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Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Thursday, September 3, 2026

आप करोड़ पति क्यों नहीं हैं?

  Advertisements Nowadays!

मेरा नौकरी से Resign (whatever kinda was that) और किसी का बताना, आपको 1- करोड़ मिलेंगे! ऑनलाइन ऐसी advertisements भी आम हो चली थी। 

कौन हैं ये बताने वाले? और इनको ये किसने बोला ? शायद इन बच्चों को ये तक नहीं मालूम, की सब हिसाब-किताब online है। और जिसको आप बता रहे हैं, उसे हकीकत पता है, आपको नहीं। वैसे भी आज के वक़्त करोड़पति होना क्या बड़ी बात है? मगर शायद कोड में कुछ अनोखा जरूर है। जाट तो वैसे भी 2-4 किले होते ही पैदायशी करोड़पति होते हैं। मगर रहते फिर भी ज्यादातर गरीब ही हैं। खासकर अगर सिर्फ जमीन है, वो भी इतनी-सी। 

भाभी की मौत के बाद, ऐसा ही शगुफा बच्चे को लेके उड़ाया जाने लगा। और आपको समझ न आये, इस सब बकवास का मतलब क्या है? ये फिर से कोड जोन था शायद। इस सबसे बचने की जरुरत थी। उसके आगे शायद, गुब्बारे उड़ाने वाले जोन थे। फूँक मारो और उड़ा दो। छोटी सी चोट की नहीं की कहानी ही खत्म। क्युंकि आगे करना क्या है, उसपे ज्यादा फोकस न होकर, खर्च कहाँ-कहाँ होना है, या कहो करवाना है, फोकस वहां ज्यादा होने लगा था। अब तक थोड़ा बहुत वित्तीय समझ आ गयी थी, शायद। उसपे Entrap के जोन से भी बचना जरूरी था। Entrap Zone चारों तरफ से था। आसपास के हर नासमझ इंसान पे था। मुझे तो समझ आने लगा था। या यूँ कहो, जो कुछ हो रहा था, वो साफ़-साफ़ दिख रहा था। मगर आसपास जो जाल फैला था, उसे कौन हटाए? और कैसे हटाए ?  स्कूल के प्लान को फ्लॉप करने की इधर-उधर की कोशिशों का मतलब ही यही था। भाभी की मौत के बाद, वो मोहरे फेंकने वाले चेहरे एक तरह से खुलकर सामने आ गए थे। मगर नासमझों को खबर अब भी नहीं थी। वो आपस में ही उलझने लगे थे। अब तो हर तरह का अवरोध (distraction) था वहाँ। 

जुए का जाल, अब उस जमीन की तरफ भी बढ़ने लगा था, जिसपे वो स्कूल बनना था। आम-आदमी की ज़िंदगी में घुसे, जमीन-जायदादों के जुए की राजनीती ! इस अजीबोगरीब तानेबाने से नफरत होने लगी थी। मगर नफरत हल कहाँ होता है? समाधान, ऐसे बन्दों से और शायद कुछ हद तक, ऐसी जगहों से और उनके षड्यंत्रों से, थोड़ा दूर ही रहना था।  

वैसे करोड़पति ही क्यों? अरबपति या खरबपति क्यों नहीं? वो भी अपनी पुस्तैनी जमीनों को बेच कर क्यों? ऐसे चालबाजों की खरीदकर क्यों नहीं? या सबसे अच्छा ये की ऐसे बन्दों और पंगों से ही दूर रहो। 

जैसे की उड़ चल कहीं 
ये जाहिल जहाँ तेरा नहीं 
साथ ले चल उन्हें भी 
जिनकी फ़िक्र यहाँ नहीं
सिर्फ़ दिखावे भर की है 
या निहित स्वार्थ तक की है 

ICICI Bank Trading? And University?

 Are banks involved in women trading?

Yes. They are. Some banks are behaving like agents of women traders. On the name of PPF withdrawal, ICICI bank has made so many excuses and so much bakwas that one feels like beware in future

PEOPLE DON'T NEED BANKS. Not at least like this ICICI DHADHEBAAZS. They are behaving like KOTHAS OF FLESH TRADERS.

People save money, so that it can be utilized in need. They are behaving like one is begging them for their money. From 2-minutes, 20-minutes, 2-hours, 2-3days, next week, on vacations, one week. Now do this, do that. Ufff! 

Not just this, earlier some stocks have been purchased even without my click on that option. I was just trying to check how this stock market works? And this ICICI directed website clicked automatically this Nippon option and then another one. I had to close that account out of fear, the way things were happening. Some fraudsters were purchasing some stocks on my behalf. Stocks, I did not even like and that was also without my permission, from my account and it was looking like I did that! 

Then another interesting thing happened. My ICICI account had money and one day it showed zero balance! On that it's occasionally showing account opening dates differences, amount difference by one digit. 





But by then, I had realized that many such things were also happening with the foreign universities websites information. 

It was clear cut indication that my internet was not just highly blocked but was presenting something which was not true. Especially some dates information of some bridge kinda or professional development kinda programs, their syllabi and even some postdoc positions, I guess. How one could work in such an environment? I realized, that it was happening since I started applying abroad in late 2021 or 2022 start. All these tactics are in place, just to stop me to leave India either by hook or crook. 

Few days back, it happened with ICICI bank PPF account. Yesterday again, it showed zero balance and almost at the same time, I got a message on my mobile that your account has been activated! What kinda account activation was that? Today again it showed the PPF amount but one digit less! Just yesterday, this lady dealing with my PPF account said that my withdrawal request has been accepted and I will get money by tomorrow evening or next day morning. Though, I was not sure as they had made fool like this many times earlier also. And today again her bakwaas started! How much time money withdrawal will take? 5-10 minutes? Or in case of some technical fault, max. 1-2 days?

Till now even University savings must had been available to me. What happened to that? What's going on there? If anyone can give any information? What else they need now? During this time period, some people or should say party, tried hard that I must join back. One day out of some fears, I even gave back that joining. But question is where are the safety measures and academic environment one needs to grow? I think, I can do better beyond this university's files-fight and political gambling of parties. 

And important question, why these political parties cannot come out of this gamble? Whom they are serving by that? What kinda society this gambling has created? 

रसायनिक छिड़काव (मतलब जहर)

जहरीले लोग, जहरीला खाना, जहरीला पानी और जहरीली हवा? क्या बस यही बच गया है, हमारे लिए या हमारी आगे की पीढ़ियों के लिए? 

"मोदी रोग और अमेरिकन शल्य चिकित्सा भोग"  Ki (Or Kia-- IA or AI?) and Operation War P SPEED? शायद कुछ-कुछ ऐसा ही? 

CORONA COVID PANDAMIC का असली नाम शायद यही है। G! जी (Ji?), सही सुना आपने। इस एक बीमारी ने या कहो महामारी ने दुनियाँ को बहुत कुछ सिखाया है। शायद ही कोई बचा हो, जिसने इसके असर को नहीं भुगता हो। बिमारी तो कोई थी ही नहीं, बस जहर था, चारों तरफ! झूठ का, धोखाधड़ी का, लालच का, इंसानों के दिमागों में। और उन्होंने फैला दिया या कहो परोस दिया वो जहर, हवा में, पानी में और खाने-पीने में। धरती में और शायद आसमान में भी।    

OXY 

GEN 

की हो गई कमी?

