About Me

Curious at life, evolved with molecular and synthetic media. Author? Researcher? Academician? Writer? Science Communicator?

Monday, October 6, 2025

अजीबोगरीब प्राथमिकताएँ (Wrong Priorities)

जहाँ प्राथमिकताएँ ही गलत हों, क्या कहा जाए, वहाँ के बारे में?

अजीबोगरीब प्राथमिकताएँ  

आप खेलों में ना हों 

और वो कहें हम तो खिलवाएंगे?

आप क्लास, लैब में हों 

और वो कहें वहाँ किसने, 

कैसे-कैसे और कहाँ-कहाँ के कैमिकल्स 

कितने सालों पुराने, कहाँ-कहाँ से लाके रख दिए 

इससे हमें क्या लेना-देना?

क्लास में स्टूडेंट पढ़ने की बजाय नौटंकियाँ करें 

और इससे भी हमें क्या लेना? 

हम इन डायरेक्टर या VC की कुर्सियों पे 

ये सब देखने, सुनने या ठीक करने के लिए थोड़े ही बैठे हैं? 

हम तो खुद नौटंकियों का हिस्सा है 

पुरे संसार में यही चल रहा है 

बताओ हम क्या अलग हैं? 

हम तो भारत हैं 

Exams Fraud रचते हैं या रचने देते हैं 

इसीलिए इन कुर्सियों पे बैठे हैं? 

और यही भारत है? 

और यही सच इस भारत का?

कैसे-कैसे चौ दू पा जैसे जुओं के हवाले दुनियाँ? 

क्या इतना ही सच है इस दुनियाँ का?    


कैंपस में organized Violence तक की नौटंकियों करने के लिए बैठे हैं। 

कोरोना के नाम पर दुनियाँ को बंद करने के लिए बैठे हैं। 

आदमखोरों की तरह, 

कितने ही गुनाहों पे या तो पर्दे डाले बैठे हैं।

या खुद गुनाहों के खुदा हैं हम।

हैं ना कितनी अजीबोगरीब प्राथमिकताएँ? या कितनी महान प्राथमिकताएँ?    

आप ऐसे लोगों से और ऐसे संस्थान से दूर भागने लगते हैं। 9, 2, 11 जैसे। मगर, ऐसी-ऐसी और कैसी-कैसी प्राथमिकताओं वाले तो हर जगह बैठे हैं। क्यूँकि, ये आम आदमी नहीं हैं, जिनकी इतनी महान प्राथमिकताएँ हों। ये तो इस सिस्टम के कर्णधार हैं। अहम कड़ियाँ हैं, इस सिस्टम की। गाँव आकर, यहाँ के हालात देख जानकार आपको लगता है की शायद बहुतों की नहीं, तो कुछ की मदद तो कर ही सकते हैं। मगर इस सिस्टम के ये महान जादूगर नहीं चाहते, लोग अपने पैरों पे खड़े हों। इनके जालों से दूर, अजीबोगरीब बेड़ियों से दूर, अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगियाँ जीयें। ऐसे में तो इन महान लोगों के हिसाब-किताब बिगड़ जाते हैं। आम गरीब आदमी को बस इतना-सा नहीं समझ आता की आपको इन महानों के जाल से निकलना है। उसी जाले में ज़िंदगी नहीं गुजारनी। ना आम आदमी को इतना आसानी से समझ आना और आ भी गया, तो ये महान कर्णधार ना उन्हें इतनी आसानी से निकलने देंगे, अपनी सिस्टमैटिक कैद से। जिस किसी ने इनके बेहूदा जालों से निकलने की कोशिश की, उसी का ईलाज कर देते हैं ये महान लोग। हैं ना कितने महान?

महानता, जैसे कल पार्लियामेंट में देखने को मिली? आपको क्या लगता है, संभव है? या महानता, जैसे 300, 400, 500, 5000 करोड़ तक लोगों के पास मिलते हैं या घरों में मिलते हैं? संभव है की कोई इतना पैसा किसी घर में इक्क्ठा कर ले और धरती के अंदर तक 24 घंटे तांक-झांक वाले इस सिस्टम को इतना कुछ होने के बाद खबर हो? और फिर उस कैश को seize करने के ड्रामे चलें? प्राथमिकताएँ? सिर्फ ड्रामे? 

एक तरफ आप किन्हीं के हालात जान, एक बहुत ही छोटी-सी रकम, किसी अपने को मदद के लिए देने को हाँ करते हैं। और जाने कहाँ-कहाँ हाय-तौबा मच जाती है। समझ से बाहर, ऐसे लोगों की प्राथमिकताएँ। ऐसे लोग उस घर को ही ताँडव का अड्डा बना डालते हैं। भला आम-आदमी की जान या ज़िंदगी की किम्मत ही कहाँ है, इस महानों के सिस्टम में। सबकुछ आकाओं के अनुसार होना चाहिए। नहीं तो अंजाम है, ईलाज है, इनके गुनाहों के खिलाफ उठती हर आवाज़ का। ऐसे ही जैसे एक बहुत ही छोटी-सी रक़म, किसी की नौकरी की 10-12 साल की जमा पूंजी, खाक खा रही है, इन महानों के जाले में। उससे भी महान, ऐसे लोगों का व्यवहार। कैसी-कैसी कुर्सियों पे बैठकर, कैसे-कैसे व्यवहार करते हैं लोग, अपने से छोटे एम्प्लाइज के साथ? वो संस्थाएँ, जिन्हें ऐसे पदाधिकारी मिल जाएँ, कैसे-कैसे कालिखों के साए में जीती होंगी? वैसे ही जैसे ऐसे समाज, जिन्हें इतने महान राजे-महाराजे मिल जाएँ? उसपे आम आदमी का वहम की वो चुनता है, अपनी सरकारें और उसके MPs और MLAs? इस गुप्त सिस्टम में क्या, कहाँ और कैसे चुना जाता है, ये तो अलग ही तरह का खेल है। जिसकी भनक तक ये आम आदमी को नहीं होने देना चाहते।  

Saturday, May 10, 2025

संदेशवाहक, गुप्तचर, गुप्तदूत? (Social Tales of Social Engineering)

Diversity of Messaging? 

