Craft and Draft: (जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव)
भद पिटना, अपमानजनक, जले पे नमक,
criminal mindset (pejorative, offensive, criminals) (pejorative, offensive)और भी पता नहीं क्या-क्या।
चलो उन बड़े-बड़े राजनीतिक मंचों की बजाय, आमजन के दिन-प्रतिदिन के छोटे-छोटे घटनाकर्मों पे आते हैं।
मान लो किसी ने यूनिवर्सिटी में कहा, लिखित में, की मेरे कैंपस घर के बाथरूम में ये, ये समस्याएँ हैं। और कहीं किसी माँ का बाथरूम ही छूट गया। कैंपस में जो भी समस्याएँ रही हों मगर कहीं और वजह बहुत ही छोटी-छोटी सी बातें। वो भी इधर-उधर से भड़काई हुई या आग लगाई हुई।
कहीं आप 2-4 दिन के स्पेशल जेल विजिट पे जाते हैं। और कुछ वक़्त बाद कहीं और, कहीं दूर से पता चलता है की किसी चाचा की वजह से, कोई एक दिन के खास विजिट पे जेल गए। क्या सामान्तर घड़ाई है। उसपे वो उस चीज़ को इतना बड़ा हव्वा ले रहे हों, जैसे पता नी क्या पहाड़ टूट पड़ा हो। और एक यहाँ, साढ़े तीन दिन के खास विजिट को ऐसे शब्दों में उकेर दिया, मानो ईनाम मिला हो (किसी के शब्दों में)। शायद ऐसे-ऐसे, छोटे-मोटे पहाड़ भी चूर-चूर हो जाते हैं, जब वो अक्सरों में घड़े जाते हैं। यही नहीं, बल्की काफी कुछ समझ ही उन्हें लिखने और बार-बार पढ़ने पे आता है। मेरे साथ तो ऐसा होता है, बाकी का पता नहीं।
बीमारियों और बच्चों के इधर-उधर के किस्से कहानियाँ तो पूछो ही मत। बच्चों के केस से खास समझ आया की ऐसा कुछ अपने आप नहीं हो सकता। उनकी इस तरह की पढ़ाई एक खास तरह के माहौल में धकेलने से होती है। ठीक ऐसा ही बड़ों के साथ है। कुछ दोस्तों ने अपने स्कूल बच्चों (दिल्ली और रोहतक) की ऐसी-ऐसी कहानियाँ या कहो धमकियाँ बताई, की एक बार तो आप भी हैरान। ऐसा ये लोग सीखते कहाँ हैं? ये तो घड़ा हुआ और इनसे काफी बड़े बच्चों के विषय लग रहे हैं। फिर आप गाँव आने के बाद, रोज छोटे-मोटे और पता नहीं कैसे-कैसे बच्चों के खेलों, शब्दों और व्यवहार को नोटिस करना शुरू कर देते हैं। ओह हो, ये बात। ऐसे तो कुछ भी संभव है। बच्चे जो देखते हैं, सुनते हैं, समझते हैं, पढ़ते हैं, खेलते हैं, बस वहीं से आता है। काफी कुछ प्रत्यारोपित (implanted) जैसे। कॉपी जैसा-सा ही। कुछ-कुछ प्रतिबिम्ब (simulation) जैसा-सा ही। कटी-पतंग खेलें और बच्चे देर नहीं लगाते झगड़ने में। उसी को थोड़ा-सा edit या mould कर दो। Girls let's play favorite colours. और लो जी कुछ ज्यादा ही सॉफ्ट हो गए बच्चे। कटी-पतंग, शब्द ही भड़काऊ है। झगड़ा उकसाने वाला जैसे। तो क्या होगा। खेल वही है, बदला कुछ खास नहीं और बहुत कुछ बदल भी गया।
इस भद्दे वाली भुतिया राजनीती और इससे बचने का समाधान इसे छिपाने में नहीं, बल्की बताने में हैं। आमजन को जागरूक करने में है। आपस में दूरियां बढ़ाने में नहीं बल्की संवाद में है। भुतिया राजनीती का सबसे खतरनाक प्रभाव तब शुरू होता है, जब इसे कोई खास किस्म के कांड रचने होते हैं। ऐसे में ये न सिर्फ लोगों को आपस में लड़वाते और भिड़वाते हैं, बल्की, आपसी बोलचाल ही बंद करवा देते हैं। बोलचाल ही बंद करवाना मतलब, "फुट डालो और राज करो", नामक पौधे को खाद-पानी देना। अगर ऐसा हो रहा है तो मान के चलिए की कहीं कुछ, बहुत बुरा रचा जा रहा है और उसपे पर्दा करने की भी कोशिशें हो रही हैं।
आओ हुलिया बिगाड़ें, आप कुरड़ संभालें