OXYGEN Cylinders हो गए गुल, कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे प्याज, टमाटर हो जाते हैं, बाज़ार से खत्म। और बढ़ जाती हैं, कीमतें। सरकारों को गिराने और बनाने के लिए? खासकर गरीब देशों में। ये तो हुई राजनीति।आम आदमी ऐसे में खुद को कैसे बचाए? अपने आपको ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा जागरूक करके। 

जहाँ-जहाँ जितना हवा, पानी और धरती में जहर है, मान के चलो वहाँ के उतने ही आदमी जहरीले हैं। सभी तो नहीं होते, कुछ हों तो ही बहुत कुछ हो जाता है। उस जहर को कम करने का तरीका क्या है? 

साफ खाना, पानी, हवा, हम सब अपने-अपने घर या आसपास ही ऊगा सकते हैं। हमारे अपने घरों या आसपास में कितनी ही तो जगह होती हैं, जहाँ हम ये सब कर सकते हैं। पहले गाँवों में तो ज्यादातर घरों में रसोई-वाटिका (Kitchen Garden) होती थी। अब भी हैं क्या? और कुछ नहीं तो खेतों से ही इतनी सारी सब्जियाँ या फल आते थे, बड़े बुजर्गों से सुनने को मिलता है। गिना सकते हैं उनमें से कुछ एक के नाम आप? शायद उन्होंने भी शहरों का रूख कर लिया है। वहाँ लोगों में रसायनिक छिड़काव (जहर) वाले खाने-पीने और उनके प्रभावों के प्रति जानकारी बढ़ रही है। हमारी आज की ज्यादातर बिमारियों की वजह या तो हमारा रहने-सहने का तरीका है या खानपान और हवा, पानी का संक्रमित होना। उसके बाद हॉस्पिटल पहुँच जाओ, बाकी कमी वो पुरा कर देंगे। टैस्ट के नाम पे ही धोखा धड़ी शुरू हो जाती है, उसके बाद तो पता नहीं क्या-क्या होता है। इसलिए खुद को हॉस्पिटल जाने से बचाना भी अहम है। गाँवों में ये जागरूकता अभी भी उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिय। तो शुरू करें, जहर का असर कुछ कम, अपने खाने से? अपने घर, छत या आसपास में ही बड़ी नहीं तो कम से कम छोटी-छोटी सी रसोई-वाटिका बनाकर, मगर बिना रसायनों के छिड़काव के?     

हेराफेरी संसाधनों की

क्या कोई आपको मानव, जीवों और निर्जीवों के संसाधनों के दुरूपयोग की तरफ धकेल सकता है? वो भी ऐसे, की आपको खबर भी न हो और वो अपना काम कर जाय या कर रहे हों?

आपके चारों तरफ राजनीतिक पार्टियां हैं। आप उनसे लगातार घिरे हैं। इनमें कुछ थोड़ा शातिर भुमिका में हैं, और बहुत ही आसपास हैं। भला किसी को नुक्सान कर किसी का क्या फायदा हो सकता है? शुरू में तो मुझे भी समझ नहीं आया। फिर समझ आया, लोगों के अपने छोटे-मोटे लालच। लालच भी अजीबोगरीब। भला अपने बच्चों के घरों को बसाने के लिए लोगबाग क्या-क्या तो नहीं करते? बस ज्यादा कुछ नहीं, ऐसे ही कुछ लालच और वो भी बिना सोचे-समझे। मतलब, भेझे से पैदल होकर।  किसी की लड़की ससुराल से आकर घर बैठी हो या कहना चाहिए, इधर-उधर की लड़कियां घर बैठी हों। कोई आसपास और कोई थोड़ा दूर। और कोई कहदे, ये पड़ोस में जो सिंगल है ना, जब तक इसकी ऐसी-तैसी नहीं होगी, तब तक तुम्हारी लड़की का कुछ न होना। शायद किसी एक पार्टी की आभाषी कहानी ने ऐसा ही घड़ा हुआ है, अपनी कहानी में। अब वो सिंगल, अपने आपको ऐसे गुंडों से बचाती घुमे। और उन गुंडों ने पीछे लगा दिए, तुम्हारा भला तब होगा, जब ऐसा होगा वाले -- भुतिया दिमाग। जब तक वो कोई अच्छी खासी डांट-डपट न खा लें यहाँ-वहाँ से, और बढ़िया वाली झंड न करा लें, तक तक तो मानने से रहे। 

फिर होंगे कुछ छोटे-मोटे हादसे, इधर या उधर। उनका सच हकीकत के इंसान जाने। मगर इधर-उधर की सुनकर जो समझ आया वो ये की राजनीतिक पार्टियां और मीडिया को बखुबी आता है, राई का पहाड़ बनाना और पहाड़ की राई। बचो इनसे बचा जा सके तो। ऐसे में दुश्मन ये पार्टी भी हो सकती है और वो भी। और किसी को बेवजह भी कोई खुंदक या लालच हो सकता है।  किसी से या कहें किन्ही से कुछ चीजें कोई बेवजह के डर पैदा कर भी करवाई जा सकती हैं। आभाषी डर, जरूरी नहीं हकीकत भी हों। विक्की कौशल का कुछ होगा तो तुम्हारा कुछ होगा। अब फिल्मी दुनिया वाले विक्की कौशल का तो शायद हो गया।  मगर ये हकीकत की दुनियाँ वाले विक्की कौशल, फ्लॉप हो गए क्या? या शायद जैसा चाहा, वैसा न हुआ? अब हकीकत की दुनियाँ और आभाषी दुनियाँ में फर्क तो है ना?

इन सबमें संसांधनों की हेराफेरी अहम है। वो फिर इंसान हों या भौतिक चीजें। वक़्त के साथ जो समझ आया वो था या है, पैसा। मैंने पैसे को कभी कोई खास तव्वजो न दी। हाथ के मैल से ज्यादा शायद कुछ समझा ही नहीं। आज भी कोई खास अहमियत नहीं है। मगर भाभी की मौत के बाद गुड़िया के केस ने जो समझाया, वो शायद किसी को भी झकझोर दे। लोगों का वो सब करने के पीछे मकसद चाहे जो भी रहा हो। इधर-उधर हर तरफ से जैसे एक ही आवाज़ आ रही हो। तेरे पास पैसा कहाँ है, पैसा तो खत्म। तेरे तो ऐसे दिन आएंगे, वैसे दिन आएंगे और पता नहीं क्या-क्या। खैर। जिसके पास जो था या है वो उसे पता है। बाकी रो लें, कुछ वक़्त और। ये पैसा-पैसा करने वाले वो लोग हैं, जिन्हें पढ़ाई की किम्मत नहीं मालुम। अब यहाँ रहोगे तो ये, ये काम नहीं करने देंगे और वहां वो। बाहर तुम्हे निकलने नहीं दिया जाएगा। जैसे कोई मोदी जैसा तानाशाह गा रहा हो कुछ या फेंक रहा हो किसी फेंकु की तरह? लपेट लो, क्या जाता है? 