ये पोस्ट तो? पिछले साल पढ़ी होगी आपने कहीं इसी या Social Tales of Social Engineering (40) में?

फिर आज कहाँ से आ गई?

कुछ चीज़ें एक बार में समझ नहीं आती? बार-बार पढ़ने पर या आसपास घटने पर, कहीं बेहतर समझ आती हैं? इसमें ऐसा क्या खास लगा मुझे?      

संदेशवाहक, गुप्तचर, भेदिया, विभिषण, गुप्तदूत? और भी कितने ही नाम हो सकते हैं ना? वो जो सब्ज़ी देने आते हैं। वो जो गुड़-शक्कर बेचने आते हैं। वो जो कटड़ा, भैंस बेच लो वाले आते हैं। वो जो बैडशीट बेचने आते हैं? वो जो शर्फ़ बेचने आते हैं? वो जो रद्दी लेने आते हैं। वो जो सूट बेचने आते हैं। वो जो झाड़ू, वाइपर बेचने आते हैं। वो जो चुन्नी बेचने आते हैं। वो जो शाल बेचने आते हैं। वो जो टीशर्ट, पायजामा बेचने आते हैं। 

उसपे वो जो मंदिर में सुबह-शाम भजन सुनाते हैं। या कोई खास मैसेज बताते हैं। वो जो ट्रैक्टर-ट्राली, गाड़ी, झोटा-बग्गी या कोई और व्हीकल्स आते हैं। वो जो पेड़-पौधे बेचने आते हैं। वो जो किसी के घर या दुकान के बनाने का सामान लेकर ईधर या उधर जा रहे होते हैं। वो जो साफ़-सफाई वाले आते हैं। या कब-कब आना बंद हो जाते हैं। वो जो फलाना-फलाना जाती से कुछ बुजुर्ग महिलाएँ, जो अब काम-धाम करने की हालत में नहीं हैं, सिर्फ़ खाना या कपड़े वगरैह के लिए कभी-कभार आते हैं। वो जो चप्पल-जूते बेचने वाले या ठीक करने वाले आते हैं। वो जो कुकर, गैस चूल्हा ठीक करने वाले आते हैं। 

वो जो, और भी कितनी ही तरह के पशु-पक्षी, कीट-पतंग, कीड़े-मकोड़े, सबके सब जैसे, संदेशवाहक कोई। आप जहाँ रहते हैं, उस सिस्टम की गवाही के गुप्तचर या कोढ़ कोई, ठीक आपके सामने होते हैं। कुछ ऐसा बता रहे होते हैं, जिनका अर्थ या अनर्थ उन्हें खुद नहीं पता होता। 

ये आपके आसपास के जीवन के बारे में और उनसे जुड़ी बिमारियों या रिश्तों की दरारों या कड़वाहटों, उनसे उपजे उत्पादों, कारकों के बारे में कितना कुछ बता रहे होते हैं? उनकी उत्पत्ति या प्रकिर्या के बारे में? और शायद उनके समाधानों के बारे में भी? कौन-सा जहाँ है ये? मुझे ये सब किसने और कैसे बताया? दुनियाँ के हर कोने में है, ये जहाँ। एक दुनियाँ के स्तर की बड़ी-सी लैब। जिसे जितने चाहो, उतने छोटे या बड़े स्तर पे अध्ययन के दायरे में रख सकते हैं। इससे भी मज़ेदार बात, ये लैब किसी भी विषय के लिए बंद नहीं है। जो चाहे, जिस विषय से चाहे या जिन विषयों की चाहे, मिश्रित खिचड़ी (Interdeciplinery) पका सकता है। और अध्ययन कर सकता है। आप आर्ट्स से हैं, तो आपको अपने लायक बहुत कुछ मिल जायेगा। विज्ञान से हैं, तो भी। और अर्थशास्त्र से हैं, तो भी। मर्जी आपकी, की कैसे और क्या जानना चाह रहे हैं।                          

OSLO UiO 

सोफ़े के कवर लो 

गद्दे के कवर लो 

मेज के कवर लो 

मुझे बालकनी में देख ठहर गई वो। मेरी तरफ देखा, सोफ़े के कवर ले लो। 

कहाँ से हो?

सुनारियाँ चौक से 

अरे आप कहाँ से आए हो? 

रोहतक, सुनारिया चौक 

अच्छा रहते हो वहाँ? 

हाँ! झोपड़ी है। 

वहाँ कहाँ से आए हो?

UP 

सोफे के कवर ले लो 

अरे, मैं तो मेहमान हूँ यहाँ। ऐसे ही पूछ रही थी। 

माँ आसपास होती तो सुनाती। पागल हो गई शुरू। किसी भी, कुछ भी बेचने वाले को रुकवाकर, पूछने लग जाती है। क्या मतलब हुआ, खामखाँ में? और फिर कोई भी कहानी घड़ देगी उसकी।   

जैसे हरी-भरी टोकरी और गई भैंस पानी में? या  "Don't Cross, Police Zone GAI Inspection"?

मतलब कुछ भी :)