check at second floor.

This is first floor, not second. 

Oh! Again sorry ma'am.

Such things had become normal at that official place.

Since then I noticed so many interesting changes on so-many other spaces on F-Block. This side F-Block, that side F-Block like some clogs. 

Now a days blah, blah zones have gone on blocked-mode and blah, blah opened-mode. I wonder at times, what makes these F-zone spaces blocked or opened zone? In case, someone can shed some light :)