जब ये सब पैसा कहाँ है चल रहा था तो समझ आया (हालांकि थोड़ा बाद), की किसी थोड़ा-सा हड़बड़ी या जल्दबाज़ी में काम करने वाले को फँसाया जा रहा था। इसे बोलते हैं शायद लोगों को असुरक्षा (insecure) के डर से भरना। और अपना कुत्ता बनाने की कोशिश करना। थोड़ा धैर्य रखो तो बुरा वक्त कट जाता है, थोड़ी शांति से। विचलित हो जाओ तो वो ले आता है और नई समस्याएँ। थोड़ा-सा नजरिए का फर्क है शायद। जैसे कोई भागा और अभागा या नरभागा को अलग-अलग अर्थ दे दे, वैसे ही जैसे -- Impossible is nothing but possible। तो ऐसे ही, भागा, भाग मिल्खा भाग भी तो हो सकता है। और नर भागा? कोई नर, भाग वाला या कोई नर, भागा जैसे। इतने से हेरफेर से ही स्थितियां भी बदल जाती हैं शायद। 

एक तरफ बड़े कहलाने वाले लोग ये सुनकर कहीं से, की पैसा तो खत्म, लताड़ रहे थे ऐसे, जैसे ज़िंदगी खत्म। दूसरी तरफ, एक छोटा-सा बच्चा शायद प्रेरित कर रहा था।  पता नहीं कहाँ से, क्या सुनके आई थी वो। 

अच्छा बुआ एक बात बताओ 

बोलो 

आप US गए थे?

हाँ ! बहुत पहले, धाई के हाथ लगाने जैसे। 

थोड़ा रुआंसा होकर, फिर आप मम्मी को भी ले जाते, तो शायद वो आज ज़िंदा होते।  

बुआ ही नहीं रुके तो मम्मी को कैसे ले जाते? 

तो मुझे ले जाते, फिर तो आप रूक जाते। (उसे मालुम ही नहीं की वो तब पैदा ही नहीं हुई थी) 

हाँ ये भी सही है। अब चलेंगे कहीं किसी US 

सच्ची ?

सोच तो रही हूँ। 

पर आपके पास पैसे कहाँ हैं?

आपके लायक तो हैं। लोगों के लायक नहीं हैं शायद। 

मन में सोचते हुए: जिनके लायक हैं वो चल पड़ेंगे। जिनके लायक नहीं हैं वो सड़ लेंगे यहीं, इस राजनीती के या उस राजनीती के तानेबानों में।   

रोज-रोज लोगों के खामखां के खेलों या कहो ड्रामों से दूर रखने के लिए बुआ-भतीजी ने कोई नई भाषा सीखनी शुरू कर दी। और शाम को एक स्पेशल टीचर-स्टूडेंट प्रोग्राम भी, अंग्रेजी की शब्दावली बढ़ाने के लिए।  

भला इस घर के दुश्मनों को इतना कहाँ सहन होना था की ये तो फिर से चल निकलेंगे। और लो खड़ी करदी फिरसे यहाँ-वहां, छोटी-मोटी दिवारें। तुम हटाते रहो वो दीवारें, वो बुनते रहेंगे। ऐसे माहौल में भला और क्या मिलेगा? वो तुम्हारा पैसा रोककर, या इधर-उधर की आवाजाही रोककर, बच्चे को किसी और स्कूल में करवाकर, कमाने वाले को खत्म कर, बचे हुए को अपने यहाँ कुत्ता बनाएंगे। बड़े लोग, इतने छोटे होते हैं, दिमाग से? हकीकत यही होती है, अक्सर ऐसे-ऐसे बड़े लोगों की। खासकर तानाशाहों की। ऐसे लोग क्यों चाहेंगे भला, की कोई उनके जालों से बाहर निकले। वो भी सालों-साल, इतनी मेहनत और छुपम-छुपाई से बनाए हुए जाले।    

तुलसी का 25 से क्या लेना-देना?

पीछे मैंने कई पोस्ट में लिखा की ज्यादातर जो आपके पेड़ पौधों, जानवरों, पशु-पक्षियों के साथ हो रहा है, वही या कुछ-कुछ वैसा ही, इंसानों के साथ भी। अपने आसपास के पेड़-पौधों, पक्षी-जानवरों को जानने-समझने की कोशिश करें। बहुत कुछ समझ आएगा। आओ एक खास पौधे से शुरू करते हैं, थोड़ा बहुत जानना। 

तुलसी, मेरे आँगन की? वो नाटक वाली नहीं, बल्की वो छोटा-सा पौधा जो ज्यादातर घरों में देखने को मिलता है, उत्तरी भारत में खासकर। जिसे पवित्र माना जाता है। जो औषधी के रूप में भी प्रयोग होता है। अक्सर जिसके पत्तों को चाय में डालकर पिया जाता है। जिसे जुकाम, भुखार में भी लाभदायक माना जाता है। 

तुलसी का 25 से कोई लेना-देना है क्या? तुलसी को अंग्रेजी में Basil कहते हैं और ये कई तरह की होती है। 

BA 

IL     

या BAS  IL? 

25 को और क्या खास है जो आपको याद है? Christmas? Birth of Jesus Christ? 25 दिसंबर? 

उसी दिन तुलसी दिवस? या कुछ हेरफेर है? हिन्दुओं की ईसाइयों से किसी तरह की प्रतियोगिता थी क्या? ऐसा कुछ और भी बता सकते हैं क्या? मटरू-पिटरु दिवस? ओह हो। माता-पिता दिवस? हिन्दुओं के यहाँ त्योहारों की कमी पड़ गई क्या जो किसी और के त्यौहारों पे अपने थोंपना चाहते हैं ? या शायद ये थोंपम-थोंप हर धर्म में है? धर्म? राजनीतिक घढ़ाईयाँ और अधर्म के रस्ते? गुनाहों को पनाहों के रस्ते? ऐसा ही कुछ रीति-रिवाजों के हाल शायद? बाजारों के हवाले, हर रीति-रिवाज़, हर उत्सव-त्यौहार। आपको क्या लगता है?