आओ वृन्दावन घडें : खास तरह के भजन-प्रोग्राम, खास तारीखों को और खास मेहमानों के साथ, खास घरों में देखने को मिलेंगे। आजकल इन सबका चलन जितना आसपास देखा है, शायद ही कभी देखा हो। ये सब लिखने का उद्देश्य कोई कटाक्ष या नफ़रत फैलाना नहीं है, बल्की कोशिश, शायद इनके दुष्प्रभावों से अंजान, अनभिज्ञ लोगों को बचाना है। इनके जाल में ज्यादातर राजनीती के जालों के मारे हुए परिवार मिलेंगे। जहाँ खास तरह की बीमारियाँ भी देखने को मिलेंगी और रिश्तों के उतार-चढ़ाव भी। इन नासमझ और भोले लोगों को नहीं मालुम की ये कैसे-कैसे जाले हैं और क्या-क्या और घड़ने में कामयाब हो सकते हैं। जैसे अभी तक जो कुछ हो चुका, वो कम हो।
आओ घर वालों को बेघर करें : बड़े बुजर्गों की तो चलो उम्र हो रखी है, वो कीर्तन करें या भजन करें? मगर युवाओं और बच्चों को ऐसे वृन्दावनों से बचने और बचाने की जरूरत है। हालाँकि बड़े बुजर्गों के ऐसे मानसिक हालात भी तभी होते हैं जब घर या आसपास उन्हें लगता है की शांति नहीं मिल रही। और ये अशांति बड़ी राजनीतिक-सी होती है। बुजर्गों को खास तरह के भजन और मोबाइल पकड़ा दिए जाते हैं। पकड़ाने वालों को खुद कुछ नहीं पता होता और न ही उन्हें सुनने वालों को।
कालिख और खास तरह के काले धागे : पैसा आएगा इसलिए काला धागा बाँधे? या विपदाओं और मुसीबतों को दूर करेगा इसलिए? या शायद अपनों को ही खा जाएगा और मुसीबत और विपदा लाएगा, इसलिए? आपका अपना सुरक्षित पैसा, हाय-तौबा करके निकलवाएगा और खामखा में उड़वाएगा, काम की जगह नहीं लगवाएगा। और आपको लगेगा, आप तो अमीर हो गए ? या सुरक्षित बच्चे और परिवार को असुरक्षा की तरफ धकेल, बच्चों तक के हाथ में कटोरा थमवायेगा? फ्री शिक्षा और कैसी-कैसी स्कॉलरशिप के नाम के जालों के नाम पर? क्यों? क्युंकि पहले ये राजनीती अपनों को खाती है और फिर जो बचे हैं, उन्हें भी खाने की तरफ बढ़ती जाती है। खासकर, अगर लोगबाग इतना कुछ होने पर भी न संभल पाएँ तो। या शायद वो चालें और घातें ही ऐसे देते हैं की नासमझों को समझने के मौके ही नहीं देती। खास तरह की फ्री शिक्षा, खास जाले घड़ने वाले लोगों या पार्टी द्वारा दी गई, खास तरह के, कुछ और कांड घड़ने के लिए है। अपना नियंत्रण और बढ़ाने के लिए। कोई किन्हीं जालों से बच निकली तो उस घर के बच्चों और बाकी सदस्यों को घेरना शुरू कर दो। ज्यादातर तो पहले ही अंधभक्ति वाले नियंत्रण में हैं। होनी-अनहोनी की अपने तरह की मोहर ठोकना ही ये खास समय पर आए खास तरह के काले धागे हैं, कुछ खास लोगों के लिए। बच सकते हैं तो बचें। क्युंकि जो समझ आ रहा है उसके हिसाब से सिर्फ सावधान किया जा सकता है, खासकर जिस तरह का माहौल है उसमें। क्यूँकि ये वो अजीबोगरीब माहौल है, जहाँ सावधान करने वाले को धन्यवाद करने की बजाय, लोगबाग उल्टा-सीधा भी सुना सकते हैं और किसी तरह के परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।
आओ 50-50 करें : सोचो किसपे, कैसे और क्यों लागू हो रहा है? 50-50 या चाहे जो परसेंटेज हो, हर कोई ऐसे बाज़ार में कहाँ है? किसे धकेला जा रहा है, रिश्तों के ऐसे बाजार में (रिश्ते और बाजार?)? उन्हीं को जिन्हें खा चुके या खाने की कोशिश में हैं? और उन्हें अहसास तक नहीं है ? यही है काले धागे परोसने वालों का, कलिखी धंधा। धंधा है, पर गन्दा है ये। लोगों को पता नहीं इतना सब बताने के बावजुद क्यों नहीं समझ आ रहा। शायद इसीलिए इसे राजनीतिक मायाजाल कहा गया है?
