About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator? Currently working at media culture lab, social designing and engineering, human robotics.

Tuesday, March 31, 2026

कितै भी थानेदार बिठा दें सैं

The way system talks through people?


दादी के डंडे की आवाज़ आई। बाहर निकल कर देखा। 

हँसते हुए, दादी डूटी दे रे हो?

हाँ ऐ। कित की ड्यूटी।  कितै भी थानेदार बिठा दें सैं। बाहर पैर धरण के भी चोर होंगे। सोच सोच कै पाहं धरणे पड़ें सैं। 

थानेदार? हँसी ही नहीं रुक रही। 

और जीहते डर डर कै बाहर पैर धरणा पड़े। किते भी धर दें सैं ये तो। 

लागय सै आपतैं किमैं बैर सै इनका? हँसी ही नहीं रुक रही। 

दादी भी हँस भी रहे हैं और दो पिल्लोँ के कहीं भी गोबर कर देने से दुखी भी। 

मेरे तै के, ये तो कितै भी धर आवें सै इस थानेदार नै। काल उनके बाहरणे धर राख्या था। भुण्डा काम सै इनका तै। 

आपके डंडे तै भी ना डरते। 

ना कित डरैं सै? डरैं तो कर अ ना यो काम। 

;)     

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