चलो वापस तुलसी पे आते हैं। कितनी तरह की हैं तुलसी (BASIL)? या TULSI ? अच्छा औषधीय पौधा है। घर में लगाएं, मगर बच्चों को आशाराम बापु वाला तुलसी दिवस और रविवार का खास पानी रिवाज वैज्ञानिक तरीके से बताएं और समझाएँ। उनकी उत्पत्ति और वक़्त और राजनीतिक जरुरत के हिसाब से उनमें आए या लाए गए बदलावों को भी बताएँ। 

सुना है 2014 में और भी बहुत कुछ बदला था। जैसे ? भाइयो और बहनो . .. ? आगे तो आप समझ ही गए होंगे। पेड़-पौधो को जरुरत के अनुसार पानी दें। रविवार को देना या न देना वाला रिवाज़ राजनीती की अपनी तरह की मजबुरियां हो सकती हैं। अपने घर और आसपास के जीवों को राजनीतिक जीव (राजनीतिक कीड़ा) ना बनाकर, प्रकति के जीव ही रहने दें। वो फिर चाहे पेड़-पौधे हों, पक्षी या जानवर या फिर कोई और जीव। अक्सर राजनीती की जरूरतें और जीवों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। अपने धर्मों और रीति-रिवाजों को, जहाँ तक हो सके राजनीती और बाजार के प्रभावों (दुष्प्रभावों) से बचाएँ। हालाँकि थोड़ा असंभव-सा है। क्युंकि राजनीती तो जैसे कण-कण में है, किसी खरपतवार की तरह।        

गुगल दर्शन या गीता ज्ञान? 




रैली निकलना (आमजन वाली) Dehumanization of Society

Craft and Draft: (जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव) 

भद पिटना, अपमानजनक, जले पे नमक,   

criminal mindset (pejorative, offensive, criminals) (pejorative, offensive)और भी पता नहीं क्या-क्या।

चलो उन बड़े-बड़े राजनीतिक मंचों की बजाय, आमजन के दिन-प्रतिदिन के छोटे-छोटे घटनाकर्मों पे आते हैं। 

मान लो किसी ने यूनिवर्सिटी में कहा, लिखित में, की मेरे कैंपस घर के बाथरूम में ये, ये समस्याएँ हैं। और कहीं किसी माँ का बाथरूम ही छूट गया। कैंपस में जो भी समस्याएँ रही हों मगर कहीं और वजह बहुत ही छोटी-छोटी सी बातें। वो भी इधर-उधर से भड़काई हुई या आग लगाई हुई।    

कहीं आप 2-4 दिन के स्पेशल जेल विजिट पे जाते हैं। और कुछ वक़्त बाद  कहीं और, कहीं दूर से पता चलता है की किसी चाचा की वजह से, कोई एक दिन के खास विजिट पे जेल गए। क्या सामान्तर घड़ाई है। उसपे वो उस चीज़ को इतना बड़ा हव्वा ले रहे हों, जैसे पता नी क्या पहाड़ टूट पड़ा हो। और एक यहाँ, साढ़े तीन दिन के खास विजिट को ऐसे शब्दों में उकेर दिया, मानो ईनाम मिला हो (किसी के शब्दों में)  शायद ऐसे-ऐसे, छोटे-मोटे पहाड़ भी चूर-चूर हो जाते हैं, जब वो अक्सरों में घड़े जाते हैं। यही नहीं, बल्की काफी कुछ समझ ही उन्हें लिखने और बार-बार पढ़ने पे आता है। मेरे साथ तो ऐसा होता है, बाकी का पता नहीं।  

बीमारियों और बच्चों के इधर-उधर के किस्से कहानियाँ  तो पूछो ही मत। बच्चों के केस से खास समझ आया की ऐसा कुछ अपने आप नहीं हो सकता। उनकी इस तरह की पढ़ाई एक खास तरह के माहौल में धकेलने से होती है। ठीक ऐसा ही बड़ों के साथ है।  कुछ दोस्तों ने अपने स्कूल बच्चों (दिल्ली और रोहतक) की ऐसी-ऐसी कहानियाँ या कहो धमकियाँ बताई, की एक बार तो आप भी हैरान। ऐसा ये लोग सीखते कहाँ हैं? ये तो घड़ा हुआ और इनसे काफी बड़े बच्चों के विषय लग रहे हैं। फिर आप गाँव आने के बाद, रोज छोटे-मोटे और पता नहीं कैसे-कैसे बच्चों के खेलों, शब्दों और व्यवहार को नोटिस करना शुरू कर देते हैं। ओह हो, ये बात। ऐसे तो कुछ भी संभव है। बच्चे जो देखते हैं, सुनते हैं, समझते हैं, पढ़ते हैं, खेलते हैं, बस वहीं से आता है। काफी कुछ प्रत्यारोपित (implanted) जैसे। कॉपी जैसा-सा ही। कुछ-कुछ प्रतिबिम्ब (simulation) जैसा-सा ही। कटी-पतंग खेलें और बच्चे देर नहीं लगाते झगड़ने में। उसी को थोड़ा-सा edit या mould कर दो। Girls let's play favorite colours. और लो जी कुछ ज्यादा ही सॉफ्ट हो गए बच्चे। कटी-पतंग, शब्द ही भड़काऊ है। झगड़ा उकसाने वाला जैसे। तो क्या होगा। खेल वही है, बदला कुछ खास नहीं और बहुत कुछ बदल भी गया।               


इस भद्दे वाली भुतिया राजनीती और इससे बचने का समाधान इसे छिपाने में नहीं, बल्की बताने में हैं। आमजन को जागरूक करने में है। आपस में दूरियां बढ़ाने में नहीं बल्की संवाद में है। भुतिया राजनीती का सबसे खतरनाक प्रभाव तब शुरू होता है, जब इसे कोई खास किस्म के कांड रचने होते हैं। ऐसे में ये न सिर्फ लोगों को आपस में लड़वाते और भिड़वाते हैं, बल्की, आपसी बोलचाल ही बंद करवा देते हैं। बोलचाल ही बंद करवाना मतलब,  "फुट डालो और राज करो", नामक पौधे को खाद-पानी देना। अगर ऐसा हो रहा है तो मान के चलिए की कहीं कुछ, बहुत बुरा रचा जा रहा है और उसपे पर्दा करने की भी कोशिशें हो रही हैं।  


आओ हुलिया बिगाड़ें, आप कुरड़ संभालें    

 आओ वृन्दावन घडें : खास तरह के भजन-प्रोग्राम, खास तारीखों को और खास मेहमानों के साथ, खास घरों में देखने को मिलेंगे। आजकल इन सबका चलन जितना आसपास देखा है, शायद ही कभी देखा हो। ये सब लिखने का उद्देश्य कोई कटाक्ष या नफ़रत फैलाना नहीं है, बल्की कोशिश, शायद इनके दुष्प्रभावों से अंजान, अनभिज्ञ लोगों को बचाना है। इनके जाल में ज्यादातर राजनीती के जालों के मारे हुए परिवार मिलेंगे। जहाँ खास तरह की बीमारियाँ भी देखने को मिलेंगी और रिश्तों के उतार-चढ़ाव भी। इन नासमझ और भोले लोगों को नहीं मालुम की ये कैसे-कैसे जाले हैं और क्या-क्या और घड़ने में कामयाब हो सकते हैं। जैसे अभी तक जो कुछ हो चुका, वो कम हो।   