आओ बदजुबान, जंगली, जाहिल कहलाएँ: दारु पिल्ले? या पाड़ने कुत्ते? इस टाइप के महामानव, इतने समझदार होते हैं की जहाँ से उन्हें मिलता है, उन्हीं को काटते हैं? या शायद खुद को ही ? अपने घर परिवारों को? आसपास में भी कुछ न कुछ असर तो जरूर होगा। अपने पैर पे जैसे खुद ही कुल्हाड़ी मारना? आसपास कई सारी ऐसी-ऐसी प्रजातियाँ हैं। जिनके व्यवहार और कारनामों को देखसुन के समझ ही नहीं आता, की ये सिर्फ दारु है या उससे आगे भी कुछ? दारु, शायद सिर्फ उससे भी आगे कुछ का ही परिणाम है ? माँ, बहन, बेटियाँ काम करती हैं, घर चलाती है। दारु-पिल्ले या पाड़ने-कुत्ते या खास किस्म के महामानव, न सिर्फ ठाली का खाते हैं, बल्की कितनी ही तरह का, कितना ही नुक्सान भी करते हैं। गाली-गलौच, मार-पिटाई, तोड़-फोड़, ये तो इनकी भाषा, तहजीब और संस्कारों के आईने हैं। उसपे वो संस्कारों के आईने भी उन्हें भुगतने वालों को दिखाने चलते हैं !
खानापान: आप जो कुछ खाते या पीते हैं, वो कहाँ से आता है? स्वास्थ्य और बिमारियों के राज और कुछ हद तक उनके समाधान भी उसी में छुपे हैं। ये सब एक तरफ, जहाँ किसी गुप्त कोड की तरह घुमता है, तो दूसरी तरफ, आम आदमी इसे गुफाओं की जानकारी, मतलब कहाँ से आता या जाता है, और वहाँ उनपे किस किस तरह के केमिकल्स प्रयोग होते हैं या गन्दा पानी प्रयोग होता है, से भी समझ सकता है। जो आप खाते-पीते हैं, उसका कुछ हिस्सा अपने आसपास के जीव-जंतुओं को भी दो और जानने की कोशिश करो, उनपे उसका क्या प्रभाव है। ऐसा ही कोई प्रभाव उन्हें खाने-पीने वाले इंसानों पे भी मिलेगा। इसके लिए आपको किसी खास विद्या की जरुरत नहीं। हाँ ! अगर हो तो समझना और आसान हो जाएगा।
Pejorative, offensive, criminal mindset, tricks:
Ashavthama
Shakargandi (Sweet Potato)
Nirgundi (Chinese chasetetree)
Pigweed
Papdi
Papad
Nagfani plants
hawthorns?
Basil holy basil
snakeplant
moneyplant
varieties differences rama, krishna,
15, 16,
Ear piercing and vaid
Thread and Liquid drying operation or treatment
Stone Removal Kidney or
Cancer
Tuberculosis
Vitiligo
Leukoderma
any diseases, treatment, tradition, ritiriwaz, plant, animal, bird or can be anything.
Maverick
और भी कितनी ही तरह के भूतिया प्रभाव, इनके बिलकुल विपरित दिशा में भी हो सकते हैं क्या? शायद उनपे ज्यादा गौर करने की जरुरत है, ऊपर लिखे दुष्प्रभावों को कम करने के लिए। या शायद भूतिया प्रभावों का रूख ही मोड़ने के लिए।
ये तो थी, थोड़ी बड़ी-बड़ी, थोड़े बड़े स्तर की, मगर बहुत ही आम-सी बातें, जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव की। ऐसे ही या इससे भी ज्यादा अहमियत रखती हैं, बहुत ही छोटी-छोटी सी बातें, जीवों पर निर्जीवों के प्रभाव की। जानते हैं, उनके बारे में भी, किसी अगली पोस्ट में।
कोड जीव हैं या निर्जीव?
trick is to distrack.
आप कहाँ व्यस्त हैं?
Pejorative and multiple stickers attacking not just the person at front but multiple ways, many other people also.
Food
Water
Shelter/Shraay
Diseases
Hospital
Death
Cremation Ground
Mourning period
Sometimes you have no idea untill it's too late
Sometimes you have an idea and cannot work upto the extent you can
Sometimes, there are so many, sometimes
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