आओ घर वालों को बेघर करें : बड़े बुजर्गों की तो चलो उम्र हो रखी है, वो कीर्तन करें या भजन करें? मगर युवाओं और बच्चों को ऐसे वृन्दावनों से बचने और बचाने की जरूरत है।  हालाँकि बड़े बुजर्गों के ऐसे मानसिक हालात भी तभी होते हैं जब घर या आसपास उन्हें लगता है की शांति नहीं मिल रही। और ये अशांति बड़ी राजनीतिक-सी होती है। बुजर्गों को खास तरह के भजन और मोबाइल पकड़ा दिए जाते हैं। पकड़ाने वालों को खुद कुछ नहीं पता होता और न ही उन्हें सुनने वालों को।  

कालिख और खास तरह के काले धागे :  पैसा आएगा इसलिए काला धागा बाँधे? या विपदाओं और मुसीबतों को दूर करेगा इसलिए? या शायद अपनों को ही खा जाएगा और मुसीबत और विपदा लाएगा, इसलिए? आपका अपना सुरक्षित पैसा, हाय-तौबा करके निकलवाएगा और खामखा में उड़वाएगा, काम की जगह नहीं लगवाएगा। और आपको लगेगा, आप तो अमीर हो गए ?  या सुरक्षित बच्चे और परिवार को असुरक्षा की तरफ धकेल, बच्चों तक के हाथ में कटोरा थमवायेगा? फ्री शिक्षा और कैसी-कैसी स्कॉलरशिप के नाम के जालों के नाम पर? क्यों? क्युंकि पहले ये राजनीती अपनों को खाती है और फिर जो बचे हैं, उन्हें भी खाने की तरफ बढ़ती जाती है। खासकर,  अगर लोगबाग इतना कुछ होने पर भी न संभल पाएँ तो। या शायद वो चालें और घातें ही ऐसे देते हैं की नासमझों को समझने के मौके ही नहीं देती। खास तरह की फ्री शिक्षा, खास जाले घड़ने वाले लोगों या पार्टी द्वारा दी गई, खास तरह के, कुछ और कांड घड़ने के लिए है। अपना नियंत्रण और बढ़ाने के लिए। कोई किन्हीं जालों से बच निकली तो उस घर के बच्चों और बाकी सदस्यों को घेरना शुरू कर दो। ज्यादातर तो पहले ही अंधभक्ति वाले नियंत्रण में हैं। होनी-अनहोनी की अपने तरह की मोहर ठोकना ही ये खास समय पर आए खास तरह के काले धागे हैं, कुछ खास लोगों के लिए। बच सकते हैं तो बचें। क्युंकि जो समझ आ रहा है उसके हिसाब से सिर्फ सावधान किया जा सकता है, खासकर जिस तरह का माहौल है उसमें।  क्यूँकि ये वो अजीबोगरीब माहौल है, जहाँ सावधान करने वाले को धन्यवाद करने की बजाय, लोगबाग उल्टा-सीधा भी सुना सकते हैं और किसी तरह के परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।       

आओ 50-50 करें : सोचो किसपे, कैसे और क्यों लागू हो रहा है? 50-50 या चाहे जो परसेंटेज हो, हर कोई ऐसे बाज़ार में कहाँ है? किसे धकेला जा रहा है, रिश्तों के ऐसे बाजार में (रिश्ते और बाजार?)? उन्हीं को जिन्हें खा चुके या खाने की कोशिश में हैं? और उन्हें अहसास तक नहीं है ? यही है काले धागे परोसने वालों का, कलिखी धंधा। धंधा है, पर गन्दा है ये। लोगों को पता नहीं इतना सब बताने के बावजुद क्यों नहीं समझ आ रहा। शायद इसीलिए इसे राजनीतिक मायाजाल कहा गया है?   

आओ  बदजुबान, जंगली, जाहिल कहलाएँ: दारु पिल्ले? या पाड़ने कुत्ते? इस टाइप के महामानव, इतने समझदार होते हैं की जहाँ से उन्हें मिलता है, उन्हीं को काटते हैं? या शायद खुद को ही ? अपने घर परिवारों को? आसपास में भी कुछ न कुछ असर तो जरूर होगा। अपने पैर पे जैसे खुद ही कुल्हाड़ी मारना? आसपास कई सारी ऐसी-ऐसी प्रजातियाँ हैं। जिनके व्यवहार और कारनामों को देखसुन के समझ ही नहीं आता, की ये सिर्फ दारु है या उससे आगे भी कुछ? दारु, शायद सिर्फ उससे भी आगे कुछ का ही परिणाम है ? माँ, बहन, बेटियाँ काम करती हैं, घर चलाती है। दारु-पिल्ले या पाड़ने-कुत्ते या खास किस्म के महामानव, न सिर्फ ठाली का खाते हैं, बल्की कितनी ही तरह का, कितना ही नुक्सान भी करते हैं। गाली-गलौच, मार-पिटाई, तोड़-फोड़, ये तो इनकी भाषा, तहजीब और संस्कारों के आईने हैं। उसपे वो संस्कारों के आईने भी उन्हें भुगतने वालों को दिखाने चलते हैं !            

खानापान: आप जो कुछ खाते या पीते हैं, वो कहाँ से आता है? स्वास्थ्य और बिमारियों के राज और कुछ हद तक उनके समाधान भी उसी में छुपे हैं। ये सब एक तरफ, जहाँ किसी गुप्त कोड की तरह घुमता है, तो दूसरी तरफ, आम आदमी इसे गुफाओं की जानकारी, मतलब कहाँ से आता या जाता है, और वहाँ उनपे किस किस तरह के केमिकल्स प्रयोग होते हैं या गन्दा पानी प्रयोग होता है, से भी समझ सकता है। जो आप खाते-पीते हैं, उसका कुछ हिस्सा अपने आसपास के जीव-जंतुओं को भी दो और जानने की कोशिश करो, उनपे उसका क्या प्रभाव है। ऐसा ही कोई प्रभाव उन्हें खाने-पीने वाले इंसानों पे भी मिलेगा। इसके लिए आपको किसी खास विद्या की जरुरत नहीं। हाँ ! अगर हो तो समझना और आसान हो जाएगा। 

Pejorative, offensive, criminal mindset, tricks:

Ashavthama

Shakargandi (Sweet Potato)

Nirgundi (Chinese chasetetree)

Pigweed

Papdi

Papad

Nagfani plants

hawthorns?

Basil holy basil

snakeplant

moneyplant

varieties differences rama, krishna, 

15, 16, 



Ear piercing and vaid

Thread and Liquid drying operation or treatment

Stone Removal Kidney or 

Cancer

Tuberculosis

Vitiligo

Leukoderma

any diseases, treatment, tradition, ritiriwaz, plant, animal, bird or can be anything.


Maverick


और भी कितनी ही तरह के भूतिया प्रभाव, इनके बिलकुल विपरित दिशा में भी हो सकते हैं क्या? शायद उनपे ज्यादा गौर करने की जरुरत है, ऊपर लिखे दुष्प्रभावों को कम करने के लिए। या शायद भूतिया प्रभावों का रूख ही मोड़ने के लिए।


ये तो थी, थोड़ी बड़ी-बड़ी, थोड़े बड़े स्तर की, मगर बहुत ही आम-सी बातें, जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव की। ऐसे ही या इससे भी ज्यादा अहमियत रखती हैं, बहुत ही छोटी-छोटी सी बातें, जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव की। जानते हैं, उनके बारे में भी, किसी अगली पोस्ट में। 

कोड जीव हैं या निर्जीव? 

trick is to distrack.

आप कहाँ व्यस्त हैं? 

Pejorative and multiple stickers attacking not just the person at front but multiple ways, many other people also.

Food

Water

Shelter/Shraay

Diseases

Hospital

Death

Cremation Ground

Mourning period

Sometimes you have no idea untill it's too late

Sometimes you have an idea and cannot work upto the extent you can

Sometimes, there are so many, sometimes

रंगों वाली तुलसी या रंग-बिरंगी तुलसी या इंदरधनुषी-तुलसी ?

पेड़-पौधों पे राजनीतिक कोढ़ का तड़का? और उनको रीती-रिवाज़ या आस्था-धर्म से जोड़ना। 

क्या फर्क पड़ जाएगा इससे, की आपके घर तुलसी है की नहीं? है तो, कौन सी किस्म है? वैसे कितनी तरह की तुलसी होती हैं?

हरी तुलसी            

राम तुलसी, हरे पत्ते, हरा तना, हरे बीज?

काली तुलसी          

कृष्णा या श्याम या काली तुलसी, बैंगनी पत्ते, बैंगनी तना और बैंगनी बीज या शायद कुछ-कुछ काले रंग जैसा-सा या रंगो का तड़का, मतलब मिश्रित रंग?

वन या वना तुलसी, ऐसा कोई पौधा है क्या? शायद मरवे को भी कुछ लोग तुलसी कहते हैं? कैसे शुरू हुआ इसे वन या वना तुलसी कहना और किसने दिया ये नाम इसे? 

हरी तुलसी और काली तुलसी या बैंगनी तुलसी या मिश्रित रंगों की खिचड़ी तुलसी का सच क्या है? दोनों अलग पौधे हैं या एक ही पौधा? या मिश्रित (HYBRID)?  ये पौधा, अलग-अलग मौसम और अलग-अलग परिस्थितियोँ में, अलग-अलग रंग बदल लेता है? बड़ा Dynamic है। जानेंगे जीवों के रंग (Pigment) के विज्ञान के बारे में, किसी और पोस्ट में। 

आपके घर में या आसपास इनमें से कौन-से वाली तुलसी है? उसको आपने किस तरह की परिस्तिथियाँ या वातावरण दिया हुआ है?

छाया में रखा हुआ है या धूप में? 

रोज पानी देते हैं ? सुबह-स्याम पानी देते हैं? या कभी-कभार? 

खाद डालते हैं या नहीं? ज्यादा डालते हैं या कम? 

उसके आसपास की मिट्टी नुलाते हैं या नहीं? 

जो पानी डालते हैं, वो साफ पीने का पानी है या रसायनिक (Toxic Chemicals)? या शायद आपको मालुम ही नहीं की उस पानी में कौन-कौन से रसायन हैं या नमक (Salty water) हैं? जहरीले रसायन ((Toxic Chemicals) और ज्यादा नमक वाला, दोनों ही पानी जीवों के लिए सही नहीं होते। फिर चाहे वो पेड़-पौधे हों या इंसान।    

यही सब अलग-अलग परिस्थितियाँ, आपकी तुलसी का रंग बदल सकते हैं क्या? ऐसे-ऐसे, छोटे-छोटे प्रैक्टिकल (experiment) आप खुद अपने घर या आसपास के पौधों पे कर सकते हैं। इससे आप जो पानी प्रयोग करते हैं, उसकी शुद्धता के बारे में भी जान सकते हैं। जो पानी पेड़-पौधों को मारता है, वो इंसान या बाकी जीव-जंतुओं के प्रयोग के लिए भी सही नहीं है। राजनीतिक पार्टियों के जाले, ये सब आपकी जानकारी के बगैर करते हैं। बस उन्हें थोड़ी-सी जानकारी (विज्ञान), आपसे ज्यादा है। वो ये, की अलग-अलग परिस्थिति (संगत जैसे)  में, अलग-अलग पौधे, कैसे अलग-अलग, रंग-रूप बदल लेते हैं? 

और फिर उन्हें नाम दे देंगे, आपकी श्रद्धा वाले, जैसे भारत में हैं, तो राम, श्याम, काली। तुलसी में लिँग अलग-अलग पौधे में हैं या एक में ही? फिर तो शिवा तुलसी भी हो सकता है। और LGBT भी?    

या किसी अंग्रेजों वाले देश में, तो अंग्रेजी में Holy Basil. 

Holy मतलब पवित्र, हिंदी में। और भी बहुत से इंटरनेशनल नाम मिल जाएँगे इंटरनेट पर , जैसे Thai Basil? ये क्या है? अफ्रीकन? अमेरिकन? Hybrids?

कैसे पता करोगे सच क्या है और क्या नहीं? मतलब आज का इंटरनेट अपने आपमें एजेंडा शैटर है। दुनियाँ भर का मीडिया इसका प्रयोग और दुरूपयोग करता है, आम आदमी को कंट्रोल करने के लिए। कैसे ? किस टेक्नोलॉजी का प्रयोग या दुस्प्रयोग करके? जैसे Artificial Intelligence (AI), Machine Learning (ML)  

इसलिए जो भी आप इंटरनेट पर देखें, जरूरी नहीं वो सच ही हो। हम उस टेक्नोलॉजी के युग में हैं, जो अपने-आप सेकिंडों और मिनटों में, यहाँ-वहाँ से डाटा का प्रयोग कर, ऐसा कुछ पढ़ने को दे सकता है, जो असलियत में हो ही ना। ऐसे ही विडियो हो सकते हैं। ऐसे ही फोटो और उनके रंग-रूप। काला सफ़ेद दिख सकता है और सफेद काला। हरा, नीला दिख सकता है या जामनी या कोई और रंग भी। ये इंसान के केस में भी सच हो सकता है और जानवरों या पेड़-पौधों के भी। जानेंगे इन टेक्नोलॉजी के बारे में किन्हीं और पोस्ट में।      

पेड़-पौधों पे राजनीतिक कोढ़ का तड़का?

रीती-रिवाज़ या आस्था-धर्म से जोड़ना, श्रद्धा 

विज्ञान, जीवों के रंग (Pigment) के विज्ञान के बारे 

टेक्नोलॉजी का प्रयोग या दुस्प्रयोग, Artificial Intelligence (AI), Machine Learning (ML)

राजनीती,  एजेंडा शैटर,  आम आदमी को कंट्रोल करने के लिए 

विज्ञान और राजनीति, मतलब राजनीतिक विज्ञान, टेक्नोलॉजी को और रीती-रिवाज, आस्था, धर्म श्रद्धा से जोड़कर अपना एजेंडा सैट करते हैं। एजेंडा सैट होता है या तो अपनी गुप्त गुफाओं के माध्यम से, या मीडिया के माध्यम से। ये सब आम-आदमी को कंट्रोल करने के काम आता है।  

इसमें किसी भी तरह के लालच का तड़का भी लग सकता है और डर या भय का भी। 

कांडों की माया-नगरी

इंदरधनुषी रंग प्रकृति के और राजनीति विज्ञान के तड़के

त्वचा और बालों का रंग 

जानवरों के रंग 

पेड़-पौधों के रंग 

राजनीती के रंग, संस्कृति के संग (DEJA VU जैसी लड़ाईयाँ और टेक्नोलॉजी)  

गुप्त कोडों के अनर्थ। जैसे 

White Black Fight 

Person of Color 

Black Lives Matter 

SC, BC, OBC, General   

(Civil Or Military Products) 

सफेद और काले रंग की, खासकर त्वचा की लड़ाई, कितनी सिर्फ त्वचा से संभंधित है? और कितनी कांडों से? वो चाहे White-Black झगडे हों या Person of Colour या Black Lives Matter। राजनीती के गुप्त कोड, कितने ही अर्थों के अनर्थ करते हैं। और कितनी ही ना होने वाली लड़ाईयाँ पैदा करते हैं? क्यूँकि, हकीकत ये है, ये लड़ाई-झगड़े ज्यादातर, जानबुझकर राजनीती ने पैदा किए हैं। इनके समाधान ऐसी राजनीती से बाहर हैं। 

ऐसे ही SC, BC, OBC, General का है। राजनीती लोगों के जीवन को आसान बनाने की बजाय, दुर्भर तो नहीं बना रही? ऐसे-ऐसे झगड़ों  में उलझाकर, अपने दायित्वों या जिम्मेदारियों से तो नहीं मुकर रही? काम की बात की बजाय, बकवास की बातें। जैसे, SC, BC, OBC, General में उलझा कर। भावनात्मक भडकावों में उलझाकर। वैसे ही जैसे, धर्मों के जालों में उलझाकर। हकीकत यही है। या शायद ये कहना चाहिए, की भला राजनीती का और दायित्वों और जिम्मेदारियों का क्या लेना देना? राजनीती का सिर्फ और सिर्फ कुर्सियों से लेना देना है।  

Vitiligo बीमारी है या काँड?

जिन्हें थोड़ा बहुत भी Vitiligo के बारे में पता है, वो शायद कहेंगे बीमारी। 

जिन्हें उससे आगे, मुझे वो पैच शुरू कैसे और कब हुआ? और उस दौरान कैंपस में आसपास क्या चल रहा था, मालूम है, वो कहेंगे काँड। जी, बीमारियाँ भी काँड होती हैं। या कुछ कांडों की तरफ गुप्त इसारे, जैसे मोहर किन्हीं कांडों पे। ऐसी मोहर जो अपनी ही तरह से, अलग-अलग रुप में, यहाँ-वहाँ दिखती हैं। जैसे Plant Bougainvillea leaves vitiligo, कैंपस के H#30, Type-4 में। पौधों में विटिलिगो नाम की बीमारी होती ही नहीं, जितना मुझे मालूम है। Variegated leaves होते हैं। अलग-अलग रंग के पत्तों वाले पौधे। किसी भी जीव में, किसी भी रंग का सम्भन्ध खास किस्म के पिगमेंट्स से होता है। उस पिग्मेंट का किसी भी वजह से खत्म होना, मतलब उस रंग का खत्म होना। जैसे बालों का रंग। वो पिग्मेंट वापस आ जाए, तो रंग भी वापस आ सकता है। या ऐसी जली या खराब हुई कोशिकाओं को हटा, स्वस्थ कोशिकाएँ बदल कर वापस लाया जा सकता है।  

BOU GAIN VIL LEA? या BO UG AI IN VIL LEA  

कुछ लोगों ने जिसे "ले ली गैंग" नाम दिया हुआ है शायद ? जैसे HOLI मतलब HO LI या HOL  I? और भी पता नहीं कैसे कैसे भद्दे कोड और अर्थों के अनर्थ हैं। 

शायद कोई हानिकारक रसायन (chemicals), छिड़के गए हैं, इस पौधे पे। क्यूँकि ये पत्ते और टहनी हटाई, तो नए सही आ रहे थे, जब तक मैं वहाँ थी।  

ऐसा ही इंसान में विटिलिगो का है शायद। Stress फैक्टर तो है ही। साथ में हानिकारक रसायनों (harmful chemicals) का दुस्प्रभाव। शायद थोड़ा ज्यादा लिख पाऊँ मैं विटिलिगो पे, किसी और पोस्ट में।  

तो अभी तक दो ऐसी बीमारियाँ जो इंसान में होती हैं, उनकी राजनीतिक मोहर पौधों पे देखी। एक पीछे अमरुद के पेड़ की कैंसर जैसी गाँठों के बारे में लिखा। वो पौधा भी कैंपस के H#30, Type-4 में पीछे वाले लॉन में था। पौधों में दोनों के ही ईलाज हैं, ऐसी-ऐसी मोहरों पे। इंसानो में? है ना अजीबोगरीब कांडों की माया-नगरी ये अजीबोगरीब राजनीती, ये कोड वाला सिस्टम और कोड वाली बीमारियाँ। जिन्हें सिर्फ इंसान ही नहीं भुगतता, बल्की बाकी जीव भी भुगतते हैं। महान इंसानों की देन?    

Monday, August 31, 2026

Electric Meter Drama 31.8.2026

 मैं पास में ही 

एक चाचा के घर गई हुई थी 

क्यों?

एक इंसान ने कुछ महीने से 

शायद 

शराब छोड़ी हुई थी 

या कहो 

वो पहले वाले हाल नहीं अब नहीं। 


मगर 

रक्षाबँधन वाले दिन के बाद 

अचानक घर आना बँध 

फ़ोन उठाना भी बँध 

लो। 

फिर पकड़ लिया लगता है?  

ख़ास म ख़ास पार्टी वालों ने?


चाची चाचा उधर जाते हैं 

जहाँ वो रहता है 

तो सोचा खबर ले लूँ। 


वापस घर की तरफ आई 

तो गली में भीड़ और शोर 

काफ़ी तार भी पड़ी हैं गली में 

एक से पूछा 

भैया मीटर लगा रहे हो?

हाँ। 


मेरे यहाँ भी लगना है क्या?

दीदी हमें तो पता नहीं 

उधर हैं ना वो उनसे पूछ लो 

भाई के घर की तरफ 

ईशारा करके। 


मैं उधर गई 

बैठक में कई बैठे हुए हैं 

मैंने एक से पूछा 

भैया, 

उधर घर का भी लगना है क्या?

कोई जवाब नहीं। 


दूसरे से पूछा 

नहीं वहाँ का नहीं लगना। 

क्यों?

और लो जी 

भड़ाम भड़ाम शुरु। 


सारा लिखना शायद 

काफी पड़ जाएगा 

किसी पे?

और क्यों? 

या 

क्या फ़र्क पड़ता है?


इतना वक़्त 

बिजली मीटर के 

नए कनेक्शन की 

रिक्वेस्ट के बावज़ूद 

मीटर का ना लगना 

क्या कहलाता है?  


शायद ये 

"यहाँ तो सबका 

ऐसे ही चलता है 

आप भी चला लो?"  

सच में ऐसा ही है क्या?


अब ये हक़ीक़त 

बिजली विभाग 

और 

पढ़ने वालों को 

मेरे से ज्यादा ही पता होगी। 

आप क्या कहते हैं?  


मगर जिस हिसाब से 

मेरे मीटर कनेक्शन के साथ हो रहा है 

उससे ऐसा कुछ लग रहा है?


नहीं तो ऐसे ऐसे काम तो 

बिजली विभाग वालों को 

बिना कहे कर देने चाहियें?


इतना वक़्त 

इतना 

अप्लीकेशन 

फॉर्म 

ये डॉक्यूमेंट 

वो डॉक्यूमेंट खेलना?   

क्या कहलाता है?


और 

उनका कहा 

सबकुछ पूरा करने के बाद 

ये कहना 

दुबारा फॉर्म भरो? 

यहाँ हर बात पर नाटक है Electric Meter Drama

बिजली विभाग के 

कुछ कर्मचारी 

कुछ बचे हुए घरों के 

मीटरों को 

बाहर खम्बों पर 

लगाने आए? 

काफ़ी महीने बाद? 


कुछ महीने बाद? 

अहम है क्या?

पिछली बार 

किस तारीख 

महीने 

और 

साल को आए थे?  


हाँ 

तारीख़ 

महीना 

और साल 

सब अहम है। 


सिर्फ़ यही नहीं 

कौन कौन? 

किस वाहन पर? 

किस सामान के साथ? 

वो सब भी अहम है। 


किस किसके घर?

किस किस नंबर के मीटर?

किन किन के घर के 

बाहर वाले खम्बोँ पर?

कौन सी तरफ़ लगाए गए?


ये इन सिर्फ़ कुछ घरों को 

पिछली बार क्यों छोड़ गए? 


ये सब अहम है?     

क्यों? 

पढ़ना लिखना सीखो 

पढ़े लिखो

और कढ़े लोगों की  

राजनितिक चालों 

और 

खेलों को जानने के लिए। 


अगली पोस्ट में कल वाला ड्रामा? 

औरतें यूँ ही नहीं पीटती यहाँ?

 औरतें 

यूँ ही नहीं पीटती यहाँ 

उन्हें गँवारपँठों द्वारा 

So Called पढ़े लिखे 

और कुर्सियों पर बैठे 

So Called 

Officers पिटवाते हैं?

अहम 

गँवारपँठों की जानकारी के बिना?

Human Robotics   


कितना सच? 

कितना झूठ?

ये समझदार 

और 

जानकारों के लिए छोड़ दिया।   


यही युद्ध है 

ईधर का भी?

और 

उधर का भी? 


4 साल से आप 

अपने घर बैठे हैं 

मगर 

आज तक वहाँ 

पानी और बिजली नहीं 

क्यों? 


घर कहना भी गलत होगा 

खँडहर 

पड़दादा के वक़्त का। 


So Called 

बड़े लोगों की वजह से 

जहाँ मीठा पानी 

और 

रहने लायक जगह हो 

वहाँ 

So called 

CBSE Registered?

स्कूल धोखाधड़ी से 

और जबरदस्ती 

अपनी दादागिरी 

और गुंडागर्दी दिखाएँगे?

या कहना चाहिए 

दिखा रहे हैं।  


आज तक उन 

शिक्षा के धँधे के 

गुंडों को 

किसी बहन या बेटी ने 

दी नहीं है वो जमीन 

बल्की, 

उनके ख़िलाफ़ 

शिकायत की हुई है। 


क्या हुआ उस शिकायत का?

कौन से डस्टबिन के 

हवाले हुई वो?


ये तो अनपढ़ गँवार हैं 

मगर वो?

25 साल से 

स्कूल चला रहे हैं?

वो भी CBSE? 


सब हेदभेद आ गए?

शिक्षा के नाम पर 

जमीनें हड़पने के?   

यही नहीं 

खुद उनको उनकी जमीन से 

जबरदस्ती बाहर करने के?


वो सब भी कब होता है?

भाभी के जाने के बाद। 


ऐसे हालातों में 

सबकुछ

मीडिया की नज़रों में 

होने के बावजूद 

संभव है क्या?


बिना CBSE जैसे 

संस्थानों की 

मिलीभगत के? 

यहाँ हर बात पर नाटक है (दिसंबर 2025 - 31.8.2026) Electric Meter Drama

 नाटक? 


यहाँ हर बात पर नाटक है 

बिजली का मीटर लगवाना हो? 

या पानी का कनैक्शन लेना हो? 


दिसंबर 2025 

आप बिजली विभाग को 

ईमेल करते हैं 

मेरे यहाँ मीटर नहीं है 

मीटर लगा दो।  


कोई जवाब नहीं 

दुबारा लिखते हैं 

कोई जवाब नहीं। 


उसके कुछ वक़्त बाद 

एक दिन कोई 

किसी 

स्कूटरी पर आता है

"ये राम सिंह का घर कहाँ है?"   

जी यहाँ तो ऐसा कोई घर नहीं। 


क्या काम था?

उनके यहाँ मीटर लगाना है 

ओह। 

पड़दादा के यहाँ मीटर लगाना है? 


किसके नाम से लगना है?

राम सिंह के?

नहीं, 

पूछ रहा था मैं तो। 

मैंने भी 

एक रिक्वेस्ट दी हुई है 

मीटर लगाने के लिए।    

कहीं विजय दांगी के यहाँ 

तो नहीं लगना? 


नहीं 

राम सिंह के यहाँ लगना है। 

भाई, यहाँ तो 

कोई राम सिंह नहीं रहता। 


हाँ, अगर 

किसी पड़दादा की बात है 

तो वो तो हम बहुत छोटे थे 

तभी जा चुके। 


आपके यहॉँ की रिक्वेस्ट नहीं है 

उन्हीं के नाम की है 

आपके यही से। 


अच्छा?

तो उनके पास जाके लगा आ। 

नमूने कैसे कैसे? 

भेझ देते हैं उठाके?   


अब ये सच में 

बिजली विभाग से थे?

या?

ऐसी ही कोई 

राजनितिक पार्टी का ड्रामा?

कैसे पता चले?


31.8.26 

एक ड्रामा कल फिर हुआ?

अबकी बार बिजली विभाग 

और आम नागरिकों ने 

मिलकर किया?


मगर सच में इन्होने ड्रामा किया?

या इनसे 

पढ़े लिखे 

और कढ़े लोगों ने करवा लिया?

और इन्हें मालूम तक नहीं?

Human Robotics   

 

या 

शायद मुझे ही ऐसा लगा?

ये पढ़ने वालों पर छोड़ देते हैं। 


कल का ड्रामा 

आगे पोस्ट में।   

पढ़ते रहिए 

अपनी अपनी सलाह 

या जो भी विचार हों 

वो भी देते रहिए।